
नयी दिल्ली: आज सुबह जैसे ही बिहार सूचना केंद्र के सेवानिवृत अधिकारी और जेएनयू के पूर्व छात्र रंजन शर्मा ने सोशल मीडिया के जरिए यह सूचना दिया कि हमारे जेएनयू के पुराने साथी अनिल सिंह जी नहीं रहे। आज सुबह ही हृदयाघात से चल बसे। एक जुझारू प्रगतिशील व्यक्ति को नमन।
रंजन शर्मा से प्राप्त यह दुखद समाचार साथियों के लिए काफी चौकाने वाली थी। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सिंह जो कि इन दिनों बिहार के पिछड़ेपन और मातृप्रदेश में बदलाव को लेकर सतत रूप से सक्रिय थे,लगातार संगोष्टी कर रहे थे,यहां तक की आगामी 17 जुलाई को भी अपने साथियों के साथ राजधानी पटना में आयोजित होने वाले एक संगोष्ठी के जरिए बिहार के अभिशाप बने बाढ़ की समस्या को लेकर विमर्श को बढ़ावा देने की दिशा में अग्रसर थे, ऐसे व्यक्तित्व की मात्र 65 साल की उम्र में दुनिया से अलविदा कह देने वाली खबर पर सहसा भरोसा कर लेना काफी मुश्किल था।
डॉ ब्रजमोहन सिंह ने लिखा है कि…
मर्मांतक सूचना…हाहाकारी हृदयविदारक एहसास दोस्तों के बीच….मैं उनको ही पाकर छपरा के एक गाँव से जेएनयू में पहुँचा था…. राजेंद्र कॉलेज के पास ही दौलतगंज में सिन्हा लॉज था उनके परिवार का… वहीं भेंट हुई और एडमिशन लेने की इच्छा जेएनयू के लिये बताई…वहीं संपर्क बना…फार्म भरने,खाने से लेकर रहने,सब सीनियर से परिचय कराने में उनका व्यवहार अपने भाई,मित्र जैसा था…वहीं रंजन भैया से वैसा ही प्यार मिला… मैं भारतीय भाषा केंद्र का छात्र बना…एक जिंदादिल, दोस्तों का दोस्त,एनजीओ और अन्य गतिविधियों में लगातार सक्रिय, मित्रों का आत्मीय दायरा, एआईएस एफ में सक्रिय भागीदारी, पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते…..महानगर से लेकर..विदेशों तक पहचान बनाते……ऐसे समय में एक जिंदादिल इंसान का इस तरह अचानक चले जाना सभी को मर्माहत कर जाता है…शब्द नहीं हैं
मेरे पास।पूरे परिवार को असह्य दुख सहने की शक्ति मिले…वो चेहरा मैं भूल नहीं पा रहा हूँ….मन रो रहा है…..अभी कुछ दिन पहले ही उदय जी,रंजन शर्मा भैया,मदन राय जी के साथ उनकी दिल्ली में बैठकी का चित्र देख रहा था।उनको कोलकाता आना था..कभी……अब ये सौभाग्य कहाँ…सादर नमन भैया….

बालेन्दु शेखर मंगलमूर्ती लिखते हैं कि…
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आज की सुबह जब मैं बनी को स्कूल छोड़ने जा रहा था तो उससे कह रहा था, देखो तो कितनी अच्छी सुबह है. रोड पर शांति है, धुप में हलकी गर्मी है पर अच्छी चमकती सुबह है. उसे स्कूल से छोड़ कर जब मैं लौटा तो सोशल मीडिया पर एक समाचार ने मुझे स्तब्ध कर दिया. Anil K Singh सर का देहांत !! आज सुबह हार्ट अटैक के चलते दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल में देहांत हो गया. एकदम स्तब्ध कर देने वाली खबर !! Ranjan Sharma सर के वाल से पता चला. उनका जाना एक guardian के जाने जैसा है. इसकी भरपाई अब संभव नहीं.
