January 19, 2020

कतहीं जियरा लागत नइखे…

महेन्द्र प्रसाद सिंह

भोजपुर जिले के कोइलवर ब्लॉक में पड़ने वाला मेरा गांव चांदी है। इसे नरहीं के साथ जोड़कर पहचाना जाता है क्योंकि भोजपुर जिले में चांदी नाम के दो गांव हैं। इसके पूरब में बहियारा, उत्तर में नरबीरपुर, दक्खिन में हरदास टोला और ​पश्चिम में जमीरा, लक्ष्मणपुर गांव हैं। चांदी को जोड़ने वाली दो मुख्य सड़कें हैं। एक आरा से कोइलवर जाने वाली सड़क जो आरा-पटना मुख्य मार्ग से धरहरा के पास निकलकर जमीरा, चांदी, बहियारा, धनडीहा होते हुए कोइलवर जाती है और मुख्य मार्ग से मिल जाती है। दूसरी सड़क छपरा-सहार स्टेट हाईवे है जो बबुरा-कोइलवर, कुलहड़िया, भवदर, नरही, चाँदी, अखगांव, संदेश होते हुए सहार चली जाती है। दोनों सड़कें चांदी में एक दूसरे को पार करती हैं जिसे चांदी चौक के नाम से जाना जाता है। पूरब में करीब 1 किलोमीटर दूर सोन नदी है। चांदी नई दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर नई दिल्ली से 950 कि.मी. दूर स्थित आरा जंक्शन स्टेशन से करीब 12 किलो मीटर पूरब और कुल्हड़िया रेलवे स्टेशन से 3 किलोमीटर दक्षिण स्थित है। यह रेलवे लाइन सन 1866 में चालू हुआ। रात के सन्नाटे में यहां से 7 कि.मी. दूर सोन नदी पर बने कोइलवर पूल से जब भी कोई ट्रेन गुजरती थी तो कभी-कभी नींद खुल जाती थी। कौन गाड़ी है इसका भी अंदाज लगा लिया जाता था। सुबह-सुबह तूफान एक्सप्रेस के जाते ही हमारे बाबूजी बोल उठते थे लगता है पांच बज गया और उनका अंदाज अक्सर सही होता था।

यह आवाज बचपन में मुझे वैसे ही आकर्षित करती थी जैसे मध्यरात्रि में दूर से आती हुई चइता और फगुआ गायन का मधुर स्वर। पर कुछ आवाजें बालमन को भयभीत करने वाली भी होती थीं। वो थीं शाम होते ही सियारों का हुआं-हुआं और मध्य रात्रि में चौकीदारों की आवाज, ” जाग सुतिह होऽऽऽ हो।” हमारे गांव में ज्यादातर बरात मठिया के सामने टिकती थी और उसमें कई बार नाच पार्टियां की कलात्मक प्रस्तुतियां होती थी। हालांकि इनमें किशोरों का जाना मना होता था, पर अपने हमउम्र दोस्तों के साथ जाकर मैं देख ही आता था। असल में हम सोते तो थे तो घर के बड़ों के साथ, पर रात में नींद खुलती तो वहां कोई नहीं होता। सारे लोग नाच देखने चले जाते थे। बस कुछ बड़ा हुआ तो नरही, बहियारा आदि गांवों में भी जाकर ऐसे कार्यक्रमों का आनन्द लेता और घर के बड़ों के लौटने से पहले ही आकर सो जाता। शायद उसी सब से मुझे भोजपुरी में नाटक करने व लिखने की प्रेरणा मिली। हिन्दी नाटक करते हुए ही अपने नागेन्द्र भैया से अभिनय सीखा था।

