नोएडा में नवोदित पत्रकारों का जमघट…डिजि​टल पत्रकारिता के प्रभावी इस्तेमाल से रूबरू हुए छात्र

Two day workshop organized by UNICEF and Amar Ujala Foundation

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यूनिसेफ इंडिया की कम्युनिकेशन, एडवोकेसी और साझेदारी प्रमुख जाफरीन चौधरी
  • यूनिसेफ और अमर उजाला फांउडेशन द्वारा आयोजित की गई दो दिवसीय कार्यशाला
  • जलवायु संकट एक अभूतपूर्व खतरा है और बच्चे, और युवा इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। बावजूद इसके बच्चों की भावनायें या उनकी समस्यायें प्रमुखता से नहीं रखी जातीं और उनकी बातों को सुनने की संभावना भी कम होती है।  इस कार्यशाला का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन और कोविड टीकाकरण की आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए युवाओं की आवाज को सामने लाना है: जाफरीन चौधरी

नोएडा: दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में पत्रकारिता के छात्रों, विभिन्न संस्थानों से जुड़कर पत्रकारिता करने वाले लोगों का जमघट लगा। मौका था यूनिसेफ और अमर उजाला फांउडेशन द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का। कार्यशाला का विषय था जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 टीकों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और डिजिटल माध्यमों से जुड़कर पत्रकारिता करने वाले छात्रों के प्रशिक्षण का। जमघट इसलिए क्योंकि इसमें एक तरफ तो पत्रकारिता पढ़ाने वाले  नामचीन संस्थानों के छात्रों ने भागीदारी की वहीं दूसरी तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों से आये हुए विशेषज्ञों, अलग—अलग संस्थानों में पत्रकारिता कर रहे लोगों ने भी भाग लिया। एक तरफ पत्रकारिता के छात्रों ने विशेषज्ञों से इस विद्या की बारीकियां सीखीं वहीं दूसरी तरफ पत्रकारिता के पेशे से जुड़े विशेषज्ञों नेे इन छात्रों को डिजिटल माध्यमों के उपयोग,डिजिटल-मोबाइल पत्रकारिता के गुर,पर्यावरण सं​बंधी विषय को जोर—शोर से उठाने और कोविड 19 की चुनौती के दौरान पत्रकारिता से संबंधी चुनौतियों से अवगत कराते हुए इन नवोदित पत्रकारों में भविष्य की संभावनायें टटोली और उनके मन उठ रहे सवालों का जवाब देने का हरसंभव प्रयास किया।

बच्चों की बातें रह जाती हैं अनसुनी,डिजिटल पत्रकारिता बन सकता है सहयोगी
कार्यशाला के पहले दिन अपने उद्घाट्न भाषण में यूनिसेफ इंडिया की कम्युनिकेशन, एडवोकेसी और साझेदारी प्रमुख जाफरीन चौधरी ने कहा कि “जलवायु संकट एक अभूतपूर्व खतरा है और बच्चे, और युवा इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। बावजूद इसके बच्चों की भावनायें या उनकी समस्यायें प्रमुखता से नहीं रखी जातीं और उनकी बातों को सुनने की संभावना भी कम होती है। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन और कोविड टीकाकरण की आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए युवाओं की आवाज को सामने लाना है। ऐसे में मोबाइल पत्रकारिता हमें कम से कम लागत और संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ाने का अवसर देती है जिसके जरिए हम बच्चों पर होने वाले प्रभावों को प्रमुखता से रख सकते हैं।
इस मौके पर उन्होंने उजाला फाउंडेशन और यूनिसेफ की लंबे भागीदारी को रेखांकित किया ओर कहा कि अमर उजाला फाउंडेशन कोविड-19, टीकाकरण, पैरेंटिंग और एनीमिया के क्षेत्र में जागरुकता से जुड़े कार्यक्रमों में यूनिसेफ की कोशिशों का समर्थन करता है।


टीकाकरण के बावजूद कर सकते हैं रक्तदान
कोविड 19 नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप के डॉ. एनके अरोड़ा ने भारत में कोविड 19 टीकाकरण की यात्रा और इस दौरान आसन्न चुनोतियों की चर्चा की व इस यात्रा से सं​बंधित विभिन्न पड़ावों से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए युवाओं को टीकाकरण के लिए प्रेरित किया। डॉ अरोड़ा ने कहा कि जीका वायरस को लेकर ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि देश के वैज्ञानिक इससे बचाव के लिए भी टीका बनाने की तैयारी में जुट गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अगर आपने कोरोना का टीका लगवाया है तो रक्तदान कर सकते हैं। टीकाकरण के बाद किसी तरह का कोई संक्रमण नहीं होता है, न ही रक्तदान करने वाले को और न ही रक्त लेने वाले को। अगर कोरोना संक्रमित हो गए हैं तो तीन सप्ताह यानी 21 दिन के बाद रक्तदान कर सकते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों ने रखी अपनी बात
पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से युवाओं को रूबरू कराने के लिए भी एक सत्र का आयोजन किया गया। पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन से जुड़े सत्र में यूनिसेफ के इमरजेंसी विशेषज्ञ सरबजीत सिंह सहोटा ने बताया कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर सजग होने की जरूरत है। जब हम यह ग्लोबल वॉर्मिंग की बात करते हैं तो दुनियाभर में औसत तापमान तो एक-दो डिग्री बढ़ने का खतरा है, लेकिन उत्तरी-दक्षिणी ध्रुवों पर तापमान पांच डिग्री तक बढ़ सकता है।
वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ विमलेंदु झा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का किसानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। किसानों को पलायन तक करना पड़ जाता है। नदियों की स्थिति भी ठीक नहीं है। हमने पीने के पानी के मामले में बीस साल पहले एक गलती कर दी। हम वाटर प्यूरिफायर लेकर आए, लेकिन हमने पानी को उसके मूल स्रोत पर ही ठीक करने पर ध्यान नहीं दिया।

इस मौके पर डीआरडीओ में सहायक निदेशक आदित्य पटेल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है तो छोटे किसान सबसे ज्यादा चपेट में आते हैं। नुकसान सिर्फ किसानों को ही नहीं होता, बल्कि उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों पर भी पड़ता है।


युवाओं के लिए बेहतर अवसर
अमर उजाला फाउंडेशन की तरफ से अमर उजाला वेब सर्विसेज एडिटर जयदीप कार्णिक ने कहा, “कार्यशाला हमें (अमर उजाला) और यूनिसेफ को युवाओं की चिंताओं को सुनें और जलवायु परिवर्तन और उन पर इसके प्रभाव के बारे में वे क्या महसूस करते हैं,जानने का मौका देती है। यह छात्रों को डिजिटल पत्रकारिता की बारीक बारीकियों को सीखने के लिए वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत करने का अवसर भी देता है।” साथ ही उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे सस्ती डिजिटल तकनीकों के उपयोग के माध्यम से बच्चों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर जमीनी स्तर पर रिपोर्ट तैयार करें।

उल्लेखनीय है कि इस दो दिवसीय कार्यशाला में शारदा यूनिवर्सिटी, एमिटी यूनिवर्सिटी, गलगोटिया यूनवर्सिटी और नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता और जनसंचार के 50 से अधिक छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया और मोबाइल जर्नलिज्म, गैजेट्स और पॉडकास्ट की बारीकियों से रूबरू होने के साथ ही कोविड 19 और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी सक्रिय भागीदारी दिखाई। इस दौरान अमर उजाला के पत्रकारों, जिला स्तर के संवाददाताओं के साथ प्रसार भारती से जुड़े पत्रकारों ने भागीदारी की।

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