November 16, 2019

गांधी के रास्ते चलकर ही बदलेगा गांव सोभानपुर

मनोज मीता
गांधी जयंती 2016 के पहले मैंने “सोभानपुर” का नाम भी नहीं सुना था। यह भागलपुर-अमरपुर-बांका रोड पर इंगलिश मोड़ से तीन किलोमीटर उत्तर स्थित है जो अमरपुर प्रखंड का सबसे बड़ा पंचायत है। सोभानपुर पंचायत में एक ही राजस्व गांव है। मेरे सोभानपुर गांव पहुंचने की यात्रा भी अनोखी है। दिशा ग्रामीण विकास मंच, बैजनी अपनी स्थापना दिवस २ अक्तूबर को तीन दिवसीय गाँधी उत्सव का आयोजन करता है। वर्ष 2015 के उत्सव में गांधीवादी साहित्यकार सुजाता चौधरी भी सम्मलित हुई थी। दूसरे वर्ष 2016 भी वे आई और समापन कार्यक्रम के दौरान उन्होंने सोभानपुर में स्थित 6 एकड़ निजी जमीन गाँधी के ग्राम स्वराज्य के प्रयोग के लिए संस्था को दान करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा से सभी आश्चर्यचकित थे, पर मैं ऐसे गांव की कल्पना में खो गया जिसमें गाँधी के सपनों को या गाँधी के विचारों को प्रयोग में लाया जा सकेगा।

गाँधी उत्सव के समापन के बाद सोभानपुर गांव को इन्टरनेट पर खोजा तो पता चला कि यह भागलपुर से 40 किलोमीटर और बांका से 15 किलोमीटर दूरी है। अपने गांव में यह पता करने लगा कि कोई उस इलाके का हो तो कुछ सहयोग मिलेगा। गांव को जानने वाला मेरा एक मित्र मिल गया। मैं बहुत उत्साह से उससे मिला, पर उसने सोभानपुर गांव का जो खाका सामने रखा वह डरावना था। उसने कहा कि वह गांव तो नक्सलियों से भी अधिक खतरनाक है। दिन दहाड़े मुड़ी (सर) काट लेता है और तुम चले हो 30-40 वर्ष से उनके अधिकार में रही जमीन को कब्जा करने। मुझे उसकी यह कब्जा वाली बात अच्छी नहीं लगी। मैं 12 अक्तूबर, 2016 को अकेले ही सोभानपुर गांव निकल गया। मुझे जमीन-दाता से दो व्यक्तियों का नाम मिला था-एक श्री सुरेश यादव और दूसरे श्री उत्तम मांझी। मैंने सोभानपुर जाने से पूर्व अजय जी, बांका से भी सम्पर्क किया था। उन्होंने कहा था कि इंग्लिश मोड पहुँच कर हमें रिंग करें, हम आ जाएँगे। मैं इंग्लिश मोड़ पहुंचा और अनुमान से सोभानपुर की ओर बढ़ गया। करीब डेढ़ किलोमीटर बाद एक बोर्ड मिला जिसपर लिखा था सोभानपुर। यह मेरा प्रथम परिचय था सोभानपुर से।
पहले दिन मैं जब सुरेश यादव जी को खोजते हुए गया तो उनकी दुकान मिली। वहां एक बुजुर्ग व्यक्ति धूप में अलसाया सा बैठा था। मैंने नमस्ते किया तो नजर उठाकर देखा भर लिया और कुछ नहीं। मैंने अपना परिचय दिया तो वह खड़े हो गए और नमस्कार के बाद बोले हम गांव वाले तो आप का कब से इंतजार कर रहें हैं। आप गाँधी के काम वाले है न। और उसके बाद उनका साथ अब तक बना हुआ है। और जब मैं गांव के अंदर गया तो एक नया संसार मिला।

