चढूनी के सियासी मंशा की भेंट न चढ़ जाये किसान आंदोलन, करोड़ों वसूलने व राजनीतिक साठगांठ के आरोप के पीछे है पुख्ता वजह..

मंगरूआ

चंडीगढ़: लगी को आग कहते हैं, बुझी को राख। एक बार आग लग गई तो लग गई। धुआं तो उठता ही रहेगा। दिल्ली के सभी बोर्डर घेर के हजारों की संख्या में पिछले 56 दिन से बैठे किसान भले ही सर्द भरी ठिठुरती रातों के गुजरने और नयी ​सुबह होने का एक-एक दिन इंतजार कर रहे हों लेकिन किसान नेताओं की विश्व​सनियता लगातार संदेह के घेरे में है। घर को आग लगी घर के चिराग से वाला मामला लगता है। एक तरफ इनपर राजनीतिक दलों से सांठगांठ के आरोप लगते रहे हैं। दूसरी तरफ देश को अस्थिर करने की मंशा रखने वाली खालिस्तान समर्थक विदेशी ताकतों की शह पर बड़े पैमाने पर फंड एकत्रित कर किसान आंदोलन के जरिए कोरोना महामारी के बाद भारत के विकास की रफ्तार को रोककर मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ाने की रही है।


इन दोनों विंदूओं पर आंदोलन पर गंभीर आरोप लग रहे हैं और किसान आंदोलन जो लगातार ये कहता रहा है कि ये किसानों का आंदोलन है जो नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा तीन कृषि बिल को पारित किये जाने के किसान विरोधी होने के कारण किसानों के आक्रोश की देन है,राजनीतिक दलों से इसका कोई लेना देना नहीं है। लेकिन जो तथ्य सामने आये हैं वो साफ तौर पर इस बात का संकेत दे रहे हैं कि पूरा का पूरा षड्यंत्र राजनीतिक दलों और वामपंथियों द्वारा पोषित किसान संगठनों का है।
वैसे तो कई नाम हैं लेकिन सबसे पहले चर्चा करते हैं भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के प्रधान गुरनाम सिंह चढूनी की। चढूनी पर आरोप है कि हरियाणा की भाजपा जजपा सरकार को गिराने के लिए उन्होंने एक डील किया है। इस डील के तहत चढूनी को न सिर्फ कांग्रेसी नेता से 10 करोड़ रुपए मिले हैं बल्कि उन्हें कांग्रेस का टिकट भी आफर हुआ है। बड़ी बात ये है कि ये आरोप ​खुद आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चा की बैठक में लगा है। भले ही चढूनी इस आरोप को खारिज कर रहे हैं लेकिन इस आरोप ने पूरे किसान आंदोलन के गैर राजनीतिक होने के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। चढ़ूनी पर यह भी आरोप लगा है कि उन्होंने किसान आंदोलन को राजनीति का अड्डा बना दिया है और वे लगातार कांग्रेसी और आम आदमी पार्टी के नेताओं से संपर्क में है।
रविवार को कन्सटीट्यूशन क्लब में किसान नेताओं ने बैठक बुलाई थी। इस बैठक में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और उदित राज समेत आम आदमी पार्टी और अकाली दल डेमोक्रेटिक के नेता भी शामिल हुए थे। चढ़ूनी पर आरोप है कि उन्होंने किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों का समर्थन मांगा, इससे संयुक्त किसान मोर्चा नाराज़ है।

साफ है स्थिती सरफुटौव्वल वाली है और जो बातें कल तक पर्दे के पीछे कही जा रही थी वो आरोप सार्वजनिक हो गया है। ऐसे में संयुक्त किसान मोर्चे ने आंदोलन की साख बचाने के लिए गुरनाम सिंह चढूनी को आंदोलन का संचालन करने वाली 7 सदस्यीय समिती से निलंबित किये जाने के साथ यह निर्णय भी लिया गया है कि उन्हें 19 जनवरी को को केंद्र सरकार से होने वाली बैठक से भी बाहर रखा जाएगा। हालांकि चढूनी के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए 4 सदस्य समिति बनाई गई है। समिति के सामने चढूनी को अपना पक्ष रखना होगा। जांच पूरी होने तक संयुक्त किसान मोर्चा की आंतरिक बैठकों और केंद्र सरकार के साथ होने वाली बैठक से चढ़ूनी बाहर रहेंगे।


