
किशोरावस्था में गांव “चिकनौटा” में बिहार के हाई-स्कूल के पाठ्य क्रम में कवि सुमित्राननंदन पंत जी की एक कविता पढ़ी थी,”भारत माता ग्राम वासिनी।” इन पंक्तियों का कवित्व अच्छा लगता था और पंडित जी इन के शब्दों के अर्थ समझाते थे, पर इस कथन के प्रभाव, इसकी गहराई की कोई समझ तब नहीं थी। हम गांव के लड़के इस कविता के शब्दों में अपने को देहाती परिवेश, अपने आस-पास, से जोड़ने-समझने का प्रयास अवश्य करते। “फैला है खेतों में श्यामल; धूल भरा मैला सा आंचल… ।” जैसे कथ्य धान की लहलहाती फसल और उसके पहले जेठ-वैशाख की चिलचिलाती धूप और सांय-सांय कर उड़ती धूल से साकार हो उठते! ग्रामीण परिवेश में पैदा-बड़ा होने के कारण हम सब जैसे—जैसे बड़े होते गए; इन पक्तियों में छुपा ग्रामीण सौंदर्य हमारे रूमानी मन में मुखरित होने लगा था।
बाद में जब गांव से संबंधित आकंड़े पढ़ने लगे; जैसे: भारत में कोई 7 लाख गांव हैं, और 85 फीसदी लोग गावों में रहते हैं, बहुत कम गांव में बिजली है; गांवों में सड़के नहीं हैं,…आदि, आदि; तो पंत जी के कुछ पंक्तियों में छिपी विद्रूपता:
“तीस कोटि संतान नग्न तन, अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन, नत मस्तक तरु तल निवासिनी।”
… ……भी समझ में आने लगी थी। पर उस वक्त तो, यानी कोई 50—55 वर्ष पूर्व; बस सौंदर्य ही सौंदर्य था मेरे मन में। नदी, तालाब, अमराइयों, और कभी सूखे-कभी लहलहाते खेतो, और जामुन, पपीते, केले, गुलमोहर, सेमर याने सेमल, खैरा, और महुआ के पेड़ों से आच्छादित, प्रकृति की सुरम्य गोद में बसे मेरे गांव “चिकनौटा” का यह सौंदर्य, जब थोड़ी पढ़ने लिखने की बुद्धि हुई और कवितायें समझ में आने लगीं तो तो आंखों में– मन में —भीगने लगा था,… कालिदास के त्रतुसंहार के बसंत वर्णन की पंक्तियां….
” वापी जलानाम , मणि मेखलानाम, शशांकभाषाम प्रमदा जलानाम |
चूतद्रुमानाम कुसुमान्वितानाम, ददाति सौभाग्यमयम वसंत: “
….जैसे मूर्त हो जाती थीं। पर उन बचपन के दिनों में भी अपने ग्रामीण-परिवेश और संस्कृति से यह लगाव मेरे मन में इतना गहरा था कि बाद में कुछ साल बाद जब मेरे पिता जी मुझे पढ़ने के लिए मुजफ्फरपुर शहर (मात्र कोई ६० मील दूर) ले जाने को कहते तो मैं बहुत रोता; ऐसा मेरी मां बताती थी।
मेरा गांव “चिकनौटा” उत्तर पूर्व रेलवे के सेमरा स्टेशन के बहुत पास है, बस कोई एक मील दूर। सेमरा, बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के मुख्य शहर मोतिहारी के बाद पश्चिम की ओर पहला स्टेशन है; मोतिहारी से आठ मील पश्चिम। रेलवे लाइन से मात्र 4-5 सौ फ़ीट की दूरी पर पटना और लखनऊ से काठमांडू जाने वाली सड़क, रेलवे लाइन के समानांतर, लगातार दौड़ती है; पहले कम अब ज्यादा भारी भरकम लारियों-ट्रकों से लदी और चौड़ी होने के कारण। पहले बहुत पतली सड़क थी। मेरे बाबूजी (पिता जी को भोजपुरी भाषी लोग अक्सर आदर से बाबूजी कहते हैं) कहा करते थे, 1964 में जब नेहरू जी त्रिवेणी बांध का शिलान्यास करने मुजफ्फरपुर से भैंसालोटन इस रास्ते से गए थे तो उसी के एवज में इस सड़क को पुख्ता किया गया था |