सर से मेरा सम्बन्ध 16 साल पुराना था. 16 सालों में हम जब भी मिले, बहुत आत्मीयता से मिले. दिल्ली में, पटना में, रांची में, हैदराबाद में. जहाँ भी मिले, बहुत स्नेह और सम्मान के भाव से मिले. बतौर सोशल एक्टिविस्ट, वे समाज के मुद्दों को लेकर बेहद संजीदा थे. एक संजीदा इंसान जो उतने ही जिंदादिल भी. उनके साथ जो भी लोग होते, सहज भाव से हँसते और जब मुद्दों की बात आती तो उतनी ही गंभीरता से बात होती. सोशल सेक्टर में उन्होंने लगभग चार दशक का समय गुजारा था और बेहद चर्चित इंसान थे. सुलझी हुई सोच, वामपंथ की ओर झुकाव, देश में दक्षिणपंथ की बढ़ती हवा से चिंतित, सोशल सेक्टर के लिए सिकुड़ते स्पेस पर लगातार अपनी राय रखते। वाणी, वादा न तोड़ो अभियान जैसे तमाम संगठनों, आंदोलनों से जुड़े अनिल सिंह ने बिहार के छपरा जिले से दिल्ली तक की और फिर देश विदेश तक की यात्रा की थी. JNU से उन्होंने पढ़ाई की थी और अपने विचारों में प्रगतिशील थे.
कोरोना काल में औरों की तरह वे भी इन एक्टिव थे. कोरोना काल के बाद उन्होंने अपनी गतिविधियां बढ़ायीं. इधर वे तमाम साथियों और बुद्धिजीवियों के साथ उत्तर बिहार के पिछड़ेपन के मसले को लेकर बौद्धिक विमर्श आयोजित करवा रहे थे. इस सिलसिले में वे बिहार लगातार आ जा रहे थे. एक दो महीने पहले ही मधुबनी में उनसे मुलाक़ात हुई थी.
इधर इसी सिलसिले में 17 जुलाई को पटना में A N Sinha Institute में एक परिचर्चा आयोजित होने वाली थी जिसके लिए हम दोनों ने मिलकर एक पेपर भी लिखा था. परसो तक इसके सिलसिले में बात होती रही थी और आज फिर बात होनी थी. पर सुबह सुबह सब ख़त्म हो गया.
उनका जाना बेहद खल रहा था. 65 साल की उम्र में वे बेहद एक्टिव थे, जिंदगी से भरे. उम्मीदों से भरे. बहुत काम करने थे. हमें लम्बा सफर तय करना था. एक दशक तो जरूर मैं सोच रहा था. पर इधर अपने करीबी मित्रों को खो रहा था. उस कड़ी में सर का नाम भी आज जुड़ गया. जीवन में एकाकीपन बढ़ता चला जाता है. यादों की परतें बनती चली जाती हैं. एकाकीपन में इन्ही यादों का सहारा होता है. जिंदगी रोज नए रंग दिखाती है.
उन्होंने काफी लोगों की जिंदगी को छुआ है और बेहद सार्थक जीवन जिया है. सर को श्रद्धांजलि. आप हमेशा हमारी यादों में रहेंगे.
असरार खान ने लिखा है कि…
यह दृश्य कितना तकलीफ देह है एक ऐसा साथी जो हमेशा तरोताजा रहता था उससे जो बन पड़े सहयोग करना उनके स्वभाव में था पति पत्नी दोनों गज़ब के सामाजिक दायित्व वाले कार्यक्रमों में आगे बढ़कर हिस्सा लेते थे।
सुनिता शर्मा लिखती हैं कि…
The news comes as a complete shock! Hard to believe. इतने ज़िन्दादिल इन्सान का इस तरह चले जाना हम उन सभी (जो उनको नज़दीक से जानते थे) के लिए किसी आघात से कम नहीं है! मेरे लिए तो वह सदैव special थे! एवं हमेशा रहेंगे! मेरे विवाह में उन्होंने एवं बिमला भाभी जी ने कन्यादान कर एक विशेष रिश्ता बनाया था। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें एवं वह स्थान दें जिसके वह सही में अधिकारी हैं!
