परस्परता की डोर से बँधे हम

कहाँ के हो ? मेले, बाजार या प्रतापगढ़ में कोई पूछता तो हम कहते-हरखपुर। जानने वाली की एक छवि होती, उदण्ड ठाकुरों का गाँव।

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प्रताप सोमवंशी (प्रख्यात कवि, कार्यकारी संपादक-हिन्दुस्तान)

पेड़ हर वक्त परिन्दों की जगह रखता है
गाँव ने मुझसे कहा था सुनो, आते रहना

शहर में रहने वाले हम जैसों की जिन्दगी में गाँव चाहे जितना सिमटा हुआ हो, गांव हमेशा हमारे लिए अनंत विस्तार की बाँहे फैलाये रहता है। गाँव में हम कुछ घन्टे बिताकर लौटें या कुछ दिन, चौराहे पर मिले गाँव के साथी-संघाती या कोई बुजुर्ग यह कहता ही है, जल्दी आया करो। पुरखों की जमीन है, शहर में कितना बना लो, सुकून यहीं पाओगे। मैं भी जल्द आने की कोई योजना बताता हूँ, वह भी खुश होकर हुँकारी भरता है। दोनों जानते हैं कि यह होने वाला है नहीं। यह देश के हर गाँव का मिजाज है, जो शिकवा-शिकायत, क्या दिया क्या नहीं दिया के जोड़-घटाव के बिना आपसे प्यार करता है। देश के ऐसे ही सात लाख गाँवों में एक। उसी एक गाँव का बाशिंदा मैं, जिसने इसी फिक्र-ओ-सोच में बीस साल पहले ये शेर कहा था, जो अपने लिखे को पल-प्रतिपल जीता रहता है।

गाँव हरखपुर, थाना-मान्धाता, जिला-प्रतापगढ़, अवध, उत्तर प्रदेश, बचपन से कितनी बार यह पता चिट्ठियों पर लिखता, अलग-अलग फार्म पर स्थाई पते के तौर पर भरता आया हूँ। ये वो पता है जो दिमाग में नहीं दिल में रहता है। अपनी तरह की अवधी बोलते आदमी से मान्धाता की दूरी नापता है। पास के गाँव का हो तो घर की दूरी फर्लांग में गिनने लगता है। क्या करें फासले ऐसे ही तो घटाए जाते हैं। आज गाँव पर लिखते समय वही दूरी तय कर रहा हूँ, पहले मीलों में फिर फर्लांग दर फर्लांग।

 

मेरे गाँव से प्रतापगढ़ 12 किलोमीटर है, इलाहाबाद आज का प्रयागराज 42 किलोमीटर। यूँ तो नजदीक प्रतापगढ़ है, लेकिन मेरे गाँव को इलाहाबाद करीब लगता है। पढ़ाई, लिखाई, हाट-बाजार, हाईकोर्ट, संगम आदि दीन-दुनिया के सारे तार इलाहाबाद से जुड़ते हैं। प्रतापगढ़ छोटी खरीददारी, कचहरी और इलाहाबाद न जा सकने वालों के लिए रह गया है। बचपन में प्रतापगढ़ जाना भी एक उत्सव की तरह था। गांधी ट्रान्सपोर्ट की ट्रक के इन्जन में बनी हुई एक बस जाती थी। आज के बच्चों को कल्पना भी नहीं होगी कि 12 किलोमीटर का सफर पूरा करने में ढ़ाई से तीन घन्टे लगते थे। हम सुबह से ही तैयार होकर बस के इन्तजार में खड़े हो जाते थे। अब तो मोटरसाइकिल से लड़के बीस मिनट में पहुँच जाते हैं। शहर भी उसी रफ्तार से गाँव तक आ गया है, जो सम्पन्न हैं, प्रतापगढ़ या इलाहाबाद बस गए हैं। जो नहीं जा सके, सड़क के किनारे घर बनाकर रहने आ गए। ठेठ गाँव में उजाड़ का एहसास होता है।

