November 16, 2019

बाजार और ब्रांड के दबाव में शोषणकारी परंपरा से मुक्त होते गांव

गांधी के हिंद स्वराज की बार-बार चर्चा होती है और कहा जाता है कि यह ऐतिहासिक किताब है। मेरी राय थोड़ी अलग है। मेरी समझ से गांधी की दृष्टि न सिर्फ पिछड़ी हुई थी, अपितु मनुष्य विरोधी भी थी। गांधी एक तरफ छुआछूत मिटाने की बात करते थे, तो दूसरी तरफ वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे। बाबा साहब अंबेदकर ने गांधी को कहा भी कि वे दलित नहीं हैं, इसलिए उन्हें गांव स्वर्ग लगता है।
विभूति नारायण राय
मेरा गांव जाकहरा आजमगढ जिले के हरैया ब्लाॅक में है। बचपन में गांव से मेरा कोई रागात्मक संबंध नहीं था। पिताजी सरकारी सेवा में थे। मेरी शिक्षा-दीक्षा उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में हुई। सरकारी नौकरी होने के कारण तबादले होते रहे। लेकिन गांव को लेकर एक खास तरह का आकर्षण मन में था और मौका मिलते ही गांव जाता था। साल में दो माह यानी मई व जून में स्कूल की छुट्टियों में गांव जाना-तय सा था।

मुझे याद है कि 1993 में मैं श्रीनगर में तैनात था। छुट्टी पर इलाहाबाद आया, जहां मेरे माता-पिता रहते थे। अचानक गांव जाने की योजना बनीं। वर्षों बाद गांव जा रहा था। लेकिन वहां सुबह सोकर उठा तो अखबार की जरूरत महसूस हुई। पता किया तो गांव में किसी के घर अखबार नहीं आता था। जबकि गांव सड़क से जुड़ा हुआ है। साठ-सत्तर नौकरी पेशा लोग भी हैं। मैंने गांव के नौजवानों को इकट्ठा किया। उनसे बात की। गांव में वाचनालय बनाने की योजना बनाई, जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें भी रखी जाएं। इलाहाबाद लौटने के बाद रवींद्र कालिया और लालबहादुर वर्मा के साथ दुबारा गांव पहुंचा। सभी नौकरी-पेशा थे इसलिए गांव में ज्यादा रहना संभव नहीं था, लेकिन महीने में एक बार गांव में जाना शुरू किया। अखबार व पत्र पत्रिकाएं ली जाने लगी। पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति विकसित हो, इस दिशा में प्रयास शुरू हुआ। वर्ष 2003-4 में शबाना आजमी और कुलदीप नैयर की सांसद निधि से गांव में पुस्तकालय बनाने के लिए पैसा मिला। इस पैसे से पुस्तकालय का भवन बना। आज पुस्तकालय में 40 हजार पुस्तकें हैं जिसमें मैंने मात्र 40 खरीदी होंगी। नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा से बात करके वहां हर साल नाटक का कार्यशाला आयोजित करने की व्यवस्था की गई। इस तरह से साहित्य और सांस्कृतिक संस्थाओं के जरिए गांव में रौनक आई और पुस्तकालय खुलने के बाद से गांव से मेरा नाता अधिक गहरा हुआ।

मेरे लिए पुस्तकालय का काम सिर्फ पठ्न पाठन तक सीमित नहीं था। यह जाति और लैंगिक भेदभाव में बंटे गांव को एकजुट करने और समझने का प्रयास भी था। पुस्तकालय का पहला लाईब्रेरियन अंगद दास को बनाया गया। गांव भूमिहार बहुल है इसलिए जब भी कोई भूमिहार आता, वे कुर्सी से खड़ा हो जाया करते थे। मैंने ऐसा नहीं करने के लिए कहा। इसी तरह गांव की हरिजन महिला को खाना बनाने के लिए नियुक्त किया। सजातीय ग्रामीणों ने आवाज उठाई कि ‘वोकर छूअल कोई न खाई।’ इतना ही नहीं बड़ी संख्या में लड़कियों ने अपने घरों से निकल कर कार्यक्रमों में शिरकत करना शुरू किया। सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ी। गांव की तरफ से विरोध तो हुआ लेकिन हम मजबूत थे, कोई खदेड़ नहीं सकता था।

बचपन के गांव और आज के गांव में काफी बदलाव आया है। बदलाव सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी। पहले के गांवों में जातीय आधार पर टोले बने होते थे। दक्षिण टोला भंगी का होता था। दलित बस्ती में कोई कुंआ नहीं था, गांव के कुएं से उनके पानी भरने में भेदभाव था। उन लोगों को हम काका, चाचा कहते तो थे लेकिन रोटी देते समय उपर से डालते थे। जिस सामाजिकता की हम दुहाई देते हैं, वह सामाजिकता नर्क जैसी थी। गांव के मकान भी नर्क की तरह होते थे। खिड़की और रौशनदान नहीं होता था। स्त्रियां असूर्यंपृष्या थीं। शरतचंद्र के उपन्यास की सारी नायिकाएं टीवी से ग्रस्त थीं। वे सूर्य की रोशनी से वंचित रहती थी।

