
हम्पी (कर्नाटक): दिनभर हम बिना विश्राम किए हम्पी की ऐतिहासिक धरोहरों का भ्रमण करते रहे। दरअसल विजयनगर साम्राज्य की ध्वस्त राजधानी के इतने भग्नावशेष हम्पी में बिखरे पड़े हैं कि उन्हें अच्छी तरह देखने के लिए एक सप्ताह का समय चाहिए। हमारे पास केवल डेढ़ दिन का समय था। सो संग्रहालय को अगले दिन के लिए छोड़कर अति महत्त्वपूर्ण अवशेषों का अवलोकन करवा देने का आग्रह हमने अपने गाइड से किया।
चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य समृद्धि की दृष्टि से प्राचीन रोमन साम्राज्य के बाद विश्व में दूसरे नंबर पर था। यह हिंदू राजवंश सर्वधर्म समभाव में विश्वास करता था। अतः राजधानी के कई भवनों में इस्लामिक और बौद्ध वास्तुकला का उपयोग किया गया था। राजवंश विष्णु, शिव और शक्ति का उपासक था; सम्पूर्ण हम्पी क्षेत्र में नारायण के दशावतार, शिव जी और नंदी महाराज के भग्नावशेष भरे पड़े हैं।
नवरात्रि और दशहरा की पूरे कर्नाटक में समृद्ध परम्परा है। राजधानी में मुख्य राजमहल परिसर में एक विशाल मंडप नवरात्रि और दशहरा उत्सव मनाने के निमित्त बनाया गया था। यहाँ राजा, रानी, अमला, कर्मचारी और अतिथि –सब के लिए अलग- अलग परिसर बने थे जिन्हें मजबूत ऊँची दीवारों से घेरा गया था। सभी परिसरों में विभिन्न देवी – देवताओं के मन्दिर थे। विजयनगर वाले हाथी, घोड़ा और ऊंट का उपयोग अधिक करते थे। हाथी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध थे। ऊंट राजस्थान से और घोड़े अरब व मंगोलिया से विदेशी व्यापारी लेकर आते थे और यहां से सोना, हीरा लेकर जाते थे। ’हॉर्स ट्रेडिंग’ के लिए यहाँ एक बड़ा बाजार था। राजपरिवार और आमजन के विभिन्न समारोहों में उपयोग के लिए अलग- अलग मंडपों का निर्माण किया गया था। मुख्य सड़कों के किनारे अलग- अलग जिंसों के लिए अलग – अलग कतारबद्ध बाजार थे। यहाँ तक कि पान – सुपाड़ी का भी अलग बाजार था यहां। लगभग सभी भवनों का आधार तो अन्य की तरह पत्थरों से बना था, पर ऊपरी रिहायशी या मंडप वाला हिस्सा चन्दन की लकड़ी से बनाया गया था।
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सभी निर्माणों में आसपास के पहाड़ों में बहुतायत से उपलब्ध अत्यंत मजबूत ग्रेनाइट पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। ग्रेनाइट पत्थर के विशालकाय ढाँचों, स्तंभों और महीन कारीगरी, वह भी बिना मशीन के; मनुष्य के संकल्प, पराक्रम, पुरूषार्थ और समर्पण की पराकाष्ठा के जीवन्त प्रमाण हैं। यहाँ के अवशेषों के बारे में कहने को तो बहुत कुछ है, इतना कि एक किताब बन जाए। संक्षेप में यह कि विजयनगर साम्राज्य की सम्पन्नता ही इसका काल बन गई। लूटपाट की कई छोटी घटनाओं के बाद 1565 ईस्वी में आदिलशाह (जिसके इस राजवंश से दोस्ताना संबंध थे।) की रहनुमाई में मुस्लिम आक्रांताओं ने राजधानी पर निर्णायक आक्रमण किया। विजयनगर के तत्कालीन राजा रामाराव की सेना में तीन लाख सैनिक थे जिनमें से अधिकांश मुस्लिम सैनिक दुश्मनों से मिल गए। हिंदू राजा रामाराय हार गए। आदिलशाह के हुक्म पर उनका शिरोच्छेद करके महलों और मंदिरों को लूट लिया गया। मूर्तियों को विखंडित कर दिया गया। महलों और मंदिरों को तबीयत भर रुककर महीनों तक जलाया गया।
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आज हम्पी के उन भग्न मंदिरों में पूजा नहीं होती। केवल एक जीवित मन्दिर विरूपाक्षी है। कहते हैं कि इस मन्दिर पर आक्रमण के मार्ग में वाराह के आ जाने से आदिलशाह लौट गया था। इसी तरह उस नृशंस के प्रकोप से कुछेक वैसे भवन बच गए जिनमें इस्लामिक वास्तुकला का उपयोग किया गया था। हम चारों ने जब अपने कुलदेवता भगवान नृसिंह की खण्डित मूर्ति देखी तो अन्दर तक सिहर उठे!
