राकेश सिंह
मै प्रतापगढ का बरिया समुद्र गांव हूं। अमृत फल आंवला की पहचान हूं। हां मै स्वीकार करता हूं कि मुझे पराई आधुनिकता ने कुछ बदला जरूर है। फिर भी मै इतना भी नहीं बदला की मेरे अपने पहचान न सकें। मै अपनी जड़ों को अभी भी पकड़े हुए हू। जो हमसे दूर चले गए हैं उनकी याद भी आती है। संकट की घड़ी में यह बढ़ जाता है। हां उनको मै रोजी रोटी न दे सका। इसीलिए वो दूर चले गए, लेकिन इतना भी मै गया गुजरा नहीं की उनकी मूलभूत जरूरतें पूरी न कर सकूं। लेकिन उनकी जरूरतें बढ़ गई थी, उन्हें पूरा करने जाना ही था। अब वो आए हैं तो उतने ही अपने लगते हैं जितना पहले थे। इस कोरोना काल में लग रहा है कि मेरा गांव बरिया समुद्र यही कह रहा है।
सालों बाद इस कोरोना काल में इतने लंबे समय एक साथ रहना हुआ। वर्तमान तो देख ही रहा हूं, लेकिन अक्सर बरिया समुद्र का अतीत भी उमड़ घुमड़कर चला जाता है। फिर वर्तमान में लौटता हूं तो पाता हूं कितना बदला है। बरिया समुद्र का पुराना रूप तो नही रहा। रंग-ढंग, रहन-सहन, और बहुत कुछ। वही मुझे याद दिलाते हैं मैं क्या था। अब कैसा हूं। याद करते हैं कि आम में बउर लगा तब आए, अब लग रहा कि आम खाकर ही जाएंगे। और जो बदला है वह तो काल के प्रवाह ने बदला। खान-पान, रहन-सहन, मनोरंजन से लेकर बतकही के विषय तक, पर तासीर वही है, सिर्फ कलेवर बदला है।
जो बचा है, जो नहीं बदला वही मूल है। यही वह मूल है जिसे जानकर हमारे कल्लू कहते हैं ‘भइया अब सबका गांव याद आवत अहैं’
बहुत कुछ अपनी आंखों के सामने से गुजरा। ऐसा इसलिए हो सका कि बचपन से लेकर पूरी पढ़ाई लिखाई प्रतापगढ़ में ही हुई। बरिया समुद्र गांव प्रतापगढ़ जनपद का हिस्सा है। अपनी प्राथमिक शिक्षा बिहारगंज और लोहंगपुर में हुई। इंटर प्रतापगढ़ शहर के केपी हिन्दू इंटर कालेज से, मुनिश्वदत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय से बीए,एमए और बीएड. किया। सामाजिक और राजनैतिक जीवन की शुरूआत भी यहीं से हुई। प्रतापगढ़ शहर हमारे गांव से दो कोस पर है। यह शहर ही जनपद का प्रशासनिक केन्द्र है। शहर का बस अड्डा तो डेढ़ कोस पर ही है। लेकिन यहां भी जब आप प्रतापगढ़ सिटी की बात करोगे तो मुख्य शहर से आपको छह किलोमीटर दूर पहुंचा दिया जाएगा। क्योंकि प्रतापगढ़ सिटी थोड़ी दूर पर बसे कस्बे को कहते हैं। प्रतापगढ़ राजघराने का किला वहीं पर है। बहरहाल लौटते हैं बरिया समुद्र की बात करते हैं।
आज गांव की सामूहिकता तो बची है लेकिन बहुत कुछ पीछे छूट गया। पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि अब खपरैल मकान कोई—कोई है। ज्यादातर मकान पक्के हो गए हैं। छान्ह यानि छप्पर भी कम ही दिखाई देते हैं। कक्षा 6 से बारह तक हम खुद छान्ह उठाने जाते थे। पूरे गांव को बुलाया जाता था। गांव के हर किसी की छान्ह को उठाकर रखने में पूरा गांव मदद करता था। अब याद आ रहा है, उठाने में थून्ह की जरूरत होती थी। ये सब शब्द अब सुनने को नहीं मिलते। क्योंकि जरूरत जब छान्ह की नही रही तो थून्ह की क्या जरूरत। छान्ह बनाना भी एक कला थी। इसमें भी कई प्रकार होते थे। इसके भी विशेषज्ञ होते थे। मड़ही उससे भी