अब आमतौर पर गांवों में कोई बैल नहीं पलता, हल-बैल के जगह ट्रेक्टर ने ले ली है। लेकिन यहाँ अभी भी प्रत्येक दरवाजे पर मस्त बैलों की जोड़ी नाद में खाना खाते मिल जाएंगे। यहाँ अभी भी देशी गायांे की अधिकता है। किसान का अधिकतर समय खेतों में ही बिताता है। छोटे छोटे जमीन के टुकड़े में भी कुछ न कुछ बोया है और पास लगने वाले ग्रामीण हाट में सबसे अधिक सोभानपुर के ही सब्जी वाले मिलेंगें। हरेक घर के मुंडेरे पर चिड़ियों का झुण्ड मिलेगा क्योंकि सभी घर में कोई न कोई हिस्सा आज भी पुवाल का है जहाँ उनका बसेरा है। दरवाजे पर हल और पालो मिलेगा। गांव में अब भी बैलगाड़ी है।
मैं खाना नहीं बनाता जिसके घर खाने के समय पहुंचा खाना खा लिया। कहीं चावल दाल और सब्जी मिली तो कहीं चावल सब्जी और दूध मिली। जब मार्किट में काकोरी (एक तरह की सब्जी) 80 रूप्ए किलो है तो आप को डेली काकोरी मिल रही है और जब 20 रूपए हैं तो परोड की सब्जी है। कहने का अर्थ है कि खाने में परोसे जाने वाले सारे सामान किसान के घर का है, सब्जी सभी उपजाते है। रात हो या दिन गाय का शुद्ध दूध मिल जाएगा। कुछ मायने में अजब-गजब गांव है सोभानपुर, नहीं तो दान की हुई सारी जमीन लोगों ने खोज कर एक जगह नहीं कर दी होती।
गांव की आबादी मिलीजुली है। संख्या बल में सबसे ऊपर कोइरी जाति के लोग है, जो वहीं बसते है जहाँ पानी की सुविधा होती है। उनके बाद यादव, तेली, पासवान, ठाकुर, बनिया, चमार, पासवान और मुस्लिम है। सोभानपुर में नहर भी है, पांच किलोमीटर के दूरी पर एक डैम भी है। साधारण चापाकल में 30 से 40 फीट पर पानी उपलब्ध है। हिदुस्तान में इसतरह कोई दूसरा गांव का शायद ही मिले जहाँ हिन्दू- मुस्लिम का आंगन एक दूसरे से मिलता हो, छप्पर का पानी एक-दूसरे के घर पर चूता हो। गांव के बुजुर्ग राजकुमार यादव कहते है कि नीतीश कोई कम अच्छा नहीं किया कि दारू बंद कर केस-मुकदमा और रोज शाम के झगड़ा को गांव से खत्म कर दिया।