विजयनगर साम्राज्य के भग्नावशेषों के अतिरिक्त किष्किंधा क्षेत्र होने के कारण पौराणिक दृष्टि से भी हम्पी का आध्यात्मिक महत्त्व है। बाली- सुग्रीव से सम्बद्ध ऋष्यमूक पर्वत, तुंगभद्र नदी, हनुमान जन्मस्थल अंजना पहाड़ आदि के कारण यह हिन्दुओं का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल भी है, क्योंकि भगवान श्री राम इस भूमि के ऋणी हैं।
इस प्रकार की ऐतिहासिक धरोहरों के अवलोकन के बाद मेरा मन तीन बातों के लिए बहुत कचोटता है। पहली तो यह कि उन इस्लामिक आक्रांताओं का इन मन्दिरों और मूर्तियों ने क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने इन्हें खोज-खोजकर खंडित कर दिया?
दूसरी यह कि हमें कितना गलत इतिहास पढ़ाया गया है! बकौल बहू सौम्या — नेहरू जी ने जेल से पुत्री इंदिरा को जो पत्र लिखे थे, उनमें उनकी सीमित जानकारी के अनुसार भारत का जो इतिहास दर्ज है, बस उतना- सा ही स्कूल – कॉलेजों के पाठ्यक्रम में दर्ज कर दिया गया है। चोलवंश (2100 वर्ष), अहोमवंश (700 वर्ष), चालुक्यवंश (700वर्ष), पल्लववंश (600 वर्ष), राष्ट्रकूटवंश (500 वर्ष), विजयनगर (400 वर्ष), गुप्तवंश और मौर्यवंश सहित अन्य राजवंशों के इतिहास से वंचित रखकर हमें केवल मुगलवंश (200 वर्ष) के इतिहास में उलझाकर छोड़ दिया गया है।
दर्जनों ऐतिहासिक महानायकों को अंधेरी कोठरी में छुपाकर अकबर को महान घोषित कर दिया गया है। अचंभित करने वाली धरोहरों की चर्चा नहीं करके दुष्प्रचार द्वारा केवल ताजमहल की मार्केटिंग की गई है।तीसरी यह कि कर्नाटक सहित अन्य राज्यों ने अपनी ऐतिहासिक विरासतों को किस प्रकार विकसित और सुविधायुक्त करके पर्यटन केन्द्र बना दिया है। ये सभी स्थल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करके हजारों लोगों को रोजगार देकर अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय भागीदारी करते हैं। और हमारे प्रदेश के मुखिया जी ने विक्रमशिला महाविहार जैसी धरोहर को नरक बनाकर छोड़ दिया है। उनके लिए जातीय जनगणना सबसे जरूरी काम है।
यदि आपको भारत के इतिहास में रुचि है और आप देशाटन के शौकीन हैं तो हम्पी भ्रमण के बिना आपका अनुभव अधूरा है। एक बात और कि यहां के लोग बहुत अच्छे हैं; विनम्र, खुद्दार, मिलनसार, समझदार, मददगार, ईमानदार और… और…











