
पटना: तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ एक तरफ दिल्ली में किसान बोर्डर को घेर कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं वहीं देश के अन्य ईलाको में भी इसे लेकर धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां तक कि अब किसानों को नागरिक संगठनों का भी साथ मिलने लगा है। कुछ इसी तरह की कवायद विगत दिनों बिहार की राजधानी पटना में देखने को मिली। पटना के नागर समाज ने किसान आंदोलन के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए “किसानों के साथ हम पटना के लोग” कार्यक्रम शुरू किया है। उल्लेखनीय है कि नागरिक अभियान की शुरुआत शहीद भगत सिंह चौराहा,गांधी मैदान, पटना में हुई है।
पटना विश्वविद्यालय की प्राध्यापक डेज़ी नारायण के नेतृत्व में शुरू किया गया यह अभियान पटना के विभिन्न मुहल्लों,बाजारों,इलाकों में गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी तक चलेगा। बड़ी बात यह है कि इसमें पटना के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, कवि-साहित्यकार, प्राध्यापक-चिकित्सक, कवि,गायक,रंगकर्मी, युवा-मजदूर आदि समाज के सभी तबके भाग लेंगे। हर सभा में गीत, कविता,नुक्कड़ नाटक व वक्तव्यों से किसान आंदोलन के समर्थन का आह्वान किया जाएगा।

क्या कहते हैं भागीदार
इस अभियान की जरूरत पर बल देते हुए पटना विश्वविद्यालय की प्राध्यापक डेज़ी नारायण ने कहा कि यह आंदोलन न सिर्फ किसानों का है बल्कि देश की आम अवाम हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। यह देश की आज़ादी बचाने का आंदोलन है। इसलिए यह जरूरी है कि इस आंदोलन को देश की जनता का व्यापक समर्थन मिले।
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता रूपेश ने कहा कि ये काले कृषि कानून न केवल सभी किसानों,कृषक मजदूरों के बीच भूखों मरने की नौबत पैदा करेंगे बल्कि, पूरे देश की अवाम को लातिनी अमरीकी देशों में फैले भुखमरी,बेकारी व बदहाली जैसे हालात के कगार पर पहुंचा देंगे।
वामपंथी किसान नेता के.डी.यादव ने कहा कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के बाद पिछले 70 सालों के कृषकों के प्रयास से हम भोजन के मामले में आत्मनिर्भर हुए हैं पर कॉरपोरेट लाभ के लिए असंवैधानिक तरीके से देश पर लादे गए कृषि कानूनों के माध्यम से हमारे भोजन का अधिकार खत्म किया जा रहा है।
वरिष्ठ वामपंथी महिला नेता सरोज चौबे ने कहा कि अपने सौ से ज़्यादा साथी खो चुके दिल्ली की सीमा पर डटे किसान केवल खेती नहीं बल्कि देश की आज़ादी बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे सच्चे देशभक्त हैं। देश उनका ऋणी रहेगा। मेहनतकश जनता की कमाई से सेठों की थैली भरने वाली सरकार को इस आंदोलन के आगे झुकना ही होगा।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसा दुष्प्रचार चलाया जा रहा है मानो यह महज पंजाब – हरियाणा के किसानों की ज़िद हो. दरअसल यह आंदोलन पूरे देश की खाद्य सुरक्षा की गारंटी के लिए लड़ा जा रहा है। आंदोलन नई कंपनी राज के हाथों गुलामी के खिलाफ लड़ा जा रहा है। इसलिए यह हम सबका आंदोलन है. इसे मिलकर जीतना ही होगा।

पर्यावरण और जल संरक्षण विशेषज्ञ , प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता रणजीव ने कहा कि लोक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था में अब आम लोगों की थाली से रोटी छीनी जा रही है और चहेते पूंजीपतियों की तिजोरी भरी जा रही है। चोरी से ये कानून लाये गए हैं। खाद्यान्न की हमारी आत्मनिर्भरता खत्म की जा रही है। किसानों की जमीन पर सरकार अपने चहेते पूंजीपतियों को कब्ज़ा दिलाया जा रहा है। पूरी खेती उनके अधीन की जा रही है. उन्होंने कहा कि ये कृषि कानून भूख और बदहाली पैदा करेंगे इसलिए हम सबका दायित्व है कि इनके खिलाफ चल रही लड़ाई में एकजुट हो व्यापक समर्थन पैदा करें।
अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवसागर शर्मा ने केंद्र की कॉरपोरेट परस्त मोदी सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अगर किसान इस देश की 135 करोड़ आबादी को दाना मुहैया करा सकते हैं तो वे इस अनाज पर डाका डालने वाले का जीना मुहाल भी कर सकते हैं. सरकार के साथ ग्यारह दौर की वार्ता के बाद भी किसानों का अपनी मांगों पर अडिग रहना इस बात को साफ करता है कि अनाज पर डाका डालने वालों की अब खैर नहीं है चाहे वह अडानी-अम्बानी जैसे पूंजीपति हों या उनकी सरमायेदार मोदी सरकार। उन्होंने कहा कि केंद्र की सरकार जहां एक-एक कर तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को ध्वस्त कर रही है वहीं देश के किसान तमाम बाधाओं के बावजूद आज़ादी और जम्हूरियत बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं. हमें इस लड़ाई को एकसाथ मिलकर जीतना होगा.
भाकपा-माले के वरिष्ठ नेता व अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के.डी. यादव ने किसान आंदोलन के दौरान अब तक 147 किसानों की मौत को शहादत बताते हुए जोरदार शब्दों में कहा कि हम संकल्प लेते हैं कि किसानों की शहादत बेकार नहीं जाएगी और जब तक मोदी सरकार कृषि विरोधी ये तीन काले कानून रद्द नहीं करती, हमारा आंदोलन जारी रहेगा. उन्होंने कहा कि ये कृषि कानून देश को गुलामी की ओर धकेलने के लिए हैं जिनके खिलाफ खड़ा होना हर भारतवासी का फर्ज बनता है.
दुष्यंत के गजल के रखी अपनी बात
इसके पहले आइसा नेता प्रियंका प्रियदर्शिनी ने दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल का एक हिस्सा – “कहां तो तय था चरांगां हर एक घर के लिए/कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए” से अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा कि ‘अच्छे दिन’ और ‘सुशासन’ का वादा कर सत्ता में आई केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की नीतीश सरकार के कामधाम जनविरोधी और विकास विरोधी साबित हो रहे हैं।
संजय कुमार कुंदन ने अपनी गजलों और नज्मों से देश-समाज के वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हुए हुकूमत को खबरदार किया कि अगर वह अपने तानाशाही रवैये से बाज नहीं आई तो जनता उसे उखाड़ फेंकेगी।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए इस नागरिक अभियान के संयोजक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ग़ालिब ने किया। उन्होंने कहा कि व्यापक समाज को आन्दोलन से जोड़ना हम सबकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। इसी मकसद से यह अभियान चलाया जा रहा है। कार्यक्रम की जानकारी विस्तार से देते हुए उन्होंने कहा कि “किसानों के साथ हम पटना के लोग” नामक इस नागरिक अभियान का यह चौथा दिन था जो पटना के विभिन्न मुहल्लों, बाजारों, इलाकों में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी )तक चलेगा। इसमें सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, कवि-साहित्यकार, प्राध्यापक-चिकित्सक, कवि,गायक,रंगकर्मी, युवा-मजदूर आदि समाज के सभी तबके भाग ले रहे हैं। गीत, कविता, नुक्कड़ नाटक व वक्तव्यों से किसान आंदोलन के समर्थन का आह्वान किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि पटना के विभिन्न मुहल्लों में सभाएं कर न सिर्फ कृषि कानूनों के दुष्प्रभावों से लोगों को अवगत कराया जा रहा है अपितु इन कानूनों को किसानों के विरूद्ध बताते हुए लोगों से इसके खिलाफ आवाज़ उठाने का आह्वान किया जा रहा है।