कहाँ के हो ? मेले, बाजार या प्रतापगढ़ में कोई पूछता तो हम कहते-हरखपुर। जानने वाली की एक छवि होती, उदण्ड ठाकुरों का गाँव। इस पहचान से बचपन में हम खुश भी होते थे। बस वाला सिर्फ हरखपुर बोलते ही पैसा नहीं माँगता था। अगल-बगल के गाँव वाले हरखपुर बोलकर गाँव के स्टाप पर उतरते। लेकिन अगर कोई दूसरे गाँव वाला हरखपुर बताकर हमारे यहाँ के स्टाप पर उतरता तो गाँव के चाचा लोग उसकी ठुकाई भी कर देते थे।

मेरे पिता बताते हैं कि मानधाता के मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक थे, महराजदीन तिवारी। एक दिन उन्होनें गाँव के लड़कों को एक कतार में खड़ा किया। उनके पास शिकायत थी कि किसी दूसरे गाँव के लड़कों से मेरे गाँव वालों ने मारपीट की थी। पिता जी और उनके साथी सोच रहे थे कि आज पिटाई होगी, हुआ उल्टा। महराजदीन तिवारी ने लाइन में खड़े लड़कों के आगे हाथ जोड़ा और कहा- ठाकुरों, जिस काम के लिए तुम लोग मशहूर हो जाओ वही करो। मारो, कूटो, लूटो, छीनो-झपटो। तुम लोग पढ़-लिख लोगो तो मिडिल पास हो जाओगे, तुम्हारा गाँव बदनाम हो जाएगा। पिता जी बहुत शर्मिन्दा हुए, बाकियों का पता नहीं।

पिता जी गाँव के कुछ लोगों में थे, जिनपर गाँव का ऱंग नहीं चढ़ा, उन्होंने अपनी और आने वाली पीढ़ियों को कूप-मण्डूक होने से बचाया। मुझे बाद में यह कसक और कचोट रही कि गाँव में जब दबंग थे तो अँग्रेजों से कोई एक भी क्यों नहीं लड़ा। फौज-पुलिस में भी बहुत थे, लेकिन आजादी की लड़ाई में मेरे गाँव की कोई सक्रिय भागीदारी का कोई भी ब्यौरा नहीं मिलता है।

तब यह कचोट और बढ़ जाती है कि जब मैं जिले के गौरव को देखता हूं, जिसमें …..
ऐसे में मेरी और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्यादा जिम्मेदारी बनती है कि हम अपनी सामाजिक भूमिका अदा करें। मुझे गर्व है कि गाँव के मेरे सहपाठी केपी सिंह जो कि मेरे गाँव के पहले इन्जीनियर भी हैं, किसानों के सवाल और पर्यावरण के क्षेत्र में बड़ा योगदान कर रहे हैं। कमलेन्द्र जी बंगलौर में रहते हैं और योगेन्द्र यादव के स्वराज अभियान से भी जुड़े हुए हैं।
गाँव के परिदृश्य में जो बेहतर हुआ है। उसमें अब नई पीढ़ी के बच्चे आईआईटी, मेडिकल और पीसीएस की सेवाओं में आ चुके हैं।

अपने परिवार की बात करूं तो दादा स्वर्गीय माता बख्श सिंह पटवारी थे, चरण सिंह जब मुख्यमंत्री थे, तब हड़ताल में शामिल होने के कारण बाबा का बस्ता रखा लिया गया। पूरा जीवन बिना पेंशन, खेत भी कोई ज्यादा नहीं था। कम खेती और बड़ा परिवार अपनी मेहनत और ईमानदारी से ही उन्होंने पाला। पेड़ लगाने का तो उनको जूनून था। उनके लगाए हजारों पेड़ आज भी गाँव और आसपास लहलहा रहे हैं। आजी अंतराजी देवी एक बड़े जमींदार परिवार से थीं, हमारा परिवार एक किसान। हैसियत का फर्क भी बहुत था।

