एक बार चंद्रशेखर जी से मैंने कहा कि आज जो भी राजनेता हैं वे सभी अपने संसदीय या विधानसभा क्षेत्र के विकास में डूबे हुए हैं. जयप्रकाश जी का यह गांव पीछे छूट गया था, आपने कुछ काम कराया. उनका जवाब था देखो, उत्तर प्रदेश से कितने प्रधानमंत्री और बड़े नेता हुए. हाल की बात छोड़ दें तो जवाहरलाल जी लंबे समय तक देश के प्रधानमंत्री रहे, उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री जी हुए, इसके बाद इंदिरा जी रहीं. ये सभी प्रभावी प्रधानमंत्री इतिहास के बड़े व्यक्तित्व थे. क्या यह उचित होता कि ऐसे बड़े लोग अपने प्रदेश या संसदीय क्षेत्र पर ही ध्यान केंद्रित करते, फिर समग्र देश या समूचा देश किसकी निगाह में रहता ? इस रास्ते यही आदर्श स्थापित होता कि देश हमारे लिए हमारा राज्य या संसदीय क्षेत्र ही है. याद रखो, गांव की परंपरा है कि संयुक्त परिवार में पिता अपने बच्चे पर ध्यान देने के बजाय अपने भाई-भतीजों के विकास की बात करते हैं. फिर परिवार के मुखिया के बच्चे की जिम्मेवारी या वह लाड़-दुलार दूसरे बड़े लोग देते हैं. इस तरह समग्र परिवार का उत्थान होता है। तब लगा कि पहले आसपास या दूसरों का भला करें, फिर खुद पर ध्यान केंद्रित करें, यह सोच उन लोगों की रही.

अपने पिता को याद करता हूं. बचपन से जो छवि बनी, गंभीर.कामकाज -परिवार के प्रति अद्भुत समर्पण. अधिकतर खेती के काम से या मुकदमों, शादी वगैरह परिवारिक कामों से बाहर रहते. 16 वर्ष की उम्र में उनके पिता (यानी मेरे बाबा) असमय गये. परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली. बहनों की शादी, भत्तीजों-भत्तिजियों की शादी-देखभाल. चाचा का असमय निधन. आय सीमित. उनसे यानी पिता से हमारा संवाद बहुत नहीं होता था. भय लगता, पर चाचा, जिन्हें हम लाला कहते, उनका स्नेह मिलता. पर पिता अनुशासन, लालन-पालन व पढ़ाने के प्रति सचेत थे. जीवनशैली उनकी निगाह में रहती . मामूली फूस-मिट्टी या कच्चे ईंटों का घर, पर सफाई अद्भुत. एक-एक पाई का हिसाब रोज लिखते.डायरियां रखते. लाल बही खाता रखते, हर साल कहां कितना खर्च हुआ, सबका ब्योरा आज भी उनके हाथ से लिखा है. पचासों वर्षों के घर का खर्च. पाई-पाई हिसाब. युवा दिनों में कैसे अधिसंख्य ‘रेहन’ (कर्ज लेकर खेत गिरवी रखना) पर रखे खेतों को छुड़ाया. गांव प्रधान रहे. मां की स्मृति, ममतामयी व सात्विक है. कोई घर से बिना खाये नहीं लौटता था. मिट्टी के चूल्हे पर धुएं में चार बजे सुबह से दर्जनों लोगों का खाना बनातीं. दिन के 11-12 बजे नहाना-पूजा. महीने में 15-20 दिन व्रत.कार्तिक स्नान सुबह चार बजे उठकर ठंडे पानी से. आंवले के पेड़ के नीचे दीया जलातीं. एक बार बस से गंगा सागर गयीं, गांव की 25-30 महिलाओं के संग. अकसर देखता कलकत्ता के विक्टोरिया मैदान में वैसी बसें कुछ देर ठहरतीं. वहीं लोग नीचे मैदान में सोते. बनाते-खाते. बाथरूम जाते. उन दिनों मैं कलकत्ता में ही था, जब वह गंगा सागर होकर इस विक्टोरिया मैदान में पड़ाव डालकर गयीं. अत्यंत असुविधाओं में. पर न मुझे सूचना थी, न उन्हें यह एहसास कि मैं भी पास में ही काम करता हूं. दूसरों की मदद, दान, सहनशीलता जैसे विलक्षण गुणों ने उन्हें अद्भुत गरिमा दी थी. वह हमारे पिता के मुकाबले संपन्न घर से थीं. काफी गहने लेकर आयीं थीं. पर पिता को घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए सब सौंप दिया. कभी ऊंची आवाज में किसी ने उन्हें बोलते नहीं सुना. आसपास के घरों या गांव में उनकी एक अलग छाप थी. अपनी दयालु प्रवृति के कारण वह बड़ा सम्मान पातीं.