हालांकि पहले गांव में एक प्राथमिक विद्यालय था। अब छह स्कूल बन गए हैं। एक सरकारी काॅलेज भी बन गया है। पब्लिक स्कूलों की बाढ़ सी आ गयी है। बावजूद इसके शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आई है। हालांकि हर तबके का बच्चा पढ़ाई करता है। पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था ने इस बदलाव को सहजता से स्वीकार नहीं किया। रोकने का भी प्रयास किया गया। फिर भी हर परिवार में ललक है कि बच्चा पढ़े, उसे सरकारी नौकरी मिले।

यह सही है कि गांव सेे बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। इसमें हर जाति के लोग शामिल हैं। आज गांव में 14-15 साल के बहुत ही कम नौजवान दिखते हैं। भारत के ज्यादातर महानगर यानी बंबई, कोलकाता, सूरत, नोयडा, गूरूग्राम में बड़ी संख्या में गांव के लड़के रहते हैं। वहां वे कोई बड़ा काम नहीं करते। हो सकता है कि बढ़ई और पेंटर का ही काम करते हों लेकिन वहां उन्हें पूरा पैसा मिलता है। गांवों में बेगार कराने की परंपरा रही है। प्रेमचंद के दौर में सवा सेर गेहूं देकर काम करा लेने वाले लोगों के लिए यह भले ही निराशा का समय हो, लेकिन अब बेगारी कोई नहीं करा सकता। पहले गांव के भूमिहार लोग नाई के यहां जाते थे तो हजामत, दाढ़ी के बाद पैसे नहीं देते थे। आज भी कोशिश होती है कि मजूरी न दी जाए। ऐसे में गांव का कामगार वर्ग परेशान होकर गांव से शहर की ओर पलायन कर जाता है। फिर लोग मजदूर न मिलने का रोना रोते हैं। वैसे मनरेगा के जरिए भी गांव में रोजगार सृजित हुआ है। पहले जिन घरों से भूख से मरने की खबर आती थी, अब उन घरों में दो वक्त का चूल्हा जलता है।

सड़क और शिक्षा गांव में पहुंची है। मछली, मुर्गा और मांस ने बाजार के एक बड़े हिस्से को घेर लिया है। अब नाई, धोबी मेहनताना लेकर काम करते हैं। इस बदलाव की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भी भूमिका रही है। 1967 के आसपास डाॅ राममनोहर लोहिया के कारण पिछडी जातियां संगठित हुईं। अहीर, कुर्मी, जाट, गूर्जर आदि जातियां एकजुट तो हुईं लेकिन वे चेतना के स्तर पर दलित विरोधी और महिला विरोधी थीं। आगे चलकर कांशीराम के उभार के बाद दलित सशक्त हुए हैं। इस बदलाव का असर है कि पहले भूमिहार परिवार सब्जी की खेती नहीं करता था, अब सब लोग सब्जी लगा रहे हैं। पहले भूमिहार परिवारों में दूध नहीं बेचा जाता था, अब सब दूध बेचते हैं। गांव के निकट के बाजार में सब्जियां मिलती थीं। लोग हरी सब्जी लाने बाजार जाते थे। अब बाजार गांव में पहुंच गया है। मुर्गा, मछली सब मिल जाएगा।

गांधी के हिंद स्वराज की बार-बार चर्चा होती है और कहा जाता है कि यह ऐतिहासिक किताब है। मेरी राय थोड़ी अलग है। मेरी समझ से गांधी की दृष्टि न सिर्फ पिछड़ी हुई थी, अपितु मनुष्य विरोधी भी थी। गांधी एक तरफ छुआछूत मिटाने की बात करते थे, तो दूसरी तरफ वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे। बाबा साहब अंबेदकर ने गांधी को कहा भी कि वे दलित नहीं हैं, इसलिए उन्हें गांव स्वर्ग लगता है।

ग्रामीण समाज का जो द्वंद है वही पूरे भारतीय समाज में दिखाई देता है। मैं जब छात्र था तो फिराक साहब ने कहा था कि हिंदुस्तान में गांवों को नष्ट कर देना चाहिए। हमें बहुत बुरा लगा। हमने उनसे बहुत बहस किया। उनकी राय थी कि चार या छह गांव को मिलाकर एग्रो इंडस्ट्रियल टाउनशीप बनाई जाए। मुझे लगता है कि गांव को फिर से बसाने का समय आ गया है। वर्णों का आपस में मिश्रण हो, तभी गांव बदलेगा। आज भी हम टोले में बंटे हुए हैं। बाजार व ब्रांड ने गांव को शोषणकारी परंपरा से मुक्त तो किया है लेकिन यह परिवर्तन आधा अधूरा है। इस बदलाव को सामाजिक स्तर पर पूरा करने की जरूरत है तभी गांव संवरेगा और खुशहाल होगा।
(पूर्व डीजीपी एवं पूर्व कुलपति, म.गा.विश्वविद्यालय वर्धा)

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