October 14, 2019

गांधी का ग्राम स्वराज एक यूटोपिया सा लगता है…

गांधी जी जिस रामचरित मानस की प्रशंसा करते नहीं थकते थे, यह संपूर्ण इलाका उसी तुलसी दास के सांस्कृतिक ग्रहण से ग्रसित है। गांधी को गांव की कितनी पहचान थी और उसके सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक पक्ष से वे कितने वाकिफ थे, मुझे ठीक-ठीक नहीं मालूम। शायद उन्होंने चंपारण के गांव, कुछेक गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल के गांव देखे हों।
कथाकार संजीव
मेरे गांव का नाम बांगरकला है। अवध अंचल में जनपद सुल्तानपुर में लखनऊ से सवा दौ सौ किलोमीटर पश्चिम, इलाहाबाद से 150 किलोमीटर उत्तर, बनारस से 150 किलोमीटर पश्चिम। गांधी जी का ग्राम स्वराज यानी ऐसा गांव जो अपने आप में पूर्ण स्वायत्त हो, एक यूटोपिया-सा लगता है। गांधी को गांव की कितनी पहचान थी और उसके सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक पक्ष से वे कितने वाकिफ थे, मुझे ठीक-ठीक नहीं मालूम। शायद उन्होंने चंपारण के गांव, कुछेक गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल के गांव देखे हों।

जहां तक सामाजिक और आर्थिक प्रश्न है मेरा गांव मूलतः खेतिहर गांव है, अन्य कोई उद्योग धंधे नहीं हैं। आजादी के तुरंत बाद से लेकर काफी दिनों तक जहां तक मुझे याद हैं सिंचाई कुओं से ही होती थी। नहरें आजादी के बाद बनी और ट्यूबवेल का विकास भी बाद में हुआ, संभवतः पहली पंचवर्षीय योजना के बाद। फिर भी भूमि-सुधार कार्यक्रम और चकबंदी के पूरी तरह से न आने तक इन गांवों का, जहां बहुत बड़ी जोतों के या जमींदार वर्ग के लोग नहीं थे, विकास अपने ही ढंग से होता रहा। यानी दूर-दूर तक छिटका खेत, ज्यादातर खेत सवर्ण भूपतियों के हाथों में और कुछ खेत मध्य जातियों यादव, कुर्मी जैसी जातियों को छोड़ दें तो कारीगर जातियों और शुद्रों के पास खेत कम ही होते थे। कारीगर लोहार, कुम्हार आदि जातियां होती थीं, जो अपने पेशे से जुड़ी हुई थीं। बहुत सुस्त और शिथिल भाव से सरकारी विकास योजनाएं यहां आती लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व जातिवादी और धार्मिक रहा है। गांधी जी जिस रामचरित मानस की प्रशंसा करते नहीं थकते थे, यह संपूर्ण इलाका उसी तुलसी दास के सांस्कृतिक ग्रहण से ग्रसित है।

खेती की उन्नति कैसे हो। सत्तर के दशक तक सवर्ण जातियां अपने हांथ से खेत नहीं जोतती थीं, इसे नीच कर्म समझा जाता था। अगर किसी सवर्ण ने अपने हांथों हल चलाया या खेती की, गोबर काढ़ा तो वह एक तरह से जाति बहिष्कृत हो जाता था। गांधी जी को संभवतः यह सब पता नहीं था। हां, उनका यह सपना कि गांव में लेन देन, बाजार, विपणन में स्वायत्तता हो तो यह गांव में था। सब्जियां गांव में खपती थी, बर्तन के हाट-बाजार, मेले-ठेले थे। गांव के महाजन ही अन्न और कर्ज लेते-देते थे। पैदावार कम थी क्योंकि खेती वैज्ञानिक समझ से तनिक दूर थी। जातिवाद के चलते इन गांवों का विकास तो नहीं ही हुआ, फलतः शोषण से उत्पीड़ित होकर काफी लोग रोजी-रोटी के लिए बंगाल के कलकत्ता, कोईलरी अंचल, मुंबई आदि में प्रवासी हो गए। जो बाहर गए उनके लड़के पढ-़लिख के नौकरी करने लगे। विकास की बहुत छिन्न सी रोशनी वहीं से आई। यह स्थिति जैसे-जैसे विकसित होती गई, कुछ और शिक्षा, कुछ और पैसा, कुछ और विकास का मार्ग खुलने लगा। लड़कियां शिक्षा से प्रायः वंचित ही रहीं। बाहर के लोगों से चंदा लेकर प्राइमरी स्कूल खुले जहां दलितों को बहुत दूर बैठाया जाता था। गांधी जी ने अपने प्रिय तुलसीदास के सांस्कृतिक दंश को शायद ही महसूसा होगा। वहां ब्राह्मण आज भी अबध्य हैं, अदंडनीय हैं। उनका राम चरित मानस इस पर मुहर लगा लगाता है-
पूजिय विप्र सकल गुण हीना, शुद्र न गुण-गण ज्ञान प्रवीणा ्
ढ़ोल गंवार शुद्र पशु नारी, ये सब तारण के अधिकारी।।