सोभानपुर के आसपास धनाय, बेला, किशनपुर, बलुवा, कमरखाल और दो अल्पसंख्यक गांव महगामा और कटोरिया है। कटोरिया बड़े बुनकरों का गांव है जहाँ घर-घर लूम और सूत कटाई चलता है। सोभानपुर ही मुख्य गांव है। आश्रम बनाने के पूर्व मेरा मुख्य बसेरा यही गांव था। गांव को लोग दबंग बोलते हैं, पर मुझे कहीं भी दबंगता नहीं दिखी। गांव में लोग एक-दूसरे को सम्मान से संबोधित करते हैं-बूढ़े बुजुर्ग को बड़का बाबू, भैया, महिला को दादी, बडकी माय, भौजी के संबोधन हैं। यादव घर का लड़का भी अपने खेत में काम करने वाले के बुजुर्ग महादलित को बड़का बाबू ही कहते है। कोई भी बुजुर्ग किसी को भी डांट सकता है, कोई प्रतिकार नहीं होगा।
पडोस कीं चानन नदी के कारण गांव के कुछ लोग अचानक अमीर हो गए है, बालू की अवैध ढुलाई के जरिए। घर-घर ट्रैक्टर और जेसीबी हो गया है। पढ़ने वाला बच्चा ट्रेक्टर चलता है और उसके गार्जियन से कहिए तो जवाब मिलता है, 15-20 वर्ष पढ़ेगा तो क्या होगा ? नौकरी मिलेगी या नहीं पता नहीं। पर एक ट्रिप बालू बेचेगा तो 2000 रुपया घर ले आएगा। सामाजिक काम में जितने बुजुर्ग सक्रिय है। युवा मिलेंगें नहीं, वे या तो ट्रैक्टर में है या फिर टैक्ट्रर कैसे हो, इस फेर में है। ग्राम पंचायत कीे स्कीमों ने भी युवाओं को दिग्भ्रमित किया है। लाखों का काम पेपर पर हो रहा है। ग्रामीण चुपचाप इंतजार करते हैं कि इस लूट में कभी उनकी भी बारी आ सकती है। मैं गांव-गांव बैठक करता हूँ शुरू में लोग को कुछ समझ में नहीं आता था। पर जब उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति लगातार हम लोगों के बीच रह रहा है तब वे भी आगे आने लगे हैं। उन्हीं में से एक बिभाश यादव भी है जो अच्छा पढ़ने-लिखने वाला लड़का था, पर बालू और ट्रैक्टर के लोभ में सब छोड़ कर ठीकेदारी करने लगा था। अब सामाजिक कामों का बीड़ा उठाया है, गांव के युवाओं को संगठित करने का प्रयास कर रहा है। बिभाश कहता है कि हम लड़का लोग खेलना, क्विज करना चाहते थे पर कोई सपोर्ट नहीं था। हमसे छोटा-छोटा लड़का भी इधर उधर करके अच्छा पैसा कम लेता था। कोई भी काम बिना पैसा लिए नहीं करता था। पर आपलोगों का काम देख कर लगा कि यह काम भी किया जा सकता है।

राजनीतिक पार्टियों ने लोगों को जाति के आधार पर टुकड़े—टुकड़े में तोड़ दिया है। गांव के 28 वर्ष तक मुखिया रहे नारायण मांझी कहते है कि राजनीतिक पार्टी वालों ने अपने वोट के लिए गांव-आंगन में जाति के आधार पर सीमांकन कर दी है, जब तक जाति की राजनीति रहेगी, इसका हल नहीं है। वे भी यह मानते है कि गांव की इस समस्या का एक ही निदान है गाँधी का मार्ग
ग्रामीण महिलाओं में पढाई को ले कर जबर्दस्त उत्साह है। उन्हें लगता है कि गांव में अगर कोई भी नई बिल्डिंग बन रही है तो वो स्कूल ही होगा। गांव की गली गली में इंग्लिश स्कूल खुल गए हैं जो काम मैकाले नहीं कर पाए वह आज के नए धनिक कर रहे हैं। गांव की बैठक में महिलाएं कहती है कि दो चीज चाहिए-एक अच्छी पढ़ाई और खाली समय में हम महिलाओं को काम।
गांव के 3-4 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐतिहासिक जगह है, स्वतंत्रता की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने वाले शहीद महेंद्र गोप का पैत्रिक गांव रामपुर जो यहाँ से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहाँ उनकी प्रतिमा लगी है। वहीं तीन किलोमीटर दक्षिण में झरना पहाड़ है, पहुंचने के बाद यह विश्वास करना मुस्किल होता है कि यह स्थान बांका जिला में है। सैकड़ों एकड़ मैं फैला जंगल, ऊंची-ऊंची पहाडियों से घिरा झरना पहाड़ सालोंभर पानी देता रहता है। वहीँ जेठोर पहाड़ी की तलहटी में बहती चानन नदी के बीचोंबीच बने टीले। ग्रामीण कहते हैं कि कितनी भी बडी बाढ़ आ जाए, यह टीला नहीं डूबता। लोक मान्यता है कि महाभारत के अमर योद्धा और अंग प्रदेश के राजा कर्ण की युद्ध में मृत्यु के बाद उनके शव को भगवान कृष्ण ने अपनी हथेली पर रखकर इसी जगह जलाया था। यह जगह आज उजाड़ और बिना किसी पहचान के पड़ा है।
गाधी आश्रम सोभानपुर,बांका।

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