छोटी होती थी। छान्ह बनाने में सरपत और बांस का उपयोग करना पड़ता है, लेकिन मड़ही सरपत,घास-फूस सबसे बन जाती थी। अवधी के जाने-माने कवि अद्याप्रसाद उन्मत्त तभी लिखते हैं ‘फूस की मड़ही में बारूद बन पैदा भये, आगि पाए भभक के बरि न जाई त का करी’ हालांकि अब न छान्ह बची न मड़ही बची। छान्ह की जगह टिन की चद्दरों ने ले ली। यही हाल खपड़ैल मकानों के हैं। खपड़ैल मकानों की जगह पक्के मकानों ने ले ली। मिट्टी की दीवारों और खपड़ैल की छतों के घर में रहने का सौभाग्य हमें मिला है। मिट्टी के घर भी दो मंजिला होते थे। सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडक का सुख देते थे। मै ऐसे ही मकान में पैदा हुआ। खपड़ा गांव के लोग ही बनाते थे, पकाते थे। यह किसी के व्यवसाय का हिस्सा नहीं था। समाजिक अर्थशास्त्र के बने नियम लागू होते थे। अब खपड़ा दिखने को नहीं मिलता। गांव में इक्के दुक्के जैसे छान्ह है, वैसे खपडैल मकान।
यही बदलाव शादी विवाह के कार्यक्रमों में आया है। तीन दिन की बारात तो मैने देखा है। शामिल हुआ हूं। जब किसी के यहां लड़की की शादी होती थी तो पूरा गांव उसके इंतजाम में जुटता था। कहीं बाहर से सामान नही आता। न ही किराए पर। हर घर से हम लोग खटिया गद्दा चद्दर, तकिया इकठ्ठा करते। बर्तन भी घरों से आता। सब्जी खरीदी नही जाती। आलू कोहड़ा की सब्जी सर्वमान्य सब्जी होती थी। आलू उबलने के बाद गांव के सभी लड़के उसे छीलते। इस तरह सब मिलकर वह इंतजाम करते। घर-घर से दूध आता। इसी कार्यक्रमों से गांव का सामाजिक शास्त्र भी समझा जा सकता है। बरिया समुद्र गांव में जो बस्ती है, उससे बहुत कुछ समझ सकते हैं। बभनउटी, ठाकुरइया, कोहरौटी, लोहरौटी, चमरौटी, कुर्मियान, पसियान, नउआन और मुसुरमनौटी है। यह सब अपने कामधाम से एक दूसरे से जुड़े हैं।
इसके साथ ही कई तीज त्यौहार भी अब नही मनाए जाते। इसमें ललही छठ, बड़ी एकादशी, गुड़िया प्रमुख हैं। ललही छठ ही हम जानते थे। दिल्ली जाने के बाद पता चला की बिहार में भी छठ मनाया जाता है। तरीका कमोबेश वही है। दोनों मां के व्रत हैं। मां अपने बच्चों के व्रत रखती है। ललही छठ में हम लोग तालाब से पानी लाते थे। ढाख के पत्ते, कुश, महुआ और तन्नी का चावल लगता था। यह त्यौहार माघ के महीने में आता था। इसी तरह बड़ी एकादशी कातिक में मनाई जाती थी। इसमें पूरी बस्ती की महिलाएं बाहर आंवले के नीचे खाना बनाती। आवंले की पूजा करती, फिर सभी लोग इकट्ठा होकर साथ खाते। इसी दिन हड़ाहड़इया खेली जाती। सन यानि सनई से बने पुतले को आग लगाकर हम सब जुते खेते में दौड़ते। और वहीं जलते पुतले को छोडकर घर आ जाते। सनई की खेती भी अब नहीं होती। सनई से सन बनता था। सन से बाध,रस्सी और रस्सा। यही बाध से खटिया बिनी जाती थी। खटिया बिनना भी एक कला थी। अब खटिया का चलन भी कम हो गया।