इसी रूप में जयप्रकाश जी के निजी सचिव जगदीश बाबू को पाया. हम बच्चे थे तो समझते थे कि वे जेपी के घर के हैं. थोड़ी उम्र हुई तो पता चला कि वे वहां से 50 किलोमीटर दूर सोनपुर के गोविंदचक निवासी हैं. अच्छे किसान परिवार से हैं. वह काफी गंभीर रहते थे. उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी. बड़ा हुआ तो उनका स्नेह मिला. उन्होंने शादी नहीं की, परिवार नहीं बसाया. विद्यार्थी दिनों में ही उन्हें समाजवादी आंदोलन ने आकर्षित किया था. उसके सिद्धांतों, आदर्शों के प्रति उनका आजीवन समर्पित हो गया। वे जेपी के साथ नया समाज बनाने निकल पड़े. अनेक बार जेल गए.1942 में जब जेपी हजारीबाग जेल से भागे, तो वही उनके बेड पर सोए थे. न जाने कितनी यातनाएं झेलीं. देश आजाद हुआ, वे सत्ता की राजनीति की ओर नहीं गए. उन्हें जेपी ने अपने साथ रखा.आधुनिक शब्दावली या मुहावरे में उनके निजी सचिव.पर, दरअसल वह उनेक सबसे भरोसेमंद रहे. पांच दशकों से अधिक साथ रहे. जेपी के घर के मालिक-मुख्तार, गांव की भाषा में या सर्वेसर्वा. वही उनके घर, खेती वगैरह की सारी व्यवस्था देखते, गांव के आश्रम आदि की देखभाल करते. बाद में जब उनके निजी जीवन के विषय में पूछना शुरू किया तो पाया कि सारे दिग्गज समाजवादी उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे, क्योंकि वे उनके संघर्ष के साथी रहे. उनके करीबी मित्रों में रहे कर्पूरी ठाकुर वगैरह. प्रारंभिक समाजवादी चिंतन शिविरों में (1940-50 व 60 के दशक में) शामिल रहे. दुनिया के साम्यवाद, उसके अंतर्विरोध रूस की नयी साम्यवादी व्यवस्था, चीन के माओ, रूस के स्टालिन वगैरह के विषय में उन्हें गहरी जानकारी थी. पर शायद ही कभी इन विषयों पर सार्वजनिक रूप से बोलते. कोई दिखावा नहीं. न श्रेष्ठता का बोध या विशिष्ट होने का भाव. फिर भी उन्होंने सत्ता राजनीति का रास्ता नहीं अपनाया. वे जेपी के सबसे भरोसेमंद आदमी थे. पर हमेशा जान बूझ कर नेपथ्य में रहते. अब सोचता हूं तो उनके नैतिक बल या नैतिक आभा का गांव पर या मुझ पर जो असर था, वह अविश्वसनीय लगता है. तब ऐसे लोग गांव में प्रेरणा के केंद्र थे. रोल माडल.