चढूनी के उपर लगे आरोप के पीछे है ठोस वजह
ऐसा नहीं है कि गुरनाम सिंह चढूनी को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ सांठगांठ करने के आरोप बेवजह लग रहे हैं। इसकी ठोस वजह है। शांतीपूर्ण किसान आंदोलन का दावा कर रहे किसान संगठनों के दावे से इतर भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी की गतिविधियां शुरू से ही संदेहास्पद रही हैं। ये बात सही है​ कि किसान आंदोलन में चढ़ूनी ने बड़ी तादाद में हरियाणा के किसानों को एकजुट करने का काम किया है। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा से अलग—अलग चढूनी ने अपना अलग मोर्चा बना रखा है, अलग बैठकें करते हैं जिनमें राजनीतिक नेताओं के आने की कोई पाबंदी नहीं है। चढ़ूनी पर आरोप है कि उन्होंने न सिर्फ हरियाणा के बड़े कांग्रेसी नेता से बड़ी धनराशि ली अपितु वे लगातार कांग्रेसी व अन्य दलों के नेताओं से संपर्क में रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने 10, 14 और 17 जनवरी को दिल्ली में ‘किसान संसद’ के नाम पर कई राजनेताओं को बुलाया।
चढूनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगजाहिर
गुरनाम सिंह चढूनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें हैं यह किसी से छिपा नहीं है। चढूनी सियासत में भी हाथ आज़मा चुके हैं। वे पिछले साल बतौर निर्दलीय प्रत्याशी हरियाणा विधान सभा का चुनाव लड़ चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी पत्नी बलविंदर कौर भी आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं। ऐसे में जब उनपर अन्य किसान नेता कांग्रेस से 10 करोड़ रूपया लेने और सीट के लिए समझौता करने का आरोप लग रहा है तो इस आरोप को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता।


चढ़ूनी पर हिंसा भड़काने के हैं आरोप
इतना ही नहीं आंदोलन के दौरान इन पर हिंसा भड़काने के आरोप भी लगे हैं और इन पर हत्या के प्रयास समेत 8 धाराओं में केस दर्ज हो गया है। दायर एफआईआर में जनसमूह के साथ उपद्रव मचाने और वाहन चढ़ाकर हत्या करने की कोशिश करने व संक्रमण का खतरा फैलाने की धाराएं भी लगाई हैं। इतना ही नहीं चढूनी ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल के करनाल में आयोजित किसान सम्मेलन में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ कराई थी। मंच तोड़ दिए गये थे, मुख्यमंत्री के लिए बनाये गये हेलीपैड खोद दिया गया था। जब मुख्यमंत्री ने हिंसा के लिए चढूनी पर हिंसा और उपद्रव के आरोप लगाए तो चढूनी ने खुद आगे आकर ये स्वीकार किया कि हमने करनाल में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में उपद्रव कराया है और आगे भी करेंगे। भाषायी स्तर पर भी गुरनाम चढूनी के बोल बिगड़े हुए रहते हैं जब वे कहते हैं कि खट्टर के मरोड़ निकाल देंगे।
स्वाभाविक है चढूनी का कृत्य के किसान आंदोलन के शांतिपूर्ण होने के दावे से उलट था। जबकी किसान नेता हमेशा ये कहते रहे हैं कि उनका आंदोलन सरकार के खिलाफ है लेकिन वे किसी दल का समर्थन नहीं करते हैं। इसके विपरित गुरनाम सिंह चढूनी न सिर्फ आंदोलन में हिंसा भड़का रहे थे बल्कि कांग्रेसी नेताओं से करोड़ों की रकम वसूल कर मनोहर सरकार को अस्थिर करने और प्रदेश को हिंसा की आग में झोकने की रणनीति अपनाये हुए थे।


चढूनी ने कक्का जी के आरोप को नकारा
चढू़नी ने ​कथित तौर किसान नेता शिवकुमार कक्का जी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि “जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे संयुक्त किसान मोर्चा के नहीं हो सकते, बल्कि किसी व्यक्ति विशेष के होंगे। ये शिवकुमार सिंह कक्का जी के आरोप हैं। कक्का खुद आरएसएस के एजेंट हैं। वे लंबे समय तक आरएसएस के राष्ट्रीय किसान संघ के प्रमुख रहे थे। वे फूट डालकर राज करने की कोशिश कर रहे हैं।”
शिवकुमार कक्का जी ने कहा, ”संयुक्त किसान मोर्चा से निलंबन की कार्रवाई के कारण चढूनी ऐसा बयान दे रहे हैं। कक्का जी ने कहा कि कल की बैठक में चढूनी को निलंबित कर दिया गया है। हालांकि चढूनी को 10 करोड़ रूपये कांग्रेस से लेने के विवाद से शिवकुमार कक्का पल्ला झाड़ते नजर आये। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। मैं इस प्रकार का बयान नहीं देता। निलंबन के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सामूहिक निर्णय है और गुरनाम चढूनी मेरे अच्छे मित्र हैं।”
किसान संगठनों पर खालिस्तान आंदोलन के समर्थन में खड़े होने और विदेशी फंड लेने के भी आरोप लगे हैं और इसकी जांच एनआईए को सौंपी गई है। एनआईए की तरफ से आंदोलन से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों को समन भेजे गए हैं, जिसमें किसान नेता बलदेव सिंह सिरसा का नाम भी है। हालाकि किसान संगठनों ने यह फैसला लिया है कोई उनसे जुड़ा कोई नेता या कार्यकर्ता एनआईए के सामने पेश नहीं होगा।
साफ है किसान आंदोलन में ऐसी गतिविधियां हो रही हैं जिसे किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता और इससे आंदोलन के सामने विश्वसनियता का संकट पैदा हो गया है चाहे गुरनाम सिंह चढूनी का मामला हो या फिर किसान संगठनों पर विदेशी संगठनों से मदद लेने और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का मामला हो।

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