कर्णांवती नदी के कछार पर बसा ऐतिहासिक गांव बैसपुर

डॉ सरिता
प्रयागराज: देश के प्रमुख धार्मिक केंद्र विन्ध्याचल क्षेत्र में गहरवार राजपूतों की स्टेट विजयपुर के निकट कर्णांवती नदी बहती है। कर्णांवती नदी विन्ध्याचल से थोड़ा पहले 96 हजार एकड़ में फैले गंगा के विशाल कछार से होकर गंगा में ही समाहित हो जाती है।
कर्णांवती केवल नदी ही नहीं,बल्कि यहां के 19 गांवों की सांस्कृतिक विरासत भी है। इसी नदी के पार कई ऐतिहासिक गांव हैं, जिनमें एक गांव है बैसपुर। यह गांव कई मायने में खास रहा है। बताया जाता है कि बैसपुर गांव का नामकरण भी यहां बसे बैस ठाकुरों के कारण पड़ा। गांव के बगल से ही होकर कर्णांवती नदी गुजरती है, इसलिये गांव की ज्यादातर गतिविधियां, अनेक घटनाएं,संस्मरण नदी से जुड़ी हुई हैं। इस नदी को केंद्रीय जल आयोग भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने महत्त्वपूर्ण मानते हुये इसके पुनरोद्धार का काम किया है। कर्णांवती नदी को फिर से सदानीरा बनाने का प्रयास पिछले वर्ष शुरू किया गया। इसका सुखद परिणाम भी सामने आया और इस समय कर्णावती नदी में लबालब पानी बह रहा है। इसी तर्ज पर प्रदेश की 19 नदियों को पुनर्जीवित करने का ब्लूप्रिट शासन द्वारा तैयार किया जा रहा है। मनरेगा के तहत मीरजापुर की कर्णावती नदी की तरह ही सोनभद्र में सोन व वाराणसी की वरुणा नदी को शामिल किया गया है। साथ ही सई, पांडु, मंदाकिनी, टेढ़ी, मनोरमा, ससुर खदेड़ी, अरेल, मोराव, तमसा, नाद, बाण, काली, दधि, इशान, बूढ़ी गंगा व गोमती नदी को योजना के तहत पुनर्जीवित किया जाएगा।……………………….कर्णांवती नदी

सन् 1734 की बात है। प्रतापगढ़ से आये पण्डित भीष्मदेव करंजई शुक्ल थे। राजा कंतित नरेश के आश्रय में राज पुरोहित थे। बाद की पीढ़ी कोे बैस ठाकुरों की पुरोहिती के लिये गांव में बसाया गया। इसी क्रम में एक परिवार विजयपुर राजा के यहां फिर से पुरोहिती करने लगे। इस परिवार के एक पण्डित प्रेम शंकर शुक्लजी आज भी अधिकांश गांव के पुरोहित हैं। विजयपुर राजा के बारे में गांव वाले बताते हैं कि कंतित नरेश बुन्देलखण्ड से आकर मिर्जापुर जनपद के विजयपुर में बसे।  विजयपुर राजा के बारे में गांव वाले बताते हैं कि कंतित नरेश बुन्देलखण्ड से आकर मिर्जापुर जनपद के विजयपुर में बसे। वंशानुक्रमानुसार राजा भूपेन्द्रसिंह को कोई पुत्र नहीं था तो उन्होंने एक राजपूत परिवार के एक बालक को गोद ले लिया। भूपेन्द्र की रानी सूर्यबल कुंवर ने 10 साल तक राजपाट सम्भाला। उनके दत्तक पुत्र त्रिवेणी माधव के पुत्र श्री निवास सिंह को कोई पुत्र नहीं हुआ। उनकी पुत्री ने ही विजयपुर स्टेट का राजपाट सम्भाल लिया। रानी साहिबा काफी उदार और आध्यात्मिक स्वभाव की थीं। उत्तर भारत के संत अड़गड़ानन्द जी ने रानी साहब के समक्ष अपना आश्रम विजयगढ़ में बनाने की इच्छा जाहिर की। रानी साहिबा ने तुरन्त ही अपना एक पुराना किला संत अड़गड़ानंद जी को सौंप दिया। चुनार के आगे करीब अठारह किलोमीटर बाद स्थित है अड़गड़ानंद जी का आश्रम। आज संत अड़गड़ानन्द जी का शक्तेशगढ़ स्थित परमहंस आश्रम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।…………………….कर्णांवती नदी

