कोरोना से बचे भी तो भी भ्र्ष्ट प्रशासन और जेसीबी वाले मुखिया जी से कैसे बचेंगे प्रवासी मजदूर

विनोद कुमार मिश्रा

वरिष्ठ पत्रकार

प्रवासी मजदूरों के सड़क यात्रा ,रेल यात्रा और अब हवाई यात्रा ने बिहार की उलझने बढ़ा दी है। पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना महामारी से निपटने के लिए एड़ी चोटी का दम लगा रही है भारत अपने संसाधनों और सूझ बुझ से अबतक इस महामारी से लड़ते हुए संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जूझते हुए दिख रहा है लेकिन कोरोना के हॉरर कथा की जगह इनदिनों सडकों पर संघर्ष करते हुए मजदूरों की कहानी ने ले ली है। अन्य राज्यों की तरह तक़रीबन 28 लाख मजदूर अपने घर बिहार लौट रहे हैं 15 लाख प्रवासी बिहारी मजदूर अपने गाँव पहुंच गए है जहाँ वे आज अपने ही गाँव में अनजान बने हुए हैं । सरकार के सामने चिंता अभी इनके कोरेन्टाइन की है लेकिन कल इनकी रोजी रोटी भी बड़ी समस्या होगी और साधन सिर्फ मनरेगा है। यानी ग्रामीण रोजगार का वही करप्ट मॉडल जो पिछले 15 वर्षों से ग्रामीण रोजगार की फर्जी सांख्यकी देकर करोडो अरबो रूपये की संस्थागत लूट का अड्डा बना हुआ है।

कोरोना महामारी और दो महीने से ज्यादा लॉक डाउन के बीच तबाह हुए अर्थव्यवस्था और लोगों के रोजगार की रफ़्तार को बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में 20 लाख करोड़ रुपया पंप करने की कोशिश की है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए अपने जी डी पी के 10 फीसद को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना मोदी सरकार का मजबूत कदम माना जा सकता है लेकिन जब ग्रामीण रोजगार और लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने अपने गाँव में रोजगार दिलाने के लिए अगर वित्त मंत्री सीतारमण के पास मनरेगा ही आईडिया है तो माना जा सकता है सरकार के पास रोजगार देने की सही तस्वीर नहीं है। मौजूदा पैकेज में भारत सरकार ने मनरेगा में 65 फीसद की बढ़ोतरी देते हुए एक लाख करोड़ रूपये से ज्यादा अलॉट किया गया है। राहुल गाँधी इस फैसले से इसलिए इतरा रहे हैं कि मोदी सरकार को कांग्रेस के बताये रास्ते को ही चुनना पड़ा है लेकिन ज़रा इस योजना की हकीकत देखिये।

मौजूदा दौर में ग्रामीण रोजगार के इस महात्मा गाँधी सुराज मॉडल में मजदूरों की जगह जे सी बी मशीन और ट्रैक्टर्स ने ले ली है। मिटटी अब मजदूरों की जगह जे सी बी मशीनों से काटी जाती है और ट्रैक्टर्स से इसे ढोया जाता है। यानी 1 घंटे के जे सी बी मशीन किसी एक मजदूर के 800 वर्कडे के बराबर काम कर लेता है। यानी महज 1000 रुपया खर्च करके इलाके के मुखिया /सरपंच महज एक दिन के काम में हजारों रूपये अपने लिए बचा लेते हैं और घर बैठे मजदूरों को इसका मिनिमम शेयर देकर बांकी पैसा सिंडिकेट में बाँट लेते है। बिहार जैसे राज्यों में जहाँ मिटटी खोदने और उठाने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं है। लॉक डाउन से पहले अगर बिहार झारखण्ड जैसे राज्यों में बेरोजगारी तक़रीबन 47 फीसद है ,इस हालत में मनरेगा और जे सी बी वाले मुखिया कितने लोगों को रोजगार गारंटी दे सकते हैं। खास बात यह है कि राजनीतिक दलों के फूट सोल्जर्स के लिए मनरेगा कमाई का सुलभ जरिया है इसलिए इस भ्र्ष्ट व्यवस्था और करप्ट प्रैक्टिस का कहीं विरोध नहीं है।

