रविशंकर सिंह
उत्तम खेती मध्यम बान। अधम चाकरी भीख निदान॥ अर्थ – सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय खेती (कृषि) है। मध्यम कोटि का व्यवसाय वाणिज्य (व्यापार) है। नौकरी अधम है। इस लिहाज से देखें तो मेरे पुरखों का काम काफी उत्तम था यानी वे किसान थे। हालाकि छोटी जोत के किसान परिवारों की विडंबना ये भी रही है कि सिर्फ खेती—किसानी से तो काम चलता नहीं इसलिए इन परिवारों में पढ़—लिख कर चाकरी करने की भी परंपरा रही है। इस लिहाज से देखें तो मेरे पिताजी पेशे से शिक्षक थे। यानी उत्तम खेती से लेकर अधम चाकरी तक दोनो विद्याओं को नजदीक से देखने का मौका मिला है। बावजूद इसके खेती हमारा पुश्तैनी धंधा था। खेती का गुर मुझे विरासत में मिला। काका खेती करने के अलावा बाग बगीचा भी लगाते थे। हमारे गांव से थोड़ी दूर पर भागलपुर कृषि विश्वविद्यालय है। वहां की नर्सरी से वे तरह-तरह के पौधे ले आते थे -आम, अमरूद , सपाटू आदि।
काका फलों के पेड़ लगाते थे और मैं फूलों की क्यारियां सजाता था। मेरे इस कार्य में काका काफी सहयोग करते थे, जैसे कुदाल से मिट्टी गोड़ना, गड्ढे खोद देना, गोबर खाद निकाल कर देना आदि। मेरे कार्य से दादी भी बहुत खुश रहती थी। उन्हें रोज सुबह पूजा करने के लिए ढेर सारे फूल मिल जाते थे। दादी मुझे आशीष देती हुई कहती, ” बेटा ! तुम्हारे उगाए हुए फूल देवताओं पर चढ़ते हैं। देखना देवता तुम्हारे जीवन में फूलों की खुशबू भर देंगे। “

दादी का प्रोत्साहन पाकर मेरा उत्साह दुगुना हो जाता था। काका बड़े गर्व के साथ लोगों को मेरी फुलवारी दिखाते और मेरे शौक के बारे में बताते थे। लोग मुझे शाबाशियां देते। गेंदा , गुलाब , जूही , बेली, चमेली, उड़हुल, हरसिंगार , रातरानी, रजनीगंधा और क्रोटन मेरी फुलवारी के शोभा हुआ करते थे। उन दिनों गांव में इंका गेंदा की वेरायटी और गुलाब की कलम वैरायटी उपलब्ध नहीं होती थी। गांव में फूलों की जो किस्में उपलब्ध थी, उसे बड़ी मेहनत से मैं सजा संवार कर रखता था।
मेरे घरवाले मेरे बारे में कहा करते थे, ” इसके हाथों में जादू है । इसी से पौधे लगवाओ। इसके हाथों का लगाया हुआ पौधा कभी मरता नहीं है। ” आज सोचता हूं बागवानी की ओर प्रेरित करने के लिए इस प्रकार का कथन मेरे जीवन में कितना उपयोगी सिद्ध हुआ।
उम्र के साथ-साथ मेरा शौक परवान चढ़ता गया। मैं टीएनबी कॉलेज का छात्र था। मेरे कॉलेज के बगल में भागलपुर यूनिवर्सिटी का बॉटनिकल गार्डन काफी समृद्ध था। खाली वक्त में मैं कभी अकेले और कभी मित्रों के साथ उसी बॉटनिकल गार्डन में जाकर अपना समय व्यतीत करता था। वहां सभी पेड़ पौधों के पास उनकी प्रजाति के नाम प्लेट में लिखे होते थे। मैं उन्हें पढ़ता था और उससे परिचित होता था। साइकस , बोगनवेलिया , एलिमेंडा, क्रिसेंथमम, डालिया , बोटल पाम, एरिका पाम आदि नामों से वहीं मेरा परिचय हुआ। वहां के माली से निहोरा करके मैं कुछ पौधे गांव भी ले आया था। साइकस प्लांट का जो पौधा उन दिनों मैं गांव ले आया था , उसी प्लांट से निकला हुआ पौधा आज भी मेरे पास शहर में बचा हुआ है।
शहर में अपना मकान बनाने से पहले जहां भी किराए के कमरे में रहा कुछ गमले मेरे साथ अवश्य हुआ करते थे। अपना मकान बना लेने के बाद मैं अपने इस शौक को विस्तार देना चाह रहा था , लेकिन जगह की सबसे बड़ी समस्या थी। मैंने गमलों में पौधे लगाए। धीरे धीरे मेरा अनुभव बढ़ता गया। जैसे, मैंने सीखा कि गमले मैं ड्रेनेज की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए। आम, नींबू और टमाटर के पौधे में कम पानी देना चाहिए। फूल आते समय पौधे में जल देने से फूल गिर जाते हैं। पौधे के जड़ों में ऑक्सीजन भली-भांति प्रवेश कर सके इसके लिए गमले की सप्ताह में कम से कम एक बार गोड़ाई अवश्य करनी चाहिए। गमले में मिट्टी भरने से पूर्व ईंट- पत्थर के कुछ टुकड़े अवश्य डालने चाहिए। गमले की मिट्टी में बालू, कंपोस्ट और पत्तों की खाद का प्रयोग करना चाहिए।
