बदलकर भी नहीं बदला मेरा गाँव

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डाॅ पवन कुमार सिंह

दुहाई कोशिका महरानी,
बाल बच्चा के जान बकस दे मइया,
बाढ़ में दूध चढ़ैबो अरु
दुहाई हे कोशिका महरानी,
बाल बुतरू के जान बकस दे माय, भादो में दूध चढ़ैबो आरु माघी पूर्णिमा में पाठी देबौ गे माय।
बाबा कहा करते थे कि कोसी को पक्का घर नहीं सुहाता। इसके दोनों किनारों पर बसे लोग यह मान कर चलते थे कि जैसे ही किसी गांव में पक्का घर बनेगा, कोसी उस गांव को काट डालेगी। मुझे याद है कि मेरे गांव में सबसे पहला पक्का घर मेरे पिताजी ने बनवाया, पर अपने रहने के लिए नहीं बल्कि अनाजों के गोदाम और पंपिंग सेट की सुरक्षा के लिए। अब भी कोसी के किनारों पर बसे हजारों हजार की आबादी में पक्के घर इक्का-दुक्का ही नजर आते हैं। हमने अपने बचपन से देखा है कि गांव के गांव फूस के घरों के हुआ करते थे। अब चूँकि फूस और बाँस की खेती नगण्य हो चली है, इस कारण मजबूरी में लोग ईंट की दीवारों पर टिन या एस्बेस्टस देकर घर बनाते हैं। मानसिक रूप से लोग तैयार रहते हैं कि कोसी गांव काट देगी और उन्हें रातों रात अपना आशियाना बदल लेना होगा।


मेरा गाँव बाघमारा है जो कुर्सेला प्रखंड, जिला कटिहार में एनएच 31 के लगभग डेढ़ किलोमीटर पश्चिम है। पाँच पीढ़ी पहले हमारे पूर्वज यहां खेती करने के लिए बासा बनाकर रहने लगे थे। बाद में परिवार लाकर बसे गाँव से एक फर्लांग बाहर अपने 22 एकड़ जमीन में। मुख्य गाँव पिछड़ी जातियों का था जो कोसी नदी के कटाव के कारण उजड़ गया। कृषि और मवेशी पालन पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण उजड़े हुए लोग आसपास ही थोड़ी-बहुत जमीनें लेकर बस गए। लड्डू की बुंदियों के समान बिखरकर हमारा गाँव एनएच 31 और कोसी नदी के बीच सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र में फैल गया है। कई गाँवों को उजाड़कर कोसी वापस पश्चिम चली गयी। मेरा घर गाँव के पूरब में था, अब बीच में आ गया है क्योंकि कोसी ने रहम कर दी और हमारे परिवार को उजाड़े बिना लौट गयी।

कोसी नदी जिसे प्राचीन काल से ही बिहार का अभिशाप माना जाता है और सचमुच कोसी जब अपने किनारों को निर्ममता पूर्वक काटती है तो भुक्तभोगियों को अभिशाप ही नजर आती है। फिर भी हमारे क्षेत्र के लोग इसे कोसिका महारानी या कोसी मैया कहकर पुकारते और श्रद्धा सहित इसकी पूजा करते हैं। हमारे गांव के सामने कोसी के उस पार सहोरा नामक गांव रातों-रात कटा था। हमें अच्छी तरह याद है कि लोग अपनी जमा पूंजी, सोने-चांदी, रुपए-पैसे तो बचा पाए। घर का एक तिनका भी बटोरना मुश्किल हो गया था। सैकड़ों मवेशी नदी में बह गए थे। यह ज्यादा पुरानी नहीं, केवल तीन दशक पहले की बात है। फिर भी कोसी पुत्रों का मोह अपनी जमीन से नहीं छूटा और उजड़े हुए लोग अपनी पुश्तैनी खेतीबारी से दूर नहीं जा सके और आस-पास ही बस गए। लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना अस्तित्व बचाने में ही लोग संघर्ष करते रहे हैं।
निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने भी इस क्षेत्र को कभी महत्व नहीं दिया और उपेक्षा करते रहे। पाँच वर्ष पूर्व मेरे गांव में बिजली आई है। सड़क अभी कच्ची ही है। गांवों में ट्रैक्टर के प्रचलन से वह कच्ची सड़क भी बर्बाद हो जाती है और कार-जीप लेकर गांव पहुंचने का सपना अभी पूरा नहीं हो पाता। ले-देकर एक तेज सवारी मोटरबाइक बच जाती है, जो किसी तरह टूटी-फूटी सड़कों के किनारे साइकिल वाली पगडंडियों से चलती है और आवाजाही का मुख्य साधन है। हर साल बाढ़ में सड़क डूब जाती है और हमारा गाँव तीन महीने तक टापू में तब्दील हो जाता है। जनप्रतिनिधि अब तक हमारे गांव को विकास की मुख्य धारा में समाहित नहीं कर पाए हैं। सरकार की विकास योजनाओं का असर गाँव पर नगण्य ही है।


हमारे गाँव में सरकारी प्राथमिक स्कूल 1962 ईस्वी में खुला जिसमें केवल एक शिक्षक की नियुक्ति की गई। वही एक शिक्षक गाँव के बच्चों को सभी विषयों की पढ़ाई करवाते थे। मैं भी उसी स्कूल का छात्र रहा। गुरुजी मेरे घर पर ही रहते थे और हमारे दरवाजे पर ही पहली से तीसरी तक की कक्षाएं चलती थीं। मेरे बाबा ने स्कूल भवन बनाने हेतु जमीन दान दी जिसमें वही प्राथमिक स्कूल अब उत्क्रमित मध्य विद्यालय के रूप में संचालित है। हाईस्कूल 4 किलोमीटर पैदल की दूरी पर तब भी था, अब भी है। आजादी के 70 वर्ष बाद भी हमारे गाँव या आस-पास के अन्य गाँवों में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या उंगली पर गिरने लायक ही है। कुछ परिवार नौकरी या व्यापार के लिए बाहर निकल आए। उनके बच्चे अच्छी तरह शिक्षित हो रहे हैं। अथवा जो अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनके बच्चे पढ़ पाए। हम भाई-बहन भी इसी कारण पढ़ पाए कि बाबूजी पढ़ाई की बहुत कद्र करते थे और बच्चों की शिक्षा के लिए जमीन बेचने से भी परहेज नहीं करते थे। पर वास्तव में अब भी हमारा गाँव शिक्षा के मामले में या कहें, साक्षरता के मामले में बहुत पीछे है। अधिकांश मजदूर निरक्षर ही हैं। 1962 में स्कूल खुलने के बाद से अबतक बमुश्किल चार दर्जन लोग मैट्रिकुलेशन और एक दर्जन लोग डिग्री तक की शिक्षा प्राप्त कर सके हैं।


कुछ बड़े काश्तकारों को अपवाद मान लें तो अब भी हमारे गांव में सीमांत कृषकों की संख्या अधिक है। ज्यादातर लोग कृषक मजदूर हैं और परम्परागत खेती में मौसमी रोजगार से अपना परिवार चलाते हैं। विगत दो दशकों से हमारे इलाके में तंबाकू और केले की खेती के रूप में व्यावसायिक कृषि की शुरुआत हुई है, पर इन दोनों फसलों की खेती काफी जोखिम भरी है। कुछ नए लड़कों ने हाल के दिनों में सब्जी की खेती शुरू की है, पर यह भी एक नाजुक किस्म की खेती होती है। मौसम और कीड़ों से सब्जियों की फसल को काफी नुकसान पहुँचता है। इस कारण अधिकतर किसान पारम्परिक खेती करना ही पसंद करते हैं। एक फायदा यहाँ की खेती को अवश्य उपलब्ध है कि यहाँ सिंचाई के लिए नलकूप लगाना काफी आसान है। एक तो बलुआही मिट्टी है और भूजल स्तर काफी ऊपर है। कृषिचक्र में बाढ़ का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। मौसम और रोग की मार जब पड़ती है तो किसानों को उसकी भरपाई करने को जेवर और मवेशी बेचने तक की नौबत आ जाती है। फिर भी खेती छोड़ कर अन्य कुछ करने का न तो विकल्प है और न ही कोई इसके लिए साहस जुटा पाता है। प्रायः हर दो-तीन साल के अंतराल पर प्राकृतिक प्रकोप के कारण खेती नष्ट हो जाती है। पर किसान धीरज और साहस का दामन नहीं छोड़ते।


अक्सर यह सुनने को मिलता है कि महाराष्ट्र और अन्य प्रांतों के किसान कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर लेते हैं। हमारे क्षेत्र में आज तक किसी किसान ने संघर्ष से भागने का यह उपाय नहीं अपनाया। अदम्य जिजीविषा, असीमित धैर्य और अथक परिश्रम के प्रतीक हैं मेरे गाँव के लोग। फिर भी उनके संघर्षों का कोई अंत नहीं है। निराला के शब्दों में कहें तो ‘‘दुख ही जीवन की कथा रही। क्या कहूं आज जो नहीं कही?‘‘
(लेखक एसएसवी कॉलेज, कहलगाँव में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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