उन्हीं के साथ खेती के कामकाज में मदद के लिए जेपी ने सरयू भाई को रखा. सरयू भाई भी छपरा के पास किसी गांव के थे. विचारों से कम्युनिस्ट, राहुल सांकृत्यायन के साथ जेल में बंद रहे, उनके अनुयायी थे. आजीवन कुंआरे रहे. जेपी का काम संभालने आ गए और अंत तक जेपी के घर ही रहे. खेती की तकनीक में माहिर. वह तब खद्दर पैंट और हाफ गंजी पहने दिन भर खेतों में आधुनिक ढंग से काम करते. जेपी ने उन्हें खेती के तौर तरीके सीखने के लिए इजरायल भिजवाया. गांव वापस लौटे तो नए ढंग से खेती करने लगे. जेपी के घर में पहला ट्यूबवेल लगाया. सब सरयू भाई के जिम्मे था, जो जगदीश बाबू के मातहत थे. पर समाजवादी व अत्यंत गंभीर व्यक्तित्व के धनी जगदीश बाबू के ठीक विपरीत व्यक्तित्व था, सरयू भाई का. वह बिल्कुल वाणी व आचरण में क्रांतिकारी थे.साम्यवाद की लौ उनके अंदर हमेशा दहकती रहती. जेपी कभी गांव आते तो वे उनके सामने हाथ से लिखकर पोस्टर लगा देते कि आपके गांव के अमुक लोग जो आपके आसपास बैठते हैं, वे गलत लोग हैं, शोषक हैं, वगैरह-वगैरह. जेपी व जगदीश बाबू देखते, आगंतुक भी देखते ही थे.सभी मुस्कुराते और बिना कहे जान जाते यह एक कम्युनिस्ट का गांधीवादी या अहिंसक प्रतिरोध है.उधर सरयू भाई बिना किसी की परवाह किए अपने काम में डूबे रहते. इसी तरह एक सर्वोदयी हमारे चंद्रिका चचा थे. वे जेपी के कट्टर भक्त और अनुयायी थे. गांव में कोई अतिथि आ जाए तो बगैर उचित सत्कार के लौटता नहीं था. एक रासबिहारी भैया थे. सुबह-सुबह चार बजे उठकर किसी दरवाजे पर पहुंच सकते थे. यह लड़का सुबह उठकर पढ़ रहा है या नहीं, या घर में कोई समस्या है, या किसी के घर कोई घटना या झंझट हो गया है तो उसके निदान या हल में जुटे रहते. खेत में बुवाई समय से नहीं हुई या मवेशी के लिए चारा की समस्या है या कोई बीमार है, शादी- विवाह का मामला है, कोई आपसी झंझट है, घर-घर की समस्याओं की फेहरिस्त या सूचनाएं होतीं, और क्या मदद हो, इसका उपाय भी होता. लंबे थे, तेज चलते थे, गांधीवादी टोपी पहनते. उन्हें लोगों ने आजीवन सरपंच बनाकर रखा.फिर हमारे ओस्ताद बाबा थे. दियारे में गंगा और घाघरा की धारा कटाव में खेतों या टोलों को निगल जाती. फिर उस जमीन को निकलने में 25 या 50 वर्ष लगते या नहीं भी निकलता. पर अगर नया दियारा बने, वहां खेती कर रात में रहना भी होता. उस सुनसान, बियाबान में वह रहते. खेती के माहिर और दियारे की जमीन पहचानने की अद्भुत क्षमता थी. हमेशा दूसरों का भला कैसे हो, सोचते थे. कभी कोई हल्की या ओछी बात नहीं करते.
