गांव के बदलाव में पलायन की बड़ी भूमिका

अरविन्द मोहन

पूर्वी चम्पारण में सुगौली के निकट मेरा गांव पजिअरवा पर्याप्त चर्चित और मुझसे काफी ज्यादा नाम और धन कमाने वालों का गांव है। पर मजदूरों के पलायन सम्बन्धी अपने अध्ययन के दौरान मुझे इस गांव का जो परिचय मिला वह काफी कुछ नया था। यह अध्ययन मैंने बिड़ला फाउंडेशन के फेलोशिप के तहत 1994-95 में किया था। बीस साल होने पर मैंने अपने आंकडों और अध्ययन के ठिकानों को दोबारा देखा तो यह नया परिचय ज्यादा गहरा हुआ। पहली बात तो यही चौंकाने वाली रही कि गांव के करीब पचीस फीसदी समर्थ नौजवान रोजगार के लिए बाहर गए हैं। परिवार लेकर निकले लोग केवल वही हैं जो सरकारी या उसी तरह की नौकरियों में गए। मेरे अध्यापक पिता और बड़े चाचा करीब सत्तर साल पहले अर्थात इस अध्ययन से पचासेक साल पहले जब निकले थे तब उन्हें ताने सुनने पड़ते थे कि इतने बड़े परिवार का, इतनी खेती वाले परिवार का आदमी नौकरी के लिए बाहर जाएगा। हमारी खेती बहुत अच्छी मानी जाती थी और है भी। तराई की अच्छी जमीन और भरपूर पानी के चलते सौ मन बीघा धान होना आम था। इन दो लोगों ने गांव में अंगरेजी पढाई और सरकारी नौकरी वाली परम्परा शुरू की जिससे सौ से ज्यादा लोग निकले होंगे। पर अस्सी के थोड़ा पहले से जब गांव के कुछ नौजवान अपने नाते-रिश्तेदारों के साथ पंजाब कमाने जाने लगे तब से एक नई बाढ़ आ गई है। आज पन्द्रह सौ से कुछ ऊपर आबादी वाले गांव के कम से कम साठ फीसदी लोग बाहर हैं। गांव के भोज में पहले कई मन चावल लगता था, अब होली-छठ न हो तो मन तक चावल पहुंचता ही नहीं। और जब दोबारा अध्ययन के क्रम में अपने चचेरे छोटे भाई सर्वेश के पास बैठकर बाहर जाने वालों का हिसाब लगा रहा था तो उसके इस कथन से चौंका कि भैया दस आना लोगों के बाहर जाने से चैन है वरना गांव नरक हो गया होता। हम अभी तक शहर और खास तौर से शहरों में प्रवासी मजदूरों की बस्तियों के नरक को लेकर ही परेशान रहा करते थे।

खेती भी बिगड़ी है। साठ के दशक में बने नहर से पानी तो कभी नहीं मिला, सिकरहना(बूढी गंडक) और तिलावे नदियों से पैन के जरिए होने वाली सिंचाई व्यवस्था चौपट हुई। कोई और काम नहीं बढ़ा है-आम के बाग और मछली के तालाब खत्म से हो गए हैं। कुछ दुकानें जरूर खुली हैं जो पुरानी दूकानों से संख्या में ही आगे नहीं हैं, सेवाओं में भी आगे हैं। प्रवासी मजदूरों द्वारा भेजे पैसे से स्वास्थ्य, दवा, मोबाइल, डीजल जैसी नई चीजों की दुकान खुली हैं। नीतीश जी की शराबबन्दी के पहले दारू भी खूब मिलती थी। पर दारू से ज्यादा डीजल बिकता है गांव में-एक रुपए लीटर महंगा, बाहर से लाकर। सारी खेती बैल और आदमी के श्रम की जगह डीजल पर निर्भर हो गई है। डीजल ही क्यों, बीज, खाद, कीटनाशक समेत हर कुछ पैसा फेंको तमाशा देखो हो गया है। इस बीच गांव में ब्राह्मणों से खेती छिनती गई है और मध्य जातियों के हाथ में गई है। इनके यहां से दो लडके बाहर गए तो साल में दो-चार कट्ठा खरीदने का क्रम शुरु हो जाता है। ब्राहमण बाहर बसने लगते हैं या न्यौता-हकार और तेल-फुलैल पर ज्यादा खर्च करते हैं। दलितों में पहले पलायन कम था-अब भी मध्य जातियों से कम है, पर वे न तो जमीन खरीदते हैं न बाहर बसते हैं। उनकी कमाई ज्यादा जूता-छाता में जाती है, दारू-ताडी पर अनुपात से ज्यादा खर्च होता है। रेडियो बाजा पर होता है।

