भोंडसी आश्रम बना चंद्रशेखर स्मृति वन बहुरेंगे दिन भारत यात्रा केंद्र के

ब्रजेश कुमार झा (एसोसिएट संपादक)

भोंडसी का ‘भारत यात्रा केंद्र’ विरान पड़ा है। जिस घर में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर रहते थे, वहां शराब की टूटी-फूटी बोतलें बिखरी हुई हैं। घर का हर कोना गंदगी से भरा है, जिससे दुर्गंध फैल रही है।

यहां हरियाली कहीं दिखाई नहीं देती। सरोवर का पानी भी सूख चुका है। अब कोई जंगली जानवर हो या पशु-पक्षी, सभी पहाड़ी पर स्थित माता भुवनेश्वरी मंदिर के जल-कुंड से ही प्यास बुझाते हैं। यहां माता का मंदिर एक मात्र आकर्षण का केंद्र है।

राजेंद्र से मुलाकात हुई तो वे बोले, ‘अब केंद्र में वह बात नहीं रही, जो बाबूजी (चंद्रशेखर) के समय थी। पहले केंद्र में मेला लगा रहता था। कई तरह के कार्यक्रम होते थे। अब सन्नाटा फैला रहता है।’ राजेंद्र से बातचीत के दौरान पता चला कि 1988 में चंद्रशेखर उन्हें लेकर यहां आए थे। तब वे 26 के थे। माटी के बर्तन बनाने की कला में निपुण हो चुके थे।

विलंब से ही सही हरियाणा सरकार को ‘भारत यात्रा केंद्र’ की याद आई है। एक समय यह केंद्र सत्ता की धुरी था। फिर गहरी उपेक्षा का शिकार हो गया। अब राज्य सरकार यहां ‘स्वर्ण जयंती नेचर पार्क’ बना रही है।

यहां भगवान अवधूत राम की कुटिया हो या बेनी माधव का निवास स्थल उन सभी भवनों को बनते हुए राजेंद्र ने देखा है। जब 2002 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो चंद्रशेखर ने भारत यात्रा केंद्र को उसकी किस्मत पर छोड़ दिया। उन्होंने पास ही नए भोंडसी आश्रम की नींव रखी, लेकिन राजेंद्र ने यहीं रहने की जिद्द ठानी।

केंद्र के एक छोर पर राजेंद्र रहते है। वहां लिखा है- ‘अपना देश, अपनी कला।’ यहां वे माटी के बर्तन बनाते हैं और बेचते हैं। इस बात का उन्हें दुख है कि जिस केंद्र को आबाद होते हुए देखा था, उसे उजड़ते हुए भी देखना पड़ा।

फिलहाल यहां इमारतों के नवीनीकरण का काम चल रहा है। कुछेक नई संरचनाओं को भी आकार दिया जा रहा है। स्थानीय अधिकारी कर्मवीर मलिक ने बताया कि इस स्थान को ‘स्वर्ण जयंती नेचर पार्क’ के रूप में विकसित करने की योजना है।

ध्यान होगा कि कोर्ट के आदेश पर चंद्रशेखर ने भारत यात्रा केंद्र ग्राम पंचायत को सौंप दिया था। 2004 में ही ग्राम पंचायत ने यह क्षेत्र वन विभाग को दे दिया। तब से हरियाणा वन विभाग इसकी देख-रेख करता आया है। लेकिन, रखरखाव के अभाव में केंद्र में बनी इमारतों का बुरा हाल है। यहां की हरियाली खत्म हो चुकी है।

यह केंद्र अरावली की गोद में बसा है। इसकी हरियाली एक समय देखते बनती थी। उसके पीछे चंद्रशेखर की मेहनत थी। यहां एक झील बनाया गया था। वह झील पक्षियों व जलचर जन्तुओं का बसेरा था। खूबसूरत पार्क और बाग-बगीचे लगाए गए थे, सो अलग। अरावली की पहाड़ी पर पौधारोपण कर क्षेत्र को रमणीक स्थल बना दिया गया था।

नेपाल के प्रधानमंत्री रहे जी.पी.कोइराला जब यहां आए, तो सरोवर के नजदीक पीपल का एक पौधा लगाया था। चंद्रशेखर के सहयोगी रहे एच.एन.शर्मा ने उसे दिखाया। अच्छी बात है कि वह पौधा अब छायादार पेड़ बन चुका है।

खैर, हरियाणा वन विकास निगम के महाप्रबंधक सुभाष यादव इस केंद्र को ‘स्वर्ण जयंती नेचर पार्क’ का रूप देने में जुटे हैं। वे कहते हैं, ”इससे पहले भी कई योजनाएं बनीं, लेकिन संयोग ही रहा कि कोई योजना आकार नहीं ले पाई।’ लगातार कोशिश के बाद जनवरी, 2016 में उन्हें सफलता मिली। हरियाणा सरकार ने उनकी योजना को मंजूरी दे दी।

