संचार क्रांति ने तेजी से बदला है गांव को

शिवमूर्ति

मेरे गांव का नाम कुरंग है। यह अमेठी तहसील में है। मेरी पीढ़ी के पहले के बच्चे प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के लिए नौ किलोमीटर दूर जाते थे। दर्जा एक में पढ़ने वाला बच्चा भी नौ दूनी 18 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलता था। मेरी पीढ़ी के समय स्कूल एक किलोमीटर पर आ गया। अब गांव में आ गया। मेरी प्राईमरी गांव में हुई फिर मिडिल तक की शिक्षा भी गांव में ही हुई। बाद में हम सुल्तानपुर पढ़ने के लिए चले गए। मैंने हाईस्कूल, इंटर वहां से किए। 1966 में मैनें मैट्रिक पास किया। ट्यूशन पढ़ने का मौका नहीं मिला, ट्यूशन पढ़ाने का मौका मिला। ट्यूशन मैं पढ़ाने लगा था , जब मैं इंटरमीडिएट में पढ़ता था तब से। गांव में एक जमाने में मैं अच्छा ट्यूशन करता था। पढ़ते भी थे और ट्यूशन भी करते थे। अपने गांव से 6 किलोमीटर दूर तक जाकर ट्यूशन पढ़ाते थे। वही मेरी आमदनी का एकमात्र स्रोत था – ट्यूशन । दर्जा आठ से लेकर हाई स्कूल तक ट्यूशन करते थे। टेंथ की गणित पढ़ाते थे , टेंथ की अंग्रेजी पढ़ाते थे। एक स्कूल में पढ़ाने लगे तो उसमें भी 10th तक अंग्रेजी पढ़ाते थे, गणित पढ़ाते थे। इसीलिए तो पीसीएस एलाइड में मेरा अच्छी तरह से सिलेक्शन हो गया। अंग्रेजी भी मेरी बहुत अच्छी हो गई , जबकि मैंने हाई स्कूल तक ही केवल अंग्रेजी पढ़ा था। लेकिन अंग्रेजी भी बहुत अच्छी हो गई। पीसीएस की परीक्षा में अंग्रेजी के निबंध में मुझे 100 में 60 अंक मिले थे। और एलिमेंट्री मैथमेटिक्स पीसीएस में होती है, उसमें 100 में 100 अंक मिले थे। उसका श्रेय यही है कि मैंने चार साल तक हाई स्कूल के बच्चों को अंग्रेजी और गणित पढ़ाई थी। दूसरा श्रेय देता हूं, हमारे यहां प्राईमरी स्कूल के एक शिक्षक थे पंडित देव मणि मिश्र। उन्होंने इतना अच्छा पढ़ाया कि प्राईमरी में ही उन्होंने मुझे लाभ हानि , प्रतिशत, भिन्न, ऐकिक नियम और ग्राफ, ब्याज यह सारा कुछ पढ़ा दिया था। उन्होंने मुझे इतना मजबूत कर दिया था कि भविष्य में मुझे फिर कोई दिक्कत नहीं हुई। गणित मैं जुबानी लगाता था। मतलब जो सवाल मैं जुबानी लगा लेता था ,उसी को फिर लिखकर बना देता था। मैं उनको बहुत याद करता हूं।


एकांत में पढ़ना था पसंद
बचपन से ही एकांत में पढ़ना पसंद था। हमारे दरवाजे पर महुवा के बहुत सारे पेड़ थे। और मोटे मोटे पेड़ थे। उनकी डालें इतनी लंबी चौड़ी थी कि जहां डालियां अलग होती हैं , उनके ऊपर छोटा-मोटा खटोला ले जाकर बिछाइये और उसी पर आराम से सोइए। इतना बड़ा मेरे दरवाजे पर एक पेड़ था, जिस पर चढ़कर मैं बैठता था और पढ़ता था। उस पर मान लीजिए कथरी ले लिए और ऊपर चढ़ गए। पेड़ पर चारों शाखाएं जहां से फूटी है ,वहां पर जो जॉइंट है , वहां एक आदमी के लेटने भर का रहता था। उसी पर अपनी खटिया बिछा लिए , कथरी बिछाकर पढ़ रहे हैं। वहां एकांत है और वह जगह घर से दूर भी है। कोई आवाज नहीं आनी है। तो इस तरह पढ़ते थे वहां।

“पहले मीडिल स्कूल में चालीस-पचास बच्चों की कक्षा में दो या तीन लड़कियां रहती थी। अब लगभग एक तिहाई लड़कियां इन कक्षाओं में रहती हैं। हमारी श्रीमती जी भी देखिए ! स्कूल नहीं गई थी । पढ़ाई- लिखाई नहीं जानती थी। हमारे यहां आई पहली बार और इसको पता चला कि किताब पढ़ कर के बहुत अच्छी नौकरी मिल जाती है।…. तो उन्होंने कहा , ” खेती-बाड़ी का सब काम तो मैं ही कर डालूंगी। मैं पूड भी चला लूंगी । हल जोतने के अलावा खेती का सब काम मैं कर लूंगी ।…. यदि छांव में बैठकर और चार किताबें पढ़कर के नौकरी मिल सकती है , तो वही सब करिए और छोड़िए यह सब काम मेरे जिम्में ।….और ले जाइए मेरा गाना गुरिया, इन्हें बेचकर अपनी किताबें खरीद लाइए।…। तो इनकी प्रेरणा से मैं फिर पढ़ने लगा। पहली नौकरी रेलवे की हुई। नौकरी में नियुक्त हुआ। यहां रहते- रहते और आगे की प्रेरणा भी इन्हीं से मिली । … और भी उन्होंने कहा पढ़ने के लिए और इन्हीं की प्रेरणा से मेरा पीसीएस में सिलेक्शन हुआ । इतना ही नहीं , उन्होंने खुद भी पढ़ना शुरू किया, सारा काम करके।….. तो ऐसे समझिए कि अब यह हिंदी पढ़ लेती हैं । उपन्यास पढ़ लेती हैं । अभी हावर्ड फास्ट का विद्रोही पढ़ रही है । कितनी दर्जनों ऐसे ही चर्चित किताबें, मैला आंचल, गोदान वगैरह पढ़ चुकी है ।


” हमारा घर आज भी गांव से बाहर है। आज तो घर के चारों तरफ बाउंड्री करवा दिए हैं । डेढ़ दो एकड़ की बाउंड्री हो गई है। उस समय खाई मारी जाती थी न, ऊंची मेढ़। उस की बाउंड्री थी। वैसे भी वहां किसी को आना नहीं रहता था। उधर से किसी का रास्ता नहीं था। हम किसी के दरवाजे पर जाएं तो जाएं या कोई मेरे दरवाजे पर आए तो आए। एकांत तो रहता ही था पहले भी। लेकिन उस पेड़ पर चले जाने से और एकांत हो जाता था। आप जब मर्जी उसी पर झपकी ले लिए और जब मर्जी उसी पर पढ़ते रहे। या तो मैं पेड़ पर पढ़ता था या पुआल की जो गजहर होती है ना। अक्सर किसी पेड़ के नीचे वह पुआल की टाल लगाई जाती है। हमारे यहां बबूल का एक पेड़ था । उसके ऊपर वह टाल लगा दिया जाता था। मैं उसी के ऊपर चढ़कर पढ़ता रहता था। दो – चार घंटे हो जाते थे । खास करके जब मैंने कंपटीशन का एग्जाम दिया ,रेलवे का एग्जाम दिया और 1- 2 एग्जाम दिए ।….तो मैं उसी पर चढ़कर पढ़ता था। सवेरे सवेरे उसी पर चढ़ गया, दोपहर में नहाया – धोया , खाया और फिर उसी पर चढ़ गया। तो पढ़ने का मेरा यही तरीका था। मैं चारपाई पर बैठ कर पढ़ता था। कुर्सी तो घर में थी ही नहीं। चारपाई पर बैठ कर भी बहुत कम पढ़ पाता था ,या तो पेड़ पर या गजहर पर। “


अब नहीं होते बाल विवाह
बाल विवाह पूरी तरह बंद हो गया है। 50 साल पहले लगभग सभी विवाह बाल विवाह होते थे। मेरी भी शादी बहुत कम उम्र में हुई। शादी तो हो गई थी पेट का नौ महीना जोड़कर जब हम सातवें साल में गए थे। यानी कि सवा छह साल ही रहा होगा। बहुत कम उम्र में शादी हो गई थी। “
क्योंकि उसी शादी में मेरी श्रीमती जी ने मेरी छाती में एक घूंसा मारा था, इसलिए वह घटना याद है। ऐसा है कि मेरी शादी अलग ढंग से हुई । मतलब कि लड़कावाला बारात लेकर जाता है लड़की वाले के यहां । हमारी श्रीमती जी आई थी हमारे यहां शादी करने के लिए। उनको लेकर उनके मां-बाप आए थे हमारे घर। एक तो इस मामले में अलग चीज हो गई। दूसरे इतनी कम उम्र में शादी हुई। तीसरे शादी में कान और नाक दूल्हे का छेदा जाता है। जब सुनार आया नाक -कान छेदने और मुझे भनक लग गई तो मैं भागा। बहुत सारे बच्चे को दौड़ाकर मुझे पकड़वा लिया गया । वे मुझे पकड़कर लाने लगे। मैं रोते- रोते आ रहा था। जब पास आ गया तो ढेर सारे लड़कों ने मुझे घेर लिया। और सब तो मुझे चिढ़ा रहे थे , लेकिन हमारी जो दुल्हन थी , यह भी दौड़कर आ गई अपने बाप के पास से तमाशा देखने। और सब तो मुझे चिढ़ा रहे थे उसने भी मुझे चिढ़ा दिया। हाथ तो मेरा बंधा हुआ था। उसे बच्चे पकड़े हुए थे। तो मैंने अपना पैर उसकी तरफ फेंका कि पैर से ही उसको मार दे। वह इतनी दूर थी कि पैर तो उसको नहीं लगा, लेकिन बदले में उन्होंने रिएक्ट किया कि उन्होंने एक घूंसा मेरे सीने पर दे मारा और अपने मां पिताजी के पास भाग गई। तो इसलिए यह घटना मुझे याद है , जबकि बहुत छोटी उम्र थी। मेरा नाक का छेदवाने के डर से भागना, बच्चों का पकड़ कर लाना , बच्चों का चिढ़ाना , मेरा पैर चलाना और फिर उसका मारना यह घटना याद रह गई। उसके बाद हम दोनों में कभी झगड़ा नहीं हुआ। “
खेती किसानी से जुड़ा रहा परिवार
परिवार खेती किसानी से जुड़ा हुआ था। जब मैं दर्जा सात में था तो पिताजी घर – द्वार , गिरस्थी सब छोड़ दिए। मेरे ऊपर घर गिरस्थी का सारा भार पड़ा उस छोटेपन में। मैं देखने में छोटा था और सचमुच उम्र में भी छोटा था। पिताजी चले गए थे। मेरी मां उन्हें बुलाने दो बार गई, लेकिन वे नहीं आए । मेरे पड़ोसी भी गए, लेकिन वे नहीं आए । जबकि आषाढ़ और कार्तिक में वे घूमते हुए चले आते थे । एक दो सालों से उनका यह चक्कर चल रहा था, लेकिन इस बार नहीं आए तो नहीं ही आए। “


” पहले तो दाना – पानी बांधकर निकल जाते थे। कभी 4- 6 साधुओं को लेकर चले आते थे। एक बार अपने गुरु जी को लेकर चले आए और भंडारा कर दिए। उसके बाद घर में एक पाव राशन नहीं बचा। वे यह सब करते रहते थे। साधु बड़े भुक्खड़ किस्म के होते थे। कभी वे कहते थे , ” खाने में घी और ले आओ , कड़ुवा तेल लाओ , सब्जी लाओ । ” वे खाने-पीने में बड़ा झमेला करते थे, लेकिन वह सब तो बहुत पहले घटित हो चुका था । हम लोग भी पक गए थे। कभी तो दो-चार मुस्टंडे लेकर चले आते थे और मेरी मां को कहते थे कि इनलोगों को खाना खिलाओ। ….लेकिन जब चले गए तो मेरे ऊपर गिरस्थी का सारा भार आ गया। अब खुद ही खेतों को जोतना-बोना है। खुद सारा कुछ करना है, सब कुछ देखना है। मेरा कद बहुत छोटा था और मेरी उम्र भी कम थी । उस समय जिसने मेरी सबसे अधिक मदद की उसके बारे में मैं बताना चाह रहा था । वह था मेरा मकरा बैल। सुनने में यह अजीब लगेगा कि भाई मकरा बैल क्या मदद करेगा , लेकिन सचमुच उस मकरा बैल ने मेरी बहुत मदद की। उसे नाध देता था मैं। नधवाने में भी वह आनाकानी नहीं करता था। जब नाधने के लिए जाता था मैं , तो खुद खड़ा हो जाता था और अपनी गर्दन बढा देता था। मैं खेत में जाता था और हल नाध देता था। ऐसा समझिए कि वह खुद हराई फनाता था। उसके साथ एक ललिया बैल था मेरा, तो वह थोड़ा घामड था । वह उसको भी खींच खींचकर ले जाता था । उसने मेरी बड़ी मदद की और हर प्रकार से मेरी मदद की । मेरे छोटे कद का मकरा भी किसी न किसी तरह मौका निकाल लेता था अपने काम का। इस तरह का वह बैल था। जो खेती के काम होते हैं , उसमें उसने मुझे मुक्त किए रखा। “


खेती में हुआ पारंगत
मेरे ऊपर खेती का सारा भार आ गया था तो मैं इसमें पारंगत भी हो गया। जैसे , नहर का पानी चढ़ाना खेत में। जाड़े के मौसम में, सुबह 5:00 बजे थोड़ा- थोड़ा अंधेरा रहता है। उस समय जनवरी महीने में नाले के ठंडे पानी में घुसकर आपको अपने खेत में पानी को ले जाने के लिए गडवार मिट्टी से बांधना होगा न ! जाड़े के पानी में हाथ पैर जब आप डालते हैं तो वह पैर आपका नहीं रह जाता है थोड़ी देर में। तब ठंडक में आपका पैर ऐसा कनकना जाता है कि आग लगाएं तो भी पता नहीं चलेगा और चुटकी काटिए तो भी पता नहीं चलेगा। मेरे पिताजी हमको ही कहते थे बड़े सवेरे, जब मैं छोटा ही था , ” जाओ गढ़वार काट दो और अपने खेत में पानी चढ़ा दो। ” वे नहीं जाते थे । तब भी मैं ही जाता था। या मान लीजिए पूड से सिंचाई करनी है, या मोट से सिंचाई करनी है तो भी कहते थे , ” जाओ ढुडारी – गडारी रख आओ। “


वे कहते थे , ” जाओ, उसे पानी में डुबाओ और उसे दो-चार बार हिलाओ । उसमें पानी भर जाए, तब तक बैलों को लेकर हम आते हैं। “
उसके बाद वे बैलों को लेकर आते थे । उस समय से खेती का सारा काम मैं करता रहा हूं। हम बो लेते थे गेहूं का बीज ,सरसों का बीज या धान वगैरह से संबंधित, जो भी निरन वगैरह डालना होता था, वह सब हम तभी कर लेते थे। जब बहुत छोटे थे तब से ही। “
हमारे यहां गेहूं और धान, मटर , सरसों , अरहर की फसल भी हो जाती है। ” मैं कह रहा था कि एक किसान के घर में अनाज तो होता है ,लेकिन उसके यहां नकद रुपए का अभाव होता है। उसे अपनी छोटी – मोटी जरूरतों के लिए अनाज की बिक्री पर आश्रित रहना पड़ता है। ” हमने ये सब अपने जीवन में करीब से देखा और महसूस किया है। हां, ऐसा तो एक बार मेरे साथ हुआ । फॉर्म भरना था हाई स्कूल बोर्ड का। उस समय फॉर्म भरने के लिए बारह या तेरह रुपए लगने थे। घर में पैसा नहीं था। मां ने कहा , ” जाओ प्याज बेच लाओ। बाजार- दर – बाजार बेचो। “