गांव की लोक सं​स्कृति
मिर्जापुर के अंचल में कजरी लोकगीत दुनिया भर में बहुत प्रसिद्ध है। तीज-त्यौहारों का भी अलग महत्त्व था। प्राचीन काल से यहां के गांवों में ‘कजरी’ सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव था, जो कमोबेश आज भी है। महिलाएं सावन में मायका जाना व कजरी गीत गाना नहीं भूलती थीं। गांव में हरियाली ही हरियाली दिखती। आम-नीम के पेड़ पर झूले लटके मिल जाते। खिलखिलाती हंसी सुनने को मिलती। एक अलग ही उत्साह और उमंग दिखता। भाई के प्रेम को अभिव्यक्ति करती ‘मोरे भईया क बसुरिया बजत आवैं ना’ कजरी गीत सुनते हुए मन भावुक हो उठता है। मेरी मां स्वयं इस गीत को दिल से गाती थीं। इस लोकगीत के माध्यम से हंसी-मजाक भी की जाती थी। जैसे -‘हरे रामा रिमझिम बरस रहे पानी, ननद बौरानी हे रामा’। तिथि-त्योहारों पर मायके जाने का आनंद नव विवाहिताओं के चेहरे पर झलकता था। इस क्षेत्र के लिए ‘कजरी’ का आज भी बड़ा महत्त्व है। नागपंचमी के दिन लड़कियां नदी या तालाब के पास से मिट्टी खोदकर लातीं और उसमें जौ बोतीं। जौ कुछ ही दिन में बढ़ जाता। कजरी के दिन कर्णावती नदी में डूबकी लगातीं और जई से मिट्टी हटाकर सभी सखियां जई साथ में लातीं। पूरे परिवार में पिता, चाचा, नाना,बाबा भाई के कान में उस जई को खोंसती थीं। नागपंचमी के दिन कुश्ती प्रतियागिता होती थी। कुश्ती में भाग लेने के लिए दूर-दूर पहलवान आया करते थे। दिन में ही मेला लगता था। कभी-कभार बारिश भी होती थी। उस दिन पूरी आम की बगिया दमक उठती थी। चारांे तरफ चहल-पहल रहती। हमने भी इस मेले का बहुत आनन्द उठाया।……………………..कर्णांवती नदी

 

