प्रो डॉ प्रदीप कांत चौधरी
कोरोना महामारी के दौरान गांव में हूं और यहां के जीवन की सहूलियतों से अभिभूत हूं। इस महामारी के बाद दुनिया में क्या बदलाव आएंगे, इस बात पर बड़े बड़े विद्वान घनघोर चर्चा कर रहें हैं। इस चर्चा में एक तत्व यह भी है कि शायद प्रकृतिक वातावरण के प्रति लोगों का झुकाव और बढ़े। गांव के प्रति आकर्षण में वृद्धि भी इसकी एक कड़ी हो सकती है।
दूसरी बात शहरों में मजदूरों को जो दुर्दशा इस दौर में हुई है, ज़्यादातर लोग उसे जल्दी ही भूल कर फिर से शहरों में काम पर लौट जाएंगे, लेकिन उनमें से एक हिस्सा निःसंदेह गांवों में अवसर की तलाश करेगा। हमें इन लोगों की मदद करनी चाहिए। किसी भी समाज में जब शिक्षित तबका और श्रमिक तबका मिलकर नवीन तकनीकों की खोज और उपयोग करता है तो उस समाज की उत्पादन क्षमता बढ़ती है। एक अवसर फिर मिला है। यदि जातिवाद और अत्यधिक राजनीतिक बहसों से निकल कर हमारे युवा अपने गांवों की उत्पादकता को बढ़ाने का संकल्प लें तो चमत्कार हो सकता है।
आज के गांव में रहना भी अब उतना कठिन नहीं रह गया है। ज़्यादातर गांव अच्छे या मध्यम दर्जे के सड़कों से जुड़ चुके हैं । बिजली की हालत भी बहुत बुरी नहीं है – 15 से 20 घंटे बिजली आ जाती है। मोबाइल और इंटरनेट भी काफी हद तक काम कर जाता है। तो गांव में रहना इतना बड़ा बलिदान भी नहीं रह गया है। हमलोग गांव में रह कर भी दुनिया भर के अखबार और लाइब्रेरी तक पहुंच सकते हैं। हां स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, बच्चों के स्कूल बहुत अच्छे नहीं हैं। इन क्षेत्रों में काफी काम करने की जरूरत है। पर एक चीज जिसकी सबसे बड़ी कमी है वह है : रोजगार के अवसर। यदि गांव में काम ही नहीं मिलेगा तो नौजवान वहां क्यों रहेगा। वो भी ज्यादा नहीं यदि 20 से 50 हज़ार प्रति महीने की आमदनी होने लगे तो हमारे गांव बहुत से लोगों के लिए बहुत आकर्षक बन जाएंगे।

इसलिए गांवों के विकास को एक नए तरीके आगे बढ़ाने की जरूरत है। लोगोंं को ये लगने लगा है कि गांधी के ग्राम स्वराज और ग्राम विकास के परिकल्पना के जरिए ही गांव को गढ़ा जा सकता है। लेकिन गांधी के रास्ते पर चलने का मतलब आधे टांग की धोती पहनना कदापि नहीं है। आजादी के बाद हमने एक लंबी दूरी तय की है। विकास के नये आयाम गढ़े हैं। तरक्की का नया प्रतिमान बनाया है। हो सकता है उसमें कई कमी,कमजोरियां हों। नीतिगत स्तर पर कुछ खामियां भी हों लेकिन समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता,उसे और बेहतर बनाया जा सकता है।
ऐसे में मुझे ये लगता है कि हमें गांधी के साथ ही चीन के ग्राम विकास की दृष्टि से भी सीखना होगा। चीन के लोगों ने एक स्लोगन दिया था, ‘इनसाईड विलेज, आउट साईड फार्म’। इस स्लोगन को व्यापकता में समझे जाने और इस दिशा में कुछ सावधानियों के साथ बढ़ने की आवश्यकता है। हमें गांधी के सिद्वांत और चीन के प्रयोग के बीच से न्यायपूर्ण तरीके से अपने लिए रास्ता बनाना होगा वो रास्ता हो सकता है सिर्फ खेती पर निर्भरता न रख कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को खेत से जुड़े उत्पादों के वैल्यू एडिशन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उदाहरण के लिए यदि किसी गांव में अदरक लगाते हैं या अन्य किसी फसल का उत्पादन करते हैं। तो ऐसे में केवल उत्पादन करना हमारा लक्ष्य न हो, बल्कि इसके प्रसंस्करण, पैकेजिंग,विनिमय आदि की भी व्यवस्था भी स्थानीय स्तर पर हो। ऐसे में विकास के लिए गांवो का संकुल बनाकर कर आगे बढ़ना होगा। लेकिन साथ ही साथ गांवो का संकुल तैयार करते समय इकोलॉजी का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है।
एक और महत्वपूर्ण बात जो रखा जाना चाहिए और उस दिशा में विमर्श को आगे बढ़ाना चाहिए वो ये है कि हमें विकास के राज्यवादी मॉडल पर निर्भरता खत्म करना चाहिए। यानी इस तरह के गतिविधियों में राज्य की भूमिका बहुत सीमित हो। साथ ही साथ हमें सरकार और कॉरपोरेट के इतर सामुदायिक आर्थिक मॉडल के निर्माण व विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा। सोशल सेक्टर इंटरप्राइजेज यानी सामाजिक उद्यम बड़ी संख्या में तैयार करना होगा। लेकिन यह अनवरत चलने वाली लंबी प्रक्रिया है जिसमें संस्कार और कार्य संस्कृति का विकास भी होगा।

यहां स्पष्ट कर दूं कि मैं बड़े उद्योगों के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन जो भी सुंदर और उपयोगी वस्तु कुटीर उद्योग में बनाए जा सकते हैं, उन्हें बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। मैं शहरों के खिलाफ भी नहीं हूं, लेकिन गांवों के विकास के लिए हर संभव प्रयास करने के पक्ष में हूं। हमें लाखों की संख्या में किसान कंपनी और कारीगर कंपनी बनाने की जरूरत है, जिसके माध्यम से किसान और कारीगर अपने उत्पादन और बिक्री को बढ़ा सकें।
हमें प्रोटीन उत्पादन जैसे मांस, मछली, पॉल्ट्री, डेयरी, के अलावा फलों और सब्जियों का उत्पादन बढ़ाना होगा। और उससे भी बड़ी बात हमें हर तरह के ग्रीन लाइवलीहुड के विकास पर काम करना होगा। बांस के 1500 से ज्यादा उत्पाद बनाए जा सकते हैं, तो बांस की खेती को प्रोत्साहित करना होगा।
(दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे हैं।)


