आजी से सुनते थे कि फलाना इतने कोस पैदल चलकर अपने बेटी के यहां जाते थे तो चिलना उतने कोस चलकर पहुनाई करते थे। यह बात हमारे लिए किसी ब्रेकिग न्यूज़ से कम न थी। जब समझने-बूझने लायक हुये तो गांव में साइकिल की पहुंच हो चुकी थी, कुछ एक घर में मोटरसाइकिल भी थी। आज सैकड़ों मील या कोस चलने की बात सुनते ही सांस फूलने लगती है। हम सोच ही नहीं सकते कि कोई इतनी दूरी चलकर तय कर सकता है। विकास के कुचक्र ने हमें अपनी गिरफ्त में इस कदर ले लिया है कि उससे इतर चीजें संशय पैदा करती हैं। जब ये आधुनिक साधन नहीं थे तब भी लोग आते-जाते थे। अधिकांश यात्राएं पैदल ही हुआ करती थीं। तब और अब में अंतर सिर्फ इतना है कि तब मनमर्जी थी और आज मजबूरी है।
टीवी में, अखबारों में जो तस्वीरें आप और हम देख रहे हैं। ऐसा दृश्य हमारी पीढ़ी ने इससे पहले कभी नहीं देखा था। सड़कों पर, रेल की पटरियों पर चलती हुई भीड़। जिनमें बच्चे, बूढ़े महिलाएं आदि शामिल हैं। माथे पर मोटरी-गठरी, बगल में बच्चे लिए एक अनजाने डर से अनथक चले जा रहे हैं। ये वही भीड़ है जो बरस पहले अपने गांव से निकलकर शहरों में आयी थी। एक सपना लेकर, एक उम्मीद लेकर। उन्हें क्या पता था कि ऐसा भी कोई दिन आएगा? जिन वजहों से उन्होने गांव छोड़ा था, वही वजह उन्हें वापस गांव की ओर पलायन करने को मजबूर कर रही है। गांवों से शहर की ओर पलायन आज के दौर में सामान्य सी बात हो गयी है, लेकिन जब शहर से गांव की ओर पलायन शुरू हो जाये तो यह गंभीर मसला बन जाता है। गांव से शहर की ओर पलायन का एक वजह थी नए संसाधनों की तलाश। संसाधन जिनसे जीवन की राह थोड़ी आसान हो जाये। इस देश में सरकार चाहे किसी की भी हो उसके केंद्र में मजदूर या किसान कभी रहा ही नहीं। सरकारी नीतियों व योजनाओं से वे हमेशा बाहर होते हैं। एक महामारी ने हमारी सारी नाकामियों को उजागर करके रख दिया। आधुनिक व शक्तिसंपन्न होने के दंभ को ज़मींदोज़ कर दिया। हमें घुटनों पर लाकर खड़ा कर दिया। जो यह सोचता था कि यह दुनिया उसी से चलती है। वह किसी नक्कारखाने में बैठा है। बड़े-बड़े शहर, ऊंची-ऊंची इमारतें, कल-कारखाने, फैक्ट्रियां, दैत्याकार मशीनें सब बंद पड़े हुए हैं। लेकिन किसान आज भी अन्न उपजा रहा है। मजदूर अब भी हैं इस दुनिया को आकार देने में। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिल रहा है?