… तो हम गए प्याज बेचने भाई ,.…..और बैठे रह गए । किसी ने एक किलो प्याज नहीं खरीदा। एक किलो प्याज लेने वाला कोई नहीं आया। 11:00 बजे से बैठा रह गया और 4:00 बज गया । कोई प्याज लेने नहीं आया। उसी तरह लाद कर मैं उसे वापस ले आया। ऐसा भी हुआ भाई ! तो अब क्या किया जाए ? उस समय लेट फाइन लगता था। हमारी मां गांव में किसी के यहां गई और वहां से कुछ पैसा मांग कर ले आई। तो इस तरह मेरा फॉर्म भरा गया। “
किसान की संपत्ति तो अनाज है। अनाज बिकता नहीं है। बिचौलिया अनाज बिकने नहीं देता । किसान और बाजार के बीच में बिचौलिए हैं, जो किसान की फसल का लाभ मार लेते हैं। ये सब खुद के साथ गुजरी है। कई बार सामान लेकर जाइए बजार में ,लेकिन गहकी नहीं आते हैं। एक बार तो ऐसा मेरे साथ हुआ था कि माल लेकर लौट आए। पैसा कहां घर में रहता था। पैसा नाम की चीज रहती नहीं थी। अब तो थोड़े बहुत पैसे लोगों के घरों में रहने लगे हैं, क्योंकि कहीं ना कहीं से कोई ना कोई आमदनी होने लगी है। अन्यथा गांव में पैसा कहां किसी के पास रहता था, अनाज रहता था। उसी को बेचकर मेला देखिए, उसी को बेचकर कोई दवा ले आइए, उसी को बेचकर और भी कोई जरूरत आ गई है तो अपना काम चलाइए। “

परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं गांव
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। दुनिया बदल रही है तो गांव क्यों नहीं बदलेंगे? गांव निरंतर बदल रहा है। यदि 50 साल पुराने गांव के विषय में सोचें और आज के गांव को देखें तो आमूलचूल परिवर्तन नजर आएगा। लेकिन परिवर्तन दो तरह के होते हैं। उन्नति के रास्ते पर या अवनति के रास्ते पर। अच्छाई की दिशा में या बुराई की दिशा में। दोनों ही दिशाओं में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। ये दोनो तरह के परिवर्तन गांव में देखने को मिलते हैं।


पचास साल पहले गांव के बाहर मीलों तक फैले महुए के हजारों जहाजी पेड़़ थे, आम के बगीचे थे, जंगल था। इन पेड़ोें के नीचे होती थी धान की खेती। इन पेड़ों पर बसेरा लेने वाले पंक्षी और टांय-टांय की गुंजार से दिशाओं को भर देने वाली ध्वनि। उनका झुंड में उड़ना। उन पेड़ों के नीचे पशुओं के झुंड का गर्मी में विश्राम। मृगों के झुंड थे। सामूहिक स्नान के लिए बनाया गया पक्का सागर था। लेकिन आज संभवतः एक भी महुआ का पेड़ नहीं हैं या दो-चार हो सकते हैं। बाग-बगीचे घट गए, जंगल छोटा हो गया, तालाब उथले हो गए या खेत बन गए। पक्का सागर ढ़ह गया। मृग जाने कब के गायब हो चुके हैं। पशुओं के चरने के लिए कोई जगह नहीं बची है। जंगल की सीमा पर मेरे बचपन में हिरनों का एक छोटा झुंड रहता था। सबसे पहले वही समाप्त हुए। आज वीरान खेत मीलों तक फैले हैं, जिनमें धान और गेहूं आदि पैदा होते हैं, लेकिन पेड़ कट गए। आमों के बाग कट गए। बबूल का जंगल लुप्त हो गया। पहले नीलगाय के झुंड के जीवन यापन के लिए मठिया और जंगल था। अब वे खेतों के बीच डेरा डालने के लिए विवश हैं। बैलों से हल की जोताई बंद हो जाने से बैल अनावश्यक हो गए तो उन्हें कौन बांध कर खिलाए। मवेशी गांव में घट गए। इन मवेशियों से मिलने वाला गोबर और खर-पतवार मिलाकर तैयार होने वाला देशी खाद खत्म हुआ और रासायनिक खादों पर निर्भरता बढ़ी है। अब तो वे स्लॉटर हाउस पहुंचाए जा रहे हैं। हिंदूवादी सरकार आ जाने के बाद गोबध व गोवंश का वध वर्जित हो गया तो अब वे गांव की खेती उजाड़ रहे हैं। जितना नुकसान ये छुट्टा सांढ-बैल कर रहे हैं, उसका आधा भी नीलगाय नहीं करते।


