नारायण प्रसाद
उम्र के जिस पड़ाव पर मैं खड़ा हूं वहां कोई सपना शेष रखना अपने-आप को ठगना कहा जाएगा। जिदंगी के नाम पर पस्त शरीर में सांसें भर हैं। ईश्वरीय कृपा और अपने वंशजों के संवेदनशील देखभाल के कारण ही हम बूढ़ा-बूढ़ी दोनों सलामत हैं। साधारण-सा जीवन रहा है मेरा। कुछ खास नहीं। वही बातें जो एक साधारण इंसान की हो सकती हैं। लगभग नब्बे साल की उम्र में पुरानी बातों को याद करना और कुछ कहना खासा मुश्किल भरा कार्य है। याददाश्त धोखा देने लगती है।
मेरे पितामह गया जिला के इमामगंज, डुमरिया के टेकरा खुर्द के बाशिंदा थे। न सामाजिक पदवी थी, न जमींदारी और न ही कोई नामी व्यापारिक घराना। हम वैश्य समुदाय में थे। कुछ जातियां ऊपर थीं तो कुछ नीचे भी। मतलब थोड़ी-बहुत सामाजिक पूंजी वर्ण-व्यवस्था ने हमें दे रखी थी। हमारा पैतृक डीहमूल (एक तरह का गोत्र) सोनहरिया है। मेरे दादा मंगरू जी की शादी आज के औरंगाबाद के राजस्व गांव अम्बा में लखिया देवी के साथ हुई थी। लखिया देवी को कोई सगा भाई नहीं था। दादाजी होशियार थे। अम्बा का भविष्य शायद उन्होंने भांप लिया था और यहीं घर-जमाई बनकर गुजर बसर करने लगे। अम्बा चौक से चारों दिशाओं में सडकें गुजरती हैं। छठ के दिनों में देव रोड बैलगाङियों से गुलजार रहता। रातभर चर-चर मचर-मचर करती बैलगाड़ियां देव जाती रहतीं। बैलगाड़ी के नीचे लालटेन टिमटिमाता रहता। हिलते-डुलते लालटेन से गाड़ीवान को कच्ची सड़क पर चलने लायक रोशनी मिलती रहती।

मेरे पिता के गुजरने के बाद मुझे दो-तीन साल की उम्र से चाचाओं ने पाला। खासकर सुखी चाचा का मैं आभारी हूं, उन्होंने मुझे तब सहारा दिया जब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत थी। पिताजी के गुजरने के बाद सुखी बड़े थे इसलिए मेरे नाम-नारायण में सुखी जुड़ गया और मेरी पहचान सुखी नारायण के रूप में बनी। हमारी बिरादरी में ही नारायण नाम से और व्यक्ति भी थे। सुखी नारायण कहने से पहचान में अंतर हो जाता था। इस नाम का एक मतलब यह भी निकला कि मैं सुखी जी का बेटा हूं। समव्यस्कों का ऐसा समझना स्वाभाविक था। कईयों ने मेरे पिता को देखा नहीं था।
थोड़ा बड़ा हुआ तो परिवेश का बोध होने लगा। मैंने बालपन में किताबें पकड़ी। किसी तरह चौथी कक्षा तक पढ पाया। बचपन बतरे और बटाने नदी घूमते, तैरते और मित्रों के साथ मटरगस्ती करते बीता। अम्बा में दुर्गापूजा के अवसर पर ड्रामा भी होता था। टीवी आने के पहले यही सभी के मनोरंजन का साधन होता। इस अवसर पर बच्चे तो एकदम मस्त रहते। बच्चे थोड़ा बड़ा होने पर ही कुर्ता और धोती पहनते। गरीब परिवारों में आज की तरह कपड़ों की उपलब्धता नहीं होती। किसी तरह बदन ढंक लिया जाता था। घर की आर्थिक स्थिति नाजुक थी। ऐसे में मैंने जल्दी ही काम पकड़ लिया। चाचाओं के भरोसे जीवन कट नहीं सकती थी और वैसे वे भी कोई संपन्न तो थे नहीं। मुझे अपना सफर अपने बूते पूरा करना था। मनोरंजन के लिए वक्त नहीं था। बस रेडियो अब तक है पक्का दोस्त। रेडियो पर समाचार सुनना मुझे आज भी प्रिय है। इस साथी को मैं तबसे साथ रखता हूं जब रेडियो सेट रखने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था।
