
कवि सुमित्रा नंदन पंत ने लिखा था..
भारत माता
ग्रामवासिनी!
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला सा आँचल
गंगा यमुना में आँसू जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी!
दैन्य जङित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग.युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी!
लेकिन यहां भी एक भारत माता है। वो भारत माता जो गांव में बसती है। पुत्र की अपार सफलता के बावजूद वो गांव कलारबंक को नहीं छोड़ती बल्कि पुत्र से कहती है, ‘‘ बाहर तो जो हो रहा है वो हो रहा है लेकिन पैतृक गांव कलारबंक में गांव के विकास का काम हो, गांव में बदलाव हो ये सपना है।’’ ये पुत्र कोई और नहीं बल्कि ओड़ीसा से बीजू जनता दल के सांसद और कलिंग इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (किट) और कलिंग इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस (किस) के संस्थापक डॉ अच्युत सामंत हैं और ये ग्राम वासिनी भारत माता हैं नीलिमारानी सामंत। आज आपको ग्राम वासिनी उस भारत माता से परिचय कराते हैं जो हमारी आपकी सबकी मां हैं, यानी जन्मदात्री माता में ही भारत मां हैं। तो चले चलते हैं उड़ीसा के भुवनेश्वर से सटे कटक जिले के कलारबंका ग्राम में और मिलते हैं लोकसभा सांसद डॉ अच्युत सामंत की मां नीलिमारानी से।

मातृ जयंती पर पुत्र ने यूं किया याद
आज भारत माता नीलिमारानी की 94 वीं जयंती है। अपनी मां को याद करते हुए कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस के कर्ता धर्ता डॉ अच्युत सामंत कहते हैं, ‘‘ मेरी माँ को उनकी 94वीं जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि। मैं उनका आजीवन ऋणी हूं।
मां, हालांकि औपचारिक रूप से साक्षर नहीं थीं, लेकिन उन्होंने हमें जीवन का पाठ पढ़ाने के लिए अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग किया।
बहुतों में से एक चीज जो वह हमेशा सिखाती थी, वह थी ष्ଖଟି जिसका अर्थ है खाओ और जियो जो तुमने अपनी मेहनत से कमाया है, न कि किसी शॉर्टकट या अवैध तरीके से। यह एक दर्शन है जिसे मैंने बचपन से अपनाया है और अपनी आखिरी सांस तक इसका अभ्यास करूंगा।
माँ को सोने के आभूषण बहुत पसंद थे, लेकिन वह इसे कभी नहीं खरीद सकती थीं। जब वह जीवित थी तो मैं उसकी इच्छा पूरी नहीं कर सका क्योंकि वह शायद ही कभी मुझसे कुछ मांगती थी, भौतिकवाद उसके लिए नहीं था। आज मैंने उनकी प्रतिमा को सोने की चेन भेंट की और महसूस किया कि माँ गर्मजोशी से बिखेर रही हैं और अपनी सुंदर मुस्कान बिखेर रही हैं।’’

ये तो डॉ अच्युत सामंत के उद्गार हैं अपनी मां नीलिमारानी के लिए। उन्होंने अपनी मां नीलिमारानी की याद में एक पुस्तक भी लिखी है, माई मदर, माई हीरो।’’ डॉ सामंत के मुताबिक जब वे मात्र चार साल के थे उसी वक्त उनके पिताजी अनादि चरण सामंत का 19 मार्च 1969 को एक रेल दुर्घना में असामयिक निधन हो गया। उनके विधवा मां के सामने उनके अपने जीवनयापन के साथ-साथ उनके तीन बेटे तथा चार बेटियों के किसी प्रकार से लालन-पालन, भरण.पोषण तथा शिक्षा प्रदान करने की समस्या थी। अपने गांव की झोपड़ी में ऊपर से कोई छत भी नहीं थी। वह झोपड़ी सांपों का बसेरा था। माताजी नीलिमा रानी सामंत अपने जीवन की प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों में दूसरों के घरों में चौका.बर्तन कर, गन्ने से गुड तैयारकर तथा सब्जी उगाकर अपने साथ.साथ अपनी सात संतानों की परवरिश की। पढा लिखाकर उन्होंने स्वावलंबी बनाया।
आज उन्हीं के तप का नतीजा है कि डॉ अच्युत सामंत को दुनिया जानती है। उन्होने उत्कल विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में एमएससी की और भुवनेश्वर के महर्षि महाविद्यालय में अध्यापन करने लगे। डॉ अच्युत को कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ओडिशा के प्रसिद्ध समाजसेवी व शिक्षा शास्त्री हैं। कलिंग इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी ;किट और कलिंग इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस ;किस के जरिए अच्युत सामंत ने ओडिशा के हजारों आदिवासियों के जीवन को उजियारों से भर दिया है। दो वक्त के भोजन के संघर्ष में जीवन खपा देने वाले आदिवासियों के बच्चे इंजीनियर और डाक्टर बनकर अपने और समाज के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

