गांव…जो शहर से कोसों दूर है

अनुपम कुमार
र दूसरे घर से एक के बाद एक-एक कर लोग बाहर निकलते गए। कोई गया पहुंचा तो कोई पटना, कोई दिल्ली पहुंचा तो कोई कलकत्ता। किसी को मुम्बई जाने का रास्ता दिखा तो किसी को गुजरात। देखते ही देखते बीसेक साल में गांव खाली हो गया। कई घरों में ताले लटक गए। पहले की तरह अब ना तो बैठकी लगती और ना ही हर त्योहार में नाच गान। रामलीला और नाटक खेलने-देखने का सिलसिला भी थम सा गया। कभी दिन रात आबाद रहने वाला गांव देखते ही देखते उजाड़ हो गया। यहां न तो कोई गब्बर आया और ना ही ‘छह इंच छोटा करने वाला नक्सलाइट।’ इस तरह का खौफ न होने के बावजूद धीरे—धीरे उजड़ते जाने की यह कहानी गया जिले के बीहड़ इलाके में बसे कोरियावां गांव की है। जिन लोगों ने धीरे धीरे “शहर की राह पकड़ी उनकी लिस्ट में मेरा परिवार भी “शामिल हो गया। पिताजी ने मेडिकल आदि की सुविधाएं हासिल करने के लिए दिल्ली को ठिकाना बनाया तो बड़े भाई ने रोजगार की खोज में। दसवीं की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के लिए 1990 के बाद मैं भी दिल्ली आ गया। गांव धीरे धीरे पीछे छूटता गया। धूल धूसरित कोरियावां मेरे अंदर अब भी जीवित है।

 


बीहड और दुर्गम़ इलाके में बसे इस गांव में पहुंचने का रास्ता एक समय बेहद कठिन था। यहां सीधे कोई कच्ची या पक्की सड़क नहीं जाती थी। कोरियावां पहुंचने के लिए सबसे पहले मखदुमपुर स्टेशन या मखदुमपुर बाजार पहुंचना होता था। यह गया पटना रोड पर स्थित हैं। मखदुमपुर के पास पाई बिगहा मोड़ से यहां पहुंचने का रास्ता पता चलता है। यहां से आठ किलोमीटर पश्चिम में बसे इस गांव में पहुंचने के लिए कुछ दूर सड़क तो कुछ दूर पैदल चलना होता है। पाईबिगहा तक सड़क और फिर पगडंडी और आरी पकड़कर इस गांव में जाने का रास्ता अख्तियार करना पड़ता है। बीच में दो बरसाती नदी दरधा और मोरहर तथा दो पईन भी मिल जाते है। पहले रास्ते में बाग बगीचे और तड़बन्ना देखकर अनजान आदमी डर जाता था। गुल्लर का पेड़ मिलने पर लोगों को भूत का डर भी सताने लगता था। अगर भारी बरसात हो या भीषण गर्मी तो यहां पहुंचने में मुसीबत दोगुनी हो जाती थी। हालांकि बदलते वक्त के साथ अब रास्ता थोड़ा आसान हो गया है। पांच साल पहले 2013-14 में गांव तक सड़क और फिर से बिजली पहुंच गई है।

आज से तीन दशक पहले जब कोरियावां को देखता हूं तो यह आर्थिक रूप से भले ही पिछड़ा था उतना सांस्कृतिक रूप से नहीं। उस समय गांव में कायस्थ परिवारों की संख्या ज्यादा थी। करीब 30 परिवारों में तीन—चार परिवार के पास ज्यादातर जमीनें थीं। उनमें से दो परिवार खासा समृद्ध था इनमें एक बृजनंदन लाल और दूसरे रघुवंश सहाय। ब्रजनंदन लाल अपने जमाने में हेड क्लर्क थे और नियम कानून के जानकार होने के कारण अनपढ़ों के बीच ताकतवर हो गए थे। जब नौकरी में थे और घर आते तो आठ किलोमीटर दूर मखदुमपुर स्टेशन से उन्हें पालकी पर लाया जाता था। सेवानिवृत्ति के बाद वह गांव में ही ठाठ बाट के साथ रहे। सौ से ज्यादा सदस्यों वाले बृजनंदन लाल के परिवार का संयुक्त रूप से आंगन एक ही था। इनमें से ज्यादातर पढ़ाई लिखाई और नौकरी के चक्कर में गया। पटना और कई दूसरे शहरों में जाकर रहने लगे। इनके बराबर खड़ा दूसरा परिवार रघुवंश सहाय का था। बृजनंदन लाल का परिवार 1990 के बाद ही धीरे—धीरे उजड़ने लगा। आज मिट्टी का बना घर खंडहर में तब्दील हो गया है जबकि सहाय बाबू का घर इसके बाद भी गुलजार रहा। वह भी बिहार सरकार में अधिकारी थे और समय से पहले नौकरी छोड़ गांव में ही रहने लगे। जमकर किसानी की। चार बैल हरदम घर के आगे बंधा रहता। मृत्यु से पहले दूरदराज के जमीन उन्होंने अपने सामने बेच दिए और गाय बैल भी। दस साल पहले उनकी मृत्यु हो गई। उनकी तीन बेटियां थीं जो ससुराल में हैं। दो भाई और भतीजों में से कोई भी घर संभालने नहीं पहुंचा। तीन कित्ते वाले घर पर आज ताला लटका हुआ है। कई खेत परती हैं। जो बाग बगीचे थे वह भी उजड़ गए।