मां गुलजरी देवी ने मेरे संभलते ही पुतोह को देखना चाहती थी। मेरी शादी रोहतास जिला के तिलौथु के सरैंया में हुई। मां की मुराद पुरी हुई और पोती को देखने के बाद ही वह मरी। बरात बैलगाड़ी से नबीनगर स्टेशन होते हुए घिरसिंडी, बड़ेम को पार करके महुआंव के सामने से सोन नदी नाव से पार कर सरैया पहुंचा था, यह आज भी याद आता है। मुझे अम्बा से ही पालकी में बैठाकर कहार ढो रहे थे। टियां के लिए बरात महुआंव में रूका। टियां का मतलब है विश्राम। सरैंया में शामियाने को हंडा से उजियारा किया गया था। इसकी कार्य-पद्धति पेट्रोमैक्स की तरह होती थी। उसी तरह के मेंटल इसमें भी लगे होते लेकिन नीचे बती लटका होता। घड़ा की तरह टंकी होता। जलाने के लिए जमीन पर पटक कर टंकी में हवा दिया जाता। कड़ी के सहारे इसे किसी खंभे में टांग दिया जाता था। शमियाना से जब बरात उठी तो छड़ के ढांचे पर रखकर उसे माथे पर उठाकर कुछ मजदूर चल रहे थे। शमियाना के बाहर गंज (चिलम) जल रहे थे जो एक मशाल जैसी रोशनी का साधन था। गोइठा (उपला) इसका ईंधन होता था।
कुल छ संतानें हुईं हमारी। आम ग्रामीणों की तरह मैं भी परिवार नियोजन की अवधारणा से अनभिज्ञ था। ज्यादा बच्चे होना आम बात थी। बच्चों की परवरिश के बीच पत्नी के लिए साड़ी और झूला खरीदना भी महंगा पड़ता था जबकि वह पुराने में संतोष कर लिया करती थी। झूला एक प्रकार का ब्लाउज होता है जो नाभी तक रहता था। उसमें धोकरी (जेब) भी बना होता। बिना सिला हुआ साया तब चलन में था जिसके ऊपर साड़ी पहनी जाती थी। कोरदार एवं बेकोरदार सादी साड़ी मिलती जिसे अम्बा में ही स्थानीय रंगरेजों से छपवा लिया जाता था। पत्नी के नैहर जाने के वक्त एक बार उसके लिए नया खरपा मैं उधार खरीद कर लाया था। यह खरपा आज का चप्पल है। यह मोची के द्वारा चमड़ा को कई तहकर सिल कर बनाया जाता था जिसे आज सोल बोलते हैं। इसमें चमड़े का ही फीता होता था। चट्टी लकड़ी का बना होता था। चौंकिये मत। यह खड़ाऊं से अलग होता था। इसमें अंगूठें की पकड़ के लिए लकड़ी की टोंटी नहीं होती थी बल्कि चमड़े का फीता होता था। इसकी बिक्री अम्बा में दो सहोदर भाईयों-दशरथ साव (केश्वर साव) , सेवक साव (मुनीब जी) की किराना दुकानों में होती थी।
सुखी चाचा बड़ा मछलीखोर थे। कहा करते कि मांस बिना घास रसोईया। वह पानी में तैरती मछली को बरछी (एक प्रकार का भाला) से मार लाते थे। बिना जाल, बंसी लगाए मछली का शिकार, अद्भुत कलाकारी थी उनकी। अब तो ताल, पोखरा गायब होते जा रहे हैं। बतरे-बटाने का पानी भी गायब होने लगा है। बरछी से मछली मारने वाले लोग भी नहीं रहे। मैं पान बेचता था और जमींदार महाराज से इसी कारण सम्पर्क बना। महाराज बाबू ने गाड़ी परिचालन के क्षेत्र में कदम रख दिया था। मैं दुकान चलाने के साथ-साथ गाड़ी की एजेंटी भी करने लगा। उनके गाड़ी लाइन में उतरने से पहले हमारे इलाके में खाकसार मोटर के नाम से इनामुल मियां की पेट्रोल चालित गाड़ियां चलती थीं। अम्बा जो गाड़ी आती थी उसका नंबर 1181 और रंग पीला था। इसी गाड़ी को महाराज बाबू ने खरीदा और लाल रंग से रंगाने के बाद उसका नाम दुर्गा मोटर हो गया। पेट्रोल आपूर्ति में दिक्कत होने पर चारकोल से चलने वाली गाड़ी आई। यह गया से महाराजगंज के बीच चलती थी। पारंपरिक साधन टमटम, बैलगाड़ी तो थे ही ।