ग्रामवासिनी भारत माता नीलिमारानी सामंत
ओडिसा के एक दूरदराज के गांव में खुशहाल परिवार में जन्मी नीलिमारानी को बचपन में यह अनुभूति नहीं हुई कि बुनियादी सुविधाओं की कमी किसे कहते हैं। उनकी शादी एक सामान्य परिवार में हुई लेकिन महज 40 साल की उम्र में उनके पति की एक ट्रेन हादसे में मृत्यु हो गई। पास में धेला नहीं और सात बच्चों के पालन-.पोषण और शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी। लेकिन उन्होंने दृढ़ता और दूरदर्शिता के साथ इस संकट का सामना किया और बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस योग्य बनाया कि वे समाज में सिर ऊंचा कर चल सकें। बेटे अच्युत सामंत ने तो इतना नाम कमाया कि किसी भी मां को उस पर गर्व होगा।
लेकिन इसी पड़ाव पर शुरू होती है गांव कलारबंका के बदलाव की कहानी और प्रेरक बनीं मां नीलिमारानी। पिछड़े हुए गांव से लेकर स्मार्ट विलेज तक के सफर पर चलने की कहानी। मां को याद करते हुए डॉ अच्युत सामंत कहते हैं कि नीलिमारानी ता उम्र साधारण जीवन जीती रहीं। बच्चों की जिद के बावजूद उन्होंने अपने गांव के घर को नहीं छोड़ा और दशकों तक वही रहीं। इसी दौरान जब गांव जाना होता और मां नीलीमा रानी तक मेरे सफलता की कहानी पहुंची तो मां ने कहा, बेटा कहां क्या करता है मां को पता नहीं। लेकिन ये पता है बहुत सारे सामाजिक कार्य कर रहा है। उन्होंने इच्छा व्यक्त किया कि बाहर तो जो हो रहा है वो हो रहा है लेकिन पैतृक गांव कलारबंका में गांव के विकास का काम हो, गांव में बदलाव हो ये सपना है।
ये मां नीलीमा रानी की प्रतिमा हैं सांसद और कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नेोलॉजी,और कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस के कर्ता धर्ता डॉ अच्यूत सामंत की मां नीलिमारानी जिनकी प्रेरणा से डॉ सामंत ने इस गांव को आदर्श गांव में बदल दिया है। आज इस गांव में सारी बुनियादी सुविधा है। फ्री वाई फाई का नारा देकर कितने लोग सियासत में उपर चढ़ गये लेकिन मंगरूआ को खुशी है कि डॉ अच्यूत सामंत ने जो भी संस्थान इस गांव में मां की प्रेरणा से खड़ा किया है वहां फ्री वाई फाई की सुविधा भी है और ग्रीन एनर्जी भी है और वैकल्पिक उर्जा के साधन भी यानी सारी की सारी बिजली सोलर उर्जा से प्राप्त होती है।
डॉ अच्युत सामंत कहते हैं आज जो भी बदलाव कलारबंका गांव में हुआ है उनकी मां नीलीमा रानी की ही प्रेरणा रही है। जीवन में इतना कुछ हासिल करने के बाद भी अच्युत सामंत की मां कभी उसकी चकाचौंध से प्रभावित नहीं हुईं और न ही अपने बच्चों को होने दिया। बच्चों के अपने.अपने करियर में स्थापित होने के बाद भी वे रुकी नहीं। अपने प्रयासों से उन्होंने दूरदराज के अपने गांव कलारबंका को स्मार्ट विलेज में तब्दील कर दिया और बेटे होने के नाते जो भी काम गांव में हुआ है वो मां की सदिच्छा से हुआ है। मैं तो सिर्फ बदलाव का माध्यम बना हूं। प्रेरणा तो मां नीलीमा रानी ही थी तो यह कहानी है ग्राम वासिनी भारत माता की।
(स्मार्ट विलेज कलारबंका व मानपुर मॉडल पंचायत की कहानी विस्तार से अगली कड़ी में।)








