प्रवासियों के गांव लौटने में तलाशें भविष्य की संभावना

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डॉ सत्यवान सौरभ
कोरोना संक्रमण से जूझ रहे विश्व में भारत की स्थिति अभी तक सही बनी हुई है। भारत की जनसँख्या को देखते हुए यहाँ संक्रमण के मामले एवं मौते बहुत कम हुई है। मगर लॉक डाउन के बाद भी हमें सचेत रहना होगा। एक छोटी सी चूक हमारे सब किये पर पानी फेर सकती है। धीरे-धीर प्रवासी लोग खासकर मजदूर अपने पैतृक स्थानों पर बड़े शहरों से पलायन कर रहे है, जो एक गंभीर मामला है। बीमारू राज्यों के करोड़ों मजदूर अब अपने ग्रामीण स्थानों पर प्रवेश करेंगे। इनके आने के साथ इनकी आइसोलेशन और इनके भविष्य की चिंताएं प्रशासन और सरकार को देखने को मिलेगी। सरकारों को अब इन मजदूरों को केंद्र में रखकर अपनी योजनाएं बनानी पड़ेगी। सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना होगा।

मजदूरों और युवाओं का महामारी के चलते शहर से पुन: वापस गांव लौटना वैसे तो अच्छा नहीं है लेकिन इसे भविष्य की संभावना के रूप में भी देखा जाना चाहिए। नि:संदेह हमारी सरकारों के लिए यह चुनौती है लेकिन हमलोग प्रयास करें तो इसे अवसर के रूप में भी बदल सकते हैं। इसे रिवर्स माइग्रेशन कह सकते हैं। दुनिया में इस प्रकार के कई उदाहरण है लेकिन जिस देश ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया, वह देश आज दुनिया केप्रभावशाली देशों में गिना जाता है और जिन देशों ने इसको लेकर कोई योजना नहीं बनाई, वहां एक के बाद एक, कई समस्या खड़ी हो रही है। सरकार चाहे तो गांव को आकर्षण का केंद्र बना सकती है। कोविड 19 आपदा के कारण गांव से पलायन कर गए युवा फिर से गांव आ रहे हैं यानी पुन: पलायन कर अपने गांव लौट रहे हैं। इनकी संख्या बहुत बड़ी है। जो युवक लौट रहे हैं, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है। वे अपने गांव में ही अपना धंधा (व्यवसाय), उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रबंधन एवं दूरदर्शिता के साथ कर आत्म स्वावलंबी बन सकते हैं और अपने जैसे युवकों को रोजगार भी उपलब्ध करा सकते हैं।

शहरी क्षेत्र में रोजगार हेतु जाने वाले ज्यादा युवा ग्रामीण परिवेश के होते हैं। ऐसे युवाओं के लिए सरकारों को चाहिए कि अब वो उनको उन्ही के गाँवों में रोजगार के अवसर देकर आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करे, इस युवा शक्ति का इस्तेमाल देश के स्वर्णिम भविष्य को खोजने के लिए किया जा सकता है। उससे निपटने के लिए अल्पावधि एवं दीर्घावधि योजना कृषि एवं गैर कृषि क्षेत्र में करने की जरूरत है ताकि आए हुए युवाओं को खेती-बारी से जोड़ा जा सके। खेती उनके लिए रुचिकर, स्वरोजगारोन्मुखी एवं टिकाऊ रूप से सामने आवे ताकि युवा इस क्षेत्र में आकर्षित हो सके एवं गांव में रुक सके। देश के कई राज्यों ने इस दिशा में युक्तिपूर्वक कार्य करना प्रारंभ कर दिया है, जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित करना होगा। तभी हम ग्रामीण युवाओं को रोजगार देने में सक्षम हो पाएंगे।

कुछ सुझाव हैं जिसके आधार पर गांव को आकर्षण का केन्द्र बनाया जा सकता है। मनरेगा योजना के अंतर्गत खेती एवं उसपर आधारित गतिविधियों में लगे किसानों को रोजगार समझा जाए, उन्हें दैनिक मजदूरी देकर आय सुनिश्चित की जाए। गरमा फसल एवं लगने वाली खरीफ फसल की सुनिश्चित आच्छादन हेतु क्षेत्रवार बीज, उर्वरक एवं खरपतवारनाशक दवा की उपलब्धता उनके घर पर जाकर कराई जाए या डीबीटी के माध्यम से की जाए। फसल क्षेत्र विशेष की पहचान कर नकदी फसलें, जैसे-मूंगफली, सोयाबीन एवं मसालों की खेती को बढ़ावा दिया जाए। मौसम के बदलते मिजाज को देखते हुए कम पानी एवं अवधि वाली फसलों, जैसे- मंडुवा (रागी), मक्का, तिल, सरगुजा के साथ-साथ अंतरवर्ती खेती को बढ़ावा दिया जाए। वर्षा जल संचयन हेतु छोटे-छोटे तालाबों के साथ-साथ बड़े-बड़े तालाबों का भी निर्माण गांव में किया जाएं।