दूसरा बड़ा बदलाव पक्के मकानों में हुआ है। बाहर की कमाई और इन्दिरा आवास योजना जैसी स्कीमों से पक्के मकान-कमरे बनने का क्रम बहुत तेज हुआ है। हरिजन टोला छोड़कर बाकी जगह कच्चे मकान दिखते भी कम हैं। और थोडा घूस देकर एक परिवार के कई लोगों के नाम इन्दिरा आवास का पैसा लेने पर तो चौपार खड़ा हो जाता है। गांव में ईंट, बालू, सीमेंट जैसी चीजों के सप्लायर मिल जाएंगे। बिजली न होने और अब आने पर बहुत कम रहने से भी वेल्डिंग जैसे धन्धे नहीं शुरु हुए हैं जबकि गांव में कुशल लोहारों के कई परिवार हैं और शेख टोली के कई लड़के बाहर वेल्डिंग का काम करते हैं। शेख टोली के काफी लोग एक्सपोर्ट हाउसों में दर्जी का काम करते हैं। पंजाब जाने वालों में ज्यादातर ऊन काटने-बुनने का काम करते हैं। पहले विदेश जाने वाले नहीं थे। पचीस साल में पचासों लोग अरब गए, पहले मुसलमान लोग गए, अब हिन्दू भी जाने लगे हैं। इधर हरिजन टोली के लड़कों की टोलियां तमिलनाडु और केरल की तरफ भी जाने लगी हैं। कुछ लोग सूरत और गुजरात भी गए हैं। दिल्ली में ही सौ से ज्यादा लोग होंगे।
पर प्रवासियों की गिनती मुश्किल है। उनके आने-जाने का क्रम लगातार चलता रहता है। और किसी तरह के पंजीयन की व्यवस्था न होने से कोई आधिकारिक संख्या ही नहीं सरकारी जिम्मेवारी भी नहीं दिखती। लेकिन जितना पैसा ये प्रवासी लाते हैं-पहले मनीआर्डर से और अब एटीएम जैसी आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से, उससे सरकारी खजाने में कितना धन जाता है और स्वास्थ्य-शिक्षा-खेती वगैरह की बुनियादी जिम्मेवारी हल्की होती है, इसका हिसाब तो और भी मुश्किल है।
अकेले मेरे गांव से ही हर साल जमीन की रजिस्ट्री का जितना राजस्व मिलता होगा उसका हिसाब भी काफी होगा। सबसे ज्यादा महंगाई जमीन की हुई है क्योंकि प्रवासी मजदूर पेट काटकर भी जो धन लाते हैं उसका एक बड़ा हिस्सा जमीन खरीदने पर खर्च होता है। जमीन उनके लिए कमाई से लेकर इज्जत तक सब कुछ है। और वे बाहर निवेश कर ही नहीं सकते। हमारे गांव का एक उद्यमी मजदूर असलम जरूर अब लुधियाना में बड़ा निर्माता और निर्यातक बन गया है। और वह भी शुरुआती कमाई गांव में जमीन खरीदने में लगाने के लिए पछता रहा था। और यह हिसाब देखने-समझने के बाद मुझे सर्वेश की बात सही लगी कि पलायन न होता तो गांव की तस्वीर कुछ और होती।

पलायन के बाद पैसा आने और देश की आर्थिक नीतियों से दूसरे बदलाव भी हुए हैं। गांव में दूध, फल, सब्जी का आदान-प्रदान लगभग खत्म है और बाहर से आकर रोज सब्जी बिकना खूब होने लगा है। अहीर काफी हैं सो दूध बाहर से नहीं आता पर गांव का दूध बाहर खूब जाता है। अब तो गांव में दूकानों पर कोल्ड ड्रींक्स, जो प्राय ठंढ़ा नहीं रहता और मिनरल वाटर मिलने लगा है, सेव और केले जैसे बाहरी फल मिलने लगे हैं। बिजली सप्लाई गड़बड़ है तो जेनेरेटर से सप्लाई का कारोबार शुरु हुआ था-चला नहीं। रोज बाजार-सा लगता है। सब कुछ मिलता है। एक निजी स्कूल खुलने के बाद शिक्षा और ट्रांसपोर्ट का धन्धा भी शुरु हुआ है। गांव बदला है और इसमें पलायन की भूमिका बड़ी है-शायद सबसे बड़ी।
