जीत के मद्देनजर गोटी भिड़ा रहे हैं पंचायत चुनाव के संभावित दावेदार

आलोक रंजन

बनारस: उत्तर प्रदेश में गंवई सरकार यानी पंचायत चुनाव का बिगुल बज जाने से गांव के प्रधानों की धड़कने बढ़ गई हैं। सभी अपनी-अपनी सीट बरकरार रखने के लिए हर तरह के जतन कर रहे हैं। वोटरों को भी खुश करने का हर संभव प्रयास किया रहा है। हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है। दावेदार प्रधानी की कुर्सी पाने के लिए हर जतन कर रहे हैं। पांच साल तक लोगों का हाल चाल न लेने वाले अब प्रधान बनने की होड़ में लोगों का दुख दर्द पूछे जा रहे हैं। दुख बांटने का ईरादा अभी भी नहीं है लेकिन दिखावा तो करना ही होता है।
अब सिर्फ दुख दर्द जानने से क्या होता है? रणनीति तो बनानी ही होती है। यही कारण है कि पंचायत के विभिन्न पदों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार हर तरह की चुनावी रणनीति बनाकर अपने विरोधियों को पटखनी देने के लिए शतरंज की बिसात बिछाने में मशगूल हो गए हैं।


कहते हैं ​न कि अकेले चना भाड नहीं फोर सकता। प्रधान के उम्मीदवारी का मंसूबा रखने वाले भी इस बात को बखूबी समझते हैं। यही कारण है कि उम्मीदवार साझी रणनीति के तहत ऐसी योजना बना रहे हैं, ताकि चुनाव में जीत भी जाए और विरोधियों को भी करारा जवाब दिया जाए। इतना ही नहीं उम्मीदवार मतदाताओं को ऐसे प्रलोभन में भी फंसाने का दाव खेल रहे हैं ताकि काम भी बन जाए और मतदाता भी खुश रहे। संसद और विधानमंडलों की राजनीति जब जातीवादी गणित से अलग नहीं है तो भला पंचायत चुनाव कैसे हो सकता है। यही कारण है कि पंचायत चुनाव में जातीवादी कार्ड जम कर खेलने की तैयारी है। कुछ स्वार्थी तत्व जातिवाद का जहर घोल कर माहौल के समीकरण बिगाड़ने में जुट गए हैं। चुनाव की तिथियां भले ही घोषित न हुई हो लेकिन पद के दावेदारी गुर-गोटियां बिछाने में लगे हुए हैं।
दूसरी तरफ यदि मतदाताओं की बात करें तो भारतेंदू हरिश्चंद्र की कविता की वो पंक्ति याद कर रहे हैं

रोअहू सब मिलिकै आवहु भारत भाई।
हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई ।।

यानी मतदाता एन चुनाव के मौके पर गांव की दुर्दशा की कथा लेके बैठ गये हैं। किसी तो सड़क याद आ रही है तो किसी को शौचालय, तो किसी को याद आ रहा है प्रधान जी का वह वादा जो उन्होंने पिछले चुनाव के वक्त किया था। यही कारण है कि ग्रामीण इस बार सोच समझकर मतदान करने की बात कर रहे हैं।
विभागीय स्तर पर तैयारियां जोरों पर है। नियमानुसार देखें तो ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 दिसंबर को ही पूरा हो गया है। आयोग ने मतदाता सूची के पुनर्रीक्षण का कार्यक्रम घोषित कर दिया और एक अक्टूबर से ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य शुरू हो गया। हाईटेक बीएलओ एंड्रायड मोबाईल के साथ घर-घर जा रहे हैं। स्वाभाविक है प्रधान जी भी इस काम में लग गये हैं कि समर्थकों के घरों का कोई वोटर बनने से वंचित न रह जाए। उम्मीद की जा रही है कि चुनाव की तिथी मार्च में निर्धारित किया जाए। क्योंकि मई में बोर्ड प​रीक्षाओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री द्वारा विभाग को यह निर्देश दिया गया है कि हर हाल में चुनाव स्कूली परीक्षाओं से पहले ही करा लिया जाए। कोरोना महामारी के कारण 6 माह से अधिक का समय निकल गया। यह वर्तमान प्रधानों के लिए नुकसान दायक साबित हुआ है। ऐसा नहीं है कि इस दौरान कोई कामकाज नहीं हुआ। काम तो हुए लेकिन प्रधान में मनमाफिक ऐसे काम नहीं हो पाए जिससे उनका कोर वोटर उनके साथ बना रहता और चुनाव में वोट की फसल काटी जाती। यदि स्थिति सामान्य होती तो प्रधान के हिसाब से काम होते अब चुनावी वर्ष में वोटों के गणित के हिसाब से काम न हो पाना प्रधानों को भारी पड़ रहा है। समस्या यह भी है कि अब उनके पास इतना समय भी नहीं बचा है कि कुछ लाभ करा सकें।


