लॉक डाउन में गंगा हुई निर्मल, कृष्ण लीला का ग्वाह बनी यमुना भी हुई साफ

आलोक रंजन,युवा पत्रकार
बनारस: सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देशवा से,
मोरे प्रान बसे गंगा धार रे बटोहिया.
गंगा रे जमुनवा के झगमग पनिया से,
सरजू झमकि लहरावे रे बटोहिया.
ब्रह्मपुत्र पंचनद घहरत निशिदिन,
सोनभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया.
अपर अनेक नदी उमडि घुमडि नाचे,
जुगन के जदुआ चलावे रे बटोहिया।

इस कोरोना महामारी के दौर में बटोहिया को आने जाने की इजाजत नहीं है, और न ही काम धंधे की। न फैक्ट्रियां चल रही हैं, न रेल, न बस। लेकिन इन सब का परिणाम ये हुआ है कि भारत के लाखों लाख लोगों का प्राण जिस गंगा और जमुना और ब्रम्हपुत्र के झगमग पानी के अभाव में मरनासन्न हो रहा था उसमें उठती लहर बटोहिया भी मगन है और राम की मैली गंगा और लीलाधर कृष्ण के लीला की ग्वाह बनी यमुना रूपी नदी इस भारत भूमि घुमड़ि नाच रही हैं और कल तक इन नदियों में प्रदूषण को लेकर हाय तौबा मचाने वाले और इनके पुर्नजीवन के बहाने लाखो लाख डकार जाने वाले लोग व संस्थान भी हैरान परेशान है कि आखिर ये चमत्कार कैसे हुआ। आखिर इस लॉकडाउन में जहां सब तरफ से परेशानी की खबरें आ रही हैं वहां इन नदियों के दिन कैसे बहुर रहे हैं। यूं भी कह सकते हैं कि नदियों का नहीं जनाब भारत की सांस्कृतिक विरासत के दिन बहुरने के संकेत हैं क्योंकि बिना और गंगा और यमुना के कलरव के भारतीय सभ्यता की कल्पना भी बेमानी है।

खबर ये है कि कोरोना वायरस के मद्देनजर लागू देशव्यापी लॉकडाउन से एक ओर जहां इंसानों की जिन्दगी ठहर सी गई है वहीं, प्रकृति के लिए यह वरदान साबित हो रही है। वायु और ध्वनि प्रदूषण तो कम हुआ ही है, साथ ही नदियां भी स्वच्छ हो रही है। लॉकडाउन के दौरान गंगा नदी पहले से अधिक साफ हुई है और नदी के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है, मानों पापियों के पाप धुल गये हों और निर्मल हो गयी हो गंगा। कुछ यही आलम यमुना का भी है। लीलाधर कृष्ण के लीला का ग्वाह बनी और दिल्ली दरबार के अनेकानेक राज में अपने में समाहित कर लेने वाली यमुना का मैला आंचल अब साफ होने लगा है। लॉकडाउन के एक माह में ही नदी की 75 फीसद तक गंदगी कम हो गई है।
गंगा के सफाई पर क्या है दावा
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा का कहना है कि लॉकडाउन के कुछ ही दिन बाद हमने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और संबंधित राज्यों के साथ बैठक की और उनसे नदी जल की गुणवत्ता की निगरानी के संबंध में अध्ययन पर चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘इसके आधार पर जल गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों ने अप्रैल में गंगा नदी के जल के अलग अलग स्थानों से नमूने एकत्र किए और इन्हें अध्ययन के लिये भेजा गया। एनएमसीजी के महानिदेशक ने कहा, ‘इसकी प्रारंभिक रिपोर्ट हमें प्राप्त हो गई है और इससे स्पष्ट हुआ है कि गंगा नदी पहले की तुलना में साफ हुई है।’ उन्होंने कहा कि गंगा नदी के जल में अनेक स्थानों पर घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर काफी बढ़ गया है जो जल के साफ होने का स्पष्ट संकेत है। मिश्रा ने कहा कि कई स्थानों पर नदी जल में जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) का स्तर पहले की तुलना में कम हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि नदी जल की गुणवत्ता बेहतर हुई है। उन्होंने बताया कि जल में घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर 5 मिलीग्राम / लीटर से अधिक होना चाहिए और बीओडी का स्तर 3 मिलीग्राम / लीटर से कम होना चाहिए । इन दोनों मानकों पर गंगा नदी के जल की गुणवत्ता पहले से बेहतर हुई है।


केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, ज्यादातर निगरानी केद्रों में गंगा नदी के पानी को नहाने लायक पाया गया है। सीपीसीबी के वास्तविक समय के निगरानी आंकड़ों के अनुसार, गंगा नदी के विभिन्न बिन्दुओं पर स्थित 36 निगरानी इकाइयों में करीब 27 बिन्दुओं पर पानी की गुणवत्ता नहाने और वन्यजीव तथा मत्स्य पालन के अनुकूल पाई गई। एनएमसीजी के महानिदेशक ने कहा कि लॉकडाउन लागू होने के दौरान जल मल शोधन संयंत्र (एसटीपी) का परिचालन सुचारू रूप से हो रहा है और नदी जल के साफ होने के कारणों में यह भी महत्वपूर्ण है । ऐसा इसलिये क्योंकि संयंत्र सुचारू रूप से चलने से नदी में जल मल नहीं जा सका । उन्होंने यह भी बताया कि 20 अप्रैल से जल मल शोधन संयंत्र (एसटीपी) एवं इससे जुड़ी परियोजनाओं पर 7-8 स्थानों पर काम भी शुरू हो गया है । इनमें खास तौर पर कानपुर और प्रयागराज शामिल हैं।

यमुना के सफाई पर क्या है दावा
हाल ही में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने यमुना के 33 फीसद तक साफ होने की बात कही थी, लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हर बैराज पर यमुना का साफ पानी बहता हुआ नजर आ रहा है। इसकी वजह सामान्य दिनों की तुलना में लॉकडाउन के दौरान यमुना में डाली जाने वाली गंदगी में कमी आना है। वैज्ञानिक डॉ. यशपाल यादव के नेतृत्व में सीपीसीबी की टीम ने लॉकडाउन के दौरान पल्ला से वजीराबाद बैराज (22 किमी), वजीराबाद से निजामुद्दीन ब्रिज (13.5 किमी) और निजामुद्दीन ब्रिज से ओखला बैराज (7.5 किमी) के हिस्से से पानी के नमूने उठाए। इनकी तुलना लॉकडाउन से पूर्व के आंकड़ों से की गई। इसमें अभूतपूर्व परिणाम सामने आए। तीनों ही हिस्सों में पानी की गुणवत्ता काफी हद तक बेहतर हो गई।

सोशल मीडिया पर थी चर्चा
सोशल मीडिया के इस दौर विशेष रूप से कोरोना काल में जहां सोशल मीडिया को महामारी से संबंधित झूठी खबरों को फैलाने का माध्यम बताया जा रहा है और इस तरह की खबर देने वालों को दंडित किये जाने की बात कही जा रही है, वहीं इसी सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने लॉक डाउन के दौरान गंगा और यमुना के पानी के साफ होने की बात कही तो सरकार का ध्यान भी इस बात गया है और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि, “लॉकडाउन के चलते नदियों में प्रदूषण को लेकर आए परिवर्तन का हम अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उद्योगों से होने वाले जल प्रदूषण और वर्तमान हालात का अध्ययन किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि लॉक डाउन के दौरान यमुना का पानी भी साफ हुआ है लेकिन कहा कि इसका एकमात्र कारण उद्योगों का बंद होना नहीं है। उनके मुताबिक़ पिछले दिनों बरसात का पानी भी यमुना में आया है, जिससे नदी साफ हुई है।
गंगा बेसिन के अन्य नदियों के नमूने भी लिए जा रहे

पहले चरण में गंगा और यमुना नदी के अलावा गंगा बेसिन राज्यों की अन्य नदियों के पानी की भी जांच की गई। गंगा बेसिन में 11 राज्य आते हैं. जिनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश शामिल हैं। पानी के नमूने लेने का काम राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर कर रहा है। जांच के ज़रिए पानी मे केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (COD) और अमोनियम नाइट्रेट की मात्रा मापी गयी। उम्मीद थी कि जांच का परिणाम अगले 10 – 15 दिनों में आयेगी। और अब जब जांच का परिणाम आया है तो नतीजे चौंकाने वाले हैं।

उद्योगों का प्रदूषण कम हुआ है

लोगों का कहना है कि लॉकडाउन के चलते बन्द पड़े कल कारखानों के चलते उससे निकलने वाला कचरा नदियों में कम जा रहा है लेकिन नगरों और महानगरों के सीवेज का गंदा पानी अभी भी गंगा और यमुना जैसी नदियों में जाना जारी है। उत्तर प्रदेश , बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में गंगा में जाने वाला 80 फ़ीसदी गन्दा पानी सीवेज से ही जाता है। जहां तक यमुना का सवाल है इस रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाउन से पहले पल्ला बैराज पर डिजोल्व डिमांड (डीओ) 71.1 मिलीग्राम प्रति लीटर और बॉयोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 163 मिलीग्राम प्रति लीटर थी। लेकिन अब यह क्रमश: 8.3 और 89 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गई है यानी डीओ में 51 जबकि बीओडी में 75 फीसद कमी दर्ज की गई है। इसी तरह से ओखला बैराज पर बीओडी में 77, नजफगढ़ ड्रेन पर 29 और शाहदरा ड्रेन पर 45 फीसद तक की कमी देखने को मिली है। इससे यमुना साफ नजर आ रही है।

यमुना साफ होने की प्रमुख वजह

22 नालों का सीवेज छोड़कर और कोई कचरा लॉकडाउन के दौरान यमुना में नहीं जा रहा।
दिल्ली के 28 औद्योगिक क्षेत्रों से प्रतिदिन निकलने वाला 213 मिलियन गैलन पूर्णतया बंद है।
यमुना में पूजा सामग्री डालने, नहाने, कपड़े धोने और सॉलिड वेस्ट डालने की प्रक्रिया भी बंद है।
हरियाणा से नियमित तौर पर पानी भी छोड़ा जा रहा है, जो पहले से जमा गंदगी को भी बहा ले जा रहा है। लॉकडाउन के दौरान यमुना का पानी काफी साफ हुआ है और इससे भविष्य के लिए भी सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं। यह स्थिति आगे भी बनी रहे, इसे लेकर ठोस प्लानिंग बनाए जाने की जरूरत है।

लॉकडाउन के बाद गंगा में देखने को मिल रहा बदलाव
 आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर डॉ पीके मिश्रा का कहना है कि, ‘गंगा में अधिकतर प्रदूषण कंपनियों की वजह से होता है और लॉकडाउन की वजह से उनके बंद होने के बाद यहां एक महत्वपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है।  15-16 मार्च को हुई बरसात के बाद गंगा के जलस्तर में भी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, अगर हम लॉकडाउन के पहले और बाद के हालात पर नजर डालें तो बदलाव साफतौर पर देखा जा सकता है।’ वहीं वाराणसी के स्थानीय लोगों के मुताबिक, लॉकडाउन की वजह से लोग गंगा स्नान नहीं कर रहे हैं और फैक्टरियां भी बंद हैं, इसकी वजह से गंगा का पानी बहुत साफ नजर आ रहा है। लॉकडाउन की वजह से ऐसा बदलाव देखकर खुशी हो रही है। कानपुर के लोगों का भी गंगा को लेकर कुछ ऐसा ही मानना है।

 

गंगा यात्री डॉ निलय उपाध्याय कहते हैं कि इन दिनों खुश हूं। गंगा को देखता हूँ तो लगता है जैसे उसका ममता से भरा गंग पन वापस आ गया हो। यह एक बदलाव है जिसे करोना के बहाने स्वयं प्रकृति ने घटित किया है। कितना कठिन समय था। पानी पीने लायक नही था। हवा सांस लेने लायक नहीं थी। धरती फसल देने से इनकार कर रही थी। इस तरह के माहौल में गंगा का लौट आना एक सुखद सकारात्मक घटना की तरह है। जिन लोगो ने इस बदलाव को देखा है। वे नही चाहेंगे की दुबारा गंगा इन कसाइयो के हाथ में जाय | अब अगर सरकार इसके लिए दुबारा प्रयास करेगी तो लोगो से प्रतिकार का नया स्वर उठेगा। वे शुद्ध हवा और शुद्ध जल को किसी कीमत पर नहीं खोना चाहेंगे।

कुल मिला के यह कहा जा सकता है कि कोरोना महामारी से जान भी मुश्किल में है और जहान भी लेकिन प्रकृति गुलजार है। अपने मूल स्वरूप में दिख रही है जिसका फायदा अंततोगत्वा मानव मात्र को ही होना है।

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