हाय—हाय मोदी..मर जा…..,मनाइ गई लोहरी,जली कृषि बिल की कॉपियां,सुशील मोदी… प्रति आंदोलनकारी 10 हजार रूपये का खालिस्तानी फंड,क्यों चुप है राहुल गांधी

पंचायत खबर टोली

नयी दिल्ली/पटना: कहते हैं कि रोम जल रहा था नीरो बांसुरी बजा रहा था लेकिन यहां देश जगा रहा है,सरकार भी जग रही,सर्वोच्च अदालत भी जगी हुई है और जगा हुआ इन सर्द रातों में दिल्ली के विभिन्न बोर्डरों पर देश का अन्नदाता। जलाई जा रही है कृषि बिल की कॉपियां जिसके वापसी की मांग को लेकर सड़क घमासान मचा हुआ है। मौका है लोहरी जैसे पावन पर्व का। लेकिन निशाने पर नरेंद्र मोदी है। नाच भी हो रहा है और गान भी। नारे ऐसे जो देश को शर्मशार कर दे। हाय..हाय मोदी..मर जा मोदी जैसे बोल। कुछ यही आलम है किसान आंदोलन जिसके विषय में देश सर्वोच्च अदालत ने यह कहते हुए आशंका जताई थी कि अब तक तो आंदोलन शांतिपूर्ण है लेकिन यदि आंदोलन हिंसक हो गया तो इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा। और जिम्मेवारी समझते हुए सर्वोच्च अदालत ने चार विशेषज्ञों की कमिटी बना दी। कमिटी को निर्देश दिया कि 10 दिन में काम शुरू करें और दो माह रिपोर्ट दें। लेकिन ये कमिटी भी विवाद में आ गई। किसान संगठनों ने कहा इसमें तो वही लोग शामिल हैं जो कल तक सरकारी कृषि बिल के समर्थन में खड़े थे। इसके साथ यह भी कहा गया कि हम तो सरकार से बातचीत कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता तो मांगी भी नहीं थी।


कुल मिला के कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर 50 दिन से चल रहा किसान आंदोलन कृषि कानून को जलाकर लोहरी मनाई गई। सिंघु बोर्डर पर किसान संगठनों एक लाख कॉपियां जलाने का दावा किया।


भविष्य की रणनीति पर विचार
इसके साथ सुप्रीम कोर्ट की कमिटी पर सवाल खड़ा कर चुके इन​ किसान नेताओं ने भविष्य में आंदोलन को तेज करने के एक महत्वपूर्ण बैठक की। कहा गया कि सरकार के साथ 15 जनवरी को होने वाले पूर्व निर्धारित बैठक की तैयारी की जा रही है साथ ही साथ 18 जनवरी को महिला किसान दिवस, 20 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जयंती मनाने और 23 जनवरी को राजभवनों पर प्रदर्शन का एलान ये ​किसान नेता ही कर चुके हैं। लेकिन जिस बात पर अभी भी संशय बना हुआ है वो 26 जनवरी। सरकार भी चिंतित है, ​सुप्रीम कोर्ट भी, पुलिस प्रशासन भी और देश भी कि किसान संगठनों द्वारा घोषित 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम का क्या होगा? स्वाभाविक है इसे लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हुई है और किसान संगठनों के बयानबाजी की वजह से कयासों का दौर जारी है आशंका के बादल मंडरा रहे हैं। कहा जा रहा है कि 15 जनवरी को सरकार के साथ होने वाली बैठक के नतीजों के बाद 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च पर कोई पुख्ता फैसला लिया जाएगा। इस बीच पंजाब और हरियाणा में इसको लेकर तैयारी की जा रही है। अलग-अलग किसान संगठनों से जुड़े नजदीकी सूत्रों भी इनके हवाले से अलग-अलग दावे कर रहे हैं। कहा जा रहा है किसान नेता 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकालने की पूरी कोशिश करेंगे हालांकि उनका मकसद राजपथ पर निकलने वाले परेड में बाधा डालना नहीं है। इस बीच किसान नेता राकेश टिकैत ने एक बार फिर से कहा है कि 26 जनवरी को देश में टैंक और ट्रेक्टर एक साथ चलेंगे, बिल वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं होगी। 2024 तक आंदोलन चलाना पड़े तो भी चलेगा। देश भर में अलग-अलग राज्यो में 23 जनवरी को राज्यपाल से मुलाकात कर ज्ञापन दिया जाएगा। राज्य का एजेंडा सामने रखा जाएगा।
गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में ट्रैक्टर परेड को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। इन सब के बीच सिंघु बॉर्डर पर सुरक्षा का जायजा लेने पहुंचे दिल्ली पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने कहा कि 26 जनवरी में अभी समय हैं लेकिन उस दिन वैसे भी विशेष सुरक्षा व्यवस्था रहती है। यानी 26 जनवरी को दिल्ली में किसानों के ट्रैक्टर परेड को लेकर अब तक ना ही किसान संगठनों ने पूरी योजना बताई है ना ही पुलिस ही बता रही है कि अगर परेड को रोका जाएगा तो कैसे? कुल मिला के यही लगता है कि अभी असमंजस की स्थिती है।


सुशील मोदी दिखे आक्रामक

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और हाल ही राज्यसभा के लिए बिहार से चुन कर आये सुशील मोदी ने आज किसान आंदोलन पर चौतरफा हमला बोला। एक तरफ उन्होंने किसान आंदोलन के बहाने विपक्ष पर निशाना वहीं यह आरोप भी लगाया कि कनाडाई मूल का खालिस्तानी संगठन दिल्ली के किसान आंदोलन को पैसे के दम पर खड़ा रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए 10 हजार रूपये दिए जा रहे है। हालांकि सुशील मोदी यह कहने से भी नहीं चू​के कि कांग्रेस, आरजेडी और वामदल किसान आंदोलन का अंध-समर्थन कर उन्हे भड़काने का काम कर रहे हैं। उन्होंने राहुल गांधी से सवाल किया कि आंदोलन की खालिस्तानी फंडिंग और पीएम मोदी को धमकी पर वे चुप क्यों रहे? उनकी दादी इंदिरा गांधी को खालिस्तानी उग्रवाद के चलते बलिदान देना पड़ा था, राहुल गांधी इसे क्यों भूल जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वास्तविक अन्नदाता आज भी खेतों में है, जबकि दिल्ली में किसान के नाम पर भारत विरोधी जमावड़ा चल रहा है। सुशील मोदी ने किसान संगठनों द्वारा इन कानूनों पर अंतरिम रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद आंदोलन करने के फैसले पर कहा कि अदालत की पहल से बनी विशेषज्ञों की समिति पर भरोसा करने और उसके समक्ष अपना पक्ष रखने से किसान संगठनों ने इनकार कर दिया है। इससे जाहिर होता है कि वे दरअसल समाधान नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राजनीतिक बैर निकालने वाली देशी-विदेशी ताकतों का हथियार बने रहना चाहते हैं। इससे साबित होता है कि वे देश की न्याय प्रक्रिया का रत्ती भर सम्मान नहीं करते, बल्कि राजनीतिक मकसद से न्यायपालिका का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

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