इस अफरा-तफरी के माहौल में एक अंजाना डर सबके जेहन में पैठ गया है। यही सही वक्त है इस बात पर विचार करने के लिए कि अब तक जो हम कर रहे थे, अब तक जिस रास्ते पर चल रहे थे, क्या वह सही था? क्या अब हमें आगे सोचने की जरूरत है? आज जो लोग भीड़ की शक्ल में नजर आ रहे हैं, जिसके कंधों पर इस आधुनिक विकास की अट्टालिका खड़ी है। वे ही सर्जक है, वे ही इस संरचना के शिल्पी हैं। उनके हाथों ने ही इसे बनाया है, लेकिन यह दुनिया उनकी नहीं है। वे आज भी पलायन को मजबूर है, क्योंकि वे मजदूर है। इस महामारी के बाद जब स्थिति सामान्य होगी तो क्या फिर हम शहरों की ओर भागेंगे या फिर गांव को एक इकाई के रूप में विकसित करेंगे, जो अपने जीवन की तमाम जरूरतों को स्वयं पूरा कर ले। क्या हम ग्राम आधारित आर्थिक संरचना की ओर आगे बढ़ेंगे? यह एक बड़ा और बुनियादी सवाल है।
गांधी ने ग्राम आधारित जीवन की संकल्पना की थी। क्या उनके अनुयायी उस ओर कदम बढ़ाएंगे। गांव-देहात में तमाम तरह के प्राकृतिक संसाधन मौजूद है, बशर्ते उनका सही उपयोग किया जाए। दुनिया की भीड़ चाल में चलते हुए हमने औद्योगिक विकास को ही सब कुछ मान लिया था लेकिन क्या विकास का पैमाना सिर्फ उद्योग है? क्या कृषि विकास का पैमाना नहीं बन सकती? हमारे देश में खेती के लिए उपजाऊ जमीन है, नदियों का देश है ये। लेकिन फिर भी आज हमारे यहां किसान आत्महत्या करने को मजबूर है। क्योंकि उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। फसल किसी आपदा के कारण नष्ट हो जाए तो उन्हें उसका हर्जाना नहीं मिलता। किसान सूदखोरों और बैंकों के कर्ज तले दबे जाते हैं। उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उद्योगपतियों के कर्ज माफ हो सकते हैं तो फिर किसानों के क्यों नहीं।
दरअसल, कृषि के बरक्स औद्योगिक विकास को इसलिए तरजीह दी गई ताकि उन्हें सस्ते मजदूर मिल सके। जो पहले किसान हुआ करते थे, वे आज शहरों में मजदूरी करते हैं। जो पहले अपनी मर्जी के मालिक थे, वे आज दूसरों के इशारे पर चलते हैं। यह बदलाव स्वाभाविक नहीं है, बल्कि पूंजीवादी संरचना की संतति है। आज जरूरत है कि सरकारें भी यह सोचें कि जो लोग शहरों से गांव की ओर वापस आ रहे हैं उनके श्रम का उपयोग किस तरह से किया जाये। उन्हें गांव में कैसे रोका जाये। इसके लिए जरूरी है कि ग्राम आधारित नीतियां बनें और योजनाएं लागू की जाएं।
इस बीच झारखंड सरकार ने तीन नयी योजनाएँ लागू करने की घोषणा की है- पहला,बिरसा हरित ग्राम योजना, दूसरा खेल विकास योजना, तीसरा जल समृद्धि योजना। ये तीनों योजनाएं ग्रामीण स्तर पर लागू होंगी। बिरसा हरित ग्राम योजना के अंतर्गत पांच लाख परिवारों को सौ-सौ फलदार पौधों का पट्टा दिया जाएगा। राज्यभर में ऐसे पांच करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वैसे पेड़ लगाने की योजना पहले भी लागू होती रही है लेकिन इस योजना में पांच साल तक पेड़ों को सुरक्षित रखने और उसके बाद उसके लिए उपर्युक्त बाजार उपलब्ध कराने की भी बात की गयी है। इन पेड़ों के रखरखाव का जिम्मा ग्रामीणों के हवाले होगा। जिससे उन्हें 50 हजार प्रतिवर्ष निश्चित आमदनी भी होगी और तीन वर्ष बाद जब पेड़ों में फल आने लगेंगे तो उसकी आमदनी भी ग्रामीणों की होगी।
इसी तरह खेल विकास योजना में ग्रामीण बच्चों के लिए खेल के मैदानों का निर्माण और उनके प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना और खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया है। जल समृद्धि योजना के तहत दस करोड़ मानव दिवस का सृजन और पांच लाख एकड़ बंजर भूमि का कृषि के लिए संवर्धन किया जाएगा। राज्य में सूखे की स्थिति को देखते हुये जल स्तर को बढ़ाने के लिए जल संरक्षण की विभिन्न संरचनाओं का निर्माण किया जाएगा। झारखंड सरकार की ओर से यह एक सार्थक पहल है जो ग्राम आधारित अर्थनीति को मजबूती प्रदान करेगी। जो लोग शहरों से गाँव की ओर आ रहे हैं उन्हें गाँव में ही उचित संसाधन एवं श्रम का उचित मूल्य मिल जाये तो शहरों की भीड़ भी कम होगी। आने वाले समय में गांव बेहतर विकल्प के रूप में उभर सकता है। आवश्यकता है उसे सही दिशा देने की। उम्मीद है कोरोना के उत्तरकाल में हमारे सोचने की दिशा बदले और हम फिर से गांवों की ओर उन्मुख हों।
(विभागाध्यक्ष (हिंदी) गरुबथान गवर्नमेंट कॉलेज कालिम्पोंग, पश्चिम बंगाल।)




