घर गांव देहात…

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कामता प्रसाद सिंह ‘काम’
लेकिन एक बात थी, कृषि विभाग का नमूना न लेकर भी लोग खाने पीने से खुशहाल थे, गाय भैंसों की भरमार थी जिनका शुद्ध दूध हम पीते थे। बहेलिय बझा—बझाकर बटेर, बगेरी हुदहदु, चाहा इत्यादी लाता था मिन सिकार अपने बारूद वाले बंदूक से हरियल, कबूतर, पंडुक आदि मारकर लाता था और हमें खिलाता था। गांव अब भी है पर इनमें से कई चीजें अब गड़बड़ा गयी हैं। मेरे गांव से भी वे अब वे चले गये जो हर प्रकार की तरकारी पैदा करते थे।
हर इतवार को अशोक के पेड़ के नीचे रामदेव बढ़ई बैठता था और लोग अपने हल—जुआठ आदि मरम्मत कराते हैं। हर इतवार को रूचा लोहार ‘मुई खाल की सांस से सार भस्म हो जाय’ वाली भांथी लेकर आते थे और लोग उनसे फार, कुदाल आदि ठीक करवाते थे। उसी अशोक के नीचे तुलसी हज्जाम सबकी हजामत बनाते और बाल की पहाड़ लगा देते थे। सोमवार को एक सभा होती थी जिसमें गांव की भलाई—बुराई पर विचार होता था। मंगलवार को महावीर जी की पूजा होती थी जब विविध अखाड़ों में शिष्य लोग अपनी—अपनी शिरनी चढ़ाते थे।


नवरात्रि में देवी के मंदिर में नव रोज चंडी का पाठ होता था जिसमें वर्ष भर गांव की विघ्नों से रक्षा हो, नवमी की खस्सी और भैंसे कटते थे जिसमें देवी की कृपा रहे, दशहरा को नवीन वस्त्र पहन कर हम नीलकंठ का दर्शन करते थे जिनमें सालों भर हमारी नवीनता बनी रहे। एक रोज गांव के बाहर डिहवार की पूजा होती थी, जिसमें शराब का तपावन चढ़ाया जाता था और छौने की बलि दी जाती थी। डिह भी हमारी ओर गांव को ही कहते हैं और डिहवार का मतलब उस देवता से है जो गांव के बाहर रहता है और बाहर से आपद—विपद को गांव की तरफ नहीं आने देता। चैतनवमी को महावीरी झंडा निकलता था और जय महावीर के नारे लगते थे। कुछ इसी जोश से हम हर साल ताजिया के पीछे चलते थे, पैक बांधते थे और मार्छल लेकर ताजिये को झालते थे। पैकनामा कोई दूसरा पढ़ता था पर ‘या अली’ की आवाज में हम सब शरीक होते थे। गांव अब भी वही है पर अब उन रिवाजों की रक्षा नहीं हो रही, जैसे पुराने घर भरभराकर गिर पड़े वैसे ही पुरानी रीतियां और नीतियां घिस गयीं और उनकी जगह पर नूतन का निर्माण हो रहा है।

जिस प्रकार इस रीति—नीति में परिवर्तन हो रहा है उसी प्रकार दुनिया भी जल्दी—जल्दी बदल रही है। दुनिया के साथ—साथ आदमी भी बदल रहे हैं। चमन वही है पर वे कलियां नहीं हैं। कहां है रामराज बाबू, जो दिन भर में आधा मन चीनी चीटियों को खिलाते थे! कहां है काजी साहु जो दिन भर मुसाफिरों की प्रतीक्षा में गुड़ की भेली लेकर कुएं पर बैठै रहते थे! कहां है मथुरा पंडित जो घूम—घूम कर बीमारों का पता लगाते थे, उनकी नब्ज देखते थे और मुफ्त दवा का इंतजाम करते थे। कहां है गणक जी के समान ज्योति​​षी जिन्होंने एक वर्ष यह समझकर कि इस साल पानी नहीं लिखता है अपना पांच सौ बीघा खेत परती छोड़वा दिया था।
एक तस्वीर याद पड़ती है रुपा भगत की। किसी और जगह से आकर मेरे ही गांव में बस गये थे। वे मिठाई बरसाते थे। ज​ब कहिये आपका मुंह मीठा कर दे, तलाशी ले लीजिये तब भी, फिर अपनी जेब में से मिठाई निकाल दें। उम्र इस साल पूछिये तो 105। एक बरस बाद पूछिये तो 200 और उसके तीन बरस बाद पूछिये तो 202। गोया और लोग बराबर बढ़ते हैं और ये कभी घटते हैं, कभी बढ़ते हैं असल में इन्हें यह याद ही नहीं रहता कि कब किससे इन्होंने कितनी उस्र बताती थी।