इसके अलावा सूक्षम सिंचाई पद्धति को अंगीकार कराने हेतु जिले के संबंधित कृषि विज्ञान केंद्रों के द्वारा पहले प्रशिक्षित कराकर ही योजना के अंतर्गत किसानों को सूक्ष्म सुविधा दी जाए। सूक्ष्म सिंचाई पद्धति को आवश्यक बनाया जाए एवं इस क्षेत्र में युवाओं में कौशल विकसित किया जाए। कृषि के साथ-साथ पशुधन क्षेत्र को भी बढ़ावा दिया जाए। खुला चारागाही पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाया जाए जिसके लिए पहले स्टाल फीडिंग के लिए किसानों को प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जाए। इससे संबंधित मशीन भी युवाओं को उपलब्ध करायी जाए। व्यावसयिक सब्जी की खेती को प्रोत्साहन मिले। किसानों को त्रिपुरा माडल पर उत्पाद को नुकसान होने से बचाव के उपायों को विकसित किया जाऐ मसलन जीरो एनर्जी कोल्ड चैम्बर में भण्डारण की व्यवस्था की जाए।
समेकित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के साथ साथ फैमिली फार्मिंग सिस्टम को बढ़ावा दिया जाए।

पंचायत स्तर पर पशुधन को बचाने की व्यवस्था की जाए। बकरी, सूअर एवं मत्स्य पालन के साथ-साथ डेयरी को बढ़ावा दिया जाए ताकि युवा स्वरोजगारी बन सकें। क्षेत्र विशेष में होने वाले फसल उत्पाद में मूल्य संवर्धन, खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा दे कर सरकार युवकों को गांव स्तर पर रोकने में कामयाब हो कसती है। खाद्य प्रसंस्करण एवं स्व-स्थान उत्पादन प्रणाली आधारित को प्राथमिकता दी जाए। फसल उत्पादन को खरीदने के लिए सरकार तत्परता दिखाए और फसल खरीद की गारंटी दे। उत्पाद खरीदने हेतु ग्राम स्तर पर कमेटी का गठन किया जाए। दैनिक आधार पर प्रिंट मीडिया के द्वारा आम जनों को जानकारी देने की व्यवस्था बनाई जाए जिससे किसानों एवं ग्रामीणों में प्रतिस्पर्धा का भाव जागृत हो सके।

लघु एवं कुटीर उद्योगों के प्रति जागरूकता एवं आकर्षण बढ़ाया जाए। क्षेत्र विशेष में उपलब्ध संसाधन एवं अनुकूल जलवायु को देखते हुए लाह, सिल्क, मधुमक्खी पालन के साथ बांस की खेती को बढ़ावा दिया जाए। बांस में मूल्य संवर्धन के स्कोप को देखते हुए ट्राईफेड के सहयोग से युवाओं में कौशल विकास किया जाए, खासकर बंबू क्राफ्ट, अगरबत्ती एवं माचिस बाक्से के क्षेत्र में ऐसा किया जा सकता है। बांस की अवैध ट्रेडिंग रोकी जाए एवं गांव में या पंचायत स्तर पर मूल्य संवर्धन के उपायों पर विचार किया जाए। खेती आधारित उद्योग को बढ़ावा दिया जाए। जैविक चावल (स्थानीय सुगंधित धान) एवं सब्जी की खेती को बढ़ावा एवं सुनिश्चित बाजार उपलब्ध कराया जाए। जिस पौधे में औषधीय गुण हैं, उस खेती को बढ़ावा दिया जाए। व्यवसायिक किसानों का डेटाबेस जिला स्तर पर बनाया जाए। कौशल विकास के साथ-साथ एक्सटेंशन सिस्टम को सुदृढ़ किया जाए।

कोरोना एक मानवीय त्रासदी है, जो मनुष्य से मनुष्य में फैलती है। इसको रोकने के लिए सामाजिक मतलब व्यक्तिगत दूरी आवश्यक है, ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है ? फिर भी आने वाले समय के लिए निर्णय भारत कि गरीब और शिक्षित जनता को केंद्र में रखकर लिए जाये न कि उच्च आय वर्ग वाले उद्योगपतियों एवं व्यापारियों के लिए। आज भारत के सामने कोरोना से निपटने के साथ- भारत कि अधिकांश आबादी मजदूर, किसान एवं बेरोजगार युवाओं की सामाजिक सुरक्षा की भी है, जिसको हम केवल इस समय नए अवसर तलाश कर ही बचा सकते हैं।

(वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार,कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)

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