बहुत बदला गांव, पर कुछ अनमोल खो गया

 

हरिवंश
ग्राम्य जीवन को गांधी ने भी नजदीक से देखा था और उनका सही निष्कर्ष था कि इन गांवों को स्वायत्त बनाकर विकसित करना ही भारत के हक में होगा। शायद गांव की सांस्कृतिक धारावाहिकता या पुरातनता के कारण ही मुहम्मद इकबाल को लिखना पड़ा-
यूनां, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से,
बाकी मगर है अब तक, नामो निशां हमारा
इसीलिए गांधी ने गांव के विषय में कहा, ‘गांव कितने प्राचीन रहे हैं, कितनी प्राचीन संस्कृति रही है हमारी. महात्मा गांधी जहां गांव की खराबियों को दूर कर उन्हें सुंदर, स्वच्छ बनाना अपना कर्तव्य समझते थे, वहीं वे ग्रामवासियों की जीवन शैली से भी सात्विक, आध्यात्मिक जीवन सूत्र सीखना वांछनीय समझते थे.’
पर आधुनिकता नए रूप में प्रवेश कर रही थी. विकास की पश्चिमी अवधारणा भारत को, उसकी खूबियों को लीलने व प्रदूषित करने लगी थीं. कई बार लगता है कि बचपन और छात्र जीवन के मेरे गांव में न सड़क थी, न बिजली, न सुविधा व चिकित्सा के साधन, दूर संचार की बात तो सपना था, गरीबी थी, अशिक्षा थी. आज इसमें बहुत सारी चीजों का एक सीमा तक हल निकला है. न वैसी गरीबी है, न अन्य चुनौतियां. जगह-जगह स्कूल खुल गए. अब नीम के पेड के नीचे पढ़ने की मजबूरी नहीं, बोरा और पटरी लेकर जाने की जरूरत नहीं. ये सारी चीजें बदलीं, पर कुछ अनमोल खो गया. वह रिश्ता, वह अपनत्व, वह बुजुर्गों के स्नेह की छाया. अपना-पराया के फर्क की वह आग दरवाजे-दरवाजे दस्तक दे रही है. भौतिक होड़ है, पैसा भगवान है. जाति, उभर रही है.


बचपन मे मेरे गांव में बाजार नहीं थे. तुरहा-तुरहीन घूम-घूमकर चीजें बेचते. आम, तरबूज, खरबूज वगैरह भी. लोगों का उनसे आत्मीय रिश्ता होता. बर्तन बेचने वाले ठठेरा घूमते. फुलहा, पीतल और जस्ता या अल्युमिनियम के बर्तन होते. वे घोड़े पर या माथे पर बेचते. जूता वगैरह गांव में ही बनता. याद है 14 वर्ष की उम्र में पहला जूता बना था. घर से लगभग पांच किलोमीटर दूर, जूता बनाने वाले ने बनाया. महीने-डेढ़ महीने का समय लिया होगा. बचपन था. उत्सुकता थी.जूते का आकर्षण था, उसे घोड़ी पर बैठ कर कई बार देखने गया. जब जूता बन गया, तो घोड़ी पर ही हाथ में लेकर लौटा. कीमत याद नहीं. शायद 10-12 रुपये कुछ था. कपड़ा साल में एकाध बार, घर में शादी वगैरह के अवसर पर बनता. तब कपड़ों के लिए बाजार जाना होता था.लगभग 25-30 किलोमीटर दूर. नाव से, फिर टमटम या रेल गाड़ी से छपरा. फिर रिक्शा से या पैदल बाजार तक.
आज जब याद करता हूं, तो वे सामान्य बाजार थे, कस्बानुमा, पर वही छपरा, आरा शहर के रूप में मान्य थे. शादी विवाह या गमी (किसी के मरने पर) किसी आयोजन या भंडारे में टायर गांड़ी या नाव से उन्हीं जगहों लोग बाजार करने जाते थे. खेती होती, अन्न उपजता, लोग जमीन में गाड़ देते, उपर से मिट्टी से ढक देते, उसे गांव में खाद या बखार कहते हैं.


गांव में खेती प्रधान उत्सव अधिक थे. आसपास लगने वाले बड़े मेलों की धूम होती, जहां मवेशी भी बिकते. हुनर के तहत बनी चीजें उपलब्ध होतीं. जब बरसात के बाद हल, विश्राम के बाद खेतों में उतरता, तो पूजा-पाठ से शुरूवात होती, होली का उत्सव होता. होली के गीत ढोल-मंजिरे पर घूम-घूम कर जाते, गाते. अमीर हो या गरीब, सबके दरवाजे जा कर फाग गाते. चैता होता . रातों में ढोल और झाल लेकर चैता, फाग वगैरह के गीत होते . रामायण का पाठ होता, हरिकीर्तन होते. पर्व अनेक थे, शायद कृषि प्रधान समाज या खेतिहर समाज को लगातार जीवंत रखने, बांधने और मनोवैज्ञानिक रुप से व्यस्त रखने के लिए. शादियां होती, घर-घर से बिस्तरें या चौकी या खाट जुटाये जाते. बारात एक दिन ठहरती थी. लड़की की शादी में माड़ो सजाये जाते. पूरे गांव के सक्रिय युवा उत्साह से भाग लेते. मृत्यु हो तो पूरा गांव एकत्र होता, हर मदद के लिए लोग तत्पर होते, गरूण पुराण का पाठ कहीं-कहीं होता.