मां ने बताया कि पहले गाड़ी-मोटर नहीं चलती थी। गांव से लोग पैदल ही विन्ध्याचल का दर्शन करने जाते। जब भी गाॅव में किसी की बहू आती तो वह विन्ध्याचल और कालीखोह का जरूर दर्शन करती। शादी के बाद बेटी के मायके आने पर भी विजयपुर शीतला देवी और विन्ध्यवासिनी मां का दर्शन कराया जाता है। आज भी नियम है कि गांव वाले शादी का कार्ड छपते ही सबसे पहले मां विन्ध्यवासिनी के चरणों में अर्पित किया जाता है। कर्णांवती नदी गांव से नजदीक होने के कारण अधिकांश लोग नहाने जरूर जाते। इस नदी के जल से पूरा काम हुआ करता था। हिन्दू-मुस्लिम सभी नहाते थे। आज नदी सूख गई है। गांव वालों को गर्मी आते ही परेशानी उठानी पड़ती है। इस लिहाज से सरकार कर्णांवती नदी के पुनरू़द्धार हेतु गांव समाज के प्रयास से नदी को जीवन दान देने में कार्य कर रही है। इस प्रयास में सफलता भी मिली है। नदी होने के बावजूद घर के काम के लिए पानी की बहुत जरूरत पड़ती, जिसके लिए कच्चा कुआं रहा करता था। उसके लिए नई नवेली दुल्हन तक को चार बजे उठकर घूंघट के साथ कुएं से पानी लेने जाना पड़ता था। आज जैसा नहीं था कि बटन दबाओ और बाल्टी भर जाये। एक बाल्टी पानी के लिए भी काफ़ी मेहनत करनी पड़ती थी। ……………….कर्णांवती नदी
गांव की सामाजिकता
आज जितना जातिगत द्वेष गांवों में बढ़ा है, उतना पहले नहीं था। आपस में सम्मान का भाव था। कोई किसी भी जाति को हो संबोधन सम्मान देने वाले ही हुआ करते थे। इस गांव में अभी 12 जातियां और मुस्लिम भाई रहते हैं। हालांकि पहले की अपेक्षा आजकल ज्यादातर लोग शहर में रहने लगे हैं। लोगों की संख्या सिमट गई है,लेकिन गांव आज भी खुशहाल दिखता है। अधिकांश ग्रामीण भले ही पलायन कर गये हों, लेकिन शादी-ब्याह के कुछ कार्यक्रम गांव से ही करना चाहते हैं। कभी पुश्तैनी देवी-देवता के पूजा के बहाने तो कभी विजयपुर और विन्ध्याचल में मुंडन के बहाने। गांव, वहां के लोगों के रहने से अपनी पहचान बनाये हुए है और लोगों में काफी जागरूकता भी देखने को मिलती है।……………………………………………कर्णांवती नदी
शिक्षा में आया बदलाव
आज शिक्षा व सूचना क्रान्ति से गांव तेजी से बदल रहे हैं। यदि तीन-चार दशक पहले के इतिहास को झांके तो गांव में अधिकांशतः लड़कियां निरक्षर थीं। उनकी दिनचर्या खाना बनाने से लेकर पहड़ी पर जाकर गाय-भैंस बकरी भेंड़ चराना तक ही सीमित रहती थी। बालिकाओं को शिक्षित करने की कोई रवायत नहीं थी। देश में ऐसी परिस्थिति व परम्पराएं लंबे काल तक विद्यमान थीं। लड़कियों व महिलाओं की शिक्षा बेमायने थी, लेकिन आज अन्य गावों की तरह बैसपुर में भी लड़कियां गांव में रहकर ही बीए, बीएससी कर रही हैं। ससुराल में भी जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं। गांव की रिया की मानें तो उसके पापा ने बीए कराने के बाद उसे बीएड भी करवाया। पंचायती राज एक्ट में संशोधन के बाद महिलाओं को पंचायतों में प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हुआ। साथ ही एजूकेशन के लिये दरवाजे खुले तो महिला ग्राम प्रधान के साथ-साथ अध्यापिका, शिक्षामित्र और शिक्षा प्रेरक बनकर आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत हुई।…………….कर्णांवती नदी

मोगरा गांव का दलित था। वह पूरे जीवन ब्राह्मण-ठाकुर के बगिए से आम-महुआ बेचकर जीवन-यापन करता रहा। गांव में मुसहर समुदाय के लोग भी हैं। आर्थिक तंगी के कारण उनकी विवशता यह है कि उन्हें प्रतिदिन रोजी-रोटी के लिए जंगल से लकड़ी और छुईल का पत्ता लेने जाना पड़ता था। गांव वाले बता रहे थे, किसी मुसहर महिला ने जनसंख्या नियंत्रण योजना के तहत नसबंदी करवा लिया। एक बार लकड़ी लाने में इस महिला पर इतना बोझ पड़ा कि आपरेशन की जगह पेट ही फट गया। यह सब सुनकर आश्चर्य भी लगता है। गांवों में पहले स्वास्थ्य सेवाओें का कोई नामोनिशान नहीं था। गरीबी बहुत थी। अछूतों का कोई ठिकाना नहीं था। इस वर्ग के लिये शिक्षा की तो दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी।………………………………..कर्णांवती नदी

आज सरकारी स्कूल होने के कारण इनके बच्चे भी पढ़ने लगे। पत्तल के जूठन खाने की जगह खुद की थाली भी नसीब हो गई। सरकार द्वारा पक्के मकान और बिजली की भी व्यवस्था कर दी गई है। टीवी और मोबाईल भी चलाने लगे हैं। महिलायें तो नहीं, लेकिन लड़के हाईस्कूल और इण्टर पास होने लगे है। मुसहर जाति में भी हमने देखा कि वहां की महिलाएं पढ़ी लिखी भले ही नहीं हैं, लेकिन व्यावहारिक समझ ज्यादा अच्छी है।

