अंबरीश कुमार
अपना गांव सरयू किनारे है। बाबा, दादी ,चाचा चाची सभी इसे सरजू माई बोलते रहे। यह बरहज बाजार से कपरवार घाट जाने वाली सड़क पर करीब दो किलोमीटर आगे बेलडांड गांव के बगल में मुख्य सड़क पर है। सड़क इस गांव को दो हिस्सों में बांटती है। वर्ष 2018, पांच जनवरी की दोपहर में जब इस नदी किनारे खड़े हुए तो हाड़ कांपने वाली ठंढ और देह भेदने वाली हवा चल रही थी। शाल भी ओढना मुश्किल हो रहा था। हम सरयू नदी के किनारे आए थे, जाना नदी की मुख्य धारा तक था पर एक छोटी धारा सामने थी। मल्लाह ने कहा, कहां इतनी दूर जाएंगे इसी धारा में नहा लीजिए। अपना जवाब था कि हम बालू का रेता पार कर मुख्य धारा तक ही जाएंगे। ठंढ औए तेज हवा में और कोई तो नजर भी नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद सरयू की मुख्य धारा तक पहुंच ही गए।
सरयू नदी के उस पार अपना खेत खलिहान रहा। दो तीन बार नाव से नदी पार कर अपना भी आना जाना हुआ। गोइठे की आग पर पके दूध की गाढ़ी गुलाबी दही का स्वाद अभी भी नहीं भूलता। यही सरयू रोहू भी देती थी तो झींगा भी जो दूर तक मशहूर थे। घर में शाकाहारी भोजन ही बनता था इसलिए घर में काम करने वाली लोचन बो के घर मछली बनती थी। उसका घर भी बगल में ही था। लोचन तब कलकत्ता के किसी मिल में काम करता था और स्टीमर से गांव तक आता था। शुक्रवार को उसका घर भी दिखा तो सामने की जमीन भी। यह जमीन उसने अपने घर परिवार के लोगों को बाद में बेच दी पर उसके बाद सामने रहने वाले अहीर परिवार ने दावा किया कि यह जमीन उसे भी बेच दी गई थी। अब कई सालों से मुकदमा भी चल रहा है। गांव में यह सब आम बात है। घर दरवाजे की जमीन को लेकर विवाद चलते रहते है।
मुकदमेबाजी तो ग्रामीण समाज की दिनचर्या में बदल चुका है। साठ के दशक में इस गांव के ज्यादातर घरों में आना जाना ,खाना पीना होता था। मिलने वाले आते रहते और खपरैल के घर के सामने के करीब सौ फुट लंबे ओसारे में हम खटिया पर जमे रहते थे। उनकी आवभगत गुड़ और ठंडे पानी से की जाती थी। मिठाई की जगह यही ज्यादा चलता था। पर अब गांव अनजाना सा लगा। चचेरे भाई ने बताया कि परधानी के चुनाव के बाद गांव बंट गया है। लोग अपने में सिमटते जा रहे हैं। नेवता हकारी भी कम हो गया है। गांव बहुत बदल गया है।
खैर, नदी तक पहुंचा तो गांव भी गया। वह गांव जहां बगल के छोटे से स्कूल में क ख ग सीखा था। खड़िया पट्टी पर, बाद में नरकट की कलम भी इस्तेमाल की। कदम का वह पेड़ तो नहीं मिला जिसके नीचे बैठता था पर वही बेल लदे दो पेड़ मिले। बाई तरफ पुरानी रियासत की छोटी बहू की जर्जर होती कोठी भी दिखी। बताते है कि जब उनके पति गुजर गए तो फिर वे उस कोठी में कभी नहीं गई और बनारस से आई इस छोटी बहू की कोठी सामने बनाई गई। रियासत के किस्से अब बंद हो गए क्योंकि रियासत वाली इमारतें भी ढहने लगी है और रियासत वाले भी छोटे-मोटे काम कर जीवन चला रहे है। ठीक वैसे ही जैसे कई नवाबों के वंशज इक्का-तांगा चलाते नजर आ जाएंगे। वर्ना तो एक दौर था पड़ोस की इस रियासत की इमारत के सामने न कोई जूता पहन कर निकल सकता था, न टोपी पहन कर। आज उसी रियासत की जर्जर ईमारत के सामने एक ढाबा नजर आया तो तखत लगा कर दाल रोटी से लेकर चिकन कोरमा बेच रहा था। ऐसा लोकतंत्र पहली बार दिखा।
पूर्व प्रधान राम चंदर यादव ने हमें भी वहीं पर कुल्हड़ में चाय पिलाई। बोले कि एक दिन तो रुकिए सालों बाद आए है। रामचंदर यादव अपने से छोटे हैं पर बहुत बड़े नजर आ रहे थे। यह खानपान ,आबोहवा के साथ शहर और गांव का भी फर्क है। अपना पुराना घर खपरैल का था। सामने का जो लंबा ओसारा था उसमें पच्चीस तीस चारपाई बिछ जाती थी। दाहिने दूर से ही सरयू के दर्शन हो जाते थे जो बाढ़ में दरवाजे तक आ जाती थी। पापा को पेड़-पौधो का शौक था। एक बार करीब दो दर्जन बड़े पौधे उन्होंने छोटे भाई अनिल के साथ गांव भेज दिए। इनमें दशहरी आम, अमरूद ,कटहल आदि थे। छांगुर बाबा बोले कटहल नहीं लगाया जाता है ,घर में झगड़ा होता है। खैर जब भेजा गया तो मैंने उसे लगाया भी। इनमे से दो तीन पेड़ आज भी फल देते है। दशहरी आम और कटहल भी, कभी खाया नहीं। कल राजू ने वे पेड़ भी दिखाए तो छांगुर बाबा याद आए और झगड़े वाली बात भी। झगड़ा ,विवाद और मुकदमा सब तो हुआ पर इसका दोष कटहल के उस पेड़ को क्या देना जो लखनऊ से आया और मैंने सरयू के किनारे इसे लगाया था। वह तो आज भी फल देता है और बेतियाहाता वाली दादी कटहल मंगवाती भी थी। सब याद आ रहा था बगीचे में घूमते हुए। बरामदे में पहुंचे तो बाबूजी की वह पुरानी आराम कुर्सी दिखी जिसपर लेटकर कई उपन्यास पढ़ डाले थे, जब वे नैनी जेल में जेलर थे। सामने पुराना क्रोटन था।
