मैंने गाँव नौलागढ़ को मरते हुए देखा है

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सलिल सरोज

बेगूसराय जिला मुख्यालय से अटठारह किलोमीटर की दूर नवलगढ़ है जो कालांतर में नौलागढ़ बन गया। यहां विग्रा पाला-3 के शिलालेख के साथ काले पत्थर की टूटी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं जो इसके ऐतिहासिक वैभव की कहानियाँ कहती हैं। हालांकि सिलसिलेवार इतिहास लिखने का काम नहीं हुआ है।

वैसे तो बेगूसराय की मिट्टी अपने अंक में एक सुदीर्घ इतिहास समेटे हुए कई ऐतिहासिक गतिविधियों की साक्षी रही है। सम्पूर्ण जिले में व्याप्त सौ से भी अधिक टीले इसकी सांस्कृतिक भव्यता की गवाही देते हैं। भूगोल, इतिहास की आधारशिला तय करता है और प्रकृति ने बेगूसराय के सीमाओं को सात नदियों से सींच कर भू-भाग प्रदान किया है, जिसपर इतिहास ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। बेगूसराय जिला पाल साम्राज्य का एक अभिन्न अंग था जिसका उल्लेख देवपाल के मुंगेर ताम्र फलक लेख में मिलता है और नारायण पाल के भागलपुर ताम्र फलक लेख में तीरभुक्ति को भी पाल साम्राज्य में दर्शाया गया है।

गांव नौलागढ़ का इतिहास

प्रो0 राधाकृष्ण चौधरी द्वारा नौलागढ़ से अन्विष्ट एक लेख में ‘क्रिमिला विषय के निवासी द्वारा प्रदत्त’ दान का उल्लेख हैं, जिसके कारण किसी ना किसी रूप में नौलागढ़ के ‘क्रिमिला विषय’ के प्रशासनिक केन्द्र होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। बेगूसराय जिला में पालवंशीय शासकों की सशक्त उपस्थिति इस क्षेत्र में पाल कला शैली में निर्मित काले बैसाल्ट पत्थर की मूर्तियों की अपार संख्या में प्राप्ति इसके साक्ष्य हैं। वीरपुर-बरैपुरा इस सांस्कृतिक चेतना का केंद्र दिखता है। पाल शासक कालान्तर में राजनैतिक परिदृश्य से भले ही ओझल हो गए हों, सांस्कृतिक पटल पर उनकी उपस्थिति उनके इस क्षेत्र में राजनैतिक अवसान के उपरान्त भी बनी रही। बेगूसराय जिला एवं पालवंशीय शासकों के आधिपत्य के सन्दर्भ में यह उल्लेख हमेशा प्रासंगिक होगा कि जहां नारायणपाल के शासनकाल (854 ई0 – 908 ई0) के 17वें वर्ष वहीं इस कालखंड के उपरांत किसी समय मिहिरभोज के नेतृत्व में हुए गुर्जर-प्रतिहार अभियान के कारण उसे गंगा के उत्तर का अधिकांश साम्राज्य गँवाना पड़ा। पालवंश की क्षीण शक्ति महीपाल (975 ई0 से 1026 ई0) के शासन काल में पुनर्जीवित हुई किन्तु राजेंद्र चोल के ‘उत्तर भारतीय अभियान’ ने उसे स्थापित होने का अवसर नहीं दिया। बेगूसराय की धरती गुप्तों के उपरांत निरंतर राजनैतिक संघर्ष एवं सत्ता के उथल-पुथल की साक्षी रही है। मुंगेर जिला 1157-58 ई0 ताल पालों के अधीन रहा पर बेगूसराय जिला के भू-भाग इस समय तक कर्णाट शक्ति के अधिकार में आ गए थे।