दिल्ली से बिहार गए कुछ मजदूरों से मैंने उनका हालचाल जाना ,रोजी रोटी के बारे में मैंने पूछा तो उसका सपाट जवाब था कुछ नहीं है यहाँ। मैने उसे मनरेगा के बारे में पूछा तो उनका जवाब था अब कोई मजदूर मिटटी नहीं काटता यह काम अब मुखिया अपने जे सी बी मशीन से करता है और अपने चहेते लोगों का जॉब कार्ड दिखाकर पैसा खुद पॉकेट कर लेता है। यह कैसे संभव है मैंने पूछा ? उन लोगों का जवाब था कि मजदूरों के जॉब कार्ड मुखिया अपने पास रखता है यह उसपर निर्भर है कि वह कब और किसे काम दे। पहले एक कार्ड में कई अंगूठे लगे होते थे जिसमे दो अङ्गूठे मुखिया के लोगों के भी होते हैं जो मजदूरों के पैसे बैंक और पोस्ट ऑफिस से निकाल सकते थे। अब चूँकि यह मोदी जी डिजिटल पेमेंट में चला गया है लेकिन काम से पहले विदड्रा फॉर्म पर साइन ले लिया जाता है। एक मजदूर बताता है कि बिहार में लोग कोरोना से नहीं भूख और भ्रष्टाचार से मर जाएंगे।
अररिया में एक प्रवासी की पैरवी में व्यस्त स्थानीय बीजेपी नेता कामेश्वर चौपाल जी बताते हैं कि जिस बिहार में कोरोना महामारी के बीच राशन और सहयता सामग्री बाटने में लूट हो और 200 से ज्यादा मुखिया और सरपंच पर मुक़दमा दर्ज हुआ हो वहां रोजगार और सामजिक कल्याण की बात बेमानी है.. कामेश्वर जी कहते हैं कि भारत सरकार के ग्रामीण विकास और समाज कल्याण योजना को अगर बगैर भ्रष्टाचार के जमीन पर लाया जाय तो लाखों के जीवन में खुशहाली आ सकती है लेकिन करप्ट नौकरशाही और भ्रष्ट ग्रामीण व्यवस्था के बीच सारा पैसा कुछ लोगों में बट जाता है।

पिछले 40 वर्षों में देश के विकास की रफ़्तार शहरों तक ही केंद्रित रही जाहिर है गरीब राज्यों से बड़ी तादाद में लोगों का पलायन शहरों की ओर हुआ। बिहार उत्तर प्रदेश ,झारखण्ड ,ओडिशा जैसे राज्यों में राजस्व का श्रोत यही प्रवासी मजदूर हो गए जिनका राज्यों के राजस्व में १८ -20 फीसद का योगदान था। हैरानी की बात यह है इन राज्यों में लगातार सामाजिक न्याय की ही सरकार बानी लेकिन त्रासदी यह है कि इस दौर में रोजी रोटी के लिए गरीब मजदूरों को अपना घरबार छोड़ना पड़ा।
आँध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री को किसी ने जब मनरेगा में व्यापत भ्रष्टाचार के बारे में पूछा तो उनका जवाब था कि पैसा राज्य में आ रहा यह प्राथमिकता है किसके पास जा रहा है यह नहीं सोचना क्योंकि इसे खर्च इसी राज्य में होना है।

10 फीसद की जी डी पी के दौर में सोनिया जी की पर्सनल कैबिनेट ने एन ए सी ने ग्रामीण रोजगार के नाम पर मनरेगा लाया था और तर्क दिया गया कि ग्रामीण भारत में लोग खर्च करेंगे तो देश का जी डी पी बढ़ेगा। लाखो करोड़ रूपये भ्रस्टाचार की भेट सिर्फ लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए अगर अबतक किया गया है तो यकीन मानिये सांसद और विधायक निधि के नाम पर हर साल अरबो रूपये की लूट देश की समृद्धि में कहीं न कही योगदान देता होगा। दुनिया भर से कामगार और मजदूर अपने अपने शहर गाँव लौट आये हैं। अर्थव्यवस्था वैसे ही पटरी से उत्तरी हुई है… यह नव निर्माण का समय है,इसमें कुछ नया सोचने की चुनौती है जिसमे मनरेगा जैसे मॉडल और भ्रष्टाचार जारी रहते हैं तो यकीन मानिये उस मजदूर की बात सच होगी जिसने कहा था कोरोना इस देश का कुछ नहीं बिगाड़ सकता यहाँ इससे ज्यादा लोग हर साल मरते हैं इस भ्रष्टाचार की महामारी को रोकिये जो इस कोरोना में बिहार जैसे राज्यों में लाखों लोगों का जीवन छीन लेगा।

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