अपने गांव की याद आते ही वास्तव में महसूस होता है कि अपनी जड़ों से लगाव क्या होता है। पंच भूतों से बना यह शरीर, पंच भूतों से ही बनी यह सृष्टि, इनका परस्पर संबंध हमें अपने गांव में ही महसूस होता है। मेरा गांव जावली भी राजस्थान में अलवर से करीब 50 किलोमीटर दूर और भगवान कृष्ण से जुड़े गोवर्धन पर्वत से करीब 70 किलोमीटर दूर, प्रकृति के सभी रंगो से सजा एक अलग ही छटा लिये नज़र आता है। मेरे बचपन में जब यहां पानी की कमी नहीं थी और बारिश भी बहुत हुआ करती थी तो आस-पास के पहाड़ों की हरियाली, कदम्ब के पेडों की खुशबू, आसमान में बादलों के बीच छिपा सूरज, पेड़ों पर पड़े झूले और नाचते मोर, ऐसा दृश्य उत्पन्न करते थे मानो श्रीकृष्ण की रासलीला आरंभ होने वाली हो। हांलाकि अब इस पूरे इलाके में करीब डेढ़ सौ गांव पानी की अत्यधिक कमी का सामना कर रहे हैं, कुछ जलवायु परिवर्तन के कारण और कुछ सरकारी अंधेरगर्दी के कारण।

अलवर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील स्थित जावली गांव अपने गौरवशाली अतीत और यहां के पूर्व शासकों द्वारा शिक्षा, कला-संस्कृति की दिशा में किये गये कार्यों के लिये जाना जाता है। एक बार फिर यह गांव देश के मानचित्र पर आर्ट विलेज – कलात्मक गांव के रूप में उभरने वाला है। रूबल नागी आर्ट फाउन्डेशन द्वारा इस गांव को गोद लिया गया है और पूरे गांव को कलात्मक ढंग से सजाया जा रहा है। यहां के घरों और भवनों पर चित्रकारी की जा रही है। साथ ही फाउन्डेशन ने युवाओं के लिये नि:शुल्क कम्प्यूटर क्लासेज़ और बच्चों के लिये अंग्रेज़ी भाषा की शिक्षा आरंभ की है। अंग्रेज़ी भाषा के लिये एक शिक्षक आर के शर्मा गांव में ही रहकर बच्चों को बड़े ही रोचक ढंग से नृत्य-संगीत के साथ अंग्रेज़ी भाषा सिखा रहे हैं। गांव की महिलाओं को इसी फाउंन्डेशन ने मौका दिया है मशहूर फैशन डिज़ाइनर और अनेक बॉलीवुड फिल्मों में फैशन स्टाइलिस्ट रहीं नीता लूला के लिये काम करने का और ये महिलायें मुंबई जाकर काम समझकर आयी हैं।

जावली की संस्कृति पर ब्रज के इलाके की छाप है तो यहां मेवाती प्रभाव भी देखने को मिलता है क्योंकि यह इलाका ब्रज क्षेत्र और मेवात दोनों से सटा है। गंगा-जमुनी संस्कृति यहां की पहचान है और हिंदू-मुसलमान यहां वर्षों से मेल-मिलाप से रहते आये हैं। इसीलिये इस गांव के दो रक्षक माने जाते हैं एक भगवान चतुर्भुज जी और दूसरे हसन पीर बाबा। विपत्ति के समय दोनों ने गांव वालों की रक्षा की है, ऐसी यहां मान्यता है। दुख की बात है कि हसन पीर बाबा की मज़ार जर्जर अवस्था में है और गांव में स्थित भगवान चतुर्भुज जी के मंदिर से प्राचीन मूर्ति चोरी हो गयी है। यहां के तत्कालीन राजा धीर सिंह जी को सत्रहवीं शताब्दी में स्वप्न में भगवान चतुर्भज जी ने दर्शन देकर बताया था कि किस जगह खुदाई करने पर उनकी मूर्ति निकलेगी। काले कीमती पत्थर की इस मूर्ति को मंदिर में स्थापित किया गया। करीब तीस साल पहले एक रात चोरों ने मंदिर के ताले तोड़कर मूर्ति चुरा ली परंतु मूर्ति के पैर वे नहीं उखाड पाये। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भैरों सिंह शेखावत ने मामले को गंभीरता से लिया जिससे प्राचीन मूर्ति बरामद हो पायी। मूर्ति को मंदिर में स्थापित किया गया परंतु कुछ समय बाद ही फिर से चोर मूर्ति को चुराकर ले गये। इस बार भी मूर्ति के पैर नहीं ले जा पाये। तीसरी बार चोरों ने पैरों को खोदने के इरादे से हमला किया पर वे नाकामयाब रहे। अंतत: गांव वालों ने ये पैर निकलवाकर, लक्ष्मणगढ़ थाने में जमा करवा दिये। फिर चतुर्भज जी की प्राचीन मूर्ति जैसी ही एक सामान्य काले पत्थर की मूर्ति स्थापित की गयी और चोर उसे भी ले गये। पुलिस-तंत्र मूर्ति चोरों के गिरोह का पता लगाने में पूरी तरह नाकामयाब रहा। एक अद्भुत, प्राचीन, बेशकीमती मूर्ति, चोरों के कब्ज़े से न छुड़ा पाने की वजह से इलाके में चोरों के हौसले और बढ गये। क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थित तभी से लगातार खराब बनी हुयी है. अवैध हथियार तथा अवैध शराब बनाने वाले गिरोह भी अब सक्रिय हैं।
यहां सदियों से हिंदू-मुस्लिम मेलजोल के साथ रहते आये हैं। मुसलमानों पर एक संकट यहां भारत के विभाजन के समय आया था जब इलाके के कट्टर हिंदुओं से मुसलमानों को बचाने के लिये जावली के तत्कालीन शासक राजा दुर्जन सिंह जी ने अपने किले और गांव में मुसलमानों को आश्रय देकर उनकी जान बचायी। गांव के बुज़ुर्ग अपने दादाओं से सुने इस वाकये को बडे गर्व से याद करते हैं कि किस तरह गांव वाले अपने राजा के साथ खड़े होकर करीब पांच हज़ार मुसलमानों को प्रतिदिन भोजन करवाते थे और रात में उनकी सुरक्षा के लिये सभी पहरा देते थे. इलाके में जितने मुसलमान आज हैं उनमें से अधिकांश इन्हीं मुसलमानों की संतानें हैं और यही आपसी भाईचारे की परंपरा आज तक कायम है।
वर्तमान में जब भारत कोरोना वायरस से जूझ रहा है, जावली के लोग इस पुराने वाकये को याद करते हैं कि कैसे आज़ादी से पहले जब भारत में प्लेग फैला था तो राजा दुर्जन सिंह जी, जो कि एक वैद्य भी थे, अपनी जान की परवाह किये बिना घर-घर जाकर लोगों का इलाज किया करते थे। इससे अनेक लोगों की जान बच पायी और जावली में प्लेग का असर बहुत कम रहा।
जावली गांव करीब तीन सौ साल पहले बसाया गया, राजा गज सिंह जी नरूका इसके संस्थापक थे। दीपिका नामक पुस्तिका में इस रियासत के इतिहास का पूरा वर्णन है जो बताता है कि यह राजवंश अपने संत राजाओं की वजह से छोटा होते हुये भी राजस्थान में अपना अलग महत्व रखता रहा। यहां के शासकों ने मदिरा-मांस के सेवन से खुद को दूर रखा, बली प्रथा को समाप्त किया और समाज में शिक्षा को बढावा दिया। इसके शासक रहे राजा धीर सिंह जी को जावलीवासी मां सरस्वती के अनन्य उपासक की तरह याद करते हैं। एक बार मुगल बादशाह द्वारा जब उन्हें हिरासत में लेने का प्रयास किया गया तो उन्होंने दीपक राग गाकर पूरे मुगल दरबार में दिये रोशन कर दिये। इस वाकये से उन्हें मुगल सेना को हराने की सज़ा के बजाय इनामों से नवाज़ा गया। जब वे मां सरस्वती की उपासना करते थे तो वीणा के सुर पूरे किले में बिखर जाते थे।

जावली के शासकों की संत प्रवृत्ति आखिरी शासक राजा प्रहलाद सिंह जी तक जारी रही। जब रियासतें भंग हुयीं, तो उन्होंने कानून का पालन करते हुये अधिकांश ज़मीन-जायदाद सरकार को सौंप दी, किले के कीमती सामान को दान कर दिया। मुगल शैली के बेशकीमती 36 राग-रागिनी चित्रों को इलाहाबाद संग्रहालय को दान किया। अद्भुत वास्तुशास्त्र से बनाये गये किले को छोडकर, अपने खेतों में निर्मित छोटे से भवन में रहने लगे। उन्होंने किले की चौकीदारी भी नहीं करवायी और गांव वालों को किले से मनचाहा सामान ले जाने दिया। नतीजा यह हुआ कि लोग किले की चौखटें, फर्श पर लगे पत्थर, दरवाज़े, खिडकियां, सब ले गये। प्रहलाद सिंह जी ने गांव वालों की सेवा में अपना जीवन बिताया और अंतिम वर्षों में एक संत की तरह रहने लगे, उनकी एकमात्र साथी पवित्र भगवद्-गीता थी। अपनी मृत्यु का पूर्वाभास होने से वे स्वयं अपनी मृत्यु के समय भूमि पर लेट गये और गांव वालों से तुलसी-पत्र और गंगाजल लेकर, भगवद् स्मरण करते हुये उन्होंने देवलोकगमन किया। गांववासियों में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने प्रहलाद सिंह जी द्वारा प्रतिदिन दिये जाने वाले नीति उपदेशों को डायरियों में कलमबद्ध किया है।
जावली को संत भूमि भी कहा जाता है क्योंकि यहां अनेक संतों ने तपस्या की जिनकी समाधियां गांव के आस-पास आज भी मौजूद हैं।
इतने गौरवशाली इतिहास को अपने में समाये ये गांव आज विकास न हो पाने के कारण पिछड़ गया है। जावली गांव, भरतपुर संसदीय क्षेत्र में रहा और इस सीट से कांग्रेस के तीन दिग्गज – राज बहादुर, राजेश पायलट और कुंवर नटवर सिंह सांसद रहे – जो कि केन्द्रीय मंत्री भी रहे परंतु इलाका, आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी विकास से वंचित ही रहा। न सडकें बन पायीं, न जल की समस्या का समाधान हुआ और न ही बिजली आपूर्ति पर्याप्त मिली। दिल्ली और जयपुर, मथुरा-वृंदावन के निकट होने पर भी यहां पर्यटन को विकसित करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। संरक्षण के अभाव में प्राचीन किले, गढ़, मंदिर, बावड़ियां, छतरियां सभी जर्जर अवस्था में पहुंच गये। इलाके में उद्योग-धंधे भी विकसित करने का किसी नेता या पार्टी ने नहीं सोचा। आज राजस्थान के विकास की दृष्टि से सबसे पिछड़े इलाकों में ये क्षेत्र भी शामिल हो गया है।
सबसे बड़ी समस्या यहां और आस-पास के डेढ़ सौ से भी अधिक गांवों में पानी की कमी की है। सभी गांवों में कुएं सूख गये हैं। पानी की उपलब्धता के लिहाज़ से इलाका डार्क ज़ोन में है। पेयजल के लिये भी ग्रामीण परेशान रहने लगे हैं। सभी सांसद और विधायक पद के उम्मीदवार गांव वालों से हर चुनाव में वादा करते हैं कि पानी की समस्या का समाधान करेंगे परंतु किसी को जीतने के बाद यह वादा याद नहीं रहता। वर्तमान में इस क्षेत्र से भाजपा की रंजीता कोली सांसद हैं और कांग्रेस के बाबूलाल बैरवा विधायक हैं। अगर दोनों नेता इच्छाशक्ति दिखायें तो राज्य और केन्द्र सरकार के सहयोग से इलाके में पेयजल की समस्या का समाधान हो सकता है।

एक मात्र उम्मीद की किरण यहां ग्राम पंचायत घाट के पास स्थित घाट कैनाल पिकअप वियर था जोकि 1996 की भयंकर बारिश के दौरान क्षतिग्रस्त हो गया। घाट से निकलने वाली एक नहर, जो कि अलबक्श गांव के बाद दो नहरों में बंट जाती है, इन सभी की खुदाई, सफाई एवं मरम्मत का कार्य भी किया जाना था लेकिन संबंधित विभाग ने खानापूर्ति करते हुए नहरों की खुदाई, सफाई एवं मरम्मत नहीं करवाई। इससे कुछ जगहों पर नहरों का लेवल खेतों के बराबर होने से रूपारेल नदी से आने वाला पानी नहर और खेतों में ही रुक जाता है और आगे नहीं बढ़ पाता। इस कारण लक्ष्मणगढ़-कठूमर क्षेत्र के बांधों को पानी नहीं मिल पाता है। सैकडों गांवों के लोग भयंकर पेयजल संकट झेल रहे हैं। ये समस्या आज भी ज्यों की त्यों हैं, ग्रामीणों ने पूर्व प्रधान अशोक सिंह, वरिष्ठ पत्रकार सुभाष तिवाड़ी तथा रिटायर्ड तहसीलदार रहमत खां जी के नेतृत्व में कई बार आंदोलन किये, बजट आवंटन भी हुआ परंतु अधिकारी इस पिकअप वियर को इसके वास्तविक स्वरूप में लाने की बजाय मरम्मत के नाम पर बिगाड़ते ही चले गये। लालफीताशाही और अधिकारियों की ग्रामीण समस्याओं के प्रति कितनी कम समझ हो सकती है, घाट कैनाल पिकअप वियर उसका जीता-जागता उदाहरण है। केन्द्र सरकार को इसका संज्ञान लेते हुये इलाके में पेयजल की आपूर्ति का प्रबंध तो करना ही चाहिये, साथ ही पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन विषय के पाठ्यक्रम में, डिग्रीधारी अफसर किस तरह काम बिगाडते हैं, इसके उदाहरण के तौर पर घाट कैनाल पिकअप वियर की कहानी को एक पाठ के रूप में भी शामिल करना चाहिये।
जावली गांव में दो तालाब हैं जिनकी मरम्मत करवाने की आवश्यकता है। एक तालाब का जीर्णोद्धार करने का बीड़ा फाउन्डेशन ने उठाया है। अगर सरकार इन तालाबों का जीर्णाद्धार करवाये तो जल संरक्षण की दिशा में एक सफल प्रयास हो सकता है।

बचपन में स्कूल की छुट्टियों में जयपुर से जावली हमेशा जाना होता था। पेड़ों पर झूले डालना और सबसे ऊंचे पेड़ की फुनगी तक झूले को पहुंचाना याद आता है, करौंदे के घने पेड़ के बीच में बैठकर सहेलियों से बातें करने को आज भी मन तरसता है। हर साल गांव जाने पर सहेलियों की संख्या कम होती जाती थी। मेरे चौथी कक्षा में होने पर जहां मेरी उम्र की गांव की 20-25 बच्चियां खेलने आया करती थीं, वहीं नवीं कक्षा में आने तक, उनमें से एक भी बालिका खेलने के लिये गांव में नहीं थी। सभी का इन वर्षों में बाल विवाह कर दिया गया था और आज तक मैं उनसे फिर दोबारा नहीं मिल पायी। फूल, संतोष, गुड्डी जीजी, नीरज जीजी, पांची, अडिया बाबा की बेटियां, मोटी माई की बेटी मुथरी, झूंता, धौली सभी याद आती हैं।
गांव में तरह-तरह के जीव -जंतु देखने का अवसर मिला। बया के घौंसले की रोशनी, जुगनुओं की चमक, मोरों का नाचना, मिट्ठू, कोयल की तान आज भी याद आती है। सांपों का निकलना वहां आम बात थी और प्रतिदिन नये रंग का सांप दिख जाया करता था। नाग को सावन में मारने पर नागिन का बदला लेने के लिए आने की कहानी मदन काका बहुत चाव से सुनाया करते थे। होली पर दादाजी के गले में शरारतवश बिडुकली की माला पहनाने से उनका क्रोधित हो जाना, आज भी याद है।
मेरे दादाजी के अलावा जो चरित्र मुझे सबसे ज्यादा याद आता है वो हैं कामदार साहब रामप्रसाद जी, जिनकी सादगी, सत्यवादिता और ईमानदारी की पूरे गांव में मिसाल दी जाती थी। वे मुझे पुराने ज़माने के किस्से सुनाया करते थे। जब मेरा दसवीं का बोर्ड परीक्षा का परिणाम आने वाला था तो मैंने अखबार में रोल नंबर से रिज़ल्ट ढूंढने के लिये गांव में कामदार साहब पर भरोसा किया क्योंकि वे हमेशा कहते थे कि वे अंग्रेज़ों के ज़माने के दसवीं पास हैं और आज की बीए की पढाई उस समय की दसवीं से पीछे है। रिज़ल्ट वाले दिन कामदार साहब गांव से अखबार लेकर सीधे मेरे पास आये और रोल नंबर से रिज़ल्ट ढूंढने की कोशिश करने लगे पर कई घंटों की कोशिश के बाद भी उन्हें मेरा रोल नंबर नहीं मिला और उन्हें भारी मन से कहना पडा कि मैं फेल हो गयी हूं। मैंने दुख से खुद को कमरे में बंद कर लिया। कई अन्य ग्रामीणों ने कामदार साहब से अखबार मांगा रोल नंबर चैक करने के लिये पर कामदार साहब ने देने से इंकार कर दिया। वे सबसे कहते – क्या तुम मुझसे भी अच्छा देख सकते हो? मैं अंग्रेज़ों के ज़माने का दसवीं पास हूं। इसी तरह रात हो गयी और तब मेरे पिता को बताया गया कि मैं भूखे-प्यासे कमरे में बंद हूं। उन्होंने कामदार साहब से अखबार लेकर ढूंढा तो रोल नंबर तुरंत मिल गया और मैं पास हो गयी थी।

त्योहारों के रंग, उनकी धूम ये मैंने गांव में ही जाना। ब्रजभूमि की छाप लिये होली का त्यौहार पूरा गांव एक साथ मनाता है। अलग-अलग स्वांग रचे टोलियां चंग की थाप पर नाचती-गाती पूरा दिन घर आया करती थीं। चोबदार बाबा होली के गीत गाते-गाते अपनी आंखें स्नेह के रंगों से भीगो लिया करते थे। फिर शुरू होता था गणगौर का त्यौहार। हमारे घर से गणगौर माता की सवारी निकलती और हम सब बच्चे सज-धजकर गणगौर माता के साथ ट्रक में गांव का भ्रमण करने जाते, गांव में गणगौर का मेला भरता, उसका भी आनंद लेते।
गांव में बुज़ुर्गों से मिला अपनापन, उनका स्नेह से सिर पर हाथ फेरना, घर से कभी छाछ, कभी राबड़ी तो कभी मक्खन लेकर आना और हमेशा दुआयें देना बहुत याद आता है। वो मिठास, वो दुलार संसार में कहीं नहीं मिल सकता जो गांव में मिला करता था। जीवन में जो भी कुछ अच्छा हुआ अवश्य ही गांव के अपनों के आशीर्वाद का ही फल है। मैं कहीं भी रहूं, जावली गांव और सभी ग्रामवासियों की याद मेरे हृदय में हमेशा मौजूद रहती है। उनका सहज ही बरसता स्नेह जीवन की सबसे बडी पूंजी है।
(नन्दिनी सिंह ने करीब डेढ़ दशक तक यूरोप में पत्रकारिता की है। वे जर्मनी में रेडियो डॉएचे वेेले की संपादक रहीं और ब्रिटेन में कई मीडिया संस्थानों से जुड़ी रहीं। ब्रिटेन के प्रतिष्ठित द गार्डियन समाचार पत्र से उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त किया है. वे ईटीवी भारत की नेशनल ब्यूरो प्रमुख भी रही हैं और हाल ही में उनका उपन्यास ‘ए हाउस ऑफ बटरफ्लाइज़ : स्टोरी अबाउट ए विमेन्स हॉस्टल’ प्रकाशित हुआ है।)