शुद्रों का पढ़ना-लिखना, पूजा करना तुलसी के मुताबिक पाप है। एक तरह से देखा जाए तो आज का अवध ही नही,ं संपूर्ण भारत तुलसी के ही सांस्कृतिक श्रापबोध का विस्तार है। घर-घर रामचरित मानस अभी भी प्रचलित है, गाया जाता है-
विप्र धेनू सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार।
विप्र यानी ब्राह्मण, धेनू अर्थात गाय, सुर अर्थात देवता, संत माने साधु-सन्यासी। आज भी ब्राहमण, गाय, साधु, सन्यासी व देवता गण ही यहां की दशा-दिशा निर्धारित करते है। नए-नए पढ़े—लिखे लड़के और बाबा रामचंद्र दास के किसान आंदोलन, जहां-तहां सेंध मारने की कोशिश करते हैं पर सफल नहीं होते। यहां तक कि बाबा रामचंद्र दास को भी अपनी बात कहने के लिए रामचरित मानस की चुनिंदा स्वस्थ पंक्तियां को आधार बनाना पड़ा। ललई सिंह यादव का आंदोलन यहां पाप माना जाता है।

कम्युनिस्ट पार्टी का हल्का फुल्का आधार वेध जी की लाचारी में झलकती है-
सजनी वोही देशवा में गाज परै,
जेही देशवा के किसनवे राम भिखारी भयन ना,
बेटवा उनकर भैंस चरावे, बाप करे ठठवारी।

आपको बताएं कि जिस नाले में हमेशा पानी भरा रहता था और मैंने तैरना सीखा था वह अब सूख चुका है। वहां न मछलियां हैं, न सीपी, सिर्फ सर्पों के हरित फव्वारे। पर अब वह भी लुप्त प्रायः है। अब तो सरकारी ट्यूबवेल तक सूख गए। निजी ट्यूबवेल भी सूखते जा रहे हैं। संसाधन नए आ गए हैं। जमीन है तो खेती होती है। पर जहां प्रायः पशुओं के लिए घांस छीलने के लिये मारामारी होती थी, वहां चूंकि बैल गायब हैं इसलिए घास यूंही पड़ी-पड़ी कुम्हला रहीं हैं। कृषि का आधार मशीनीकरण हो गया है। ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, कंबाईंन आदि आ जाने से बैलों की जरूरत ही न रही। सो बछड़े और बैल छोड़ दिए जाते हैं चाहे जिसके खेत में आवारा चरें। आप मार तो सकते नहीं, कसाई ले नहीं जा सकते। सो भैंस, गाय, बकरियां तो हैं पर बछड़े, नीलगाय और वन सुअर इस तकनीकि खेती का सर्वनाश कर रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर बैलों, नीलगाय को गोवंश बताकर संरक्षित-सा कर दिया गया। किसान तबाह है। अंदर ही अंदर चाहते हैं कि प्रशासन को गोरक्षा इतनी प्रिय है तो लखनउ व दिल्ली ले जाकर सेवा-सत्कार करें। कम से कम हमें बक्स दें। जैसाकि हमने कहा कि प्रशासन, सरकार पूरी तरह से तुलसी दास के नक्शे कदम पर है। गोवंश मारा तो न जाए लेकिन उसका किया क्या जाए, कैसे उससे फसलों की रक्षा हो, कोई नहीं बताता। यह सिर्फ मेरे गांव की या अवध के अधिकांश अंचलों में ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इनसे बचने के लिए किसान रात भर मसाल या फलैश लाईट लेकर पहरे देते हैं।

इधर किसानों में उन्नत और तकनीकि खेती के प्रति जागरूकता आई है। उत्पादन भी बढ़ा है, लेकिन दो चीजें गौरतलब है। एक तो अधिक उत्पादन के लिए भूगर्भीय जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। ट्यूबवेल तक सूख रहे हैं। कुएं पहले से ही सूखे हुए थे। चोरी छुपे बिजली व डीजल से सबमर्सिबुल आदि लगाकर पानी खींचते ही हैं और इस प्रक्रिया में पूरा साम्यवाद आ गया है। यानी क्या सवर्ण, क्या अवर्ण सब इस अफरातफरी की खेती में लिप्त हैं। सामंती मिजाज दरक कर एक दूसरा रूप ले रहा है। उत्पादन तो माना कि हो रहा है पर इसका आउटपुट क्या है? गन्ने की मिलों से पिछले साल का ही बकाया पैसा नहीं मिला है। लोग गुड़ की तरफ लोग लौट रहे हैं। गन्ने के लिए विख्यात उत्तर प्रदेश नंबर दो पर पिछड़ता जा रहा है, एक नंबर पर महाराष्ट्र आ गया है। चूंकी छोटी जोतों के किसान व कृषक मजदूर संभल नहीं पा रहे हैं सो बिहार की तरह ही वे पंजाब, दिल्ली, सूरत आदि जगहों पर पलायन कर रहे हैं। सामंती मिजाज के दरकने का यह भी एक कारण बना है।

