आओ बनाएं…‘सबका भारत’

0
568
New Delhi: A view of illuminated Parliament, in New Delhi, Tuesday, Aug 13, 2019. The exterior of Parliament has been installed with permanent colourful lights ahead of the 73rd Independence Day celebrations and was inaugurated by PM Narendra Modi today. (PTI Photo/Atul Yadav)(PTI8_13_2019_000204B)

शिवाजी सिंह

16 अगस्त, 1947 लाल किला का लाहौरी गेट प्रचीर। स्वतंत्र भारत का तिरंगा झंडा खुले गगन में लहराने के लिए उद्वेलित हो रहा था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जैसे ही तिरंगा लहराया, तोपों की सलामी के बीच ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष चारों दिशा में गुंजयमान होने लगा।    नेहरू ने बताया कि आजादी की पूर्व संध्या पर यानि 14 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने एक स्वर में देश सेवा में अपने को समर्पित करने का प्रण लिया है। नेहरू ने कहा कि देश में हम गरीबी,अशिक्षा एवं असमानता को हटाएंगे। देश के प्रत्येक नागरिक के आंसू हम पोछेंगे। सारे देश-वासियों में नई आशा एवं उम्मीदों का संचार हो रहा है।  

आज देश की आजादी के 72 वर्ष से ज्यादा गुजर चुके हैं। लाखों भूखे-प्यासे लोग सड़कों पर पैदल चल रहे हैं अपने घरों को लौटने के लिए। बेरोजगारी, भूखमरी, कुपोषण, बीमारी एवं गरीबी भारत के अधिकांश आबादी का पर्याय बन चुके हैं। असमानता अपनी चरम सीमा पर है। गरीबों , मजदूरों एवं किसानों की आवाज उठाने वाला आज कोई नहीं है।  आजादी के बाद देश के नेताओं में कुछ ऐतिहासिक भूलें की जिसका खामियाजा आज पूरा भारत चुका रहा है।

 एतिहासिक भूलें 

अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 वर्ष राज किया। शासन करने के लिए उन्होने जो तंत्र स्थापित किया था-यथा पुलिस, न्याय व्यवस्था, कानून, शिक्षा व्यवस्था आदि; वह शोषण पर आधारित था। अंग्रेज शोषक थे व भारतीय शोषित। आप विश्व के सभी महान राष्ट्रों के इतिहास के पन्ने पलट कर देख लें। आप पाऐगें कि आजादी के बाद उन्होंने पुराने प्रशासनिक ढांचे एवं पुराने कानून को पूरी तरह बदल दिया। परन्तु भारत में ऐसा नहीं हुआ। आजाद भारत के कर्णधारों ने पुरानी व्यवस्था को ही जारी रखा। पुरानी व्यवस्था भ्रष्ट एवं अकर्मण्य थी। आजादी के बाद के 72 वर्षों में भ्रष्टाचार एवं अकर्मण्यता बढ़ती गयी। आज हम उस चौराहे पर खड़े हैं, जहां से चारों बेरोजगारी, भूखमरी, भ्रष्टाचार, कुपोषण एवं बीमारी ही दिखाई दे रही है। दूसरी सबसे बड़ी गलती हमारे कर्णधारों ने जनसंख्या वृद्धि को रोकने पर उचित ध्यान न देकर की। 1951 में भारत की जनसंख्या 47 करोड़ थी जबकि चीन की 56 करोड़। 2011 में भारत की जनसंख्या बढ़कर 125 करोड़ हो गयी (तीन गुणा वृ़​द्धि) जबकि चीन की जनसंख्या 134 करोड़ पर रूक गयी। 2021 में भारत की अनुमानित जनसंख्या 139 करोड़ है जबकि चीन की अनुमानित जनसंख्या 137 करोड़ है। अर्थात हम चीन से आगे निकल जाएंगे।   हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन के भूभाग का क्षेत्रफल भारत से तीन गुणा ज्यादा है।  कोई भी देश एक निश्चित जनसंख्या के लिए योजना बना सकता है। अगर जनसंख्या बढ़ती गयी तो कोई भी योजना असफल हो जाएगी। 
जनता की घटती भागीदारी

 1952 में जब भारत में पहला आम चुनाव हुआ था तो करीब 80 प्रतिशत प्रतिनिधि आम जनता के बीच से आए थे। बहुतों को रहने के लिए मकान नहीं था। कालान्तर में समाज में तेज नैतिक पतन एवं धन अर्जित करने के लोभ ने आज हमें उस स्थिति में पुहंचा दिया है कि आज आम आदमी चुनाव नहीं जीत सकता। चुनाव एवं सत्ता पैसे वालों का खेल हो गया है। आज भारत का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है। वर्तमान लोकसभा (सदस्य 543) में 475 करोड़पति है। 266 सदस्यों की सम्पत्ति 5 करोड़ से ज्यादा है। क्या ये लोग गरीब की आवाज उठाएंगे। राज्य सभा में (238 सदस्य) में करीब 201 सदस्य करोड़पति है। सत्ता एवं अधिकार पर धन ने कब्जा कर है। आम जनता गरीबी, भूखमरी, अशिक्षा, कुपोषण एवं बीमारी के लिए अभिशप्त है। अगर आम जनता के प्रतिनिधि पार्लियामेंट में नहीं होंगे तो उनकी आवाज कौन उठाएगा।  आज लोगों को धर्म,जाति,भाषा एवं क्षेत्र के आधार पर इस कदर बांट दिया गया है कि वे कभी भी संगठित होकर अपने हक के लिए आवाज नहीं उठा सकते। गरीबी ही उनकी नियति है। आजादी के पहले शिक्षा व चिकित्सा ‘सेवा’ के क्षेत्र थे। लोग सेवा भावना से आते थे। पैसा कमाना उद्देश्य नहीं था। आज चिकित्सा एवं शिक्षा व्यापार बन चुका है। पिछले 72 वर्षों में समाज का घोर नैतिक पतन हुआ है। 

आर्थिक असमानता

वर्ष 2019 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 11254 रुपया थी यानि प्रति महीने 1000 रुपया से भी कम। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 36 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। यह आबादी का 30 प्रतिशत है। एक अनुमान के अनुसार भारत में गरीबी रेखा से नीचे लोगों की संख्या 50 करोड़ है। 
आगे का रास्ता

जिनपर भी भारत के विकास यात्रा की जिम्मेदारी है, उन्हें लम्बी अवधि के लिए योजनाएं बनानी होंगी। उन्होंने देश के मूलभूत ढांचे को पुनर्निर्माण के लिए सर्व-प्रथम प्राथमिकताएं तय करनी होगी।

 वे क्षेत्र जिनपर अविलम्ब ध्यान देने की जरूरत है निम्नलिखित हैं :-

1. चुनाव प्रणाली में उचित सुधार

 2. जनसंख्या नियोजन 

3. पुलिस व्यवस्था में सुधार

 4. न्याय व्यवस्था में सुधार 

5. स्कूली शिक्षा के गुणवत्ता में सुधार

 6. जन स्वास्थ्य 

7. कुपोषण

8. जल एवं वायु प्रदूषण

 9. ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन 

चुनाव सुधार

भारतीय प्रजातंत्र के मजबूत स्तंभ पार्लियामेंट एवं राज्यों की विधान सभाएं हैं। आम जनता का प्रतिनिधि वहां पहुंच सके; इसके लिए जन प्रतिनिधि कानून में बहुत सुधार की जरूरत है।

कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं –

1. विधानसभा/ लोकसभा के चुनाव सिर्फ वही लड़ सकते हैं, जो उस क्षेत्र के स्थायी निवासी हों।

 2. राज्य सभा में भी सम्बन्धित राज्य के स्थायी निवासी ही चुनाव लड़ सकते है।

 3. चुनाव प्रचार में काफी धन खर्च होता है। सरकार दूर दूर्शन पर राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवरों के प्रचार के लिए टाइम स्लाॅट उपलब्ध करा सकती है।

 4. विधान सभा में नामांकन एवं मतदान के बीच कम से कम एक महीने तथा लोक सभा में दो महीने का अन्तराल होना चाहिए ताकि उम्मीदवार सीमित साधनों में ही सारे निर्वाचन क्षेत्र में सम्पर्क अभियान चला सके।

 परन्तु ये सब सुधार कौन करेंगे। वर्तमान शासक तो धनकुबेरों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। परन्तु इन सभी सुधारों के लिए देश में पुनः स्वामी विवेकानंद, राजा राम मोहन राय, दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, भीम राव अम्बेदकर एवं सरदार भगत सिंह जैसे युग पुरूषों की आवश्यकता हैं। 135 करोड़ की आबादी वाले देश में क्या एक दर्जन निःस्वार्थ युवा भारत के पुर्नउत्थान के लिए आगे नहीं आ सकते जो मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दें। 
जनसंख्या नियोजन 