पहले सिचाई के साधन कुंए और नहर थे। ट्यूबवेल आदि नहीं थे लेकिन पानी बहुत बरसता था। हफ्तों पानी की झडी लगी रहती थी। ताल-तलैया भर जाते थे। धान की फसल बरसात के पानी से हो जाती थी और रबी की फसल तालाबों में भरे पानी, नहर के पानी और कुंए के पानी से हो जाती थी। मेरे गांव के चारों तरफ आठ-दस विशालकाय तालाब थे लेकिन अब वे तालाब या तो बहुत उथले हो गए हैं या पट गए है और इनकी जगह खेत बन गए हैं। बरसात का पानी भी घट गया है। एक एक गांव में बीस बीस ट्यूबवेल लग गए हैं। और जमीन के नीचे का जल स्तर तेजी से घट रहा है। बिजली भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलती जिससे खासकर धान के पकने के समय पानी की किल्लत हो जाती है। पहले गांव में जातीय आधार पर छुआछूत और भेदभाव ज्यादा था जो धीरे-धीरे घटता जा रहा है। खान-पान की स्थिति भी बहुत अधिक सुधर गयी है। अब किसी को किसी की बेगार नहीं करनी पड़ती। मजदूरी इतनी मिलती है कि पेट भर जाता है। पर अब गांव में रोजगार हीं नहीं रह गया है तथा किसान के लिए मजदूर की मजदूरी देना असंभव होता जा रहा है। इसलिए गांव से पलायन बढ़ता गया है। लागत के अनुसार कृषि उपज का समुचित मूल्य न मिलने के कारण अब लोग खेती करने से पीछे हटने लगे हैं। परिवार में बढ़ोतरी के साथ जोत छोटी हो गयी है। इस कारण भी वह लाभकारी नहीं रह गयी है और युवा वर्ग के पलायन का कारण है।