राहुल सांकृत्यायन का नौलागढ़ आगमन

1941 ई0 में बेगूसराय में महापंडित, बहु भाषा विज्ञ राहुल सांकृत्यायन जी का आगमन हुआ था, तो शिलालेख पर अंकित शब्दों का उनके द्वारा पाठन होने पर पता चला कि करीब 2000 वर्ष पूर्व यह गढ़ पाल वंशियों राजाओं की राजधानी थी। पहले तथा आज भी सोने, चांदी, कौड़ी साम्भ आदि – आदि पाए जाते हैं। यह स्थली साधना के परम परिवेश की तरह दृष्टिगत होती है। पालवंशीय इस किला की सुरक्षा के प्रहरी के रूप में फैला विनष्ट है, जो पालवंशीय होने की याद दिलाता है। इस गाँव में एक कुआँ है, जो बड़का कुआँ कहलाता है। यह कुआँ सार्वधिक प्राचीन है, जिसका व्यास करीब 16 हाथ है। इस कुएँ की ईंट, गढ़ की ईंट से मेल खाती है, जिससे अनुमान किया जाता है कि यह कुआँ, गढ़ काल के समकालीन है। नौलागढ़ गाँव वैंती, बलान तथा बूढी गंडक सदानीरा से आक्षप्प है। इस गाँव की पावन धरती के समीप ही बड़ेपुरा, बीरपुर, जयमंगलागढ़ है, जो पालवंशीय संस्कृति से सामंजस्य स्थापित करते हैं। यहाँ पर कपाली आदि शक्ति महाकली की प्रतिमा स्थापित है। यहां के गढ़ के उत्खनन से भाँति – भाँति के मिट्टी के छोटे – छोटे खिलौने, मोहरे, सिक्के आदि के टुकड़े प्राप्त हुए हैं, जो यहाँ की प्राचीन गौरव गरिमा का उदद्योतक है। आजकल नौलागढ़ गाँव जहां बसा हुआ है, सुनसान स्थान था। आज से करीब 450 वर्ष पूर्व काशी के समीप मरूबन गढ़ सारनाथ नामक गाँव से गौतम वंश के दिवाकर राय का यहाँ पहले पहल आगमन हुआ था और जिनका आवास चौधरी साहब की पुरानी डीह पर था जो प्राचीन तथा अर्बाचिन में भी अन्य आवासीय डीह की तुलना में ऊँचीडीह है। जैसे- जैसे दिवाकर राय को संतानों की वृद्धि होती गई, वैसे -वैसे लोग फैलते गए। उसके बाद धीरे – धीरे और वंश तथ इसी वंश के भी भूमिहार, ब्राह्मण और मैथिल ब्राह्मण और अन्य जाति के लोग आकर बसते गए।

नौलागढ़ का समृद्धशाली अतीत
सर्वप्रथम यहां एक प्राथमिक विद्यालय था। 1940 ई0 में मिडिल स्कूल तथ 1947 ई0 में हाई स्कूल की स्थापना हुई। इसके अतिरिक्त इस गाँव में अभी दो और प्राथमिक विद्यालय हैं। 1949 में एक डाकघर की भी स्थापना हुई। इस गाँव में जय श्री राम जानकी के छः मंदिर थे, जो चार ज़मींदारों के द्वारा तथा दो संतों के द्वारा स्थापित किए गए थे। उनमें से एक श्री श्री 108 श्री बाबा भागवत दास जी का मंदिर अब विलीन हो चुका है। एक श्री श्री 108 श्री तुलसी दास जी का मंदिर अभी मौजूद है। मिडिल स्कूल के पास एक पोखरा है, वह चौधरी गणेशदत्त प्रसाद सिंह द्वारा खोदवाया गया था। दूसरा जो बैटीपारा है, वह इन्हीं के वंसज ईश्वरी प्रसाद की धर्मपत्नी श्रीमती जगरूप कुमारी ने खुदवाया था। तीसरा पोखरा ताजपुर पट्टी के जोखर सिंह ने खुदवाया जो गाँव से सटे दक्षिण बेटी के किनारे है। 1925 में बने गंडक बाँध टूटने से 1950 और 1954 ई0 में भयंकर जिसके फलस्वरूप बेटी, बलान एवं गंडक नदियों में 1955-56 में बाँध बनाया गया। 1960 ई0 में बेटी एवं बलान नदियों के बाँध की सुरक्षा हेतु बलान नदी में देह पर सुलिश गेट बनाया गया। करीब 64-65 वर्षों से यहां फाल्गुन कृष्णसप्तमी को श्री महावीर जी की मूर्ती बनाकर तीन दिनों के मेले का आयोजन। ठीक इतने ही वर्षों से प्रत्येक साल विजयादशमी में मान दुर्गा जी की भी पूजा अर्चना की जाती है। 1992 ई0 में एक सहकारी भवन का निर्माण हुआ है।