तीस कायस्थ परिवारों में अब गांव में रहने वालों की संख्या घटकर सिर्फ पांच रह गयी है जो किसी तरह गुजर बसर कर रहा हैं। अन्य सभी के घर खंडहर में तब्दील हो गए हैं। इन परिवारों में ब्याह भी देर से होता था। पढाई-लिखाई और नौकरी ढ़ूंढते तीस साल कब बीत जाते इसका पता ही नहीं चलता था। युवतियों का विवाह भी तीस की उम्र के बाद ही होती थी। जबकि दूसरी जातियों में 16 साल के बाद ही हाथ पीले कर दिये जाते थे। कायस्थ समाज की संस्कृति और खान—पान अक्सर चर्चा का विषय भी बनता। उनकी बुद्धिमता और चालाकी को लेकर भी हास-परिहास चलता था।


चालीस साल पहले मिट्टी, फूस और खपरैल के इन घरों के बीच ही एक घर मेरा भी था। इसे मेरे पिता विजय कुमार ने 1969 में पक्के का बनवाया। ऐसा हवादार घर बना जिसमें गरमी में भी आराम से रहा जा सकता है। हालांकि डर के साये के बीच। जब पक्के का घर नहीं थो तो चोरी डकैती का डर नहीं था। लेकिन जब पक्के का बना तो चोरी डकैती दोनों हुई और सुरक्षा की चिंता भी खूब होने लगी। इस कच्चे पक्के घर की देखरेख में मां 36 साल तक रही। वह भोजपुर बेल्ट से मगह इलाके में ब्याह करके आई थी। मायका यानी नैहर पटना जिले में बिक्रमगंज पाली के पास अंकुरी गांव में था। अचानक 1996 में 56 साल की उम्र में कैंसर से हुई मौत ने घर के उजड़ने की कहानी लिखनी शुरू कर दी। मां की की मौत के बाद चारों पुत्रों का घर से रिश्ता धीरे धीरे कम होता गया। पांच साल बाद पिता जी भी चल बसे। वह पिता जिनके पूर्वज यहां दो पीढ़ी पहले पास के ही नोनी गांव से आकर बसे थे। पिता जी दो भाई थे। उन्होंने 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण ढाई साल जेल में बिताया और फिर लंबे अरसे तक पठन-पाठन के सिलसिले में गांव से गायब रहे। आचार्य नरेन्द्रदेव के मार्गदर्शन में काशी विद्यापीठ से शास्त्री और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए किया। पढाई के अलावा सोशलिस्ट पार्टी की राजनीति में भी बढ़ चढकर भाग लिया। छात्र आंदोलन में कई बार जेल गये। 1959 में समाजवादी शिष्ट मंडल के साथ रूस, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी और पोलैंड आदि की यात्रा की। वहां से लौटकर वापस अपने वतन आए तो उत्तर प्रदेश में राजनीतिक उलटफेर के शिकार बने।

राममनोहर लोहिया से राजनैतिक मतभेद के कारण बिहार स्थित गया जिले में अपने जड़ों की ओर लौट आए। लंबे दौर तक गैरमौजूदगी के कारण गांव वाले परिवार में एक ही बेटे को जानते समझते रहे। एक भाई का विवाह नहीं होने के कारण अब दूसरे भाई के रूप में उन पर दबाव पड़ने लगा। घर वालों की मानकर 34 साल की उम्र में विवाह किया और फिर पूरी तरह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश। खादी ग्रामोद्योग भवन में एक साल तक उच्च पद पर नौकरी की लेकिन तबादले के कारण उसे छोड़ दिया। मुख्य रूप से वह भूदान आंदोलन और ग्राम स्वराज की संकल्पना को ही साकार करने में लगे रहे। मखदुमपुर में ग्राम स्वराज आश्रम की स्थापना भी की जिसकी देखरेख में बड़े भाई यानी मेरे चाचा द्वारिका नाथ लंबे अरसे रहे। वह पास के प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे। आश्रम एक नई तरह की जीवन शैली का पाठ पढ़ाता था जिसके केन्द्र में स्वावलंबन था। मधुमक्खी पालन और जैविक रूप से खेती करने का तौर तरीका सिखाया जाता। सादगी और सहजता इस आश्रम की दिनचर्या होती थी।