अजय यायावर ने लिखा है कि…
बेहद दु:खद. नि:शब्द हूं। विश्वास नहीं हो रहा है कि अनिल जी नहीं रहे। हमारी देश और बिहार के वर्तमान स्थिति पर बराबर बातें होती रहती थी। हमारी अंतिम बार बातचीत इसी 7 जुलाई को हुई है। बेहद सरल, सहज, स्पष्ट और मददगार प्रवृति के थे।
मानस सिंह लिखते हैं कि…
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हमारे प्रिय अनिल सिंह मामा जी का आकास्मिक निधन का मनहुस खबर से मन बहुत चिंतित दुखी हो गया हैं,अनिल सिंह मामा आपका अचानक अलविदा ऐसे जाना अब इस दुनिया मे नही रहना परिवार समाज देश के लिए अपूर्णिये क्षती हुवा हैं,अनिल सिंह मामा जी का मुल स्थायी घर सिन्हा लौज दौलतगंज थाना-भगवान बाजार छपरा सारण बिहार मे स्थित हैं |अनिल सिंह मामा ज़ी अंतराष्ट्रिय श्रेणी के संसद सेवा संस्थान नामक मशहुर गैर सरकारी संस्था के राष्ट्रीय महासचिव थे,उनका रूची समाज सेवा करना समाजिक विचार धारा के मिलनसार मृदूलभाषी अच्छे व सच्चे स्वाभाव के नेक ईमानदार इंसान आदमी थे,कुछ दिन पूर्व मे उनके नई दिल्ली साकेत घर आवास पर जाकर उनसे शिष्टाचार मुलाकात करके उनका स्वास्थ्य का हाल चाल व जानकारी लिया और परिवार से मिला था|वह वर्तमान मे साकेत के स्वंत्रता सेनानी कॉलोनी नई दिल्ली मे अपने परिवार के साथ रहते थे|उनका जब भी छपरा सारण बिहार आना होता तो हमारे घर पर हमसे मिलने मुलाकात करने जरूर आते थे|वह बहुत कम उम्र मे अपना घर से दूर दिल्ली मे अपने दम पर जाकर संघर्श मेहनत परिश्रम के बल पर अपना घर आशियाना बनाकर परिवार के साथ रहते थे ,वह परिवार समाज देश के लिए ईमानदार अच्छे व सच्चे सहयोगी आदमी थे|उनका ऐसे अचानक असमय निधन हो जाना बहुत दुखद घटना हुवा हैं,उनका उम्र 65वर्ष लगभग के अवस्था मे निधन हो गया हैं |उनका कुछ दिनो से बिमारी से ईलाजरत थे,उनका तबियत खराब चल रहा था|इस दुखद घड़ी मे मेरा संवेदना उनके शोकाकुल परिवार के साथ हैं|ईश्वर भगवान से प्रार्थना करते हैं की उनके मृत आत्मा को शांति दे और परिवार को इस दुख के घड़ी मे दुख सहने की सहन शक्ति प्रदान करें |भावपूर्ण श्रद्धा सुमन से सच्ची श्रद्धांजली शत शत नमन् अर्पित करता हूँ |ॐ शांति ॐ शांति|
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने सोशल मीडिया के जरिए अनिल सिंह को याद करते हुए लिखा है कि …
सामाजिक और बौद्धिक क्षेत्र में निरंतर सक्रिय
अनिल कुमार सिंह का आज सुबह निधन हो गया. अनिल भाई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(JNU) के पूर्व छात्र और हम लोगों के समकालीन साथी थे. वह एक NGO से सम्बद्ध थे.
मूल रूप से बिहार के रहने वाले अनिल भाई अपने दोस्तों और सहकर्मियों की सर्किल में बेहद सक्रिय और लोकप्रिय थे. जहां तक याद आ रहा है, अपने छात्र-जीवन में वह ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से सम्बद्ध थे. जीवन के अंत तक वह सेक्युलर और लोकतांत्रिक विचारों और मूल्यों के साथ रहे.
सलाम और श्रद्धांजलि अनिल भाई.
परिवार के प्रति गहरी शोक-संवेदना.
नागेंद्र प्रसाद सिंह लिखते हैं कि…
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अभी तो तीन दिन पहले दिल्ली में उनसे मिलकर आया था, और आज सुबह सवेरे सोशल मीडिया से उनकी मृत्यु की खबर पढ़ने को मिली. करीबन 40-45 वर्षों से सामाजिक कार्य से जुड़े रहे अनिल कुमार सिंह की मृत्यु से हमें काफी सदमा लगा है.
मसूरी से हमलोग अपने घनिष्ठ मित्र और जेपी सेनानी सीताराम सर्वहारा जी के लड़के ऋषभ की शादी से लौट रहे थे. पटना की ट्रेन शाम को थी. हमने इस अंतराल में कुछ प्रमुख लोगों से मिलने का मन बनाया. पहला नाम आया अनिल कुमार सिंह का. सीडब्ल्यूएस के वे ट्रस्टी थे. उनके कई कार्यक्रमों में शिरकत करने का मौका मिला था, पटना में, सिकंदराबाद में. सामाजिक मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ थी. बेबाक बोलते थे.
