गांव लीलते जा रहे शहर

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  • अब गांवों का रंग-रूप और चाल-ढाल बदल रहा है और शहर है कि उन्हें लीलता जा रहा है। बाजार की दस्तक इतनी मायावी है कि वह बिना किसी सूचना के गांव के सहज स्वभाव को बदलती जा रही है। गांव के लोग शहरी होने को अपना अंतिम गंतव्य ठहराने लगे हैं
    गिरीश्वर मिश्र
    भारत की पहचान ‘‘गांवों के देश’ के रूप में करने की परंपरा-सी रही है। ऐसा कह कर देश की एक खास तरह की छवि बनती थी। अभी भी क्षेत्रफल और जनसंख्या को देखें तो गांव का ही पलड़ा भारी पड़ता है। यह अलग बात है कि विकास की मानसिकता के साथ अब भारत माता को ‘‘ग्रामवासिनी’ मानने को नई पीढ़ी मानने को तैयार न होगी। आज उद्योग और विकास के मार्ग में अगर कोई गांव को बाधा के रूप में देखे तो आश्र्चय नहीं होगा। विकास की तेज रफ्तार दौड़ में फंस कर हम नगरवासी लोग गांव को भुलाते जा रहे हैं। ग्रामीण समाज इस दौड़ के हिसाब से ‘‘मिसफिट’ है। संदेश बड़ा साफ है ‘‘अगर गांव को जीना है तो उसे शहर बनना ही पड़ेगा’। चूंकि शहर ही मानव विकास की पराकाष्ठा है, इसलिए शहर में ही संभावना शेष है। दूसरी ओर गांव का जो स्वावलंबी रूप रहा है, वह इतिहास की बात होती जा रही है। अब गांवों का रंग-रूप और चाल-ढाल बदल रही है और शहर है कि उन्हें लीलता जा रहा है। बाजार की दस्तक इतनी मायावी है कि वह बिना किसी सूचना के गांव के सहज स्वभाव को बदलती जा रही है। गांव के लोग भी शहरी पैतरें और दंद-फंद में शहर को न्योता दे रहे हैं और शहरी होने को ही अपना अंतिम गंतव्य ठहराने लगे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि अपना और साथ में अन्य लोगों का भरण-पोषण करने वाले गांव की आभा सिमटती-सी जा रही है। गांव अब उजड़ रहे हैं। ग्रामीण जीवन खेती के इर्द-गिर्द आयोजित होता है और वह प्रकृति के करीब। ठीक इसके विपरीत शहर असंदिग्ध रूप से प्रकृति के क्षेत्र में मानवी दखल का स्मारक बन रहा है। दखलअंदाजी से उपजे तमाम विकार से सभी जूझ रहे हैं। उच्च होता तापमान, वन विनाश, जल-प्रदूषण और वायु-प्रदूषण आदि ऐसी ही कहानी कह रहे हैं। साथ में हिंसा, तस्करी, भ्रष्टाचार, अपराध और मादक द्रव्य के व्यसन की सौगात भी मिल रही है। आपाधापी में जीवन कैसे और कहां बीत जाता है, यह सब विकास की चमकीली और भड़कीली रोशनी में नजर ही नहीं आता। गांव का समाज पारंपरिक मूल्यों से था-बंधा था, जिसे प्रबल होते आर्थिक सरोकार तहस-नहस करने पर आमादा हैं। वहां जाति और वर्ग के, ऊंच-नीच के भाव जरूर गहरे पैठे थे पर विभिन्न जातियों और समुदायों की आपसी निर्भरता भी थी, जो रीति-रिवाज और उनसे जुड़े धर्म-कर्म की मर्यादा में परिसीमित थी। व्यक्तिवाद के बदले सामूहिक मानदंड और शास्त्र की जगह साझे के अभ्यासों में ढले लोकाचार के अनुरूप विभिन्न जातियों की खास भूमिका भी हुआ करती थी जो लोगों को खास रिश्तों में बांधती थी। खेती-किसानी में मिलजुल कर काम करना होता था। सब श्रम साध्य था, इसलिए श्रम का आदर था। सामाजिकता के अवसर उत्सव बन जाते थे। समस्याओं को चौपाल/पंचायत में स्थानीय स्तर पर ही हल करने की कोशिश की जाती थी। अब अर्थ की प्रधानता के साथ जीवन के प्रति नजरिया बदल रहा है। शहर से बढ़ता संपर्कहीनता की भावना को बढ़ा रहा है। सरकारी नीतियों और अन्य परिस्थितियों के चलते समस्याएं कितनी गहरा रही हैं, इसका अंदाजा देश के कई क्षेत्रों में हो रही किसानों की आत्महत्या के मामलों से लगाया जा सकती है। खेती झमेला होती जा रही है। बीज, खाद, सिंचाई और बाजार तक पहुंच आदि की मुश्किलों से खेती घाटे का सौदा हो जाता है। यह नियति का विधान है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकता के बावजूद विकास और प्रगति का केंद्र शहर है और गांव उपेक्षित ही बने हुए हैं। नई पीढ़ी एक आकर्षक और संपन्न जीवन की तलाश में गांव से आये दिन पलायन कर रही है।नगर और महानगर अफना रहे हैं, और वहां बढ़ती भीड़ के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। गांव छोड़ शहर पहुंच रहे अकुशल गांव के युवा वर्ग को गुजर-बसर करना मुश्किल हुआ जा रहा है। सिर्फ शहर को ही विकास की स्थिति करार (राष्ट्रीय सहारा से साभार)देने का यही स्वाभाविक परिणति थी। गांवों को नष्ट कर नगर बसाने की नीति से उपजता बेतरतीब विकास असंतुलित और अनिष्टकारी साबित हो रहा है। भविष्य की चिंता शामिल न होने से इसमें टिकाऊपन तो नहीं ही है। वह भस्मासुर की तरह स्वयं अपने ही विनाश का कारण हुआ जा रहा है। यह सबके हित में होगा कि गांवों को आधारभूत सुविधाओं से लैस कर रहने के लिए लायक बनाया जाए। प्राकृतिक सुषमा के कारण गांव जीवनदायी होते हैं। देश के विकास की योजना में गांवों को केंद्रीय बनाते हुए उन्हें विशेष स्थान देना होगा। गांव सिर्फ शहर के लिए एक संसाधन नहीं हैं।(राष्ट्रीय सहारा से साभार)

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