पिताजी ने इस बीच गांव समाज की उन्नति को लेकर कई और कार्य किए। सन 1972 में सोशलिस्ट पार्टी से विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस की हवा होने के कारण जमानत जब्त हो गई। हमलोगों के मन में यह ख्याल अक्सर आता रहा कि अगर दोबारा 1977 में लड़ते तो विधानसभा में जरूर पहुंचते क्योंकि तब बिहार में सोशलिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी। इस दौरान वह सुदूर गांव में जाकर खेती बाड़ी का काम भी देखते रहे। इमरजेंसी के बाद गांव में अराजकता की स्थिति आ गई। कई घरों में चोरी और डकैती होने लगी। पिता जी को भी दो दो बार चोरों और डकैतों का सामना करना पड़ा। तंग आकर उन्होंने गांव से दिल्ली का रूख किया। उस दिल्ली में जहां उनके बहुत सारे राजनैतिक साथी राजनारायण, मधु लिमये, सुरेन्द्र मोहन, मधुकर दीघे और जनेश्वर मिश्र आदि ने राष्ट्रीय राजनीति में कद बना लिया था। गांव को जिस हाल में छोड़ा था वह काफी दिनों तक ठहराव की स्थिति में रहा। आगे चलकर धीरे—धीरे गांव बदहाली की ओर बढ़ता गया। हालांकि मृत्यु तक उन्हें गांव से खासा लगाव रहा।
पूरब से पश्चिम लंबे आकार में बसे इस गांव के सबसे पहले रामस्वरूप बाबू का घर है। वह पचास साल पहले गांव के मध्य में मेरे परिवार के साथ एक ही आंगन में रहते थे। लेकिन आपसी बंटवारे के बाद वह पूरब में जाकर बस गये। वह लंबे अरसे तक बेलागंज हाईस्कूल में गणित के सम्मानित शिक्षक रहे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने भी गांव को ही अपना ठिकाना बनाया। उनके घर जमकर खेती होती रही। लेकिन दो साल पहले पोते अभिसेक विशाल का चयन सिविल सर्विस में हो जाने के बाद उनके यहां भी खेती पर ग्रहण लग गया है। हालांकि सम्मान की बात यह रही कि गांव में पहली बार किसी ने इस उच्च पद तक मेहनत और प्रतिभा से पहुंच बनाई।
एक समय कायस्थ बहुल इस गांव में नाटक, रामलीला और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम समय समय पर होते रहते थे। आपसी भाईचारा और एक हद तक शांति भी थी। छोटी—मोटी लड़ाई तो होती रही लेकिन कभी खून खराबे की नौबत नहीं आई। शौक्षिक रूप से भी पिछड़ा नहीं था क्योंकि गांव में प्राइमरी के अलावा 1975 में जनता हाईस्कूल भी स्थापित हो गया था। हां, जब गांव में आम लोगों के गरीबी की बात की जाए तो उस दौर में कई ऐसे चरित्र जरूर मिल जाते थे जो एक खिल्ली खैनी या एक कप चाय के लिए दूसरे के दरवाजे पर घंटों इंतजार करते थे। पांच या पच्चीस पैसे का माचिस नहीं खरीद पाने पर दूसरे के यहां आग जलने का इंतजार करते परिवार भी मिल जाते थे। ऐसे परिवार दूसरों के चूल्हे से आंच लेकर अपना चूल्हा जलाते थे। इस भीषण गरीबी से बाहर निकलने के लिए ही कई परिवार चार दशक पहले मौका मिलने पर बेरमो या धनबाद की कोईलवरी में चला गया। कई लोग कलकत्ता जिसे अब कोलकत्ता कहा जाता है, जाने लगे। लेकिन बाद में वहां नौकरी का जुगाड़ नहीं होने या अवसर घट जाने पर बहुत सारे लोग दिल्ली या पंजाब का रूख करने लगे। जब दिल्ली में रहना खाना महंगा हो गया है तो ऐसे लोगों का यहां भी आना कम हो गया है। वे अब वे गुजरात जाने लगे हैं। वहां रहना खाना सस्ता है और काम भी आसानी से मिल जाता है। नौकरी में बचत भी ठीकठाक हो जाती है।