सुभाष यादव कहते हैं, ‘अरावली के इस क्षेत्र को ऐसा स्वरूप देने की योजना है, जहां बच्चे आकर जंगल के बारे में अपनी समझ विकसित कर सकें। वे इस बात को महसूस करें कि आखिर मानव-जीवन के लिए जंगल क्यों जरूरी है।’ बात केवल इतनी ही नहीं है। नेचर पार्क को विकसित करने के साथ-साथ चंद्रशेखर से जुड़ी स्मृतियों को भी यहां संरक्षित किया जाएगा।

यहां एक म्यूजियम बनाया जा रहा है, जिसका एक कोना चंद्रशेखर के नाम समर्पित रहेगा। म्यूजियम को सजीव रूप दिया जा सके, इस दिशा में स्वयं सुभाष यादव कोशिश कर रहे हैं। वे चंद्रशेखर के निकटतम सहयोगियों से संपर्क कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘यहां नई संरचनाएं तैयार नहीं की जाएंगी। पहले से जो भवन बने हुए हैं, जरूरतों के मुताबिक हम उनका सदुपयोग करेंगे। हमारा पूरा ध्यान भारत यात्रा केंद्र को नेचर पार्क के रूप में बेहतर तरीके से विकसित करना है।’

⌈‘अरावली के इस क्षेत्र को ऐसा स्वरूप देने की योजना है, जहां बच्चे आकर जंगल के बारे में अपनी समझ विकसित कर सकें। वे इस बात को महसूस करें कि आखिर मानव-जीवन के लिए जंगल क्यों जरूरी है।’- सुभाष यादव (हरियाणा वन विकास निगम के महाप्रबंधक)

इसी योजना के तहत अशोक वाटिका का कायाकल्प किया गया है। इसमें 15 कमरे हैं। बाहर से आने वाले लोग यहां ठहर सकेंगे। इसके अलावा ओएनजीसी की मदद से 10 टेंट की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिसमें बच्चे ठहरेंगे। एक टेंट में छह बच्चों के ठहरने की जगह होगी।

केंद्र में आने वाले लोगों के लिए भोजन की सुविधा स्वयं सहायता समूह की महिलाएं उपलब्ध कराएंगी। इस काम के लिए भोंडसी और अकीलमपुर की महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। यहां विशेष तौर पर हरियाणवी खाने परोसे जाएंगे। शाम के वक्त ओपन थिएटर में हरियाणवी लोक नृत्य और गायन का लोग आनंद उठा पाएंगे।

यादव कहते हैं, ‘हमारा प्रयास है कि यहां आने वालों को अरावली के जंगल और जीव-जंतु की जानकारी तो हो ही, इसके साथ-साथ वे हरियाणवी संस्कृति से भी रू-ब-रू होकर लौटें।’ नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के सहयोग से एक हर्बल पार्क को विकसित किया जा रहा है। एक बड़ा क्राफ्ट बाजार होगा, सो अलग।

स्मरण रहे कि हरियाणा के छह जिले में अरावली फैली हुई है। इसके जंगल, जीव-जंतु और यहां का जीवन-चक्र विभिन्न ऋतुओं में किन-किन रूपों को धारण करता है? इसे फोटो-फीचर के जरिए प्रदर्शित किया जाएगा। बच्चों के लिए एक एडवेंचर पार्क तो बनकर तैयार हो चुका है। आगंतुकों को सैर सपाटा कराने के लिए 20 नवयुवकों को नेचर गाइड के बतौर प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि आने वालों को वे छोटी से छोटी चीजों के बारे में जानकारी दे सकें।

एक अच्छी बात यह है कि यहां जितने भी रोजगार के अवसर पैदा होंगे, वे भोंडसी एवं अकीलमपुर के लोगों को ही दिए जाएंगे। यहां के लोगों के लिए नेचर पार्क में प्रवेश हमेशा नि:शुल्क होगा। पार्क में गाड़ी का प्रवेश वर्जित होगा। लोग ऊंट गाड़ी, ई-रिक्शा और साइकिल से इसकी सैर कर सकेंगे। 31 अक्टूबर तक स्वर्ण जयंती नेचर पार्क को पूरा होना है।

एकबारगी ऐसा लगता है कि म्यूजियम में चंद्रशेखर का कोना छोड़कर ‘भारत यात्रा केंद्र’ यहां इतिहास बन जाएगा। अच्छा तो यह होता कि इस नेचर पार्क का नाम चंद्रशेखर के नाम से जुड़ा होता। उस भवन का नाम ‘चंद्रशेखर स्मृति भवन’ ही रखा जाता, जहां वे रहा करते थे। अगर ऐसा होता है तो इसके संकेत गहरे होंगे। (यथावत से साभार)

 

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एक दशक से भी ज्यादा से पत्रकारिता में सकिय। संसद से लेकर दूर दराज के गांवो तक के पत्रकारिता का अनुभव। ग्रामीण समाज व जनसरोकार से जुड़े विषयों पर पत्र पत्रिकाओं में लेखन। अब पंचायत खबर के जरिये आपके बीच।

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