जनसंख्या नियोजन के लिए महा अभियान चलाना होगा। यह त्रि आयामी होगा।

  •   परिवार नियोजन के लिए बड़े पैमाने पर जन जागरण अभियान 
  •  परिवार नियोजन के साधनों की सहज उपलब्धता
  • पुरस्कार एवं दंड

जन-जागरण अभियान 

आज जिस प्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस प्रकार कोविड 19 को 24 घंटे में 12 घंटे दिखा रहा है, उसी प्रकार परिवार नियोजन पर सरकार को लगातार छ महीने तक जागरण अभियान चलाना चाहिए। 

परिवार नियोजन के साधनों की सहज उपलब्धता

परिवार नियोजन के जितने भी साधन हैं, उनकी जानकारी लगातार आम जनों को दी जानी चाहिए और उन्हें उपलब्ध कराया जाना चाहिए। 
पुरस्कार एवं दंड 

एक बच्चे वाले परिवार के लिए उचित प्रोत्साहन सरकार द्वारा दिया जाना चाहिए।   दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवार को चुनाव लड़ने से वंचित कर देना चाहिए। आयकर में ज्यादा दर एवं सरकारी नौकरी से भी वंचित किया जा सकता है। इसके लिए चीन की तरह भारत में भी सख्त कानून बनाने होंगे।

 पुलिस व्यवस्था में सुधार 

देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए पुलिस व्यवस्था एवं न्याय व्यवस्था से सबसे पहले भ्रष्टाचार को हटाना होगा। देश में पुलिस की छवि ऐसी है कि लोग थाने में जाने से डरते हैं। उनका रवैया लोगों के प्रति दोस्ताना नही है। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार तो है ही। थाने दो कारणों से एफआईआर नहीं लेते-या तो पैसे के लिए या मामलों की संख्या बढ़ने के डर से ।

-एफआईआर दर्ज करना आॅनलाइन कर दिया जाना चाहिए। इससे आम जनता को काफी सहूलियत होगी तथा भ्रष्टाचार भी कम हो जाएगा। 

-व्यवहार परिवर्तन के लिए मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों द्वारा सारे पुलिस कर्मियों को प्रत्येक छः माह पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

-पुलिस कर्मियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों के लिए एक नई संस्था बनायी जानी चाहिए।

-हर संस्था में नयी नियुक्तियां की जानी चाहिए। दूसरे विभागों से प्रतिनियुक्ति किसी भी नई संस्था को दूषित कर देती है।

-राज्य स्तर पर इस संस्था का सर्वोच्च पदाधिकारी डायरेक्टर जनरल स्तर का होना चाहिए तथा उस पर केन्द्रीय सतर्कता आयोग के सहमति से दी नियुक्ति की जानी चाहिए। 

-आज पुलिस थाने कम मामलों के लिए पुरस्कृत होते हैं। जब कि होना यह चाहिए कि मामलों के त्वरित निष्पादन के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए। 

 

न्याय व्यवस्था में सुधार

 भारत की न्याय व्यवस्था ब्रिटिश राज का ही प्रतिबिम्ब है। सारे कानून 200 वर्ष पुराने हैं। इनमें आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 

न्याय व्यवस्था मेें कुछ खामियों को अविलम्ब दूर किया जा सकता है:-

 1. छुट्टियां बहुत ज्यादा है। इनका कोई औचित्य नही है। गर्मी की छुट्टी तो बेमानी है।

 2. सुनवाई के दौरान मुदई, मुदालय एवं गवाह को कोर्ट में उपस्थित होने के लिए तीन से ज्यादा तरीख नहीं मिलनी चाहिए।

 3. न्यायिक अधिकारी को मामला निष्पादन के लिए वार्षिक लक्ष्य दिया जाना चाहिए। 60 प्रतिशत से कम निष्पादन पर प्रोन्नती रोक देनी चाहिए। 

4. वकीलों को मुद्दे से हटकर प्रश्न पुछने की अनुमति नही होनी चाहिए। इसमें समय बर्बाद होता है।

 5. जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।

 6. राष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक सेवा का गठन किया जाना चाहिए। ऐसा होने न्यायाधीश प्रोन्नती पाकर हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट जाने चाहिए।