यदि गांव “चिकनौटा” के चौहद्दी की बात करें तो गांव के उत्तर में बूढ़ी गंडक या सिकरहना नदी बहती है, दक्षिण में रेलवे लाइन और पूर्वोत्तर भारत को नेपाल से जोड़ने वाली तब की एकमात्र पक्की सड़क; पूरब में दूर पर मधुमालती (या मधमल्ति) गांव, और पश्चिम में बाभनटोली की दूसरी तरफ सुगौली को जाने वाली कच्ची सड़क। सुगौली मात्र पांच मील दूर है मेरे गांव से; और हमारा गांव सुगौली थाने के अंदर आता है। कहते हैं सुगौली में नेपाल के राजा और ब्रिटिश लोगों में ईस्वी सम्वत 1816 में एक संधि हुई थी जिसके मुताबिक नेपाल को उपनिवेश न बनाकर स्वतंत्र रहने दिया गया था।
सड़क के दूसरी तरफ, यानि सड़क के दक्षिण में, सड़क के सटे हुए, एक छोटा मंदिर था, जो अब बहुत बड़ा हो गया है। मुझे थोड़ा थोड़ा याद हैं वहां, सड़क पर ही, एक पेड़ होता था; उसकी जड़ पर कुछ लोगों का विश्वास था कि किसी देवी का निवास है। लोग देवी को बनस्पति माई, या बनसपती माई , कहते थे, कहते हैं।
गांव “चिकनौटा” से हम किशोर हर शाम को आम तौर पर बड़ी सड़क तक घूमने जाते। शौच आदि के बाद मंदिर जाकर देवी के दर्शन करना एक नियम सा था। गांव के दक्षिण में रेलवे लाइन,उसके दक्षिण में सड़क, और सड़क के दक्षिण में देवी। यानी देवी मंदिर से मेरे गांव आने में बड़ी सड़क, जिस पर दिन रात ट्रैफिक दौड़ता है, और रेलवे लाइन; दोनों पार करनी पड़ती है। यह समय के साथ साथ भीड़-भड़क्के के कारण खतरनाक हो गया है।
2014 में इस सड़क और रेललाइन पार करने के क्रम में एक बड़ी दुर्घटना हो गई, जिसकी गूंज देश भर में सुनी गई। हुआ यों कि एक अन्य गांव के एक युवक ने नई टेम्पो खरीदी। उसके सम्बन्धी मेरे गांव के अहीर टोली में रहते थे। वह उस टेम्पो पर अपने सम्बन्धी के पूरे परिवार को लाद देवी के मंदिर पूजा करने गया, नई टेम्पो के शुभारंभ के लिए। पूजा करके लौटते समय रेलवे गुमटी के खुले रहने के कारण कोई बीस लोगों से भरी हुई टेम्पो ट्रेन से टकराकर चूर हो गई, और सभी लोग मर गए। बड़ी सड़क और रेलवे लाइन मेरे गांव को दुनिया से जोड़ती है, रोजी, शिक्षा, नौकरी, बाजार,अस्पताल सबके लिए। पर उन तक पहुंचना खतरनाक होता जा रहा है, सड़क और रेल को बड़ा बनाने के क्रम में; और देवी की प्रसिद्धि के कारण।
मेरे गांव, “चिकनौटा”के पश्चिम में जिस एक टोले का जिक्र मैंने ऊपर किया है, बभनटोली; वह अपने नाम के अनुरूप केवल ब्राह्मणों का टोला है; जिसमें मूल के मात्र 10 परिवार होंगें, पर अब तो कई हो गए हैं। बभन टोली के उत्तर-पश्चिम में छपरा-बहास नाम का बड़ा गांव है, जिसके नाम पर मेरे पंचायत का नाम भी छपरा-बहास है। बहास शब्द मेरे ख्याल से ‘बहने’ से आया है; याने वह इलाका जिसमे पानी बहे, आकर जमा हो। इस बहास होने के कारण मेरे यहां बाढ़ खूब आती है। दक्षिण की रेलवे लाइन उत्तर की सिकरहना की बाढ़ के लिए बांध का काम करती है, और ये गांव बीच में होने के कारण सदा बाढ़ से प्रताड़ित रहते हैं। यह प्रताड़ना ग्रामीणों के लिए कभी कभी असह्य हो जाती है।
कल्पना कीजिये… बाढ़ का पानी हर घर में घुस आता है, मवेशियों को लेकर लोग ऊंची जगहों जैसी रेलवे लाइन या सड़कों पर बांध आते हैं और नावों से जाकर उन्हें खिलाते हैं। सांप और दूसरे कीट भी ऊंची जगहों पर भाग जाते, बड़े छोटे गेंहुअन सांप लोगों के घर की धरन पर लटके पड़े होते; जरा कल्पना करें…आप सोये पड़े हैं, सुबह उठते है, आंखें खुलती हैं, सबसे पहले ऊपर देखते हैं धरन से लटके बड़े सांप को, आपकी क्या मनस्थिति होती होगी! यही नहीं… मुझे याद है शौच के लिए हम बच्चे, बड़े, डेढ़ दो फ़ीट पानी लांघ कर खड़े—खड़े शौच करते थे। हम युवाओं/किशोरों में जो दुस्साहसी थे, वे पेड़ों पर चढ़ जाते शौच के लिए। कल्पना कीजिये महिलाओं की क्या स्थिति होती थी; उस बाढ़ में डेढ़-दो फ़ीट पानी लांघ कर किस तरह शौच के लिए वे जाती होंगी; वहीँ जहां पुरुष जाते थे! यह विद्रूपता अभी भीं ज्यादा नहीं बदली है; क्योंकि बाढ़ अभी भी खूब आती है। बल्कि ज्यादा आती है क्योंकि नदी कट कट कर नजदीक आती जा रही है गांव के। अभी भी लोग डूब कर मरते हैं, सांप काटने से मरते हैं। किसी भी नेता या सरकारी अधिकारी को इसकी चिंता नहीं है .. जब लोग मरने लगते हैं तो अधिकारीगण और नेता जी लोग हेलीकॉप्टर से एक बार दौरा कर लेते हैं और चुनाव के समय इसी को दुहराते हैं। नेहरू जी से लेकर मोदी जी की स्वतंत्र भारत की 75 वर्ष की सरकार ने शायद ही कुछ किया हो; सिवा कंबल बांटने और दौरा करने के। कई बार, सुना कुछ पैसे भी आवंटित हुए बांध आदि के लिए; पर सरकारी पैसों का भारत में क्या होता है, यह तो ईश्वर या सरकारी कर्मचारी ही जानते हैं।
मेरे अपने गांव में मुख्यतः दो टोले हैं। अगर आप गांव में नहीं रहे हैं तो शायद “टोला” क्या होता है न जानते हों। जैसे शहर के हिस्से को ‘मोहल्ला’ कहते हैं, वैसे ही गांव के हिस्सों को ‘टोला’ कहते हैं। गांव, “चिकनौटा” के दो टोलों के बीच एक गहरा बड़ा तालाब सा है; जिसे हम सब नासी कहते हैं। यह शब्द कहां से आया, किसका अपभ्रंश है, पता नहीं। नासी के पश्चिम में हमारा टोला है, छोटका टोला। नासी के उत्तर-पूरब के टोले को बड़का टोला कहते हैं। अगर बड़का टोला जाना हुआ, तो हम लोग कहते हैं “ओह टोला जाए के बा”; यानि उस टोले पर जाना है।
मैं जब बड़ा हो रहा था तब सदा यह बात मन में घूमती थी कि उस बड़का टोला को बड़का टोला क्यों कहते हैं? एक बात तो प्रत्यक्ष थी; उस टोले में मेरे छोटका टोले से ज्यादा लोग थे। पर मेरा मन इस से संतुष्ट नहीं होता था। थोड़ा दिमाग पर जोर देने पर पता चला कि उस टोले के लोग मेरे टोले के लोगों से बड़े काश्तकार थे; ज्यादा जमीनों वाले, इलाके में प्रसिद्ध। कई परिवारों की जमीने दूसरे गावों में भी थी। मेरे गांव के, मेरे बड़े होते समय, बहुत दिनों तक सरपंच, रामप्रसाद सिंह, उसी टोले के थे और एक बड़े काश्तकार थे। बड़ी इज्जत थी। रामप्रसाद सिंह, जिन्हे मैं ‘रामपरसाद काका’ कहता था; मुझे बड़ा स्नेह देते। सदा खूब पढ़ने को कहते रहते, मेरा मनोबल बढ़ाते रहते। उनके छोटे लड़के मेरे साथ हाई स्कूल में पढ़ते थे। जहां तक मुझे याद है, सरपंच साहेब, याने राम परसाद काका कभी कभी अपने घोड़े पर आते। रामपरसाद काका के निधन के बाद बहुत वर्षों तक मुझे एक खालीपन लगता रहा, जैसे किसी छायादार वृक्ष का साया ऊपर से उठ गया हो। बड़का टोला के ही दूसरे छोर पर एक दूसरे बड़े काश्तकार परिवार थे। उन परिवारों के मुखिया बाबू कमला सिंह जी शायद कांग्रेसी थे और स्वतन्त्रता सेनानी भी। वे सदा धुले हुए सफ़ेद धोती कुर्ते में रहते; टोपी का याद नहीं। वे रोज सुबह सुबह तैयार होकर टहलने सेमरा स्टेशन की तरफ जाते, यह मुझे अच्छी तरह याद है। मेरी याददाश्त में अपने गांव में एक हाथी की स्मृति है; जहां तक मुझे याद है, यह कमला सिंह जी के ही यहां थी। पर शायद मैं गलत भी होऊं; इतने वर्षों बाद वाली याददाश्त पर कितना भरौसा किया जाय।
मेरा गांव “चिकनौटा” छोटा था पर उसमें हर जाति के लोग थे। मेरे ही टोले में एक घर धोबी, एक घर तेली, एक घर कुर्मी, दो तीन घर दुसाध थे। अब सब के कई घर हो गए हैं। दुसाध लोग हट्ठे कट्ठे थे, वे खेतों में सब के घर काम करते। हम उन्हें आम तौर पर जन-बनिहार कहते। उनका पानी नहीं चलता था, यानि उनका छुआ नहीं चलता था; यानि वे अछूत समझे जाते थे। कुर्मी लोगों का छुआ चलता था। वे लोग शादी-ब्याह, परब-त्यौहार पर घर के अंदर का कामधाम करते जैसे आगंतुकों को पानी पिलाना; पूड़ी-जलेबी परोसना,आदि, आदि। हमारा परिवार एक मात्र ब्राह्मण परिवार था। पर मेरा परिवार पुरोहिती नहीं करता था। हम भी राजपूतों की तरह खेती-बाड़ी करते थे।
ब्राह्मणों को हल चलाना मना था; अत: खेती के लिए हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में हमारी जो भी थोड़ी बहुत खेती थी; हो नहीं पाती थी और हम सदा निर्धन ब्राह्मण की श्रेणी में गिने जाते थे। हमारे पास खेती थी भी कम। बाकी सब परिवार राजपूतों के थे। मेरे घर के आसपास के राजपूत लोग रेलवे में चौथी श्रेणी के कामों में लगे होते, जैसे रेल की पटरी की मरम्मत या सफाई, या गुमटीदार, या पैटमैन (यह प्वाइन्टमैन का अपभ्रंश शब्द है)। सभी सुखी थे। 4-5 घरों के अलावा, जिसमें मेरा परिवार भी एक था; जो दूसरे परिवार थे, उनमें से कइयों के पास अच्छी खेती थी। अच्छी खेती का मतलब तब होता था 5 बीघे से ज्यादा। यह रकबा करीब करीब 7 एकड़ होता है। दूसरे लोगों को यह गलत लगे; पर चम्पारण की लग्गी, जिससे खेत नापते हैं, कहते हैं 9 हाथ की होती है; आम 6 हाथ की लग्गियों की अपेक्षा।अत; हमारे बीघे अपेक्षाकृत बड़े होते हैं।
बड़का टोला में रईस राजपूतों के कई बड़े परिवार थे, मध्यम काश्त वाले भी। पर इसके अलावा दूसरी जाति के लोग भी थे। उनमें एक घर हजाम लोगो का था; तीन घर बनियों के थे, और कई घर चमार लोगों के। इस तरह हमारा गांव आत्म-निर्भर था, छोटे बड़े काश्तकार, धोबी, नाइ, तेली, बनिए, दुसाध, चमार, सब एक साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते; चाहे वे किसी जाति के हों। जैसा कि तब आम गावों में होता था, हर ग्रामीण दूसरे का भैया, चाचा, दीदी, बबुआ होता था। झगडे होते थे; पर कम। लालच, वैमनस्य तब भी था लेकिंन जैसा आज है वैसा नहीं। आगे बढ़ने की होड़ इतनी नहीं थी। कारण कुछ भी हो; अशिक्षा, जीने खाने लायक पर्याप्त संसाधन, उपजाऊ जमीन, कम महत्वाकांक्षाएं; आदि आदि; पर इन सबका परिणाम था कि शांति आज से ज्यादा थी। किसी एक घर में व्याह का मतलब था पूरे गांव में व्याह का जश्न; पूरे गांव की भागीदारी। बेटी का व्याह हो लगता सबकी बेटी का व्याह हो रहा है। पूरा गांव सहायता के लिए उठ खड़ा होता। हफ्तों पहले से अहिरटोली को बता दिया जाता कितने सेर दूध की जरूरत होगी, मिठाई बनाने के लिए। गांव के सभी घरों में दूध की दही एक हप्ताह पहले से बनाने लगती। सबकी दही व्याह में काम आएगी। सबके केले से घौद काट कर उसे जल्दी पकाने के लिए धूक दिया जाता (याने जमीन के अंदर रख धुएं से पकाने की तैयारी की जाती, ताकि केले जल्दी पकें। …. . जैसे वह एक की नहीं, पूरे गांव की बेटी हो। …. सामूहिक स्नेह, सहायता का अद्भुत नमूना।
गांव ने जितना दिया..उसकी तुलना में गांव के लिए कहां कुछ कर पाई
हमारे दोनों टोले; जैसा मैंने कहा, स्वावलम्बी थे, पर खास चीजों के लिए बगल के गांवों का सहारा लेना पड़ता था; जैसे सिलाई, लकड़ी-चौकी-फर्नीचर बनाना, कुम्हार का काम, आदि। हमारी पंचायत के मुख्य गांव छपरा बहास में मुसलमानो के कई परिवार थे जो सिलाई और दूसरे कई कलाओं में माहिर थे। हम कपडे खरीद कर छपरा जाते और अपना कुरता कमीज वहीं से सिला कर लाते। हमारी चुड़िहारिन चाची भी मुसलमान थीं। वे चूड़ी की टोकरी लिए आतीं और घर—घर घूमतीं। उन्हें घर के भीतर आना मना था क्योंकि वे मुसलमान थीं; पर किसी तरीके का वैमनस्य मैंने नहीं देखा। बल्कि वे सबसे हंसी मजाक करतीं। मुझे याद है मेरी चौखट पर बैठ कर वे मेरी मां, चाचियों, बुआओं को चूड़ियां पहनातीं। मेरी छोटी चाची तब नवेली दुल्हन थीं परिवार की। वे चूड़ी पहनाने के बहाने उनका हाथ पकड़ लेतीं और तबतक नहीं छोड़ती जबतक मेरी मां या दादी उन्हें कोई उपहार न दे दें। इतनी देर तक वे पूरे परिवार से चुहल करती रहतीं; घर के अंदर आते जाते मर्दों से भी; पर किसी की मजाल जो उन्हें जाने को कहे। उसी मुसलमान टोली के एक रज्जाक चचा थे; मेरे बड़े अजीज। इस अजीजी का कारण था उनकी सीधी-साधी शायरी और मेरे बाबूजी से उनका याराना रिश्ता। उनकी शायरी हाल के वर्षों में ही, शायद २०१२ में, मैंने उन्हें फोन पर बुलाकर, एक कविगोष्ठी में सुनी है। अब रज्जाक चाचा नहीं हैं। स्नेह के ये सूत्र मात्र यादें छोड़कर अंतर्धान होते जा रहे हैं |
नासी के उस पार गांव, “चिकनौटा” का खलिहान था, खलिहान के बगल में एक बड़ी अमराई थी कोई दो तीन एकड़ की, या ज्यादा की। उस अमराई के बीचोबीच एक कच्ची सड़क जाती थी, जो अब ईंटों की बन गई है| अमराई तो अब सिकुड़ कर नाम मात्र की रह गयी है। इस सड़क के दूसरी छोर पर ‘अहिरटोली’ थी जिसमें अहीर लोगों के कई परिवार थे। उस टोले में दो घर ब्राह्मणों के भी थे, एक चौबे, एक पाण्डे। शायद किसी जमाने में बड़े काश्तकारों ने कुछ जमीन उनके नाम कर दी होगी और वे वहां आकर बस गए होंगें। अहीर लोगों का नाम उस वक्त राउत होता था, जैसे मोहन राउत। बाद में यह बदल कर यादव हो गया। सबके पास पर्याप्त गायें थी। गायों के चरने के लिए तब बहुत ही परती थी: परती, यानि चरागाह; मवेशियों के चरने के लिए खुली जगह। शाम को गायों को चराने के बाद गो-पाल लोग यानीं अहीर लोग कई रास्तों से घर लौटते। धूल उड़ाती गायों की इन टोलियों को देखकर पंडित जी द्वारा पढ़ाई गयी सूरदास की पंक्तियां “चार पहर वंशी ले भटक्यो; सांझ परे घर आयो” साकार हो; उठती थीं। वंशी तो किसी के हाथ में नहीं होतीं थीं, एक पतला सोंटा जरूर होता था। हालांकि गायें दिन भर चर कर इतनी थक गईं होतीं थीं कि वे खुद ही झटक झटक कर भागती आती थीं; धूल उड़ाती, गो-धूलि की उपमा साकार करती; सोंटे की जरूरत नहीं पड़ती थी।
गांव-इलाके का हर मौसम मुझे सुहाना लगता था जैसा मैंने ऊपर लिखा है। जेठ की गर्मी और सावन-भादो की बाढ़ अवश्य क्लेश देती थी। जेठ की गर्मी बहुत कड़ी और कष्टदायिनी लगती थी। हम लड़कों के लिए हमारी अमराइयां हमारी झुलसती गर्मी से रक्षक थीं। तब गांव में अमराइयां यानीं आम के बगीचे खूब थे। मेरे अपने बगीचे में कोई 15 पेड़ होंगें; तीन लंगड़े आम के, और बाकी बीजू। बीजू आम के पेड़ बड़े होते हैं पर आम छोटे। लंगडा आम बड़ा होता है, पर पेड़ छोटे। मुझे याद है, आम इतने होते थे कि लोग खा नहीं पाते थे। उस वक्त लोग आम बेचते नहीं थे। मुझे अच्छी तरह याद है मेरी अमराई में एक साल इतने आम हुए कि घर के एक कमरे में उनका अम्बार लग गया। और सब खा नहीं पाए तो कोई एक दो हप्तों के बाद उसमे कीड़े लग गए। हमे कुदाल से खोद खोद कर वह कमरा साफ़ करना पड़ा और सारे सड़े हुए आम खाद की तरह खेत में काम आये। यह मेरे घर की ही कहानी नहीं थी; कई घरों में ऐसा होता था। अमराई, गर्मियों में, हम बच्चो के खेलने की जगह भी थी। उस वक्त एक खेल हमारे इलाके में खेला जाता था; उसे ‘सही-टिक्का’ कहते थे। साधारण सा खेल: मिट्टी के ढेले से एक लकीर खींच दी जाती; कुछ लड़के एक तरफ, कुछ दूसरे। दूसरी तरफ जीतने के लिए जरूरी था कि आप अपने प्रतिद्वंदी को अपनी तरफ जोर लगाकर खींच लाएं। हाथ मिलाकर खेल शुरू होता और उसी हाथ मिलाने से खींचने की शुरुआत हो जाती। मैं इस खेल में कभी नहीं जीत पाता था; अत: मजबूत लड़के मुझे अपने दल में रखने से कतराते थे।
गर्मियों में अमराइओं में बीजू आम पक कर गिरे रहते। अगर आप ब्रह्म-वेला में अमराई में चले गए तो आप को टोकरी के टोकरी आम मिलेंगें। पर बटोरने का लालच किसी को नहीं था क्योंकि सबों की अपनी अमराइयां थीं। जब मैं शहर में पढ़ने लगा और गांव गर्मी की छुट्टी में आता; तो दोपहर में अमराई ही गर्मी से बचने का सहारा रहती। लंगड़ा आम के नीचे नंगी चारपाई डालकर, उसकी छाया में लेटकर; कविता, कहानी की किताबें पढ़ता। पके हुए बीजू आम पूरी अमराई में बिछे होते। गरीबों के; ज्यादातर हरिजनों लोगों के बच्चे, जिनकी अमराई नहीं थी, पूरी दोपहरी में मेरी अमराई में छाये रहते। मेरा