बीस साल पहले तक इस गांव के ज्यादातर घर मिट्टी के थे लेकिन अब ज्यादातर पक्के हो गए हैं। गांव में बाहर से खुशहाली नजर आती है लेकिन अंदर से वीरान। पक्के मकान के अलावा पीने का साफ पानी मिलने लगा है। गांव की गलियां और नलियां भी पक्की हो गई हैं। लेकिन पहले जैसी अब चहल—पहल नहीं है। बहुत सारे घर खंडहर से हो गए हैं। जो हैं उनमें भी कई घरों में ताले लटके हैं। संझा के दीया बाती करने वाला भी अब नहीं रहा। उदारीकरण और बाजारीकरण की बयार बहने के बाद गांव उजाड़ होता गया। पढे लिखे लोगों के लिए रोजगार के अवसर ना के बराबर थे। जो किसान थे उनकी दुर्गति सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण होने लगी। गांव में ना तो कोई नहर है और ना ही कोई ऐसी बड़ी नदी जिससे खेतों को पानी मिलता रहे। अगर ढंग से बरसात हुई तो किसान खेती कर लेते हैं। अगर नहीं हुई तो पूरे साल की मेहनत पर भी पानी फिर जाता है। किसानों को दुखी देख मजदूर भी धीरे धीरे मोटी पगार के चक्कर में शहर पकड़ने लगने लगे।
गांव की जातीय संरचना में कायस्थ और भूमिहार व ब्राह्मण के बीच नोनियार, कुम्हार, चमार और हरिजन जैसी जातियां भी हैं। इनके अपने—अपने टोले हैं। इनके बीच कुछ घर सिनुरिया, लोहार, दुसाध और कहार के भी हैं। मुसलमानों के भी दो चार घर थे लेकिन 1947 के बाद वे गांव छोड़कर चले गए। इस जातीय संरचना के बीच रचे बसे इस गांव में वैसी दबंगई या अहूठपन की कहानी नहीं देखने को मिलती जैसे की आसपास के कई दूसरे गांवों में मिलती है। संख्याबल के हिसाब से अब नोनियार, कुम्हार और हरिजन सबसे ज्यादा हैं।
वक्त बदला तो यह गांव भी बदला। एक समय में जहां खेती सबसे ज्यादा कायस्थों के पास थी वह अब धीरे धीरे नोनियार, कुम्हार, चमार और दूसरी जातियों के पास पहुंच रही है। पलायन सबसे ज्यादा पढ़े—लिखे युवाओं में है जिनके लायक यहां रोजगार नहीं है। अब गांव के आसरे वही बैठे हैं जो बाहर सही तरीके से एडजस्ट नहीं हो पाए या फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण गांव रूक गये। खेती अब एक फसली होने लगी है। इस कारण से धीरे—धीरे किसानी भी पहले जैसी नहीं रही। नोनियार, कुम्हार या भूमिहार परिवार में अब वही खेती से जुड़े हैं जो खेत में मेहनत मजदूरी कर लेते हैं। हालांकि सिर्फ खेती पर रहना भी कई परिवारों के लिए मुिकल हो गया है। पढाई-लिखाई छोड़ किसान के रूप में काम करने वाले प्रमोद सिंह ने खेती को घाटे का सौदा बताया। कहने लगे, खेती घर की शोभा तो है लेकिन बिजनेस नहीं। ऐसी स्थिति में गांव की अन्य जातियां या परिवार जिनका खेती से गुजारा नहीं हो पा रहा अब दूसरे धंधे को जीवनयापन का साधन बना रहे है। जैसे नोनियार जाति में पूरा परिवार ईंट बनाने के लिए बाहर शहर में या किसी भट्ठे पर जाता है। हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद कुछ माह के लिए गांव लौटता है। जो पैसे बचाकर लाता है उससे खेत खरीदता है। पढाई लिखाई पर कम खर्च करता है। हरिजन ऐसा नहीं कर पाता। यही हाल कुछ और जातियों का भी है। उनमें जो बाहर से कमाकर और कुछ बचाकर लाता है वह खेत खरीदता है, घर बनाता है। जो ऐसा नहीं कर पाता वह घर फूंक तमाश देखता है।

(दस साल तक हिंदुस्तान, नईदुनिया और नेशनल दुनिया में पत्रकारिता की। फिलहाल दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

2 thoughts on “गांव…जो शहर से कोसों दूर है”

  1. सहाय परिवार के संबंध में दी गई जानकारी सही नहीं है

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