 7. त्वरित न्याय के लिए आवश्यक है कि विशेषज्ञ न्यायालय बनाएं जाएं। कोई जज केवल एक तरह के मामले सुनेगा तो वह उस क्षेत्र का विशेषज्ञ हो जाएगा तथा मामलों का तेजी से निष्पादन करेगा।

 8. वकील संवर्ग से न्यायाधीश में नियुक्ति बंद होनी चाहिए। जो भी वकालत करते हैं उनकी मानसिकता पैसे कमाने तथा किसी तरह केस जीतने की होती है। निष्पक्ष न्याय की मानसिकता से वे दूर चले जाते हैं। 

शिक्षा में गुणात्मक सुधार 

भारत में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सिर्फ सर्टिफिकेट बांटती है। स्कूल या कालेज से पास कर निकले युवा नौकरी की तलाश में भटकते हैं। उनके पास इतना आत्म विश्वास एवं हुनर नही होता कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य चरित्र निर्माण एवं हुनर विकास है। शिक्षा का उद्देश्य सच्चरित्र, स्वस्थ एवं हुनरवान युवा का निर्माण करना है। शिक्षा में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। संसार में प्रत्येक बच्चा प्रतिभावान होता है। बस हम उसकी प्रतिभा को पहचान नही पाते । हम बचपन से ही उसे डॉक्टर, इंजीनियर, सरकारी अधिकारी बनाने में जुट जाते हैं। बड़ा होकर वह जिस व्यवसाय में जाय, हम उसे एक योग्य इन्सान जो समाज को अधिकतम दे सके; बनाने में चूक जाते हैं। 

एक छोटी कहानी है। एक कक्षा में कुछ हाथी बन्दर, मछली, कुत्ते आदि पढ़ते थे। एक दिन शिक्षक ने उनकी योग्यता परखने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। शिक्षक सभी जानवरों को एक पेड़ के नीचे ले गया और बोला – ‘जो इस पेड़ पर सबसे पहले चढ़ जाएगा, उसे सबसे योग्य माना जाएगा’ बन्दर छोड़ कर सभी जानवर मन मसोस कर रह गए। आज हमारी शिक्षा प्रणाली में यही हो रहा है। आज शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 

अपेक्षित सुधार के लिए मेरे कुछ सुझाव है:-

 1. जब बच्चे को अक्षर, शब्द एवं गणित का प्रारम्भिक ज्ञान हो जाए तो उनकी रूचि जानने का प्रयास शुरू किया जाना चाहिए। इसमें बच्चे के माता-पिता का भी सहयोग जरूरी है। प्राथमिक शिक्षा समाप्त होते होते सभी बच्चों की रूचि प्रकट हो जाएगा और उनकी आगे की शिक्षा उनकी रूचि के अनुसार दी जानी चाहिए। गणित में सबकी रुचि नहीं होती; परन्तु स्कूलों में गणित अनिवार्य विषय है।

 2. चरित्र निर्माण पर खास जोर दिया जाना चाहिए। वर्ग 12 तक खास जोर दिया जाना चाहिए। वर्ग 12 तक ‘चरित्र शिक्षा’ एक आवश्यक विषय होना चाहिए। 

3. देश का प्रत्येक नागरिक स्वस्थ होना चाहिए। अतः स्कूलों में शारीरिक स्वास्थ्य, उचित आहार, व्यायाम, प्राणायाम, स्वच्छता तथा रोगों की प्रारम्भिक जानकारी दी जानी चाहिए। 

4. 10 वीं कक्षा के बाद रोजगार परक शिक्षा दी जानी चाहिए। सर्टिफिकेट बाटने का काम बंद होना चाहिए।

 5. वर्तमान परीक्षा पद्धति मेमोरी पर जोर देती है। 

परीक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि सृजनात्मक प्रतिभा का विकास हो। आज अमेरिका में इतने वैज्ञानिक, लेखक आदि क्यों पैदा होते जहैं जबकि 135 करोड़ की आबादी में एक-दो ही निकलते हैं। भारत में बच्चों के दिमाग में कूड़ा ठूंस दिया जाता है। बड़े होते होते उनकी सृजनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है। आज से 40 वर्ष पहले तक सरकारी स्कूल कालेज उच्च स्तर की शिक्षा देते थे। सरकारी स्कूल/कालेज में दाखिला न मिलने पर ही लोग निजी संस्थाओं में दाखिला लेते थे। आज क्या स्थिति है । सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी अपनी संतानों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला नही करवाते। क्या देश के 100 करोड़ गरीब एवं निम्न मध्य वर्ग के परिवारों को अपने बच्चों को अच्छी स्कूली शिक्षा देने का अधिकार नहीं है। 
स्वास्थ्य 