अब गांवों में हजारों वर्षों से दबे-कुचले दलित वर्ग में भी क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। इंटर पास मोगरा सा नौकर का लड़का मिर्जापुर में कोचिंग चलाता है और उसने एक टीचर से शादी कर लिया। कहां उसके पिता गांव में व्याप्त छुआ-छूत के कारण स्कूल का मुंह नहीं देख पाये थे। वहीं मोगरा का बेटा आज ब्राह्मण नवयुवकों के साथ मित्रवत् है।…………………………………..कर्णांवती नदी

महिलाओं के पक्ष में कई कानून बनने व संविधान में आरक्षण से गांवों की महिलाओं में जागरूकता आई है। पहले महिलायें जितना धरेलू शोषण सहती थीं, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। सास-ननद का राज चलता था। यह समाज में बहुत बड़ी बुराई थी। सास का यह हाल था कि वह आलमारी में गुड़ और चीनी से लेकर चबैना तक ताले में बन्द करके रखती थीं। हर शिकायत पर ससुर और पति हाथ छोड़ देते थे। अब थोड़ी स्थिति बदली है। घरेलू हिंसा की शिकार होने पर तो गांव की महिलाएं, बेटियां मोबाईल से तुरन्त मायके वालों को सूचित करती ही हैं साथ ही थाने भी पहुंच जाती हैं। न्याय के लिए न्यायालय की शरण तक ले लेती हैं। गांव में रह रही रागिनी ने अपने ससुराल वालों की प्रताड़ना के खिलाफ कानून का सहारा लिया। अब ससुराल वाले भय से ही सही, गलत व्यवहार नहीं करते।………….कर्णांवती नदी

शिक्षा व सूचना क्रान्ति ने महिलाओं के आर्थिक विकास के द्वार खोल दिये हैं। पढ़ी-लिखी होने के कारण गांव की महिलाओं की सोच में भी बदलाव आया है। मर्यादा के नाम पर जिस तरह से गांव की लड़कियों को चुप करा दिया गया था, वह चुप्पी अब टूट चुकी है। अब पुराने जमाने की तरह उसे सिसकना नहीं पड़ता और न ही बहुओं को मायके की खबर पाने के लिए 6 महीने का इन्तजार करना पड़ता है। वह चाहे घर की बात हो, ससुराल या फिर चौराहे के बददिमागों की गलत हरकत हो, स्मार्ट फोन से काफी संबल मिला है। आज इण्टरनेट ने बहुत कुछ बदल दिया है। इस फोन ने शहर-देहात का अन्तर कम कर दिया है। देहात शहर से ज्यादा स्मार्ट हो रहा है।………..कर्णांवती नदी

लेकिन सूचना क्रांति से उपजी आधुनिकता की अंधी दौड़ से गांव की संस्कृति लुप्त हो रही है। परिवार की शादी में हमने देखा कि बहुओं के हाथ में स्मार्ट फोन और साथ में आरओ, डायनिंग टेबल, वाशिंग मशीन जैसे आरामदायक चीजों का आगमन 15 सालों में ज्यादा ही दिखने लगा है। पीतल के बटुआ-परात और कलश नाम मात्र के रह गये हैं। यही नहीं शादी ब्याह में गाये जाने वाले स्थानीय गाने बजाने की लोक संस्कृति भी पिछड़ेपन में आ गयी है। कजरी, सोहर और मजाकिया अंदाज में गायी जाने वाले गारी की जगह डीजे का चलन हो गया है।

महसूस होता है कि लुप्त हो रही गांव की संस्कृति को बचाना होगा, वर्ना ये नये-नये बाजारू भस्मासुर सब कुछ निगल जायेंगे और केवल गांव की झलक ही शेष रह जायेगी। आज हमारे अन्दर का गांव जो जीवित है, उसका कारण हमारे पिता श्री सूर्य नारायणजी और माता सरस्वती जी का अमूल्य योगदान रहा है।

(इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एम.ए व पुरुषार्थ दर्शन पर शोध। पत्र-पत्रिका​ओं में नियमित लेखन)

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