उनसे एक करार था; वे एक आम ले जाएं और एक आम मुझे दें। मैं चारपाई के नीचे छोटी बाल्टी में पानी डालकर रखता। ठंढे पानी में कुछ देर रखने के बाद आम और मीठे हो जाते हैं; बस वही मीठे आम दिन भर “जलपान” होते। हमारी अमराई के बगल में एक मात्र महुए का पेड़ था। सुबह में खेत की तऱफ जाने पर, उस पेड़ के नीचे, महुए की पर्त बिछी दीखती। कहते थे, मेरी बुआ लोग उस महुए को दउरा (टोकरी) भर भर कर लेकर आती। दो तीन माह बाद उसी महुए का लट्टा बनाकर धान रोपाई के लिए आसाम से आये मजदूरों को तिजहरिया (तीसरे पहर) का जलपान दिया जाता।
धान रोपाई पर याद आया। धान रोपाई मेरे इलाके में एक उत्सव जैसा होता था; क्योंकि हमारे बहास इलाके में धान ही एकमात्र फसल होती थी, रबी की फसलों के अलावा। धान की रोपाई दो चरणों में होती है, पहले, आषाढ़ के आने के कुछ दिनों पूर्व, खेत को खूब महीन कर धान को गुच्छों में बोया जाता है, जिससे बिछले (धान के छोटे छोटे कोमल पौधे) झुंडों में निकलते हैं। फिर उन्हें उखाड़कर दूसरे खेत में एक एक पौधे को रोपा जाता है। बड़ा ही श्रमसाध्य काम है। हमारे गांव, “चिकनौटा” में इस काम में हाथ बटाने के लिए सुदूर आसाम से मजदूरों के परिवार आते थे। मजदूरों के ये एक या दो साथ परिवार कोई दो माह गावं में रहते और पूरे गावं के हर काश्तकार की रोपाई कर के अपने देश आसाम लौटते। आषाढ़ के पहले जेठ की भीषण गर्मी में खेतों की मिटटी गरम हो जाती; खेतों में बिना जूते चप्पल के चलने से पॉँव जलते, मिटटी के ढेलों को हाथ से छूने से हाथ जलता था। जब पहली बार चिर-प्रतीक्षित वर्षा की बूंदे आषाढ़ में इन ढेलों पर पड़ती , तो पूरे खेत में एक मीठा धुआं सा निकलता, जिसकी अपनी एक मीठी सुगंध होती; यह तो केवल एक किसान ही जान सकता है।
इन ढेलों से सम्बंधित एक अनुभव पूरी उम्र मेरे साथ रहा है। जब थोड़ा बड़ा हुआ और दिनकर जी की रश्मिरथी की समझ थोड़ी होने लगी ,तो लगा उसके एक प्रसंग की उपमा इन ढेलों के बहुत ही करीब है।सन्दर्भ है:….. कुंती अपने बेटे कर्ण से मिलने आईं हैं। …..कर्ण कुंती से बहुत नाराज हैं; …”तुमने मुझे मां का प्यार कभी नहीं दिया, अब क्या करने आई हो?” उसका शरीर क्रोध की इस आग में जल रहा है। पर कुंती पहली बार जवान बेटे से मिल रही है, उसकी मातृ-ममता उमड़ पड़ी है, वह जार जार रो रही है| मां के आंसुओं को देख कर्ण का मन पसीजता है, वह उसके चरणों पर गिर जाता है| और माँ के स्नेह-सिक्त आँसू कर्ण के तपते शरीर पर गिर रहे हैं…. दिनकर कहते हैं :
“पहली वर्षा में मही भीगती जैसे, कुछ काल भीगता रहा कर्ण भी वैसे… “