पलायन पुराण
आज भारत और पूरी दुनिया में श्रमिकों के पलायन के मामले में जो नई प्रवृत्तियां दिख रही हैं, उनकी व्याख्या न तो इन विद्वानों के निष्कर्षों से की जा सकती है न ही भारतीय मानस की पुरानी धारणा से। नवीनतम तकनीक, संचार-साधनों, विश्व की नई राजनीतिक व्यवस्था, उपभोक्तावाद, बाजारवाद वगैरह के माध्यम से पूरी दुनिया के बाजारों और संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों-कंपनियों का नियंत्रण-सा बन जाने के बाद श्रमिकों के पलायन का जो दौर शुरू हुआ है वह बेहतर अवसर, बेहतर कमाई और बेहतर जीवन स्तर के लिए नहीं है। वह पूरी तरह अपने-आपको, अपने बाल-बच्चों को, अपने आश्रितों को जीवित बचा लेने भर के लिए है। आज जीवन बचा लेना ही मुख्य उद्देश्य हो गया है और इस दौर में पलायन उन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा हो रहा है जो आधुनिक विकास के किसी भी तरह के लाभ से वंचित हैं, आधुनिक संचार प्रणाली से दूर हैं, जहां साक्षरता लगभग शून्य है और पुरुष बेरोजगारों की बहुलता है।
1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने बजट भाषण में ग्रामीण श्रमिकों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग गठित करने की घोषणा की थी। उसी साल अगस्त में प्रसिद्ध गांधीवादी नेता झीणाभाई दारजी के नेतृत्व में यह आयोग गठित भी हुआ। बाद में सरकार बदलने पर दारजी ने इस्तीफा दे दिया और सांसद सी.एम. हनुमंत राव इस आयोग के अध्यक्ष हुए। आयोग के अधिकांश निष्कर्ष ग्रामीण श्रमिकों की वास्तविक स्थिति को सामने लाते हैं और उसके सुझाव क्रांतिकारी लगते हैं- कम से कम प्रवासी मजदूरों वाले सुझाव तो निश्चित ही। 1991 में उसने अपनी रिपोर्ट दी, पर आज तक इसकी एक भी सिफारिश पर अमल करने की पहल नहीं हुई है।
इस आयोग ने प्रवासी मजदूरों की स्थापित परिभाषा की जगह नई परिभाषा देने और उसी को ध्यान में रखकर निष्कर्ष तथा सुझाव दिए हैं। उसने माना है कि प्रवासी मजदूर के तहत सफेदपोश नौकरी, कमाऊ व्यवसाय और व्यापार करने वाले सभी लोग आते हैं जो वर्षों से किसी एक जगह जाकर काम करते हैं और कमोबेश वहीं बस से गए हैं। पर इसमें वे मजदूर भी शामिल हैं जो साल के कुछ महीने में अपना श्रम बेचने के लिए घर से निकलते हैं और कमाकर वापस अपने घर लौट आते हैं। और बड़ी परिभाषा के बाद आयोग ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा अध्ययन के लिए प्रवासी मजदूर की परिभाषा दूसरे वर्ग वाली ही होगी।