चांदी का गौरवशाली इतिहास रहा है। इस गांव को पूरे इलाके का सबसे पुराना उच्च विद्यालय पाने का गौरव प्राप्त है। यहां के कायस्थ परिवार शिक्षा और सम्पन्नता में सबसे आगे थे। उनमें सबसे समृद्ध थे स्व. हरबंश सहाय जिनके तीन बेटे थे-स्व. महानन्द सहाय, स्व. जगतानन्द सहाय और स्व. सच्चिदानन्द सहाय। स्व. महानन्द सहाय ने अपने पिता के नाम पर सन् 1917 में उच्च विद्यालय की स्थापना की थी। कहा जाता है कि इस विद्यालय के शिलान्यास में किंग पंचम जार्ज या अंग्रेज हुकूमत का कोई बड़ा ओहदादार आया था और उनके स्वागत में विद्यालय तक पहुंचने वाले सभी मार्गों पर मखमल विछाया गया था। यह भी कि जब पंचम जार्ज विद्यालय के निकट आए थे तो बूंदाबांदी होने लगी थी तब उन्होंने स्वयं अपने हाथ में छाता पकड़ा और महानन्द सहाय को भी ओढ़ाया था। उनकी एकलौती बेटी की शादी सूर्यपुरा स्टेट के सुविख्यात साहित्यकार राजा राधिका रमण प्रसाद से हुई थी। यह भी कहा जाता है कि इस शादी में बारातियों के स्वागत में मठिया के पास वाले कुएं में इतना चीनी डाला गया था कि पूरे कुआं का पानी ही शरबत हो गया था। उनके परिवार में आज भी लोग देश और विदेशों में बड़े—बड़े ओहदों पर हैं। उस परिवार के वारिस मदन जी का घर और उसके चारों ओर बने अहाते और विशाल दरवाजों का भग्नावषेश इसकी गरिमा के सबूत थे। एक द्वार के दो खम्भे चांदी प्राइमरी स्कूल और मठिया के बीच, सन् 1980-85 तक, गर्व से चांदी गांव के समृद्धि का इतिहास बयां करते थे। सुरखी-छोआ से जोड़े गए और प्लास्टर किये गए उन खम्भों को संरक्षित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। दूसरा द्वार उनके घर के उत्तरी भाग में बना था। घर में बहुत दिनों तक एक महंथ जी रहा करते थे जिन्होंने बाद में अपना आश्रम अयोध्या में बना लिया। अहाते में भीतर आम और लीची के विभिन्न प्रकार के पेड़ थे जिसका प्रमुख हिस्सा हमारे बड़े चाचा स्व. परीखा सिंह ने खरीदा था जो जमीरा स्टेट में तहसीलदार थे और बाद में कुछ गांवों के जमींदार भी। इस बगीचे के दक्षिण में था हमारे दादा जी का बगीचा जिसमें आज आम के पेड़ों के बीच दो मकान और मिनरल वाटर प्लांट बन गया है। प्राइमरी स्कूल अब मिडल स्कूल हो गया है और मठिया भव्य राम-जानकी मंदिर। मंदिर निर्माण में गांव वालों के साथ मदन जी का भी आर्थिक सहयोग मिला। चाँदी में राजपूत परिवारों में भी कई समृद्ध परिवार थे जिनमें वकील, पुलिस व रेलवे के अधिकारी आदि थे।

गांव के मध्य में स्थित पुराने मकानों और दो मुख्य मार्गों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वजों ने गांव को सुनियोजित ढंग से बसाया था। गांव का पुराना बाजार आरा चांदी रोड़ पर था जहां से गाँव में आने का एक चौड़ा मार्ग था। मुसलमानों के इस मुहल्ले से आते ही देवी स्थान और यादवों के मुहल्ले से गुजरने पर षुरू होता था राजपूतों का बसेरा। ब्राह्मण लोगों के घर गाँव के पष्चिम में और दक्षिण में हरिजनों का निवास है। तब बहियारा गांव में साप्ताहिक बाजार लगता था। सोन नदी में छठ पर्व पर अनुपम नजारा होता था। यहाँ गंगा स्नान, चौत्र और मकर संक्राति पर लगने वाले मेले और तेलहा जिलेबी का कोई जवाब नहीं। गर्मियों में सोन भ्रमण का आनन्द ही कुछ और था। हम सोन के किनारे खनगांव के अपने दोस्तों के खेतों का तरबूजा और ककड़ी खाने जाते थे और उन्हें अपने बगीचे का आम खिलाते।