मेरे पिता श्री राम लखन सिंह सिंचाई विभाग से जिलेदार के पद से रिटायर हुए। मामूली तनख्वाह थी, लेकिन एक ही सपना लिए चलते रहे कि मेरे भाई-बहन पढ़ सके। ऐसा हुआ भी, पिताजी से ठीक छोटे श्री उमाशंकर सिंह ही नहीं पढ़ सके। उनसे छोटे हरिशचंद्र बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय ले अंग्रेजी में एमए किया और सप्लाई विभाग में इंस्पेक्टर थे। मेरे तीसरे चाचा डा एलवीपीबी सिंह इलाके के पहले एमबीबीएस डाक्टर हुए, जो बाद में संयुक्त चिकित्सा निदेशक क पद से रिटायर हुए। सबसे छोटे चाचा का जिक्र पहले कर चुका हूँ। बड़े भइया शिव बहादुर सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में एम.एससी. की, वकालत की पढ़ाई भी की। हम सब पढ़ सके, कुछ बन सके इसी में उनकी आँखों ने अपने लिए कैरियर का कोई सपना ही नहीं देखा, लेकिन ईश्वर ने उनके हिस्से कारोबार में सफलता की वो इबारत लिख दी है कि अमूमन एक पीढ़ी के कारोबार में ऐसा कम ही होता है। पैसे से बड़ा उन्होनें जो सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित की है, वह हम सब के लिए गर्व की बात है। पिता जी के तबादले के साथ हम बहराइच गए, भइया की नियति में वह शहर दर्ज हो गया। मैने भी वहां से हाईस्कूल पास किया। छोटी बहन बबिता सिंह गांव की पहली पुलिस अधिकारी बनी, जो लखनऊ में अपर पुलिस अधीक्षक के तौर पर कार्यरत है। अगली पीढ़ी के बच्चे और भी बेहतर कर रहे हैं।

कभी मैने लिखा था-

उम्मीदों के पंछी के पर निकलेगें
मेरे बच्चे मुझसे बेहतर निकलेगें
तो मेरा सोचा मेरे घर के लिए बेहतर ही हो रहा है। बात गांव की करें तो पढ़ाई की कद्र हमने देर से शुरू की तो उसकी रफ्तार भी धीमी ही होगी, सोमवंशी परिवार का एक गाँव बहुंचरा है, जहां आईएएस-आईपीएस की भरमार है। मेरे अपने समेत आसपास के तमाम गाँवों का सबसे खराब पक्ष मुझे जो लगता है कि लड़के कुछ करने की बजाए आसान तरीके से पैसे कमाने के जुगाड़ तलाशते रहते हैं। उसके लिए वह हर तरह का दंद-फंद भी करने को तैयार रहते हैं। दस साल से ज्यादाहुए मानधाता के पास इन्दुपुर गाँव में एक वालीबाल प्रतियोगिता के उद्घाटन समारोह में शामिल होने गया था।वहाँ बहुत से मसल्स बनाए सिक्स पैक वाले नौजवान दिखे, अच्छा लगा कि नई पीढ़ी सेहत को लेकर सजग है। लेकिन अगले ही पल कुछ से बातें शुरू की तो पता चला कि ये बच्चे नए किस्म के बाउन्सर हैं, जैसे दिल्ली और आसपास पब, क्लब, बिल्डर के यहाँ काम करते हैं। गाँव के लड़के बाहुबली नेताओ के साथ जुड़े हैं। इनकी हालत दिल्ली के बाउन्सरों से भी गई बीती है। इन्हें कोई नियमित वेतन या खर्चा भी नहीं मिलता है। ये सब जातीयता के तार से नेताओं से बन्धे रहते है, या यूँ कहिए खुद शोषण की ओखली में अपना सिर दे आते हैं। इनमें से कुछ होते हैं, जो नेता के साथ मिलकर ठेकेदारी या दलाली आदि कर पाते हैं या फिर छोटा-मोटा चुनाव लड़कर अपनी सियासी दुकान खोल लेते हैं। ज्यादातर लड़के सिर्फ उपरी चमक का शिकार होते हैं, बाद में इनके हिस्से सिफर आता है। अपराधी छवि के नेताओं का आकर्षण के कारण इस सिलसिले में गिरावट की कोई सूरत नजर नहीं आती है।

अपनी माटी में सम्मान…वर्ष 2008

हमारे जिले में रियासते ज्यादा हैं, किसानो के लिए जमीनों का रकबा कम है। दस-बीस बीघे के राजकुमार, राजा साहब मिल जाएंगे, बाकी लोगों का हाल और खराब है।
मेरी एक शेर इसी परिवेश को बयान करता है..
रियासत जब भी ढहती है, नवासे दुख उठाते हैं
कहीं तांगा चलाते हैं, कहीं पंचर बनाते है