ऐसे में वोटरों को अपने पक्ष में बनाए रखना भारी चुनौती साबित हो रहा है। जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा है यह चुनौती और भी बढ़ती चली जा रही है। पहले यह लग रहा था कि शायद यह चुनाव मई-जून तक हो और उस समय तक परिस्थितियां बदल जाएंगी,लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। विभागीय तैयारियों से यह साफ संकेत मिल रहा है कि चुनाव जल्दी हो जाएगा और चुनावी प्रक्रिया मार्च अप्रैल तक समाप्त हो जाएंगी। यह आशंका प्रधानों की धड़कने बढ़ाने के लिए काफी है।
अब यदि जमीनी हकीकत की बात करें तो पंचायत सदस्यों और ग्राम पंचायत के प्रधानों ने कार्यकाल तो पूरा कर लिया है लेकिन गांव की स्थिती में कोई व्यापक बदलाव नहीं आया है और समस्या जस की तस बनी हुई है। शासन ने ग्राम विकास में जहां करोड़ों रूपये ग्राम पंचायतों को दिए, पैसा तो खर्च हो गया परंतु रास्ते ज्यों के त्यों बने रहे। सदस्यों व प्रधानों ने लोगों की समस्या पर कम अपने विकास पर ज्यादा ध्यान दिया। कई गांव ऐसे हैं जहां आज भी लोगों का निकलना मुश्किल है। सड़कों पर नालियों की पानी बजबजा रही है।
पंचायत चुनाव में महिलाओं को मिले आरक्षण का लाभ लेकर अशिक्षित या कम पढ़ी लिखी महिलाएं प्रधान तो बन जाती हैं। लेकिन इसके बाद 5 साल तक घूंघट में रहती हैं। घरेलू महिलाओं को आरक्षण के चलते चुनाव जिताकर उसे घर की चहार दिवारी तक ही सीमित रख उनके पति पुत्र बतौर प्रतिनिधि पंचायत चलाते हैं।
सोशल मीडिया का भी पंचायत चुनाव में जम कर सहारा लिया जा रहा है। इससे कोरोना काल में उन्हें मिलने और घर-घर जाने का जोखिम भी नहीं उठाना पड़ रहा है। सोशल मीडिया माध्यमों मसलन फेसबुक और व्हाट्सएप्प ग्रुप के जरिए लोगों को जोड़कर अपने पाले में करने का जतन किए जा रहे हैं। इनमें युवा प्रत्याशी और उनके समर्थक ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं। यही कारण है सोशल मीडिया पर मतदाताओं को लुभाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। हालांकी गांव में चाय के चुस्कियों के साथ घरों से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर चुनावी चर्चा तेज है। जीत के दावे और प्रति​द्वंदियों को हर कीमत पर पछाड़ने के दावे के साथ प्रधानी की इच्छा लिए नये-नये नाम सामने आ रहे हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *