मगर, तुरतुक गांव तक बिजली नहीं पहुँची।

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पुष्प रंजन, वरिष्ठ पत्रकार

माउंट एवरेस्ट के बाद विश्व की सबसे ऊंची पर्वतमाला है ‘के-टू‘ ! पाकिस्तान का गिल्गिट, बाल्टिस्तान और चीन का ताजिक स्वायत क्षेत्र शिन्चियांग के तमाम गांव ‘के-टू‘ की परिधि में आते हैं। तुरतुक, त्याक्शी, चलूंका और थांग ये चारो गांव पाकिस्तान वाले गिल्गिट-बाल्टिस्तान की हदों में हुआ करते थे। ‘के-टू‘ की की वादियों के ये गांव 15 दिसंबर 1971 से पहले पाकिस्तान का हिस्सा थे। 15 दिसंबर 1971 की रात अचानक दोनों तरफ से गोलियां चलनी शुरू हुईं। रात भर रूक-रूक कर गोलीबारी थमी, और सुबह का उजाला हुआ, तो तुरतुक, थ्याक्शी, चलूंका व थांग गांव के लोगों ने खु़़़द को भारत में पाया।
2010 से तुरतुक देसी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। 2012 से यहां आने के वास्ते ‘इनर लाइन परमिट‘ लेना आवश्यक कर दिया गया। अब यहां आने के वास्ते लेह स्थित डीसी कार्यालय से परमिट बनवाना होता है। नुब्रा घाटी और तुरतुक ‘इनर लाइन’ के अंतर्गत आते हैं।


मेरे लिए ऐसे गांव में जाना, कल्पना लोक से गुज़रने जैसा था। बाल्टिक कल्चर कैसा होगा? लोग कैसे होंगे? इससे वाबस्ता जानकारी वहां जाने से पहले जुटाना भी ज़रूरी था। बाल्टिक लोगों के पास लिखने के वास्ते मुद्रित शब्द नहीं हैं। इसलिए इसे भाषा भी नहीं कहेंगे। फिर नई पीढी ने बाल्टिक बोलना कैसे शुरू किया? बाल्टिक बच्चे राष्ट्रगीत कैसे गाते हैं? मुहर्रम में मर्सिया कैसे पढ़ते होंगे? इन सवालों का जवाब इस रहस्य लोक में जाने पर ही मिलना संभव था। दिल्ली में बैठे नेतागण दावा करते हैं, ‘हिन्दुस्तान के सभी गांवों में हमने बिजली पहुंचा दी हैं।‘ इसका रियलिटी टेस्ट भी यहां आकर हुआ। देश के इस आखि़री गांव में बिजली के वास्ते जनरेटर ही सहारा है। रात को मात्र अढ़ाई से तीन घंटे आने वाली बिजली देश के सभी गांवों को रौशन कर देने के सरकारी ढोल का पोल खोलती है।

बहरहाल, लेह से टैक्सी ली और सुबह-सुबह निकल पड़े दिस्किट के लिए। दिस्किट नुब्रा घाटी का मुख्यालय है, जहां से गुजरते हुए हमारी मंज़िल तक पहुंचना संभव था। रास्ते में हमें पार करना था दुनिया का दुर्गम खारदुंगला दर्रा। दिस्किट पहुंचते-पहुंचते दिन के दो बज गये। तुरतुक में हुसैन बेग जो हमारे गाइड बनने से लेकर ठहरने का इंतज़ाम करने वाले थे, उनका निर्देश था कि सूरज ढलने से पहले या तो मंज़िल पर पहुंच जाएं, या फिर दिस्किट में ही होटल लेकर रूक जाएं और सुबह को चलें।

हमारे टैक्सी चालक उरगेन दोरजे लेह के ही थे, चुनांचे उसी समय चल देने का ही फैसला ले लिया गया। मगर, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गये, मरधट का सन्नाटा। शाम ढलने लगी थी। दुर्गम शायोक घाटी का 80-85 किलोमीटर, 200 किलोमीटर के मुक़ाबिल दिखने लगी। उरगेन के लिए भी यह रूट नया था। कहीं कोई बोर्ड नही,ं जिससे पता चले कि हम तुरतुक की तरफ सही दिशा में बढ़ रहे हैं। ऐसे लम्हे, भारत सरकार ंऔर स्थानीय प्रशासन को कोसने का कोई फायदा नहीं था। बस सोचते रहे, इस प्राचीन रेशम मार्ग के बारे में। ईसा पूर्व दूसरी सदी में बैक्टेरियन ऊंटों का काफिला इस मार्ग से गुजरते हुए चीन के शिन्चियांग और सेंट्रल एशिया कैसे जाता होगा? बैक्टेरियन ऊंटों के झुंड को हम दिस्किट स्थित हुंडर के रेगिस्तान से गुज़रते देख चुके थे, जो पर्यटकों के लिए थोड़ी तफरीह और ‘फोटो अपॉरच्युनिटी’ के काम आते हैं।
हुंडर के बाद, बीसेक मिनट वनस्पति विहीन पहाड़ और उसके साथ-साथ चलती तेज़ घारा वाली शायोक नदी का आनंद हमने उठाया। रफ्ता-रफ्ता प्राकृतिक सांैदर्य निहारने का रोमांस, अनजाने से डर वाली रोमांचकारी यात्रा में परिवर्तित होने लगा। मरधट सा सन्नाटा चारो ओर पसरा हुआ। आदमी-जानवर कुछ भी नहीं। सियाचीन और रिमो ग्लेशियर जहां से पिघलती है, उसकी धारा शायोक नदी में समाहित हो जाती है। सिंघ नदी की घारा मिलने के बाद शायोक का करंट पाकिस्तान में प्रवेश करते-करते और भयावह हो जाता है। ड्राइवर और मैं, इस संशय में भी डूबे थे कि कहीं सरहद पार पाकिस्तान में, बतौर बिन बुलाये मेहमान हम पहुंच तो नहीं गये।

ख़ैर, इसी उहापोह में डेढ़ घंटे निकल चुके थे। दूर से एक गांव नज़र आने, और दो चार लोग दिखने के बाद सांस आई। वे लदाखी भी नहीं थे। अलग सा चेहरा, जैसे चंगेज खान या कुबलाई ख़ान के वंशजों से आप रूबरू हो रहे हों। औरतें सामने आते ही पलट जातीं, और चेहरा ढंक लेतीं। लग गया था कि हम लदाखी नही, बाल्टी कल्चर वाले गांव में हैं। गाड़ी में बैठे-बैठे एक से पूछा, ‘तुरतुक क्या इसी रस्ते जाना है?‘ जब उन्होंने कहा कि इसी मार्ग से बढ़ते जाओ, तब सांस में सांस आई। कुछ किलोमीटर बाद थ्याक्सी सैनिक छावनी पर तैनात संतरी ने भी कन्फर्म किया कि हम ठीक जा रहे हैं। हमें तुरतुक में हुसैन बेग से मिलना था, जिसने ठहरने से लेकर वहां की संस्कृति और तुरतुक के राजा से रूबरू कराने का अहद कर रखा था।
छुतांग तक सड़क समतल इलाक़ा था, जिससे हम मंज़िल तक पहुंच चुके थे। वहां दो एक रिसोर्ट और गेस्ट हाउस भी दिखे। मगर, हमें उससे कोई एक-सवा किलोमीटर ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना था। हुसैन बेग का फोन लगा, तो जवाब आया पहाड़ी चढ़कर ऊपर आ जाएं, यहीं ‘के-टू गेस्ट हाउस‘ में मिलता हूं। यह सीघी चढ़ाई वाली पहाड़ी थी, जिसपर तुरतुक गांव चार हिस्सों में बसा था। तबतक अंघेरा हो चुका था। गाड़ी हमने वहीं पार्क की, और बैग उठाये चल पड़े पर्वतारोहण के वास्ते। आधा किलोमीटर की चढ़ाई में ही कलेजा मुंह को आने लगा। हमारी सांसें उखड़ने लगीं। बीच-बीच में हम कई जगह हांफते हुए रूकते। लंबी-लंबी संास लेते, थोड़ा नार्मल होने पर आगे बढ़ते। इस बीच सीमेंट की बोरी उठाये एक लेबर, नीचे से चला आ रहा था। वह गांववाला पचास किलो वज़नी सीमेंट की बोरी पीठ पर लादे, बिना रूके पहाड़ी पर ओझल हो चुका था। 

जैसे-तैसे ऊपर पहाड़ पर पहुंचे। वहां प्रशस्त समतल धरा देखकर हम दोनों हैरान। हमारे ‘इंतजाम बहादुर’ हुसैन बेग ने बताया कि तुरतुक गांव चार हिस्सों में बंटा हुआ है। रात के अंधेरे में कुछ दिखना नहीं था। अस्तु उस धर में टिक गये, जिसे गेस्ट हाउस के रूप में तब्दील किया गया था। ड्राइवर के वास्ते एक दूसरे घर में रूकने का इंतज़ाम हुसैन बेग ने पहले से कर रखा था। जहां मैं टिका चार कमरे थे। मेरे सिवा सारे गेस्ट विदेशी। एक इज़राइल का, दूसरी लड़की बैंकाक से आई, तीसरा ब्रसेल्स से और चौथे कमरे चार कोरियाई लड़कियां। खाना सर्व होने तक हम सबों का ‘अंतरराष्ट्रीय गोलमेज़ सम्मेलन‘ जारी था। पहले से सूचना थी कि बिजली साढ़े नौ बजे तक चली जाती है। निस्बतन, डिनर वगैरह पहले से निपटा लेना था। 

सोने से पहले और बीच में नींद खुलने पर पानी पीने की आदत थी। हुसैन बेग ने एक ख़ाली बोतल पकड़ा दी। पता चला आगे एक खेत के पास झरने से जुड़ा नलका है, वहां से पानी भर लेना है। गांव में जगह-जगह ऐसे नलके हैं। आर.ओ. वाटर पीने वाला, नलके का वह भी बिना फिल्टर वाला पानी कैसे हजम करेगा? मगर, उस ठंडे-मीठे, और स्वच्छ पानी पीने के बाद, सारी शंका दूर हो चुकी थी। साढ़े नौ बजे बिजली जा चुकी थी। जैसे-जैसे करवट बदलते देर रात नींद आ ही गई।
तब थोड़ा अंधेरा था, दूर किसी मस्ज़िद के अजान से आंख खुली। अजान समाप्त होने के बाद अलसाया सा उलट-पुलट, मैं दूसरे दौर की नींद के जुगाड़ में था कि अचानक पड़ोस के किसी घर से गधे के रेंकने की आवाज़ आई। उसके बाद आस-पड़ोस से ऐसी जुगलबंदी शुरू हुई कि सोना असंभव था। पूरा गांव गर्दभ वाणी से गुंजायमान। उजाला हो चुका था। फ्रेश होने के बाद गांव का जायज़ा लेने मैं अकेला निकल पड़ा। जिस गली से गुजरो, एक-दो गेस्ट हाउस दिखता, गोया आधा गांव गेस्ट हाउस के काम को कुटीर उद्योग का रूप दे चुका हो। कुछ औरतें किसी गली के मोड़ पर दफ़्अतन सामने दिखतीं, फटाक चेहरा घुमा लेतीं, या फ़िर पर्दा कर लेतीं।
    साढ़े सात बजे सुबह मेरा तुरतुक के राजा काचो मोहम्मद ख़ान याग्बो से मिलना तय था। फटाफट गेस्ट हाउस लौटा। नाश्ते में कुट्टू आटे से तैयार ब्रेड व मक्खन और साथ में पुदीने की चाय। ब्रेकफास्ट के बाद बैग, कैमरा वगैरह उठाया और हुसैन बेग के साथ चल पड़े तुरतुक ‘महल’ की तरफ, जो उसी पहाड़ी के बराबर दूसरे गांव में था। पगडंडी के दोनों ओर कुट्टू के लहलहाते खेत। अंग्रेज़ी में कुट्ट को ‘बकव्हीट‘ कहते हैं। पानी की सप्लाई एक नाले के ज़रिये हर खेत को। गज़ब का ड्रेनेज सिस्टम। पानी को एक बड़े से तालाबनुमा जगह पर स्टोर करने से लेकर खेतों तक उसे पहुंचाने का अद्भुत जल प्रबंधन!
हरी सब्जियां मंडी में नहीं मिलतीं। हर परिवार को खेत नसीब है, वहीं उपजाते और ताज़ा-ताज़ा आर्गेनिक सब्जियां आपकी रसोई में। पगडंडियों के आर-पार सेब-अखरोट के पेड़। यूल में प्राइमरी स्तर का सरकारी स्कूल, जिस तरफ जाते हुए बच्चों के झुंड। हेड मास्टर नाज़िर हुसैन ने बताया 110 छात्र-छात्राएं यहां पढ़ते हैं। इस स्कूल से रिटायर 65 साल के अब्दुल करीम हश्मत मिले, जो 1970 में मैथ टीचर के रूप में यहां नियुक्त हुए थे। उन्होंने बताया कि यहां पर भारत सरकार ने स्कूल तक सड़क निर्माण कराया था। पगडंडी के बाद पक्की सड़क पर हम आ चुके थे। चारों तरफ साफ-सफाई। कहीं कूड़े का ढेर नहीं। एक भी मच्छर नहीं। राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान का कोई बोर्ड नहीं। गांव वाले भी नहीं जानते कि भारत सरकार ने ऐसा कोई अभियान छेड़ रखा है।


