पोषण और हमारी परंपरागत जीवनचर्या

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डॉ. शंभु कुमार सिंह

पोषण माह चल रहा है। पोषण से हम कई अर्थों को समझ सकते हैं। बैंकों का पोषण क्षेत्र , बच्चों का पालन पोषण , शरीर को सही तत्वों से पोषण आदि। सामान्यतया पोषण से हमारा तात्पर्य यही होता है कि हमारा आहार पोषण योग्य है या नहीं। अगर नहीं है तो कुपोषण के शिकार हो सकते हैं।
भारत की आर्थिक स्थिति, असमान विकास और अवैज्ञानिक जानकारियों का प्रतिफल है कि देश में कुपोषण की बेहद ही खराब स्थिति है। हमारे यहाँ बच्चे ,किशोर , स्त्रियां और बूढ़े यानी सभी कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण की गम्भीरता को देखते ही पोषण माह की अवधारणा साकार हुई है और हम पोषण माह आयोजित करते हैं। इसी से समझा जा सकता है कि हमारे लिए यह कितना महत्वपूर्ण मुद्दा है। किशोर आयुवर्ग के अधिकांश एनीमिया के शिकार हैं। उनके शरीर में लौह तत्व की कमी है जो हमारे शरीर केलिये एक महत्वपूर्ण अवयव है।
प्रश्न यह उठता है कि हम क्यों कुपोषण के शिकार हो जाते हैं ? जबकि हमारी आहार परंपरा बहुत ही पोषक तत्वों से परिपूर्ण रही है। हम हमेशा होलिस्टिक भोजन को प्रश्रय देते रहे हैं। तो इसके बहुत से कारण हैं। पोषण को हमारा आहार विहार बहुत प्रभावित करता है। हम ज्यों ज्यों आधुनिक होते जा रहे हैं त्यों त्यों हम अपनी परंपरा से कटते जाते हैं और अपनी पुरातन अच्छाइयों को तिलांजलि देते जाते हैं।

हमारी आहार परंपरा में आहार को पूर्णतः सम्पूर्ण बनाया गया है। यानी टोटल परफेक्ट। जो स्वादिष्ट तो है ही सस्ता भी है और पोषक तो है ही। बिहार की लिट्टी हो या दक्षिण का सांभर इडली ,या गुजरात का भाखरा या किसी भी अन्य प्रदेश का भोजन वह अपने में सम्पूर्ण है। हमारे बिहार में ही ऐसे ऐसे सुस्वादु व्यंजन हैं कि जिनका भोजन कर हम पूरा पोषण प्राप्त कर सकते हैं। महुआ और तीसी का लट्टा कभी खा कर देखिये। या फिर बगिया ही ! आप अंगुलियां चाटते रह जाएंगे। दरअसल ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट हैं वरन पोषण तत्वों से परिपूर्ण भी हैं।

हम परंपरागत रूप से अपने आहार को मूल्यवर्द्धित करना जानते हैं। चिउड़ा तो खुद वैल्यू एडेड है फिर उसको दही के साथ मिला खाते हैं तो वह और मूल्यवर्द्धित हो जाता है। हम तो चिउड़ा आम भी खा लेते हैं। सत्तू ,मकई की रोटी आदि हमारा पसंदीदा आहार रहा है। सबसे बड़ी बात है कि हमारे आहार में मोटे अनाजों की बहुतायत उपस्थिति है। हम रागी , बाजरा , कोदो आदि मोटे अनाजों को बड़े चाव के साथ खाते हैं । बल्कि हमारे बहुत से तीज त्यौहार हमें इन्हें खाने को प्रेरित करते हैं। हमारे व्रत अनुष्ठान में इनका बहुत ही सुंदर समावेश रहता है। अभी हाल ही में सम्पन्न तीज पर्व में मडुआ का सत्तू और नूनी के साग को शामिल किया गया है। बल्कि झिगुणी भी। इसका भी कारण है। हमारे व्रत त्यौहार हमें हमेशा सचेत करते हैं कि हम पोषण से पूर्ण भोजन से विमुख न हों। तो यह है हमारी संस्कृति और परम्परा जिसमें पोषण को महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है।

हमारे व्रत त्यौहार में न केवल इसे बल्कि अलुआ, सुथनी तक को जगह मिली हुई है। आखिर क्यों ,इस पर विचार कीजिये। जब हम पोषण की बात करते हैं तब केवल अनाज और फलों की चर्चा नहीं करते वरन मसालों की भी चर्चा करते हैं। हम मसालों के मामलों में सबसे अमीर हैं। हमारे आहार में ,व्यंजनों में इन मसालों की खुशबूदार उपस्थिति होती है। हल्दी ,जीरा , काली मिर्च , लाल मिर्च , अदरख , सौंफ ,लौंग , हरी इलायची , बड़ी इलायची ,तेजपत्ता , हींग, दालचीनी आदि अगणित मसालें हमारे भोजन को पोषण से पूर्ण बनाते हैं और हमें स्वस्थ। अभी हाल ही में कोरोना के कहर ने साबित कर दिया कि ये मसालें हमारे पोषण और इम्यूनिटी हेतु कितने महत्वपूर्ण हैं!

एक बात और हमारा रहन सहन भी हमारे पोषण की प्रक्रिया का एक अंग है। हम भरपूर मेहनत करते हैं तो भूख भी जबरदस्त लगती है नहीं तो बहुतों को भूख ही नहीं लगती । तो लाइफ स्टाइल भी पोषण पर प्रभाव डालते हैं। हम प्रसन्नचित हो भोजन करते हैं। भोजन के पूर्व अपने इष्टदेव को सुमरते हैं और कहते हैं कि हे ईश्वर आपने जो यह सुमधुर आहार हमें दिया है उसका कोटि कोटि आभार। हम पूरी कृतज्ञता के साथ भोजन ग्रहण करते हैं तो यह शरीर में लगता भी है। हम उनका भी आभार प्रगट करते हैं जिनके अथक मिहनत से यह भोजन हमारी थाली में आया है। तो यह है भारतीय भोजन परंपरा के पोषण का रहस्य। हम भोजन को केवल भोग से नहीं जोड़ते। इसे केवल रसना का विषय नहीं समझते वरन अध्यात्म का भी विषय मानते हैं। तो ऐसे भोजन हमारे लिए पोषण से परिपूर्ण होते हैं।

तो अब आप पूछेंगे कि आखिर क्यों भारतीयों में पोषण की समस्या है? तो इस पर आगे चर्चा करता हूँ तब तक खिचड़ी का भोग लगाने दें। आज शनिचर है और हमारी पोषण प्रणाली में आज खिचड़ी की उपस्थिति तय है। तो खिचड़ी और उसके चार यार के साथ एक सुस्वादु मुलाकात के बाद पुनः आपसे मिलता हूँ।

(जाने माने मीडिया प्रशिक्षक, प्रगतिशील किसान डॉ शंभू कुमार सिंह प्रकृति मित्र अभियान के संयोजक हैं।)

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