गांव में वृद्ध लोगों का सभी आदर और सम्मान करते थे, विशेषकर उनका जो निःस्वार्थ रूप से लोगों की सेवा करते थे। ऐसे लोगों में षामिल हैं स्व. गुप्तेष्वर पाठक जो एक साधक, कर्मकाण्डी के साथ अच्छे वैद्य भी थे। बिना फीस लिए सभी का आयुर्वेदिक ढंग से इलाज करते और दवाइयां देते। स्व. वैजनाथ सिंह जो पोस्टमास्टर भी थे और गांवभर का होमियोपैथिक दवा से उपचार भी किया करते थे। महेन्द्र प्रताप सिंह जो पूरे गांव के बच्चों को फीजिक्स, केमिस्ट्री, गणित और अंग्रेजी का निःशुल्क कोचिंग दिया करते थे। कभी-कभी कोई विद्यार्थी स्वेच्छा से 10 रू दे दिया करता था। महेन्द्र प्रताप सिंह, स्व. गुप्तेष्वर सिंह उर्फ दरोजी के दामाद हैं और चांदी के सभी जातियों के सभी उम्र के लोगों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे हैं।

स्व. गणेशदत्त सिंह (पूर्व डीएसपी) का योगदान चांदी गांव कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद पूरे गांव के नालों को पक्का करवाया। उसके लिए उन्होंने युवकों से श्रमदान करवाया और नौकरी करने वालों से चन्दा लिया।
गांव के युवकों को नौकरी लगवाने के अलावे किसी भी तरह के झगड़े में न्यायकर्त्ता की भी भूमिका अदा करते। स्व. डा. बसुधा को भला कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने मेरे नाखून की सर्जरी गर्म चाकू से की थी। बड़े, बूढ़ों में मेरे बालमन पर प्रभाव छोड़ने वालों में शामिल हैं-स्व. दुर्वाशा पाठक जो पूजा पाठ करवाते और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव अपने दरवाजे पर करवाते, स्व. लुटकी पाठक जो कहीं भी बिना लोटा-डोरी और लाठी लिए नहीं चलते। उन्हीं की षैली में मैं अपने नाटक, ”बिरजू के बिआह” में रामधरोहर बनकर चलता हूँ और ”लुटकी बाबा की रामलीला” नाटक भी लिखा। स्व. टेंगरी सिंह की लम्बाई और उनका अजूबा नाम, स्व. परीखा सिंह की पगड़ी, सभी जातियों में होने वाले झगड़ों का निपटारा करवाना, सदा खड़ाऊं पर चलना, सदा तनकर बैठना और कड़े अनुशाषन में सबको रखना, स्व. चन्द्रदीप सिंह (पहलवान) का बुढ़ापे में भी घंटों कसरत करना, स्व. रतन सिंह का 90 डिग्री पर मुड़कर चलना आदि सदैव याद रहता है।

चांदी चौक पर स्थित स्व. राम लड्डू साह की मिठाई दुकान, पवन चौरसिया की पान दुकान, गांव में राम प्रसाद साह और गंगा साह की दुकानें, चिरकुट, फागु, गोधन, फेंकन, फुदुल आदि की सेवाएं, अपने बचपन के मित्रों के ठेठ नाम जैसे छकौड़ी, चुटुर, पलटू, भूअर, खदेरन, महंगू, नाकी आदि सदैव याद रहे और हमारे नाटकों में भी आते रहे।

उसी पीढ़ी के मेरे चाचा स्व. जीतन सिंह,बीए,आनर्स,एलएलबी उस काल में उच्च शिक्षा प्राप्तकर अधिकारी बने थे और गरीबों को कम्बल आदि बांटने का यश प्राप्त करते थे। मेरे पिताजी स्व. गोविन्द सिंह जिन्होंने गांव के कई मेधावी छात्रों को अपने आरा स्थित आवास पर महीनों रहने-खाने की व्यवस्था की ताकि उन्हें पढ़ने-लिखने में सुविधा हो और वे गांव का नाम रौशन कर सकें। उन्हांने नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद भी 20 वर्षों तक खेतीबारी में अपने को गतिशील रखा। दूसरी पीढ़ी के कुछ मेधावी लोग थे जो पूरे गांव के युवाओं के लिए रॉल मॉडल बन गए थे। स्व. रमाकांत सिंह जिन्होंने मगध विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया, बिग्रेडियर भरत प्रताप सिंह जिन्होंने डाक्टरी की पढाई की और सेना में बहुत सारे लोगों को भर्ती करवाया। डा. नागेन्द्र प्रसाद सिंह जिन्होने कृषि में पढ़ाई की और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और अपने विश्वविद्यालय में प्रथम होकर कीर्तिमान स्थापित किया। विश्वनाथ श्रीकृष्ण, कृष्णानन्द कृष्ण जैसे समर्थ साहित्यकार इसी गांव के थे। गांव में ही रहकर अपना निजी विद्यालय स्थापित करने वाले मास्टर कवलेष को भी मैने अपने नाटक ”बबुआ गोबरधन” में उद्यमिता का प्रतिमान बनाया। इंजीनियर, डाक्टर, पीओ, सरकारी अधिकारी आदि बहुतेरे हैं जिनका यहां नाम गिनवाना संभव नहीं है। फिर भी कुछ अपने परिवार के इंजीनियर योगेन्द्र नारायण सिंह, डाक्टर ज्ञानेन्द्र नारायण सिंह, बैंकर शिवाजी सिंह, प्राचार्या डा. कमल कुमारी सिंह, जिला न्यायधीश राजेन्द्र नारायण सिंह के साथ स्व. कृष्ण कुमार सिंह, अशोक कुमार सिंह का नाम हमारे गांव के युवकों के लिए आदर्श के रूप में लिया जाता है।

