दादी (बापी) के नुस्खे साबित हुए रामबाण… बदल रहा है दंतेवाड़ा का स्वास्थ्य परिदृश्य

संतोष कुमार सिंह

दंतेवाड़ा: क्या तुम्हें याद है वो बातें पुरानी,
दादी (बापी) के नुस्खे नानी की कहानी।
कौन ऐसा होगा जिसका बचपन से लेकर युवावस्था तक दादी के नुस्खे और नानी की सीख के बीच से न गुजरी हो।
नानी के नुस्खे दादी के बोल
होते थे सीधे प्यारे व सच्चे
उसका न कोई तोल…थे बहुत अनमोल
                                           बिना किसी भाव गोल मोल।

यानी हर किसी के जीवन में दादी के नुस्खे और नानी के बोल ने कुछ न कुछ बदलाव लाया ही होगा। क्योंकि हमारे बुजुर्गों के पास उनके अनुभव का खजाना होता है,हर समस्या का समाधान हुआ करता था और वे अनुभव की बदौलत की किसी भी परिस्थती या हल्के-फुल्के बीमारी की स्थिती में रामबाण ईलाज किया करते थे। लेकिन यहां किसी एक व्यक्ति या परिवार के दादी की बात नहीं हो रही है। यहां ऐसे दादी की बात हो रही है जो पूरे गांव की दादी हो और गांव को उसकी बातों पर भरोसा हो। चाहे कोई भी समस्या हो वो गांव के लोगों के साथ खड़ी होती है। विगत सप्ताह छत्तीस गढ़ के बस्तर रीजन के नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में कुछ ऐसी ही दादियों से मिलने का मौका मिला जिन्हें पूरे गांव का स्नेह हासिल है। गांव उनपर भरोसा करता है और दादी भी चाहे कोई भी समस्या हो, कोई भी पहर हो, कितनी भी मुश्किल की घड़ी हो गांव वालों पर नेह लुटाने से ​पीछे नहीं हटती।

इन दिनों ​छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा जिले में जिला प्रशासन और यूनिसेफ के संयुक्त प्रयास से एक अनूठा कार्यक्रम चलाया जा रहा है, यानी अभिनव प्रयोग किया जा रहा है जिसका जमीनी प्रभाव इन नक्सल प्रभावित जिले में शाषण के प्रति आम लोगों के भरोसे और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच गांव के सबसे हाशिए पर रह रहे समाज तक पहुचाने में मददगार साबित हो रहा है। और ये सब संभव हुआ है दादी की बदौलत। दादी ​ यानी बापी। इस कार्यक्रम का नाम दिया गया है बापी न उवाट (कार्यकर्ता)। इसके तहत हर गांव में एक बापी नियुक्त किया गया है ​जो लोगों के स्वास्थ्य व्यवहार में बदलाव लाने में सहायक हो रही हैं। ये दादियां यानी बापी स्वस्थ व्यवहार के 7 सूत्र के जरिए जैसे गंदगी मुक्त दंतेवाड़ा,पूर्ण सुपोषित दंतेवाड़ा, अनीमिया मुक्त दंतेवाड़ा, मलेरिया मुक्त दंतेवाड़ा, शिक्षित दंतेवाड़ा शत प्रतिशत संस्थागत प्रसव वाला दंतेवाड़ा, सांस्कृतिक धरोहरों को सं​रक्षित करने वाला दंतेवाड़ा के जरिए आम जन के जीवन के बदलाव ला रही हैं।

यानी बापी कार्यक्रम का उद्देश्य जिले के प्रत्येक गांव मे आजीविका, पर्यावरण संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव, पोषण सुधार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए गांव को संवारना है। लेकिन बापियों का काम सिर्फ इतना भर नहीं है। कोरोना महामारी के इस दौर में बापी यानी हमारी दादियों ने वह कर दिखाया है जिस पर किसी को भी गर्व हो सकता है। आज दंतेवाड़ा कोरोना टीकाकरण के मामले में प्रदेश के अग्रणी जिलों में से एक है ओर इस महत्ती कार्य में बापी की भूमिका का जिलाधिकारी दीपक सोनी भूरी-भूरी प्रशंसा करने से खुद को रोक नहीं पाते।