तपते जेठ के बाद आषाढ़ की पहली बूंदों का आनद ही कुछ और है! कालिदास के “मेघदूतं” के यक्ष की तरह “आषाढस्य प्रथम दिवसे मेघमाश्लिष्टसानूं। ..” आसमान को देखकर हम कृषकों परिवारों का मन भी डोलता था, उल्लसित हो उठता था। खेतों में बिछले बड़े हो रहे होते, अब बस मेघ का इन्तजार रहता। जैसे ही झिनझिनि बारिस शुरू होती सब दौड़ पड़ते भीगते भीगते खेतों की तरफ। रिमझिम बारिश के दिनों में हम बच्चों को भी मजा ही मजा था।आम तौर पर स्कूल बंद रहते (क्योंकि मास्टर साहेब अपना खेत रोपने में व्यस्त रहते !); तो बच्चों के पौ बारह रहते। हम बच्चे झिनझिनि बारिस में कीचड में खूब खेलते। खेतों की उस एक दो इंच पानी में छोटी झींगा मछलियां पता नहीं कहाँ से चली आतीं; हम बच्चे; मालिक के भी, मजदूरों के भी, उन्हें अंजुरी में भरकर मेड पर ले आते, खर-पतवार की आग जलाकर उन्हें भूनते और अच्छा “स्नैक” होता हम बच्चों का,बिना किसी नमकीन के! हमें प्राय: यह आज्ञा दी जाती कि हम जाकर बिछले निकालते लोगों को कह आएं कि बिछले और भेज दें; यहां रोपनी में बिछलों की जरूरत जल्द ही पड़ने वाली है। हम दौड़कर बिछले वाले खेत में जाकर कह आते | हम बच्चे उनके धावक थे, यानि ‘कम्यूनिकेटर’। सुनता हूँ अब यह काम मोबाईल फोन से होता है
धान के खेर्तों में छिपछिप पानी में हम मजदूरों के बच्चों के साथ धमाचौकडी करते, हालाँकि उनकी भाषा मेरी समझ में नहीं आती थी; पर उल्लास को, मन की भावनाओं को, भाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती। बहुत दिनों बाद लिखी मेरी कविता की एक पंक्ति है:
” भावो की भाषा न होती; होता कोई व्याकरण नहीं। ..”
छोटी झींगा मछलियों के स्नैक का आनंद लेते हुए, उस धुंआइन आग में और बारिस में हमारी सारी दूरियां मिट जातीं। .. भोजपुरी और आसामी की, दूर दूर प्रांतों की, भाषाओँ की, बड़े-छोटे, ब्राह्मण-हरिजनों की। …..प्रकृति ऐसे कोई अंतर नहीं देखती। उस रिमझिम आषाढ़ की गर्म बारिस की छुअन अभी भी मेरी त्वचा को है। मेरे लिए यह अनुभव अभी भी आनंदमय है इस उम्र में भी जब कभी बारिस होती है तो बस भीगने के बहाने बाहर निकल पड़ता हूं। सभी डरते हैं कि जुकाम हो जायेगा… पर शायद शरीर को इस आनंद की याद है; अत: अभी तक तो जुकाम जी दूर ही रहते हैं !
(भारत में सेना के पूर्व कमीशंड अफ़सर, सुरेन्द्रनाथ तिवारी लगभग तीन दशक से यू.एस.ए. में हैं। उन्होंने भागलपुर (बिहार) विश्वविद्यालय से बी.ई. सिविल इंजीनियरिंग में उत्तीर्ण की। अमेरिका के ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी से एम.ई. इंजनीयरिंग मैंनेजमेंट तथा एम.बी.ए. की भी डिग्री प्राप्त की। ओहायो तथा न्यू जर्सी विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग मैंनेजमेंट का अध्यापन के साथ साथ ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी को सिविल इंजीनियरिंग विभाग की सलाहकार समिति के भी सदस्य रहे। संप्रति अमेरिका की ऊर्जा (बिजली, तेल) संबंधित परियोजनाओं के प्रबंधन से संबंधित।
अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति के भूतपूर्व अध्यक्ष, हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति को विदेशों में अक्षुण्ण रखने की दिशा में कार्यरत्त हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ताज़ा पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, भाषा, सभ्यता की महत्ता का प्रचार -प्रसार कर रहे हैं।)
कमश: जारी…शेष अगली कड़ी में।






