चांदी गांव के कई किसानों की खेती बंगाल में है या जिले के दक्षिणी हिस्से में उपजाऊ जमीन है जहां से अनाज आता था। खेती आधुनिक तरीके से भी की जाती थी। पर सिंचाई का साधन सरकारी ट्यूबवेल ही थे। फिर भी दूर-दूर तक करहों द्वारा पानी पहुंच जाता था और धान, गेहूं, आलू, सब्जियों की उपज खूब होती थी। अरहर, मकई, ज्वार और बाजरे की भी उपज अच्छी होती थी। लोग मेहनती थे , जिससे खुशहाली थी। शादी-ब्याह हो, पूजा-पाठ हो या त्योहार हो, आपसी सौहार्द गजब का होता था। अपने परिवार की तरह दूसरे के उत्सवों में भी काम करते थकते नहीं थे हमलोग। दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा में हमलोग बड़े उत्साह से नाटकों का मंचन करते थे। उन नाटकों में मेरे भइया डा. नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा. भरत प्रताप सिंह, कृष्णानन्द कृष्ण, स्वयं मैं और मेरे मित्रगण जैसे अनिरुद्ध नारायण सिंह, रामेन्द्र सिंह, ददन पाठक आदि लोग खूब सक्रिय होते थे। रणधीर सिंह अक्सर विदूषक की भूमिका निभाते थे। होली गायन मुंशी चाचा के दरवाजे से उठता था और पूरे गाँव में घूमता था।

चांदी चौक पर सरकारी चिकित्सा केन्द्र था जिसके लिए जमीन स्व. परीखा सिंह ने दी थी। बिजली 1960 तक आ चुकी थी। पर धीरे-धीरे लोग सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग करने लगे। करहों की जड़ें काटकर मिट्टी ढोने लगे या अपने-अपने खेतों में मिलाने लगे। सरकारी तंत्र में लूट और करहों का मरम्मत न होना, बिजली के खम्भों एवं तारों की चौतरफा चोरी से सिंचाई प्रभावित होती गयी। निजी ट्यूबवेल्स लगाने पड़े। फिर भी कई क्षेत्रों में आज भी खेती बारिस के भरोसे रह गया है। शराबबंदी के पहले शराब पीने की लत कई परिवारों के लिए दुर्भाग्य का कारण बना। शराबबंदी से कई परिवार बच गए, पर अब उसकी जगह ड्रग्स ने ले रखा है। सड़कों पर बालू ढोने वाले ट्रकों ने गाँव की शांति भंग करने के साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ा दिया है। बगीचे सूखते चले गए। पीपल के पेड़ों को काट दिया गया। आपसी सौहार्द कम होता गया। नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम अब देखने को नहीं मिलता। मैने अपना एक नाटक ”कचोट” अपने गांव की मिट्टी और गांव के लोगों को समर्पित किया है और अपनी एक कविता की दो पंक्तियों को नाटक-”बबुआ गोबरधन” का हिस्सा बनाया जो निम्न प्रकार हैः-
चानी छोड़ बोकारो गइनीं, दिल्ली के इहे कहानी बा
कतहीं जियरा लागत नइखे, सबसे नीमन आपन चानी बा।

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