गुड़िया का पटोहा तो अभी भी याद है। यह गुडिया के पहले से पड़ जाता था। गांव की महिलाएं झूला झूलती थी। गांव में इसे पटोहा कहते थे। यहां एक और बात ध्यान में अब आती है कि पटोहा अक्सर नीम के पेड़ पर पड़ता था। पटोहा डालने वाले कहते थे कि नीम की डाल मजबूत होती है। इसी तरह एक त्यौहार होता था नया। दरअसल यह बसंत पंचमी को पड़ता था। नए अन्न का पारन होता था। नए अन्न की पूजा करने के बात उसे भूनकर खिलाया जाता था। बरिया समुद्र की होली ने भी अपने रंगढंग बदल लिये। होली का त्योहार भी पहले जैसा नही मनाया जाता। पहले होली के कई दिन पहले से होली शुरू हो जाती। तब मिट्टी से लोग खेलते। घर की साफ साफ सफाई होती। यही नहीं पशुओं के स्थान को भी पूरी तरह साफ किया जाता। होली के दिन शिवाला पर सब इकट्ठा होते। फगुआ होता। शिवाला के बाद सब लोग सबके दरवाजे जाते फगुआ गाते। भांग छनती, अब ये सब अतीत के किस्से हैं। इसका भी अतीत रहा होगा।
यह तो रही बरिया समुद्र के त्योहारों की बात, जो मैने देखा और जिया भी। इसका इतिहास नहीं मिलेगा। मौखिक इतिहास ही रह गया। ऐसा बहुत कुछ गांवों में जो मौखिक इतिहास भी नहीं बन पाया। इतिहास बन चुके ऐसे ही अतीत के कुछ और पहलू हैं जो याद आते हैं। हर साल गांव में दशहरे के आसपास मेला लगता था। आसपास के सभी गांवों में लगता था। एक दिन में दो गांव का मेला नही लगता। मेले में रावण जलता। बाजार सजती। आसपास के दुकानदार दुकाने लेकर आते। उस गांव का अपना दशहरे का मेला होता था। मेले की रात को नौटंकी बुलाई जाती। रातभर गांव के लोग नौटंकी देखते। नौटंकी अब गांव में नही रही। वह गांव से निकलकर दिल्ली के श्रीराम सेंटर पहुंच चुकी है। फिर भी वह दौर याद है। मनोरंजन के साधन बदल गए। बरिया समुद्र के घर-घर स्मार्ट फोन पहुंच गए। डिस टीवी पहुंच गया। पूरी दुनिया से लोग जुड़ चुके हैं। देश दुनिया के समाचार लोगों तक पहुंच चुके हैं। इससे उनके बातचीत का विषय भी बदल चुका है। देश दुनिया पर नजर रहती है। उनकी बातचीत का विषय भी देश दुनिया में चल रहे घटनाक्रम होते हैं। पर अंदाज वही रहता है। जैसे कल्लू छोटई से कह रहे थे। ‘छोटई दादा यह कोरोना में ट्रम्पवा वोम्पवा फेल होइ ग, लेकिन मोदिया संभारि लै गा’। छोटई ने कहा ‘कल्लू बेटवा इहै जमितिये थोरिके गड़बाडाई देहेन नही तो दुनिया देखते’ विषय बदला पर अंदाज नहीं।
आज बरिया समुद्र की तासीर तो वही है पर कलेवर बदल गया है। देशी बाग कम बचे हैं। उनकी जगह आंवले ने ले ली है। गूलर अब दिखाई नही देती। कल्लू से मैने पूछा कल्लू गुलरी क पेड़ कतंऊ अहै, कल्लू कहते हैं भइया गुलरी पेड़ गुलरी के गुलरी के फूल होइगा। ये कहावत है जो कम दिखाई दे। इसी तरह देसी आम में नाम मात्र के ही बचे हैं। गांव तक पक्की सड़क हो गई है। पास की बिहारगंज बाजार ने खुद को विस्तारित कर लिया है। दूसरी तरफ भी पक्की सड़क बन गई है। अब यह गांव एक एनएच और एक स्टेट हाइवे के बीच में हो गया है। प्रतापगढ मुख्यालय का बाईपास भी बरिया समुद्र को छूते हुए निकल रहा है। सभी घर शौचालय युक्त हो गए है। गर्मी में एयरकंडीशन भी घरों में देख सकते हैं। घर-घर हैंडपंप है, गैस चूल्हा है। अब यह गांव छोटे शहरों की तुलना में कम नहीं है। लेकिन उनकी अपेक्षा वातावरण साफ है। गांव में विकास की रफ्तार तेज हुई है। विकास के साथ साथ गांव की तासीर जो भी बची है उसे हम संभाले। कुछ नही तो साल में एक बार ही महीने भर अपने कुटुंब के संग बिताएं।