कुछ दिनों बाद गमले की बागवानी से मेरा मन नहीं भरा। मैंने ढाई फीट- 5 फीट काश स्लैब बनवाया। प्रत्येक स्लैब में 3 – 3 बड़े होल करवाए। लैब के नीचे ढाई फीट ऊंचा ईट का स्टैंड बनाकर उस पर फ्लैग को रखवा दिया। उसके ऊपर 5 इंच ईंट की दीवार बनवा कर उसके बीच-बीच में पार्टीशन करवा दिया। 5 इंच के दीवार में भी बड़े-बड़े होल बनवा दिए। क्या आर्यों के ताल में छोटी-छोटी पत्थर की गिट्टियां डलवा दी । उसके ऊपर एक परत बालू बिछवा दिया। क्यारियों में बालू मिट्टी और कंपोस्ट मिलाकर मैंने कुछ पौधे लगा दिए। उर्वरक के रूप में मैं सरसों की खली को पानी में 1 सप्ताह तक चढ़ा कर उस पानी को पौधे में डालता हूं। अमेजॉन से डीकंपोजर मंगवा कर मैंने 200 लीटर के ग्राम में लिक्विड खाद बनाकर रखा है। यह लिक्विड खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और कीटाणुओं से ही पौधों की रक्षा करता है। मैं अपनी रसोई से निकला हुआ किचन वेस्ट खाद बनाने के काम में लाता हूं। किचन वेस्ट से खाद बनाना बहुत आसान है। किचन बेस्ट को मैं छेद किए हुए प्लास्टिक की बाल्टी में ढककर लगभग 3 महीने तक छोड़ देता हूं। उस प्लास्टिक की बाल्टी की छेद से भी लिक्विड के रूप में खाद मिलती रहती है। मैं उस लिक्विड को जल में मिलाकर पौधों पर छिड़काव करता हूं और पौधों की जड़ों में भी डालता हूं। फिलहाल मेरी क्यारियों में काफी केंचुए उत्पन्न हो गए हैं। कुछ दिनों के उपरांत मेरी क्यारियों की मिट्टी काफी उपजाऊ हो जाएगी।
घर में कौन-कौन सी सब्जी लगा सकते है-
रबी के मौसम की सब्ज़ियां: रबी में सब्ज़ियां सितम्बर-अक्टूबर में लगा सकते है जैसे- फूल गोभी, पत्तागोभी, शलजम, बैंगन, मुली, गाजर, टमाटर, मटर, सरसों, प्याज़, लहसुन, पालक, मेथी, आदि।
खरीफ के मौसम की सब्ज़ियाँ: खरीफ़ में लगाने का समय जून-जुलाई है। इस समय भिन्डी, मिर्च, लोबिया, अरबी, टमाटर, करेला, लौकी, तरोय, शकरकंद आदि सब्जियों को लगा सकते है।
जायद की सब्ज़ियां: जायद में सब्ज़ियां फरवरी-मार्च और अप्रैल में लगाई जाती है… इसमें टिंडा, खरबूजा, तरबूज, खीरा, ककड़ी, टेगसी, करेला, लौकी, तरोय, भिन्डी जैसी सब्जी लगा सकते है…
फिलहाल मेरी क्यारियों में पालक धनिया, बैगन, पुनका साग टमाटर , करेला , खीरा, नेनुआ, भिंडी, झींगा के अलावा कुछ फूलों के पौधे लगे हुए हैं। इसके अलावा 25 लीटर वाले प्लास्टिक के ड्रम में अमरूद जामुन के पौधे भी लगे हुए हैं। अमरुद के पौधे पुराने हो चुके हैं और फल देने लगे हैं।
सब्जी बगीचा के लाभ:-
1. खाली छत का उपयोग होने के साथ ही व्यर्थ पानी व कूड़ा-करकट का सदुपयोग हो जाता है…
2. मनपसंद सब्जियों की प्राप्ति होती है…
3. साल भर स्वास्थ्यवर्धक, गुणवत्तायुक्त व सस्ती सब्जी, फल एवं फूल प्राप्त होते रहते है…
4. परिवार के सदस्यो का मनोरंजन व व्यायाम का अच्छा साधन है, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है…
5. पारिवारिक व्यय मे बचत होती है…
6. सब्जी खरीदने के लिये अन्यत्र जाना नही पड़ता…
आप मेरी क्यारियों में उपजे हुए फल और सब्जियों की कीमत पर मत जाइए। उनके स्वाद के क्या कहने ! सचमुच मेहनत का फल बहुत मीठा होता है। आप भी इस विधि को अपनायें और प्रकृति के करीब आकर इस अनोखे स्वाद का भरपूर आनंद लीजिए।