धीरे-धीरे समय के प्रवाह ने उन रीति-रिवाजों को भी बदला है. पहले गांवों से जो लोग बाहर जाते थे, वे रिटायर होकर गांव ही आकर बसते. अब लोग गांव छोड़ने के लिए निकलते हैं. प्रतिभाएं गांवों से बाहर निकल गयी. खेती में अब रूचि नहीं, खेत बोझ हैं. हां सरकारी योजनाओं से अधिक से अधिक लाभ मिल सके, यह कोशिश रहती है. बिना परिश्रम धन कमाने की भूख प्रबल है.

इसी अंचल से निकले देश के जानेमाने साहित्यकार-निबंधकार डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र, ने गांवों में आये बदलाओं और पराभाव को देखकर ही यादगार पुस्तक दशकों पहले लिखी ‘बेहया का जंगल’, तब भोजपुरी में अश्लील गाने कम होते थे. भोजपुरी के शान थे कबीर के निर्गुन, गोरखपंथी योगियों के विहवल करने वाले गीत, महेंद्र मिश्र, भिखारी ठाकुर या भोला सिंह गहमरी जैसे लोगों के गीत. इसी अंचल से हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी, पंडित परशुराम चतुर्वेदी (संत साहित्य के मर्मज्ञ), महान इतिहासकार भागवतशरण उपाध्याय, लेखक अमर कांत, दूधनाथ सिंह वगैरह-वगैरह. जेपी, चंद्रशेखर का इसी अंचल से रिश्ता रहा. अब इस गांव में पहुंचने के कई माध्यम हो गए हैं.

 

बिहार की तरफ से आने के लिए माझी में बना सरयू नदी पर पुल है, इधर दक्षिण से गंगा पर आरा होकर गांव पहुंचने के लिए पीपे का पुल है. बलिया से आने के लिए सड़क मार्ग से, सड़क भी बन गयी है. पर भीड़ बेतहाशा बढ़ी है. गाड़ी लगभग घर-घर है, दोपहिया, चारपहिया. सरकारी योजनाओं में मीडिलमैन बनने की मारामारी है. राजनीति ने बाकी हर चीज को पीछे छोड़ दिया है, वह अहम है रिश्ते में हो, सामाजिक संबंधों में हो, जातीय संबंधों में हो, राजनीति प्रभावी भूमिका में है. गांव के आपसी बरताव में भी अब राजनीति है. इंच-इंच जमीन की लड़ाई है, घर में आपस में है, फिर बाहर है. नैतिक-अनैतिक का द्वंद्व मिट रहा है, जो सबल, सक्षम और प्रभावी, वही आगे है. जो जीता, वही सिकंदर है. अब पहले की तुलना में बुनियादी चीजों के मापदंड बदल चुके हैं.

पूजा पाठ का दिखावा नहीं था, पर श्रद्धा से पूजा होती, बिना तड़क-भड़क. अब दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा वगैरह में चंदा वसूली है. शराब का भी सेवन है. जरूरत के अनुसार बाजार जाना होता. उस पुरानी व्यवस्था में बड़ी चुनौतियां थी. मुसीबतें भी. लोग साल भर का उधार लेते, खेती होने पर चुकाते. शादी या बीमारी में कर्जदार बन जाते. दुकानदार अपनी बही-खाते में नोट कर लेते. अब उस गांव में न जाने कितनी संख्या में मिनी बाजार उपज गये हैं. गांव की भाषा में इसे चट्टी कहते हैं. इन चट्टियों पर हर चीज उपलब्ध है. मादक पेय और नशीली चीजें भी. यानी शराब. यह देखता हूं, तो बचपन की एक स्मृति उभरती है. 69-70 की बात, गांव में उत्तर की ओर से एक व्यक्ति घइले (घड़ा) में ताड़ी लाया (ताड़ से निचोड़े जानेवाला मादक पेय). अगले दिन पूरे 27 टोलों में यह चर्चा का विषय था. बुजुर्गों के लिए नैतिक सवाल था. सर्वोदयी चाचा चंद्रिका सिंह ने सभी टोलों के प्रमुख लोगों को खबर भेजी कि हम कहां जा रहे हैं ? बच्चों, समाज, गांव का क्या भविष्य होगा ? उस व्यक्ति को उसके ही गांव के बुजुर्ग लोगों ने बुलाया, तहकीकात की, उसे नष्ट करवाया और कहा आइंदा ऐसा न करें और घाट के घटवार और मल्लाह (नाविक) को अगाह किया कि सावधान रहें कि इसके बाद दियारा में उधर से ऐसी चीजें न आये. अब, तो गांव-गांव में चट्टी पर पीने वालों की भीड़ रहती है. कम ही घर बचे हैं, जहां पीने का शौक नहीं पहुंचा है. शहर से इस दियारे में आकर शराब पीना बढ़ गया है, क्योंकि बिहार के शहरों में सख्त पाबंदी है.बिहार के गांवों में असर है. पर, यूपी इलाके में मुक्त है.
पहले बाजार दूर होने की तकलीफें पहले बहुत थी, अब घर में बाजार पहुंच चुका है, तो उसकी चुनौतियां अलग हैं. प्रायः गांव अब भी जाता हूं, जब भी इन चट्टियों से होते हुए लौटता हूं, तो एक खालीपना और उदासी का बोध होता है. कठिनाइयों और मुसीबतों से निकले जरूर, पर पहुंच कहां गये ? पहले ऋण लेने से परहेज था, अब चार्वाक लोकप्रिय हैं. सरकारी बैंकों-संस्थानों से ऋण लें, फिर न लौटायें, यह चलन है. यकीन है कि यह तो माफ हो ही जायेगा.

(राज्यसभा के उपसभा​पति हरिवंश जी के गांव सिता​बदियारा के कहानी की चौथी कड़ी।)

छ लाख गांव हमार ह,अपना गांव लागी बात करीं तो लोग का कही..जयप्रकाश नारायण

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