संचार क्रांति ने तेजी से बदला गांव को
आज के गांवों की बात करूं तो संचार क्रांति हो जाने, मोबाईल आ जाने, गांव तक गूगल इंटरनेट की सुविधा पहुंच जाने से अब दूरी घट गयी है तथा सूचना तंत्र विकसित हो गया है। अब हर प्रकार की जानकारी गांव के आदमी को भी नेट के माध्यम से उपलब्ध हो रहा है। पहले शहर में काम करने वाले युवा अपने परिवार से लंबे समय तक दूर रहते थे और बातचीत करने की कौन कहे, चिट्ठी भी हफ्तों बाद पहुंचती थी। अब रोज शाम युवा पत्नी परदेशी पति से फोन पर बात कर लेती है। एक दूसरे का चेहरा भी देख लेते हैं। संचार क्रांति ने फेसबुक, नेट और मोबाइल की लत युवा पीढी़ को लगा दिया है। आमदनी का कोई जरिया है नहीं और मोबाइल, नेट का नया खर्चा उसके जिम्मे आ गया है। खेती में लाभ न होने और युवा पीढ़ी के पढ़ लिख जाने के कारण खेती में उसका मन नहीं लगता। वह मेहनत से दूर भाग रहा है और शहरों में नौकरियां है नहीं, या घटती जा रही हैं। इसलिए गांव में समय के साथ संपन्नता आने के बजाय विपन्नता और अभाव की स्थिति पैदा हो गयी है। अब पहले की तरह उत्सवधर्मिता भी नहीं रह गयी। पहले तीज, त्योहार, होली, दीवाली जैसे पर्व मन में उल्लास जगाते थे। अब त्योहार आते हें और चले जाते हैं। लोग एकाकी होते जा रहे हैं। सामाजिकता समाप्त होती जा रही है। लोकगीत मेरी रूचि में था। मैं जहां कहीं भी लोकगीत सुनता था, तो मुझे वह याद हो जाता था। शादी विवाह में औरतों की गालियां सुन लेता था तो वह गीत मुझे याद हो जाता था। कहीं कोई बिरहा गा रहा है , कहीं कोई भजन गा रहा है , कहीं कोई होलिका गा रहा है , सोहर आदि गीत महिलाएं गा रही हैं , तो वह सुनकर मुझे याद हो जाता था। “
आज भी यह अपने आप मेरी रचनाओं में आ जाता है। जहां जरूरत होती है, वह गीत स्वयं कंठ से फूट पड़ता है। जिसको आप रस कहते हैं मेरी रचनाओं में उसे भी प्रकृति दे देती है। नेचर ने दे दिया तो आप मालामाल हो गए और नेचर ने नहीं दिया तो आप अकिंचन रह गए। “
इसके साथ ही जातिवादी राजनीति ने भी लोगों के बीच एकता, मिलनसारिता और पारस्परिक सद्भाव को कम किया है। सहज विश्वास घटा है। सामूहिकता नष्ट हुई है।
सुधरी है गांव की आर्थिक स्थिति
सब कुछ होते हुए भी गांव की आर्थिक स्थिति सुधरी है। इसका कारण है कि खेती के अलावा अन्य आय के स्रोत भी खोजे गए हैं। पहले गांव में साइकिल ही इज्जत की सवारी थी। अब घर-घर मोटरसाइकिल आ गई है। चार-छह कारें हर गांव में आ गई है। पहले पक्के मकान दो-चार ही थे। अब गांव में आधे से ज्यादा मकान पक्के हैं। आगे पक्के ही बन रहे है। पशुधन का घटना जरूर चिंता का विषय हैै।
शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार की है दरकार
जहां तक शिक्षा की बात है लोग पहले की तुलना में बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं और दलितों के बच्चे भी स्नातक और स्नातकोत्तर कर रहे हैं। गांव में सबसे खराब स्थिति प्राइमरी शिक्षा की है। पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो गयी है। विद्यालय में सारे शिक्षक रोज पढ़ाने नहीं जाते। इसका नतीजा है कि हमारी अगली पीढ़ी अयोग्य हो रही है। यह सबसे बड़ा राष्ट्रीय और जातीय नुकसान है। प्राइमरी शिक्षा को पटरी पर लाना सभी जिम्मेदार लोगों का पहला उद्देश्य होना चाहिए।
दूसरे क्रम पर खराब स्थिति स्वास्थ्य की है। चिकित्सा सुविधा गांव में न के बराबर है। योग्य डॉक्टर गांव में रहना नहीं चाहते और गांव का आदमी पूरी तरह झोला छाप डॉक्टरों की दवाई के भरोसे है। तीसरे क्रम पर खराब स्थिति सुरक्षा की है। गांव में आदमी अपने को असुरक्षित समझता है। इसलिए जैसे ही कुछ सक्षम होता है, शहर में मकान बनाने की सोचने लगता है। शहरों में जिस तेजी से प्रदूषण बढ़ रहा है, वह दिन दूर नहीं जब शहर से गांव की ओर शुद्ध हवा-पानी के लिए भागदौड़ शुरू होगी। इसलिए जरूरी है कि गांव में नियम कानून की स्थिति व शिक्षा तथा चिकित्सा की स्थिति को यथा समय सुधारने की दिशा में प्रयास किया जाए ताकि गांव सामाजिक संतुलन साधने में कामयाब हो सके।
(वरिष्ठ कथाकार,उपन्यासकार,गांव गंवई के ​जीवन को नजदीक से देखने,समझने व रचने वाले शिवमूर्ति प्रशासनिक अधिकारी रहे।)

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