गांव नौलागढ़ का वर्तमान

आज हम आदर्श और स्मार्ट शहर की बात करते हैं लेकिन गाँव नौलागढ़ आज से कोई बीस-पच्चीस साल पहले तक जीता जागता, सुन्दर और रमणीय गाँव था। शहर में काम करने वालों को गाँव से इतना प्रेम था कि लोग दो घंटे साईकिल चलाकर भी शनिवार की सुबह-सुबह गाँव पहुँच जाते और दो दिन उस जिंदगी को जीते थे। गांव की चौहद्दी में बलान और बैंती नदियां इसका श्रृंगार करती थी जहां लोग सुबह की सैर, स्नान एवं छठ के त्यौहार को सम्पन्न करते थे। कच्चे घरों की छत और दीवारों पर साग-सब्जियाँ भरी होती थीं। बच्चे फूलगोभी की डंडियों से स्लेट मिटाने का काम करते थे। बच्चे 50 पैसे में चॉकलेट ,बिस्किट और लेमनचूस खाके मस्त रहा करते थे।

पूरे नौलागढ़ गाँव में चारों तरफ शीशम, कीकड़, बरगद, पीपल, अमरुद, नीम और सैकड़ों अन्य तरह के पेड़ लगे थे जो इसके वातावरण को सुगन्धित बनाए रखते थे। खेतों में जाकर चने खाने की खुशी, गाय से दूध दूह कर पीने का आनंद सब कुछ तो था उस गाँव में। गाँव के मध्य में स्थित मंदिर की घंटियाँ जब सुबह-सुबह बजती थी तो चारों तरफ से बच्चे दौड़कर झाल-मृदंग बजाने के लिए लाइन में खड़े हो जाते थे और उन्हें इंतजार रहता था कि चीनी का प्रसाद कब मिलेगा। हालाँकि गाँव की सड़क कच्ची जरूर थी, लेकिन माँ ,दादी ,भाभियाँ अपने घर का चौखट देखे बगैर सड़क तक साफ रखती थी और कई शादियों में भोज के आयोजन का गवाह यही सड़क हुआ करती थी। गाँव के मध्य में स्थित इनार शीतल और निर्मल जल लेने आई स्त्रियों का मिलन-स्थल हुआ करता था। देवर-भाभी की नोंक-झोंक की उससे बेहतर जगह नहीं थी और उस समय किसी के मन में कोई खटास भी नहीं थी।

गाँव नौलागढ़ का सबसे लोकप्रिय स्थल था-हाई स्कूल। विशाल क्रीड़ास्थल, बड़ा-सा गेट ,कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, झंडोत्तोलन की ऊँची सीढ़ियां और लम्बीे गैलरी तथा पूरा प्रांगण हरे भरे घासों और पेड़ों से परिपूर्ण। वह स्कूल रोज ही नई-नवेली दुल्हन की तरह लगता था। ऐसा कहे कि गाँव की जान उसमें बसती थी तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उस स्कूल में हर व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ था। महिलाएँ घर के काम काज से निपट कर कुछ गप्प कर लेती थी। बूढ़े-बुजुर्ग खुली हवा का आनंद ले लिया करते थे। बच्चे कभी गेट पर झूला करते, तो कोई भैया, पिताजी से चुराके साईकिल सीखने आ जाता तो कोई बच्चा पेड़ों पर चढ़ा नजर आता तो लड़कियाँ फूल चुनती नजर आती थीं।