खरीफ की फसल हो या रबी की जुताई, बुवाई या अन्य कृषि कार्योें के लिए मजदूरों की भारी किल्लत हो गई है। उनकी सूरत देखने के लिये सूरत जाना पड़ेगा, दिल्ली आना पड़ेगा। वे कहीं पंजाब में लस्सी पी रहे हैं। दिल्ली, मुंबई की सड़ी-गली जगहों में मजदूरी कर रहे हैं। साल के अंत में कुछेक हजार ले जा पाते हैं तो वही नियामत है। गांव में तो वह भी नसीब नहीं होता था। बाजार गांव का और शहर का प्रायः एक जैसा हो गया है।

अलबत्ता, शिक्षा के क्षेत्र में एक अजीबोगरीब परिवर्तन आ गया है। प्रायः सभी गांवों में सरकारी पाठशालाएं और कहीं-कहीं इंटर व डिग्री काॅलेज तक हो गए हैं। वहां मिड डे मिल भी मिलने लगा है, पोशाक भी जिसके लोभ में बच्चे-बच्चियां स्कूल जा रहे हैं। हालांकि यह गरीब तबकों के लिए चल रही व्यवस्था है। पैसे वालों के लिए तो गांव में ही जगह-जगह कन्वेंटी स्कूल खुल गए हैं। बच्चों को ले जाने के लिए बस भी चलने लगी हैं। गांधी ने निश्चित रूप से ऐसे असमान, अधकचरे और कमाऊ विकास का सपना न देखा होगा।

अवध के अंचलों में कृषि उत्पाद से उचित समर्थन मूल्य, उचित न्यूनतम मजदूरी, मिलों की बकाया अदायगी, कुटीर और छोटे उद्योग धंधों के विकास, शिक्षा के वास्तविक विकास से गांधी का सपना पूरा हो सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अधिक लोभ, अधिक उत्पादन से भूगर्भ जल की लूट और हर स्तर पर व्याप्त अव्यवस्था, जाति व्यवस्था, दहेज आदि से राम की अयोध्या का सब कुछ राम भरोसे चल रहा है। अयोध्या से सुल्तानपुर के बीच राम-वन-गमन मार्ग के बोर्ड अंकित हैं, लेकिन उनके विकास का मार्ग कहां है किसी को पता नहीं। जगह-जगह बंदरों का साम्राज्य है। अंधविश्वास का बोलबाला है।

गांव से थोड़ी ही दूर पर मिथकीय मकई कुंड मेरे ही यहां है, जहां संजीवनी बूटी लाते समय कालनेमी को हनुमान ने मारा था। उसका जल बेहद प्रदूशित है फिर भी लोग आचमन करते हैं। जहां मिथकिय रामचंद्र ने लंका से लौटते समय नहाकर हत्या का पाप धोया था, वहां मेला लगता है, एक हत्याहरण भी है जहां खून करके नहा लो तो हत्या करने से मुक्ति मिलती है। इस सांस्कृतिक गड़बड़झाला का एक असर यह है कि संगम से लौटने के बाद आपने यदि जल में आचमन कर लिया तो आपको बचाने के लिए राम को ही आना पड़ेगा।

काश! गांधी जी को यह सब पता होता। गांधी जी तो जाति-पाति तोड़क संतराम बीए से यह कहते हैं कि सबको अपनी-अपनी जाति के हिंसाब से कर्म करना चाहिए। संतराम एक सामाजिक कार्यकर्ता थे। जात-पात को सबसे खराब बीमारी मानते थे। संतराम ने कहा तो गांधी जी आप तो बनिए हैं।
गांधी जी अचकचाए-हां
संतराम- तब तो आपको नमक, तेल, धनिया बेचना चाहिए? स्वतंत्रता आंदोलन चलाना आपकी जाति का काम तो हैं नहीं। गांधी जी झेंप गए।

इस प्रसंग का उल्लेख इसलिए समीचिन लगा क्योंकि गांधी जी उन सांस्कृतिक संकटों की गहराई में नहीं जा पाए जो देश को घेरे हुए था। खैर, आर्थिक दबाव से सांस्कृतिक विकलांगता निश्चित रूप से आज नहीं तो कल और अपनी दिशा पहचानेगी और बांगर कलां जैसे लाखों गांव के ये शिक्षित युवक नयी राजनीति और कर्मनीति लेकर आएंगे।
(प्रसिद्ध कथाकार, संपादक-हंस, दिल्ली)

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