चारकोल गाड़ी में पीछे चैम्बर बना होता था जहां कोयला झोंका जाता था और आगे इंजन लगी होती थी। कोयला जलने से बना गैस पाइप द्वारा आगे इंजन तक जाता था और गाड़ी को ईंधन मिलता रहता था। चारकोल गाड़ी में तीन क्लास होते थे। आगे ड्राइवर के अगल-बगल वाली सीट फर्स्ट क्लास कहलाती थी। इसके टिकट पर रोमन में एक अथवा अंग्रेजी का बड़ा आई लिखा होता था। थर्ड कलास पीछे होता था। थर्ड क्लास में आयाताकार सीटें होती थीं। सेकेंड क्लास में सीटें ऐसी लगी होतीं कि पैसेंजर एक दूसरे के मुंह देखते रहते। आज के मारूति वान की सीट की तरह। अम्बा से औरंगाबाद तक का भाड़ा 6 आना होता था। गाड़ी में कुल चार गेट होते। इस प्रकार, सभी क्लास से अलग-अलग निकास की व्यवस्था थी। चारकोल गाड़ी का साइज आज के 409 गाड़ी की तरह होता था। इसका परिचालन स्वराज मोटर के द्वारा होता था जिसके मालिक गया के नारो बाबू थे। गाड़ी का रंग नारंगी था और निर्माता कंपनी थी शेवरलेट। इसी समय सड़क पर साव मोटर भी उतरा। इसकी गाडियां हरे रंग की होती थी।
तब अम्बा की आबादी का मुख्य जमावड़ा आज के सब्जी बाजार के आसपास हुआ करता था। मुस्लिम आबादी भी वहीं बसी थी। अम्बा में आज तक कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ, हिन्दू-मुसलमान का साथ-साथ रहना जारी है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि पुराना अम्बा मतलब सब्जी बाजार था। चौक के नजदीक श्रीसाव (अवध बिहारी के पिताजी) की कपड़ा दुकान थी जो आज भी आबाद है। यह जगह आबकारी विभाग की थी। उस जमाने में केवल नवीनगर रोड में ही थोड़ी भीड़भाड़ रहती थी। यहां ऐरका (अम्बा) के जमींदार परिवार के वंशज बृजकिशोर साव (विपिन) और रामविलास गुप्ता (प्रवीण) का पुराना मकान था जिसे उन्होंने निसंतान सब्जी-विक्रेता बीतन केवानी से हासिल किया था। उनके वंशजों ने आज वहां मार्केट खड़ा कर दिया है। रामविलासजी के मकान के पीछे आज सब्जी बाजार है। 1983 से पहले सब्जियां मुख्य सड़क के किनारे बिकती थीं। देव नारायण (वृजा बाबू के दादा) और उनके भाई मोद नारायण (रामबिजेश्वर सिंह के दादा) के हिस्से में अम्बा की 100 बीघे जमीन थी जिसका बड़ा हिस्सा आज भी उनके वंशजों के पास है। आज जो कुटुम्बा प्रखंड का कार्यालय बना हुआ है वह इन्हीं की जमीन पर है। आज जाति के आधार पर आवासीय पहचान धूमिल हो चुकी है।

मैने अपनी बुद्धि को किसी चौहद्दी में नहीं बांध रखा था। मैं रूपया कमाने के हर संभव तरीके को आजमाता था। इसी तरह का एक मौका था बाजार का ठेका। बाजार के डाक (ठेके) में भुलगंड़ सिंह (विवेक सिंह के दादा) के साथ मैं भी हिस्सेदार बन गया। यहां बिकने वाले अनाज, लकड़ी और तेल, सब्जी से टैक्स मिलता था। चिल्हकी के चौकीदार सहदेव पासवान वसूलकर्ता थे। जब भी मैं अपनी पत्नी के इलाज वगैरह के वास्ते कुछ दिनों के लिए घर से बाहर रहता तो सहदेव बूढा इस बीच मेरे घर और बच्चों की रखवाली करते। छोटी-सी