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गाँव के युवा मैदान में लगे वॉलीबाल कोर्ट में क्या कमाल की फ्लिप, स्मैश ,ब्लॉक और लिफ्ट करते थे। क्या माहौल होता था शाम को उस स्कूल में। मानो शाम को पूरा नौलागढ़ गाँव एकत्रित होकर जश्न मना रहा हो। लौटने के बाद किसी के चबूतरे पर हारमोनियम तो कहीं ढोलक की आवाज शाम को और भी मनोहारी कर देती थी। ऐसा लगता था जैसे यह उत्सव कभी खत्म न हो। हम किसके घरों में खाना खाते थे ,हमें खुद भी याद नहीं। इतनी भाभियाँ थी कि खाने की चिंता ही नहीं रहती थी। और सोते वक्त दादी की कहानियाँ किसी और ही दुनिया में ले जाती थी।

लेकिन शायद किसी की बुरी नजर लग गई इस जीते-जागते गाँव को। राजनीतिक उपेक्षाओं का शिकार नौलागढ़ गाँव शायद आपको भारतीय मानचित्र पर आसानी से मिले भी नहीं। इस गाँव को पक्की सड़क सन 2013 में नसीब हुई। बिजली इसके दरवाजे तक 2017 में पहुँची। नक्सलवाद का शिकार यह गाँव सामाजिक समरसता का हर पाठ भूलता चला गया। ऐतिहासिक धरोहरें फिर से इतिहास के गर्त में पहुँचा दी गईं। जातिवाद का जहर ऐसा घुला यहाँ की फिजा में कि भाईचारा, दोस्ती, यारी सब कहीं खो गए। जातिगत राजनीति ने गाँव के हृदयस्थल को छिन्न-भिन्न कर दिया। वह हाई स्कूल आज किसी विधवा जैसी प्रतीत होता है। उसके प्रांगण के सारे पेड़ कौरव के सौ पुत्रों की तरह काट दिए गए। उसका गेट, उसमें स्थित कुआं, कक्षाएं, मैदान सब उजड़ गए। कोई लालची प्रशासक उसे लूट कर चला गया। पास से बहती नदियाँ गन्दगी से भर कर सूख गयी और जो कभी सुगंध लाया करती थी, अब केवल बदबू लाती हैं। जहाँ ठण्ड में कभी साइबेरियन क्रेन आते थे, अब कोई भी नहीं आता। आपसी विवाद में खेत बंटती चले गए, कितनी हत्याएँ हो गई और गाँव में डर का माहौल बन गया।

जो युवा टूटी सड़कों से गाँव नौलागढ़ से बाहर पढ़ने के लिए गया, वह पक्की सड़कों से भी कभी लौटकर वापस नहीं आया। कृषि ,पशुपालन और बुनाई से सम्पन्न यह गाँव आज दूसरे गाँव की जीविका पर जिंदा है, रोजगार के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। गायों को खिलाने और पालने की आर्थिक क्षमता खत्म हो चुकी है। दूध-धान से परिपूर्ण यह गाँव अच्छे खाने को तरस गया। घरों की दीवारें पक्की हो गईं लेकिन वो फल, सब्जी, साग सब छूट गए। कुआँ सूख कर विवाद का स्थल बन गया और मंदिरों में महंतों ने डेरा जमा लिया। किसी त्योहार में यह गाँव मिलकर एक परिवार हो जाता था। पर अब परिवार तो कई हैं लेकिन वो सब मिल कर एक गाँव को नहीं बचा पाए। सारे पढ़े-लिखे लोग बाहर चले गए। गाँव में बेरोजगार और उद्दंड युवकों ने भय का साम्राज्य तैयार कर रखा है। जो एक आदर्श गाँव हुआ करता था अब क्या बन कर रह गया है, पता नहीं।

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अगर देश के किसी भी थाने में गाँव की हत्या का केस दर्ज होता हो तो जरूर नौलागढ़ गाँव का केस दर्ज किया जाए। क्योंकि यह गाँव खुद नष्ट नहीं हुआ बल्कि इसकी हत्या की गई है।

(कार्यकारी अधिकारी, लोक सभा सचिवालय, संसद भवन ,नई दिल्ली।)

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