क्या कहते हैं जिलाधिकारी
बापियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए जिलाधिकारी दीपक सोनी कहते हैं कि  हमारी बुजुर्ग महिलाओं और दादी के ज्ञान और अनुभव से लोगों को लाभ होगा। बापी अभियान के तहत स्वास्थ्य और पोषण को बढ़ावा देने के लिए दंतेवाड़ा की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को आधार बनाया गया है। बापियों को उनकी समझदारी और अनुभव के कारण समुदाय में सम्मान दिया जाता है। इसलिए वे माताओं, फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं और समुदाय के सदस्यों को स्वास्थ्य और पोषण पर महत्वपूर्ण व्यवहार करने के लिए प्रेरित करने में सक्षम हैं और इनके इसी ताकत की बदौलत जिले में न सिर्फ टीकाकरण अभियान सफलता पूर्वक चल रहा है ​बल्कि बापी न उवाट‘‘ कार्यक्रम का सफल संचालन हो पाया है। वे कहते हैं कि बापी अपने अनुभव को गर्भवती माता, शिशुवती माता, किशोरी बालिका एवं 06 माह से 06 वर्ष के बच्चों को खाद्य विविधता में परिवर्तन, स्वच्छता पर विशेष ध्यान, समय पर टीकाकरण, आयरन फोलिक एसिड टेबलेट का उपयोग एवं नवजात शिशु को कंगारु मदर केयर जैसे कारगार साबित होने वाले नुस्खों से रुबरु कराती है। इसी प्रकार बापी समन्वयक विभाग अंतर्गत शासन/प्रशासन द्वारा संचालित महत्वाकांक्षी योजनाओं को हितग्राहियों तक पहुंचाने एवं लाभ दिलाने में विशेष सहयोग करते हैं। यह अभियान मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान को मजबूत करेगा और जिले में कुपोषण और रक्ताल्पता को समाप्त करने का मदद कर रहा है। इस कार्यक्रम की सफलता इस बात से समझा जा सकता है कि जिले में 2168 बच्चे कुपोषण से मुक्त हुए इस प्रकार 37 प्रतिशत कुपोषण की दर में कमी आई है। यूनिसेफ की भूमिका को रेखांकित करते हुए जिलाधिकारी कहते हैं कि यूनिसेफ की तकनीकी विशेषज्ञता से इन इन्फ्लुएंसर्स को बच्चे और किशोर कल्याण और हित के लिए कार्य करने में मदद मिलेगी।


क्या कहते हैं यूनिसेफ प्रतिनिधि
इन बापियों के चयन और प्रशिक्षण में जिला प्रशासन के साथ कदम ताल मिलाते हुए काम कर रहे यूनिसेफ के अभिषेक सिंह ने बताया कि बापी कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक गांव में एक बापी/दादी होगी जो लोगों से मिलेगी और उनके स्वास्थ्य व्यवहार पर बात करती हैं। महिला शक्ति केंद्र के ग्राम स्वयंसेवकों द्वारा बापी का सहयोग किया जाता है। गांवों में इन विशेष संचार दूतों की मदद से समुदाय के पिछड़े वर्ग भी आवश्यक सेवाओं का लाभ मिलने में काफी आसानी हो रही है। अभिषेक कहते हैं कि कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसके अंतर्गत लोगों से संवाद करने के लिए हलबी और गोंडी जैसे स्थानीय भाषा का उपयोग किया जा रहा है। साथ ही साथ वो यह बात जोर देकर बताते हैं कि ये सभी बापियां वोलंटियर के रूप में स्वेच्छा से ग्राम समाज को बेहतर करने और स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसके एवज में जिला प्रशासन की तरफ से उन्हें सिर्फ प्रोत्साहित किया जाता है और इसी प्रोत्साहन की बदौलत बिना किसी मानदेय के ये अपनी महत्ती भूमिका निभा रही हैं।

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