इस आइने में देखूं तो मेरे गांव का हाल और भी खराब है। मेरी पीढ़ी के ज्यादातर लोग अपना हिस्सा लगाएं तो दो बीघा जमीन भी उनके हिस्से नहीं आने वाली। इसका एक फायदा तो यह होता है, जो उन्नति चाहते हैं उनके लिए पढ़ाई के अलावा कोई रास्ता नहीं। मेरे घर-परिवार से लेकर गांव-जवार तक अफसरों की कतार है। दूसरी तरफ यह देखकर अफसोस होता है कि वे युवक जो कोई काम नहीं करते, दिन भर यहां-वहां घूमते हैं उनके बीघा-दो बीघा खेत भी खाली रहते हैं या बंटाई पर चढा रखा है। दस साल पहले गांव के साप्ताहिक बाजार में एक दिन गया तो पता चला कि बेलों की सब्जियां लौकी, कद्दू, तरोई, नेनुआ, सेम आदि हर सप्ताह 10 हजार रूपए की बिक जाती है यानी घरों पर बेल लगाने का रिवाज भी खत्म हो गया। मेरे बचपन में ये सब्जियां सब एक-दूसरे के घर पहुंचा जाते थे। घर में कोई आयोजन हो और 200-500 के लिए खाना बनना तब बात और थी।

 

बेलों से मेरा आशय समझने के लिए आप मेरी यह कविता पढ़िए-
हमारी छत पर बेलें
—-
अपने हरे-हरे पत्तों के पंख फैलाए
छत पर इत्मीनान से पसरी
ये सब्जियों की बेले हैं
मिट्टी को कुछ हफ्ते पहले
सौंपे गए थे इनके बीज
फिर उगे पौधे
जो छुटपन से ताकने लगे दीवार की तरफ
पौधे से बेल होने के बीच
ये दीवार पर रस्सियों के सहारे
पांव टिकाते चढ़ आई है यहां तक
भरी पूरी जवान बेलों का छत पर कब्जा है
यह देखकर पूरा घर प्रसन्न है
ये बेले फल देने में भले एक महीना लगाए
मुस्कुराहट बांटने लगती हैं अंकुआने के साथ
जब मिट्टी फोड़कर बाहर झांकते हैं
इन बेलों के शिशु
बच्चे ताली बजाते हैं, एक दूसरे को दिखाते है
अंकुरित बीज और बच्चे साथ-साथ खिलखिलाते हैं
बेले यहीं से सिखाती हैं
बच्चों को सृष्टि के सृजन का पहला पाठ
बच्चे अंगूठे और मध्यमा उंगली को तानकर
बित्ता बनाते हैं फिर नापते हैं
हर गुजरते दिन के साथ कितने अंगुल बढ़ी बेले
ऐसा लगता है कि बित्ता को माप की इकाई
बनाया ही गया बच्चों और बेलों के लिए
बेलों के बढ़ने के बाद उनके फल
को भी इसी तरह नापते है बच्चे
एक बित्ता, दो बित्ता, तीन बित्ता
ये बेले सिखाती है धैर्य
कि कैसे एक बीज फल में बदलता है
पूरी एक प्रक्रिया के साथ
लौकी, करेला, तरोई, सेम
जब अपनी बेलों से टूटकर आएंगे रसोई तक
इतना तो तय है कि जितना भार में होंगे
उससे ज्यादा भाव में
जो देगा पूरे घर को सुख कि
ये उनकी अपनी बेलों की सब्जियां हैं
जिनमें शामिल है पूरे घर का बोना, सींचना और सहेजना
इन सब्जियों स्वाद तौला जाएगा बाजार के साथ
वहां हर तरह से भारी पड़ेगीं ये
सच भी है तराजू के दो पलड़ों में
नहीं रखा जा सकता घर और बाजार एक साथ
बेले बर्च्चो को मुस्कुराहट देती हैं
बड़ों को भी देती है दाता बनने का अवसर
जब वो पड़ोसियों और परिचितों को सौंपते हैं
हरी ताजी सब्जियों का उपहार
तो पाने वाले के भीतर भी जाग जाता है
कृतज्ञता का भाव
पशु-पक्षी सब प्रसन्न होते हैं इन बेलों को झूमते देखकर
कबूतर के लिए तो सबसे स्वादिष्ट होता है
सब्जियों के बेलों के फूल को चखना
तितलियां भी रस का मजा लेने से नहीं चूकती
पर्यावरणविद इन बेलों के महत्व को विस्तार दे रहे हैं
कि कैसे सोखती है ये वातावरण से
कार्बनडाईआक्साइड का जहर
सौंपती हैं हमे आक्सीजन सांस लेने के लिए
फल पर भले उसका हो जिसकी बेले हैं
आक्सीजन सबके हिस्से में शामिल है
दीवार इतरा रही है कि
उसके सहारे खड़ी ये दुबली-पतली बेलें
किस-किस तरह से कितने काम आ रही हैं
छह माह की छोटी आयु जीने वाली बेलें
हमें सिखा रही है जीवन का बड़ा अर्थ
मुठ्ठी भर जमीन और धरती की नमी
इतने भर से गुजारा करने वाली बेले
जब आयु पूरी करके सूखती हैं
चुपचाप शामिल हो जाती है कूड़े के टोकरे में
जमीन में दफ्न होकर
बन जाती हैं खेतों के लिए खाद
या फिर अलाव के लिए ईधन.