गांव में ज्यादा देर रुकना नहीं हुआ .घर से निकले और फिर उस सरयू के दर्शन किए जिसकी मुख्य धारा में दोपहर में पापा का अस्थि विसर्जन करके आए थे। यह पापा की इच्छा थी। वे सरयू तक जाना चाहते थे जिसके किनारे वे बड़े हुए। पापा की बड़ी इच्छा थी कि अंतिम समय में वे गांव में रहें। पर अब वह गांव था कहां जहां वे बड़े हुए। घर का साझा बगीचा करीब चार कोस दूर था। सौ से ज्यादा आम के ही पेड़ थे। बगीचा बेच दिया गया। पेड़ लकड़ी में बदल गए। भाई पाटीदार से विवाद हुआ तो नया घर भी उन्होंने एक अहीर परिवार को बेच दिया। यह सब गांव के विवाद में आम बात है। जमीन का विवाद सबसे ज्यादा होता है, इसके बाद रास्ते का विवाद। बाबूजी यानी पापा के बड़े भाई साहब ने लोचन बो की सामने की जमीन खरीद कर अपना रास्ता चौड़ा कर लिया। पर इसपर भी पड़ोस के परिवार से विवाद ही हुआ।
सामने जो छोटी रियासत थी उससे भी रास्ते का विवाद चल ही रहा है। हालांकि अब न रियासत रही न बाबू साहब का वह जलवा रहा। पुरानी ईमारत भी रखखाव के अभाव में खंडहर होती जा रही है। गांव का जातीय वर्चस्व भी टूट चुका है। मायावती और मुलायम सिंह के सत्ता में आने के बाद से पिछड़े और दलितों का दबदबा बढ़ा ही है। वैसे भी अगड़ी जातियों के ज्यादातर लोग गांव छोड़ कर शहर चले गए हैं। वे ही नहीं गए जिनके सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
बिजली जब आती है तो देर तक भी रह सकती है पर आती ही कभी कभी है। पानी हैंड पंप का है। लोग पीते हैं कभी जांच पड़ताल नहीं की, काम चल जाता है। जो परिवार खेती किसानी पर निर्भर थे उनमें से ज्यादा अब खेती किसानी से मुंह मोड़ चुके हैं। छोटी नौकरी मिल जाए यह प्रयास होता है ताकि कोई नियमित आय बनी रहे। छोटा मोटा काम भी कर लेते हैं। चचेरे भाई ने बरहज बाजार कस्बे में कंप्यूटर सिखाने का एक इंस्टीट्यूट खोल दिया है जिससे काम चल जाता है। रियासत वाले बाबू साहब की नई पीढ़ी के सबसे छोटे भाई ने पहले पीसीओ खोला पर जब मोबाइल क्रांति आई तो ज्यादातर पीसीओ की तरह उसका पीसीओ भी ठप पड़ा और फिर उसे तकनीकी किस्म की सेवाओं में बदल दिया गया। वैसे वे राजनीति भी करते है,ं पहले कांग्रेस में थे पर बाद में समाजवादी पार्टी में भी उम्मीद देखने लगे। अभी भी तेवर वही हैं पर गांव की नई जमात पर कोई असर पड़ता नजर नहीं आता। अभी भी गांव की बाजार लगती है पर खरीदार कम होते जा रहे हैं। हलवाई की दूकान जरुर एक से बढ़ गई, पर नौजवानों की वह बैठकी नहीं नजर आती जो सत्तर के दशक तक चलती थी। कपरवार घाट से कुछ किलोमीटर दूर बडहल गंज से पहले अपना ननिहाल मरवट पड़ता है। बड़ी अम्मा के निधन के बाद लौटते समय उधर से गुजरा तो बगीचा देखने निकला। पता चला वह सूख गया है। इस गांव में कई कायस्थ परिवार थे। उनके घर के लड़के पढ़ लिख कर डाक्टर इंजीनियर बन गए। ज्यादातर अपना घर खेत बेच चुके हैं। गांव में दलित पिछड़े परिवार ही बचे हैं। गांव तक सड़क तो आ गई पर बाग-बगीचा खत्म ही गया। अब वे ताल भी नजर नहीं आते ,बरसात में जिसके किनारे से गुजरने पर मेढकों की आवाज सुनाई पड़ती। सामने के बाग में तो प्लाट काट कर बेचे जा रहे थे। कभी इस बगीचे में बरात रूकती। शामियाना लगता और ग्रामोफोन पर गाना बजता था। गर्मी की रातों में हम लोग बगीचे में ही सोते, टपकते हुए आम बटोरने के लिए। गर्म रातों में आने वाली आंधी भी झेलते तो पानी में भी भीगते। पर अब तो वह बगीचा ही नहीं रहा।
संपादक, शुक्रवार। जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस में रहे।