अनिल बाबू ने अपने घर का पता और मैप मेरे व्हाट्सएप पर भेज दिया था. जेपी सेनानी डॉ ब्रजेश शर्मा के साथ उनसे मिलने का कार्यक्रम बना.अभी मेट्रो के रूट की तलाश में लगा था कि माननीय विधायक पंकज मिश्रा ने हम लोगों के लिए एक ओला का प्रबंध कर दिया. ओला वाले ने गूगल मैप का सहारा लेकर फ्रीडम फाइटर एनक्लेव, क्वार्टर नंबर भी 28 तक पहुंचा दिया. उनके घर की घंटी बजाई, तो हमेशा मौज मस्ती में रहने वाले अनिल बाबू खुले बदन हाफ पैंट में मिले. दरअसल उनके ड्राइंग रूम में काफी गरमी थी, उन्होंने बड़े आदर से बिठाया. हालचाल पूछा.अंदर के कमरे से उनकी पत्नी निकली और किचन में चली गई. हम लोगों के लाख मना करने के बावजूद माने नहीं और नींबू पानी के साथ बिस्किट भरा प्लेट टेबल पर लगा दिया. हम और ब्रजेश जी बड़े संकोच में पड़े थे और 75 प्लस उम्रदराज इंसान से सेवा लेना उचित नहीं लग रहा था.
बातें शुरू हुई, तो देश स्तर पर स्वयंसेवी संस्थाओं के हालात, एफसीआरए कानून में हुई बेतरतीब तब्दीलियां से हो रही परेशानियां, गांव से जुड़े कार्यकर्ताओं के सामने खड़े संकट के साथ-साथ पटना अनुग्रह नारायण सिंह संस्थान में बिहार विमर्श कार्यक्रम में आने का आमंत्रण तक बात पहुंच गई. हमलोग जब चलने को होते, तब वे बार बार बैठने को कहते. बड़े ही सहृदय व्यक्ति थे अनिल बाबू. जानकारी का भंडार था उनके पास. कौन जानता था कि उनसे यह अंतिम मुलाकात होगी. सादर नमन
श्रद्धांजलि🙏🙏
लाल बाबू यादव लिखते हैं कि…
अनिल कुमार सिंह मेरे बेहद करीबी मित्रो में से थे राजेंद्र कॉलेज छपरा में वे मेरे बैच मेट थे अनिल और अशोक दोनो भूगोल ऑनर्स के विद्यार्थी थे जबकि मैं राजनीति शास्त्र का बाद में अनिल जी अशोकजी के साथ जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी चले गए अशोकजी ने तो भारत सरकार के बाल विकास मंत्रालय को ज्वाइन कर लिया और निदेशक के पद से सेवानिवृत हुआ है अनिल ने स्वसेवी संगठन v a n I के माध्यम से समाज सेवा का कार्य सुरू किया हम निरंतर संपर्क में रहे कुछ माह पहले राम जयपाल कॉलेज के लकछामी नारायण अध्ययन केंद्र में बिहार के विकास पर सेमिनार उनके कहने पर हमने आयोजित किया रहा आज उनके निधन के अकस्मात खबर सुनकर मैं स्तब्ध हूं। अनिल भाई को सत सत नमन।

संतोष कुमार सिंह ने लिखा है कि…
सुबह सुबह बहुत हृदय विदारक सूचना है। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सिंह जी के जाने की खबर मंगरूआ के लिए आघात की तरह है। वर्षों पहले हमको लगता है 2017 में जब अनिल सिंह चंपारण से दिल्ली तक यात्रा कर रहे थे तो पटना से अमरनाथ झा ने फोन कर कहा..अनिल सिंह के जानल। उनके सामाजिक गतिविधियों को मंगरूआ जानता तो बहुत पहले से था, लेकिन मिल कर परिचय नहीं देता था। वो अपनी यात्रा लेकर गांधी पीस फाउंडेशन पहुंचे। उनसे मुलाकात हुई। जब परिचय पूछा उन्होंने तो मंगरूआ ने पत्रकार के तौर पर अपना परिचय दिया और बोला उम्र में हमसे बड़े हैं लेकिन आप मेरे दामाद हैं। कंस्टीट्यूशन क्लब में मिले तो कहे घर आईये। घर गया था मंगरूआ उनके। विराट व्यक्तित्व। लेकिन एक सच्चाई ये भी अनिल सिंह मंगरूआ के दामाद थे..बहुत दुखी है मंगरूआ आज। एक लड़ाका चला गया और सामाजिक कार्यों में मंगरूआ का सहयोग देने वाला..तमाम प्रक्रियाओं से रूबरू कराने व राह आसान बनाने वाला एक संबल चला गया।
छपरा के एक छोटे से मुहल्ले से निकलकर दिल्ली के जेएनयू और वहां से देश विदेश तक अपने पहचान गढ़ने वाले वरिष्ठ साथी को विनम्र श्रद्धांजली। अभी आपको जाना नहीं था..अभी तो आप बिहार को गढ़ रहे थे..समाज के तरक्की व बदलाव के लिए चलाये जाने वाले तमाम विमर्शों का केंद्र बने हुए थे।