आज सरकार का सारा फोकस ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति पर है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति व्यापार बन चुकी हैं सरकारी अस्पतालों के लिए डाक्टर नही मिल रहे हैं। क्या सरकार कानून नही बना सकती कि सरकारी कालेजों से निकले डाक्टर को दस वर्षों तक सरकारी अस्पतालों में काम करना पड़ेगा और वे प्राइवेट प्रैक्टिस नही कर सकते। आज सरकार की प्राथमिता लोगों को कुपोषण से बचाने, स्वच्छता एवं स्वस्थ रहने के लिए शिक्षित करना होना चाहिए ताकि आने वाले समय में कम लोग बीमार पड़ें । उचित आहार, स्वच्छता, व्यायाम एवं प्राणायाम लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। सरकार को इस पर जोर देना चाहिए। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदिक, युनानी एवं होमियोपैथिक चिकित्सा प्रणाली सस्ती है। इसके प्रचार, प्रसार एवं अनुसंधान पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। होमियोपैथी में तो 135 रूपया की दवा में 10 रोगियों का इलाज हो सकता है।

 स्वस्थ जीवन के चार आधार हैंः-

संतुलितआहार,  शुद्ध हवा,  शुद्ध पानी,  व्यायाम एवं प्राणायाम। 

संतुलित आहार

 सबको संतुलित आहार मिले इसके लिए सबको रोजगार उपलब्ध कराना होगा ताकि अपनी आय से प्रत्येक व्यक्ति अपने एवं अपने परिवार के लिए संतुलित आहार उपलब्ध करा सके। देश में अन्न का 20 प्रतिशत उचित भंडारण के अभाव में नष्ट हो जाता है। फल एवं सब्जी का 30 प्रतिशत बर्बाद हो जाता है। घरों में लोग बचा खाना फेंक देते हैं।

एक अनुमान के अनुसार देश में रोज जितना खाना फेंका जाता है, उसे करीब 5 करोड़ लोगों की रोज भूख मिटाई जा सकती है। स्कूलों में बच्चों को अन्न एवं जल का महत्व बचपन से ही बताया जाना चाहिए। अन्न, सब्जी एवं फल की बर्बादी रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे भंडार गृह एवं शीत गृह का निर्माण कराया जा सकता है। इससे रोजगार सृजन होगा। 

शुद्ध हवा

 इसके लिए उर्जा के स्त्रोत में कार्बन गैस उत्सर्जित करने वाले इंधन की जगह सौर उर्जा, जल उर्जा एवं पवन उर्जा का उपयोग बढ़ाना होगा। पट्रोल एवं डीजल से चलने वाली गाड़ियों की जगह पर बिजली से चलने वाली गाड़ी का उपयोग बढ़ाना होगा। हवा में प्रदूषण का एक बड़ा कारण धूल कण हैं। इसको कम करने के लिए नदी तटों पर, सड़कों के किनारे तथा रेलवे ट्रैक के दोनो ओर वृक्ष लगाए जाने चाहिए। 

शुद्ध जल 

अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध पेय जल आवश्यक है। इसके लिए भूगर्भिय जल तथा नदी के जल के प्रदूषण को रोकने के लिए इमानदारी से प्रयास करना है। कृषि में रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशकों के उपयोग धीरे-धीरे घटाना होगा। इसके लिए गहन अनुसंधान की आवश्यकता है। 

व्यायाम एवं प्राणायाम 

स्कूलों ने कक्षा एक से कक्षा दस तक व्यायाम एव प्रणायाम को आवश्यक विषय के रूप में शामिल करना होगा। 

ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार 

भारत गांवों में बसता है। कुल आबादी का 69 प्रतिशत ( 2011 की जनगणना ) गांवों में बसती है। ग्रामीण जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा कृषि पर आधारित है। लोगो के पास पूरे साल के लिए रोजगार नहीं है। अगर ग्रामीण क्षेत्रों में बसने वाले 69 प्रतिशत जनसंख्या के कार्यबल को 300 दिनों का रोजगार उपलब्ध करा दें तो उत्पाद एवं सेवा में अप्रत्याशित वृद्धि होगी तथा गांवों में समृद्धि बढ़ेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन में अपेक्षित सुधार के लिए रोजगार सृजन के अतिरिक्त निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए:-

1. किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले।

 2. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार में लोग उचित जानकारी के अभाव में गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं और इलाज में उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। गांवों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा की जानी चाहिए। समय-समय पर प्रत्येक ग्रामीण के स्वास्थ्य जांच की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए ताकि किसी बीमारी का प्रारम्भिक अवस्था में ही इलाज किया जा सके। चिकित्सा के वैकल्पिक साधन यथा आयुर्वेद, युनानी एवं होमियोपैथी के उपयोग को प्रसारित करना चाहिए। 

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन

 सर्वप्रथम स्वदेशी आंदोलन चलाया जाना चाहिए।  प्रत्येक ग्रामीण अपने देश में बने उत्पाद का प्रयोग करने का प्रण ले तो वैसे उत्पाद जो बाहर से आते हैं; देश में ही बनने लगेंगे। 

वित्त वर्ष 2019-20 में हमने चीन से करीब 5 लाख करोड़ रुपये का आयात किया। अगर यह आयात बंद हो जाए और अपने देश में ही उत्पादन होने लगे तो करीब 10 लाख रोजगार सृजन निम्नलिखित क्षेत्रों में हो सकते हैंः- 

1. देश में जहां भी वर्ष में दो फसल होते हैं; उन क्षेत्रों में तीसरे फसल का उत्पादन 

2. दलहन, तेलहन, सब्जी एवं फलों के उत्पादन पर जोर

 3. हर्बल का उत्पादन

 4. डेयरी 

5. मुर्गी पालन 

6. बकरी पालन 

7. मछली पालन 

8. मधुमक्खी पालन

 9. ग्रामीण क्षेत्रों में भंडार गृह एवं शीत गृह का निर्माण

10. खादी वस्त्र निर्माण

 11. छोट-छोटे फूड प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना 

12. फर्नीचर निर्माण 

13. गृह निर्माण के स्थानीय साधनों का उपयोग 

उपरोक्त क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाने एवं उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार के द्वारा अविलम्ब कुछ उपाय किए जाने अपेक्षित है। 
1. कुशलता निर्माण 

सरकार को युद्ध स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्रों में लोगों कुशलता निर्माण का प्रयास करना होगा। यह विकास की दिशा में पहली सीढ़ी है। कुशलता निर्माण वास्तविक होना चाहिए न की सिर्फ कागजों में जैसा कि अभी हो रहा है।

2. धन की उपलब्धता 

सरकारी बैंको के पास काफी सरप्लस फंड  है। लेकिन वे ऋण देने में आना-कानी करते हैं।

इसके दो कारण हैंः-

शाखाओं में अधिकांश अधिकारियों में ऋण मुल्यांकन कुशलता का अभाव है तथा दूसरा भ्रष्टाचार। सरकार को इस पर अविलम्ब ध्यान देना होगा। अगर सरकार बैंकों की कुशलता बढ़ाना चाहती है तो उन्हें बैंकों के अध्यक्षों एवं निदेशकों की नियुक्ति में योग्य, अनुभवी एवं इमानदार व्यक्तियों का चुनाव करना होगा। अगर यह नही होगा तो सरकार लाख कोशिश कर ले; बैंक द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण वितरण में कोइ सुधार नही होगा। 
श्रमिकों के लिए अविलम्ब रोजगार उपलब्ध कराना

कोविड.19  की वजह से आज करोड़ों श्रमिक बेरोजगार हो गये हैं। सरकार को यह निर्णय लेना होगा कि जबतक रोजगार के स्थायी अवसर ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध नही कराया जाता है, सरकार द्वारा वित्त पोषित सारे आधारभूत ढांचे के निर्माण में बड़े मशीनों की जगह श्रमिकों का उपयोग किया जाएगा। सरकार का यह निर्णय करोड़ों श्रम दिवस का सृजन करेगा। लेकिन सफलता के लिए सबसे आवश्यक है राजनीति नेतृत्व की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं इमानदार प्रयास। यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

(सेवा निवृत्त सहायक महा प्रबंधक, स्टेट बैंक आॅफ इंडिया। 1974 के जे पी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी। भारतीय स्टेट बैंक अधिकारी संघ (बिहार/झारखंड) के अध्यक्ष व महासचिव रहे। समाज सुधार व समाज सेवा में सतत प्रयत्नशील।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here