अपने गांव के हवाले से यह पूरा विषय मैं आपके सामने रखना चाह रहा था। आत्मनिर्भरता की चाह में हमने जो परस्परता खो दी है, ये उसका एक उदाहरण भी है। मुझे यह और भी इसलिए चुभता है कि मेरा परिवार पिता के पांच भाईयों सहित आज भी गांव के एक साझा रसोई में खाता है। हमारे खेत अभी तक नहीं बंटे। पिता जो नब्बे छू रहे हैं, सबसे छोटे चाचा जो सत्तर की ओर है, बिहार में मार्केटिंग अफसर पद से रिटायर होकर अपनी मिट्टी में लौट आए हैं। दोनों भाइयों को गांव के चौराहे पर बैठे हुए एक फोटो जब छोटा भाई डा. विवेक सिंह भेजता है, तो पूरा मन एहसास की खुशबू से नहा जाता है।

 

बचपन की एक घटना याद आ रही है। हादसा मेरे साथ हुआ लेकिन मुझे उसकी कोई याद नहीं है। अम्मा का बताया कि जब मैं तीन साल का था तो घर के बाहर एक गहरे कुएँ में पीठ की तरफ से गिर गया। मैं डूबकर नीचे जाने की बजाए हाथ-पैर पटकता पानी के उपर ही तैरता रहा। वहां लोगों की भीड़ जुट गई, तमाशाई ज्यादा थे। कुएं में उतरने का कोई साधन न था। टूटे ईटों से बनी खोह को पकड़कर नीचे उतरना था। गांव के रिश्ते में मेरे बाबा लगने वाले गोविन्द सिंह जिनकी उम्र 30 साल के आसपास रही होगी। वह फौरन दो घूंट लगाकर आए और कुएं में जानपर खेलकर उतर गए। लोगों से रस्सी और धोती के सहारे बाहर निकाला। गोविन्द सिंह की गांव में पहचान दिन भर दारू पीकर घूमने वाले की थी, लेकिन मेरे परिवार के लिए वे देवदूत से कम न थी। अम्मा कहती हैं कि आसपास के गांव से लोग मुझे देखने आते थे कि बच्चा ऊपर ही तैरता रहा, एक बार भी डूबा नहीं। उन्हीं देखने वालों में एक आया और बोला कि इस लड़के अब वज्र से मारो तब भी नहीं मरेगा। यह सुनते ही मेरी माई(दादी) ने उसे मारने के लिए दौड़ा लिया था। प्रेमचंद ने लिखा था कि अतीत कितना भी भयावह हो उसकी स्मृति भी कई बार मुस्कुराहट दे जाती है। आज गुजरे दिन याद करने में ऐसा ही हुआ है।

 

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