बस्ती में घूमने लायक स्थान क्या होता। ऐसे में एक दो राउंड इधर-उधर मारकर सहदेव बूढा शाम में खुद एक ढिबरी जलाकर दरवाजे पर तंबाकू वाला गुड़गुड़ा लेकर बैठ जाते। ढिबरी मिट्टी का बना होता। इसकी बनावट चुक्का की तरह होता, ढक्कन में थोथ निकली होती, बाती को थोथ होते हुए ढक्कन में डालकर ढक्कन को चुक्के पर बैठा दिया जाता था। चुक्का में तेल भरा होता था। बाद के दिनों में मिट्टी की ढिबरी की तरह शीशे के बोतल का भी ढिबरी की तरह प्रयोग किया जाने लगा। बहुत बाद में थाना और ब्लॉक बनने के बाद यहां बिजली आयी थी लेकिन वह नियमित नहीं रहती थी। बाजार की दुकानदारी मिट्टी तेल वाले लैंप, लालटेन और पेट्रोमैक्स की रोशनी में होने को विवश थी। इस असुविधा को देखते हुए सुनार रामबलि प्रसाद (श्रवण) ने सन पचासी में बाजार में जरनेटर आधारित बिजली आपूर्ति की योजना बनाई। शुरूआती प्रस्ताव था कि दिन के बारह बजे से रात के बारह बजे तक बिजली सप्लाई होगी। फार्मूला हिट हुआ। टीवी पर रामायण धारावहिक देखना आसान हुआ और इसी हौसले का परिणाम था कि सन सत्तासी में सत्येन्द्र आजाद ने बड़े गोलाकार एंटिना वाले डिश टीवी का कनेक्शन घर-घर बांटे। अब पास के नवीनगर में बिहार की सबसे बड़ी बिजली परियोजना स्थापित की जा रही है। इसके चालू हो जाने पर उम्मीद है कि इलाके में उधोग-धंधे का जाल बिछना मुमकिन हो सकेगा। 
पुराने गया जिला के बंटकर 1973 में औरंगाबाद जिला के गठित होने के समय से इसे गढते हुए, बढ़ते हुए और बदलते हुए मैं देख रहा हूं। महाराजगंज रोड में सबसे पहले मिडिल स्कूल खुला था। मिडिल स्कूल में तब के हेडमास्टर किशोरी पांडे जी को अंग्रेजों से बहस करते देखा है। फिर इसी मिडिल स्कूल की फालतू जमीन पर डॉ सूर्यवंश शर्मा की कोशिशों से कन्या उच्च विद्यालय खुला 1980 में। यह इलाके की लड़कियों के लिए वरदान साबित हुआ। लड़के तो 1953 में स्थापित चिल्हकी उच्च विद्यालय में पढ़ लेते थे, लेकिन लड़कियां स्कूल के अभाव में पढ़ नहीं पाती थी। 1983 में नजदीक ही परसावां में जनता कालेज खुला और 1995 के आसपास मुडिला में महिला महाविद्यालय। अब तो स्कूलों की भरमार है। आज का अम्बा शिक्षा, स्वास्थ्य और अनाज व्यवसाय का हब बन चुका है। यहां किसी जाति विशेष का प्रभुत्व कायम नहीं हो सका और यही कारण है कि इसका विकास दूसरे गांवों की तुलना में अधिक हुआ। मोबाइल फोन के विस्तार और गांव-गांव में सड़कों का जाल बिछने और अम्बा की मुख्य सड़कों से उनके जुड़ने से बाजार को काफी ताकत मिली है। पीएनबी, इलाहाबाद बैंक, एसबीआई, मध्य बिहार ग्रामीण बैकों का परिचालन हो रहा है। दिक्कत यही नजर आती है कि आज तक इस क्षेत्र का विधायक कोई स्थानीय व्यक्ति नहीं बन सका। लेकिन पहले की तरह ना मुखिया चुनाव रहा और ना ही मुखिया। हमारे जमाने की तुलना में अब लोगों के आपसी सामाजिक रिश्तों में ठंडापन आ गया है। नब्बे के दशक की राजनीति ने यह दूरी बना दी है। खैर, नब्बे साल की अपनी उम्र में इतना कुछ देख चुका हूं कि सबको बयां करना मुश्किल है।
(श्री नारायण प्रसाद से बातचीत के आधार पर अमित लोकप्रिय द्वारा कलमबद्ध।)