रास्ते में 400 साल पुरानी काठ की एक मस्ज़िद मिली, जिसमें आश्चर्यजनक रूप से बौद्ध मत का प्रतीक धर्मचक्र, हिंदू धर्म का स्वास्तिक और ईरानी कलाकृतियां स्तंभों व छत पर उकेरी हुई दिखीं। हमारे गाइड ने बताया कि के-टू के इस इलाके में प्राचीन काराकोरम मार्ग के ज़रिये तेरहवीं सदी के ईरानी स्काॅलर व शायर मीर सैयद अली हमदानी यहां आये थे। उनकी वजह से बाल्टी इलाके में नूरबक्शी मत को विस्तार मिला था।
हमारे गाइड बने हुसैन बेग ने ही बताया कि पूरे गांव के वास्ते सामूहिक फ्रीज़र बना हुआ है, जिसमें हर परिवार के वास्ते एक खाना आबंटित है। इन खानों में वर्षो पुराने मक्खन, पनीर, मीट वगैरह रखे होते हैं। इन खाद्य पदार्थों को एक बार फ्रिज से निकालने के बाद उसका इस्तेमाल ही होता है, उसे दोबारा से वापिस फ्रिज़ में नहीं रखा जाता। शालोक नदी की जल घारा के आसपास बना यह मकाननुमा फ्रिज अद्भुत और विशाल है। शायद शीतल जल की वजह से इस अजूबे फ्रीज़ का तापमान सालों भर बर्फीला रहता है, जिसे विद्युत की ज़रूरत ही नहीं।


तुरतुक में कम्युन चेतना का यह अकेला उदाहरण नहीं है। किसी के पक्के घर में छत की ढलाई करनी होती है, तो पूरा गांव सहयोग के वास्ते खड़ा हो जाता है। बस ढलाई के बाद मालिक मकान को भोजन का प्रबंध भर करना होता है। इन्हीं विषयों पर चर्चा करते हुए हम सब तुरतुक के राजा के महल के आगे पहुंच चुके थे। पत्थरों व काठ का दस फीट ऊंचा प्रवेश द्वार जिसके माथे पर बाज की आकृति बनी हुई। शायद यह उस राजवंश की निशानी के बतौर बनाया गया था। अंदर पहली मंज़िल पर दस बारह कमरों वाला काठ का महल।
हाॅलनुमा ड्राइंगरूम का एक हिस्सा म्यूज़ियम है, जहां सिक्के, तलवारें, कवच, शाही वस्त्र, पत्थर के कूकर व दूसरे बर्तन वगैरह रखे हैं। म्यूजियम के दूसरे हिस्से की दीवार पर एक नक्शा दिखा जिसमें याग्बो राजाओं की वंशावली अंकित है। तुरतुक के वर्तमान राजा काचो मोहम्मद ख़ान याग्बो ने अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी दी कि वे लोग शिन्चियांग के यारखंड से 800 ईस्वी में गिल्गिट-बाल्टिस्तान आकर बस गये थे। याग्बो वंश के बेग मंथाल पहले राजा थे।
किंग काचो मोहम्मद ख़ान याग्बो एक ऐसे राजा हैं, जिनकी ताबेदारी के लिए कोई सेवक नहीं दिखा। राजा साहब के ख़र्च के लिए सरकार अनुदान दे, इसकी उम्मीद कर रहे थे। बस कुछ इतना मिल जाए कि महल का जीर्णोद्धार कर सकें। ड्राइंग रूम में एक डोनेशन बाॅक्स रखा हुआ था। जो आगंतुक उनके उजड़े दयार को देखने आते, राजा जी के साथ फोटो खिंचाकर गर्व की अनुभूति करते, उनसे किंग काचो की अपेक्षा होती कि कुछ सहयोग राशि-चंदा वगैरह उस बक्से में डाल दें। शिवपूजन सहाय की लिखी बात, ‘अमीरी की कब्र पर पनपी हुई ग़रीबी बड़ी ज़हरीली होती है’ को सजीव देखना हो तो तुरतुक चले आइये !

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