और ये रंगू धोबी। वादा पर कभी कपड़ा नहीं देते थे, जब जाईये तो धुकाई की कमी की शिकायत करते हैं और साथ—साथ यह भी कहते हैं कि क्या कोई कपड़ा धुलवायेगा, धुलवाते थे तो बड़े महाराज। बस जब धुलें तो कपड़े इत्र में धुलें। जितने कपड़े मिलते थे उतनी शीशी गिनकर इत्र। घर क्या, गांव मुंह मुंह करता रहता था।
और ये हैं रहीम खलीफा। एक टूटी—फूटी मशीन है, दर्जी की दुकान है। वादे पर कपड़ा देना दुश्वार है पर एक से एक कहानी सुन लीजिये। ये भी बड़े महारा के नाम के शैदाई हैं। बड़े महाराज मर भी गये तब भी मेरे गांव में बहुत से भक्त छोड़ गये। हां तो रहीम खलीफा का सुनिये, ” कपड़ा सीने में मन नहीं लगता। जहां राज रजनी वहां भीख नहीं मांगनी। बड़े महाराज 25 गज कपड़ा दिलवाते थे। एक उनका बनता था और दस गरीब की मदद हो जाती थी। हाथ वही, मशीन वही, गांव वही और दुकान भी वही, पर एक बड़े महाराज न रहे और सब सूना हो गया है।”


और वह बुढ़िया मालिन। जब इसके पति खदेनर जीते थे, इसको देखते बनता था। विवाह में लड़के के विदा होने के वक्त यह जिस समय मौर लेकर आती थी, बारात भी इसको देखने के लिए थोड़ी दूर रुक जाती थी। पति मर गये, बुढ़िया हुई। अब वह जमाल नहीं पर कमाल बजिन्सहू वही है। हां, अगर सवांर कर मोर बना दे तो देखे बने और दिखाये बने। दुल्हा यों सजे कि लाखों में भी फबे। पालकी थोड़ी देर के लिए चूमने के काबिल बन जाये। हां ऐसे ही खूबी है उसे हाथ के मौर में।
सिफ मौर पर ही मुनसहर नहीं था मेरे गांव में लोग एक से एक चीज बनाते थे। बाटा का जूता पहनकर आज कौंसिल में जाता हूं तो मंहगू चमार का जूता याद पड़ता है मुलायम और सुंदर। महंगू लाने के साथ—साथ उसमें रेंडी का तेल देता थ पहनने से पैर भी चप—चप मुलायम हो जाता था। रामदेव की बनाी कुर्सी हर घर में एन न दो मौजूद हैं जो बड़े लोगों के आने पर निकलती थीं। छड़ी भी रामदेव एक से एक बनाते थे। जग्गू लोहार की गुप्ती इलाके भर में मशहूर थी। भाला, बर्छा, तलवार, फल्सा इत्यादी भी जग्गू एक से एक बनाते थे। आज जनेउ पहनने का शौक जाता रहा, पर कुछ दिन पहले जागा पांडे के बनाये जनेउ मन में लालच पैदा कर देते थे। जागा पांडे अनन्त में अनन्त भी खुद ही बनाते थे, रक्षा बंधन में राखी भी अपने हाथ से बनाते।

(औरंगाबाद जिले के भवानीपुर गाँव के निवासी स्व० कामता प्रसाद सिंह प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, साहित्यकार व बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं।)

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