उसी तरह एक समा बाबा थे. अपढ़. अद्भुत गायक. हार्मोनियम बजाते, शाम को सुंदर राग में टेरते या गाते या अलापते. अपने बड़े भाई बहोरन बाबा के साथ गांजा भी पीते. दोनों भाई मशहूर पहलवान थे. लाठी भांजनेवाले. एक रामकेवल थे, शाम को गांजा पीने में वह साथ होते. कभी- कभी झगड़ा होता आपस में, तो बैठे-बैठे बंटवारा वगैरह सब हो जाता. सुबह रामकेवल पूछते, कि बंटवारा का क्या हुआ, दोनों भाई रामकेवल पर गुस्साते, बुरबक हो क्या ? जीते जी भाइयों में बंटवारा होता है ? वह तो नशे में हुआ बंटवारा था. परिश्रम से काफी चीजें अर्जित की कोलकाता तक. अपने धुन और मौज के पक्के. भूत के किस्से बताने-सुनाने वाले. आतिथ्यप्रेमी. रामायण-महाभारत, चैता, फगुआ कंठस्थ. हार्मोनियम के जानकार, लोकसंगीत के ज्ञाता, पर मुकदमा लड़ने में माहिर. आनबान, शान की लड़ाई में न जाने आज के मूल्य में कितने करोड़ की संपत्ति गंवा दी. खासतौर से कोलकत्ता में अर्जित. फिर भी गम नहीं. उतने ही सहज आत्मीय और प्रेमी, कोई छल-कपट नहीं. हमारे एक अन्य चाचा श्री बिंदा सिंह थे. 50 के दशक में टीएनबी कॉलेज, भागलपुर से पढ़कर आए. उनके साथ के लोग पुलिस में दारोगा हुए, डीजीपी हुए. वे भी नौकरी में गए लेकिन छोड़ कर गांव लौट आए. खेती और भगवान की भक्ति, साधुओं का स्वागत और सत्संग यही उनकी दिनचर्या थी. सबसे अधिक स्नेह वे अपने भतीजों से ही करते. उन्होंने हमें सबसे पहले नेसफिल्ड की अंग्रेजी ग्रामर पढ़ने को कहा. घर में लुंगी पहनकर कोई घूम नहीं सकता था या शाम को समय से दरवाजे पर लौटना जरूरी था. लालटेन जलाकर महावीर स्थल को दिखाना और पढ़ना तय कार्यक्रम थे. परिवार बंट चुका था, फिर भी हर दरवाजे के गार्जियन लाला ही थे. वह सुबह-सुबह उठकर 4 से 5 के बीच सूरदास के भजन गाते. उनसे सुने भ्रमर गीत आज भी कानों में गूंजते हैं. तब समझा बहुत नहीं, पर यह एहसास हो गया था कि यह जीवन बहुत कुछ है नहीं. भौतिक कामनाओं की एक सीमा है. इसी तरह स्कूल में एक बुजुर्ग पंडित जी थे. वह हर मंगलवार की सुबह स्कूल के मैदान में बच्चों को बैठा कर गीता का पाठ करते. तब कुछ समझ में नहीं आता. बच्चे उनकी बकुली चुरा लेते, बहुत गुस्साते, बकुली लेकर दौड़ाते. फिर भी कथा की शैली में गीता और पुरानी, पौराणिक सांस्कृतिक धरोहरों की अनमोल बातें बताते.
एक टकमानो आजी थी. बचपन में ही विधवा हो गईं. ससुराल से लौट आयीं गांव के लोगों ने एक मड़ई लगा दी. आजीवन उसी में रहीं, अकेले रहीं. गांव उनकी सुध लेता था. उनके घर में कोई था नहीं. गांव के बुजुर्ग, सम्मानित लोगों को भी फटकार सकती थीं. कोई उनकी बात का जवाब नहीं देता था. न जाने ऐसे कितने लोगों से ही मेरा गांव बना था या देश के हर गांव लगभग ऐसे ही मिजाज और संस्कार के थे. ये सदियों से उस भारतीय ग्रामीण संस्कृति के प्रवाह के हिस्से या अंग थे, जिसे देख राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा,
‘ अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है,
क्यों न इसे सबका मन चाहे,
थोड़े में निर्वाह यहां है,
ऐसी सुविधा और कहां है ’
(राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी के गांव सिताबदियारा के कहानी की तीसरी कड़ी।)
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छ लाख गांव हमार ह,अपना गांव लागी बात करीं तो लोग का कही..जयप्रकाश नारायण

