आंखों में विकास का ख्वाब

मनोज कुमार, युवा पत्रकार

मेरा गांव भी भारत के लाखों गांवों जैसा ही है। लगभग तीन सौ घरों की इस छोटी-सी बस्ती का नाम अवर्हिया है जो बिहार के कैमूर जिला अंतर्गत दुर्गावती प्रखंड में पड़ता हैं। इस गांव के बारे में एक पुरानी उक्ति है कि पांडे पूरा बांधे जूरा, दरौली पीसे पिसान, नार खोर में बसे अवर्हिया, नंगा लोग मचखिया यानी पांडेपुर गाँव ब्राह्मण बहुल है, लिहाजा लोग अपनी सिखा बांधते है। अवर्हिया गांव देश के सबसे व्यस्त सड़क और देश की लाइफ लाइन कही जाने वाली जीटी रोड से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर जरूर है, पर गांव के दो तरफ दुर्गावती नदी है। गांव के दो तरफ नार पईन, ताल और तलैया है। गांव की कुल आबादी करीब 4000 है और मतदाताओ की संख्या 16 सौ है।

गांव के चारों ओर खेतों की हरियाली है जिससे गांव की शोभा बढ़ाती है। 10 किलोमीटर दक्षिण में कैमूर पर्वतमाला हैं जिसपर विविध वनस्पतियां मिलती हैं। जो इसका प्राकृतिक सौंदर्य में चार चाँद लगा देता है। गाँव के बीचोंबीच एक बड़ा कुआं है, जो देव का कुआँ’ के नाम से प्रसिद्ध है। कुएँ के सामने विशाल शिवालय है। कुछ दूरी पर गाँव का पंचायत भवन है।

गांव में 8वीं तक की पाठशाला है, आगे की पढ़ाई करने के लिए तीन किलोमीटर दूर जाना होता है। गांव के बच्चे उत्साह से पाठशाला में पढ़ते हैं। पाठशाला में पढाई के अलावा विद्यार्थियों को बागबानी की शिक्षा भी दी जाती है। कताई और बुनाई के कामों में भी विद्यार्थी रूचिपूर्वक भाग लेते हैं।

गांव में अस्पताल नहीं हैं। लेकिन दवाखाना है जो लोगों को अच्छी सेवा कर रहा है। मुस्लिम आबादी नहीं हैं, शेष सभी जातियां यहाँ निवास करती है। पर राजपूत और यादव का बाहुल्य है। गांव का आपसी सौहार्द इतना मजबूत है कि हल्के-फुल्के विवाद के बावजूद तहरीर लिखवाने लोग थाने नहीं जाते। गांव के लोगों में कभी-कभी छोटी-छोटी बातों को लेकर कहा-सुनी हो जाती है, लेकिन पंचायत की बैठक में उन्हें सुलझा लिया जाता है।

गांव में सभी वर्णों के लोग बिना किसी भेदभाव के रहते है। मेरे गांव के लोग बहुत उद्यमी और संतोषी है। गांव के लोगों की सभी जरूरतों की पूर्ति गांव के लोग ही विभिन्न उपायों से करते है। गांव में अधिकतर किसान रहते है। यहां मुख्य रूप से धान, गेहूं, गन्ना, अरहर, उड़द, चना, मटर, मसूर, सरसों की खेती होती है। बेरोजगारी की वजह से लगभग तीस प्रतिशत लोग पलायन करते हैं।

अनेक देवी-देवताओं में उनका अटूट विश्वास है। गांव में अक्सर भजन-कीर्तन का कार्यक्रम होता है। होली के रंग सबके हृदय में हर्ष और उल्लास भर देते हैं तो दिवाली की रोशनी से सबके दिल जगमगा उठते है। ग्रामपंचायत ने हमारे गांव की कायापलट कर दी है। आज गांव की सभी गलियां पीसीसी से निर्मित है, जबकि रोशनी से भी जगमग है। साफ सफाई के प्रति लोगों में काफी जागरुकता है, लोग रोजाना इसका ख्याल रखते है।

कुछ लोग भांग, तंबाकू का सेवन भी करते हैं। कुछ लोग सफाई की ओर विशेष ध्यान नहीं देते, फिर भी मेरा गांव अपने आप में अच्छा हैं। यहां प्रकृति की शोभा हैं, स्नेह भरे लोग हैं, धर्म की भावना हैं और मनुष्यता का प्रकाश है। भोले-भाले स्त्री-परूष, भाभी-देवरों और सरल बच्चों से भरा यह मेरा गांव मुझे बहुत प्यारा है। गांव के 25 लोग सरकारी नौकरी जबकि 70 से 75 लोग गैर सरकारी नौकरी करते हैं।

यहां की हर आंख में विकास एवं तरक्की का ख्वाब तैर रहा है। यहां आने वाले हर नुमाइंदे एवं राजनेताओं को लोग हसरत भरी निगाह से देखते हैं। उम्मीद यह होती है कि शायद यह शख्स इलाके की तस्वीर को बदल दे, ग्रामीणों के दुख दर्द को कम कर दें। पर अफसोस अबतक ऐसा नहीं हुआ। राजनेताओं से तरक्की का ख्वाब गांव वाले इसलिए पाले बैठे हैं कि गांव का 4000 बीघे का रकबा है, सिंचाई के साधन नहीं हैं, बिजली गांव तक आती है और सिंचाई का पूरा दारोमदार बिजली चालित निजी नलकूप पर हैं। तेजी से भागते जलस्तर की वजह से खेती चौपट होती दिख रही है। नहर की सुविधा नहीं है और ना ही अभी तक नदी में पंप लग पाया है। गांव की तरक्की जितनी भी हुई है किसानी के बदौलत हुई है, लेकिन अब किसानी पानी के बिना मछली की तरह तड़पती दिख रही है। यहां के लोग आजादी के बाद से आजतक गांव की समेकित उन्नति के इंतजार में टकटकी लगाए हुए हैं। इंतजार कर रहे हैं, उस नुमाइंदे का जो इस गांव में विकास की रोशनी ले आए।

साल 2011 में जीटी रोड से गांव तक की सड़क प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से बनी थी, आज जर्जर हो गई है। इस सड़क पर चलने का मतलब पैर से खून बहवाना। एक नजर में गांव के 250 मकानों में से 95 प्रतिशत पक्के -गटर, पानी, स्ट्रीट लाइट सहित सभी प्राथमिक सुविधाएं- आंगनबाड़ी, पंचायत भवन – कम्युनिटी हॉल, मीडिल स्कूल, गांव के अंदर 12 फीट चौड़ी पक्की सड़क है। गाँव में 1960 में बिजली आ गई थी, फिलहाल 20-22 घंटे बिजली मिलती है जिसका श्रेय बिहार के पूर्व मंत्री जगदानंद सिंह को है।

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