आयोग की परिभाषा बहुत हद तक मानते हुए भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रवासी मजदूरों की परिभाषा में घर से दूर जाना और साल में कुछ समय काम करने जैसे दो आधार ही पर्याप्त नहीं हैं। ये मजदूर आम तौर पर अनपढ़ हैं, असंगठित हैं, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से आते हैं। पर ये विशेषताएं उनको दूसरों से अलग नहीं करतीं। घर से दूर जाने और अस्थायी काम के अलावा उनके काम का एक खास चरित्र यह है कि उन्हें नियमित वेतन या दैनिक मजदूरी की जगह काम के हिसाब से मजदूरी मिलती है या काम ही ठेके पर मिल जाता है। स्थानीय मजदूर की तुलना में सस्ती दर पर काम करने, ज्यादा मोल-तोल की स्थिति में न रहने, मजदूरी के अलावा दूसरी सुविधाओं की मांग न करने से उनको ज्यादा काम मिलने लगता है। प्रवासी मजदूर की विशेषताओं में यह पहलू भी शामिल है। अपने घर-बार से हजारों मील जाकर भी स्थानीय मजदूरों से कम दर पर काम करना, उनसे बदतर हालत में रहना, किसी भी सुविधा की मांग करने की स्थिति में न होना, उनको अन्य मजदूरों से अलग करता है।
संगठित न होना उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेवार है। उनके काम का चरित्र उनको संगठित नहीं होने देता। आज जहां काम मिल रहा है, वहां कर लेना उनकी मजबूरी है और कल कहां-क्या काम मिलेगा, इसका पता उन्हें नहीं होता। फिर अन्य मजदूरों से मेल-मिलाप के अवसर भी कम होते हैं। रहने की तंग जगहों पर वे साथ जरूर आते हैं, पर संगठित होकर कुछ मांग कर सकें, सौदे कर सकें, मांगे न पूरी होने पर कोई कार्रवाई कर सकें, यह सब उनके वश में नहीं होता। साथ के किसी मजदूर की मौत या दुर्घटना होने पर वे आपस में चंदा करके खर्च बांट लेते हैं, पर मुआवजे की मांग करने की स्थिति में नहीं होते।

श्रम और उत्पादन संबंधों में इस युग के सबसे बड़े व्याख्याकार कार्ल मार्क्स की सर्वहारा की परिभाषा भी प्रवासी मजदूरों पर लागू नहीं होती। वर्ग चेतना, लाभ या अपने हकों के प्रति चेतन होकर संघर्ष करने की कौन कहे, अपना, अपने परिवार और बाल-बच्चों का पेट पालकर कैसे भी जीवित रह लेने की बुनियादी चिंता से ही ये लोग मुक्त नहीं हो पाते। हम देखते हैं कि अपने यहां किसानों और भूमिहीन मजदूरों के आंदोलन समय-समय पर होते रहते हैं। महेन्द्र सिंह टिकैत, शरद जोशी, एम.डी. नजुंदास्वामी, किशन पटनायक, अजमेर सिंह लाखोंवाल जैसे किसान नेताओं के जरिए लगातार किसान आंदोलन हुए हैं और इसके चलते देश की राजनीति, उनकी अर्थनीति में किसानों की उपेक्षा मुश्किल है। अर्थनीति की दिशा किसान समर्थक भले ही न हो पर लोकतंत्र में समाज के इतने बड़े वर्ग (और वह भी जब आवाज उठाने लगे तो) की उपेक्षा संभव नहीं है। पर प्रवासी मजदूरों का न तो कोई संगठन है, न उनकी तरफ से किसी बात के लिए संगठित आंदोलन हुआ है, न इसकी कोई संभावना ही दिखती है। सो देश की राजनीति, अर्थनीति और कुल चर्चा में उनका अस्तित्व कहीं नहीं दिखता, महसूस नहीं होता। संख्या की लिहाज से तो वे सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले कुल मजदूरों (1993-94 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 192.10 लाख) में आधे से अधिक ही होंगे, पर उनको पूछने वाला कोई नहीं है। सच कहें तो उनकी बदहाली का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि उनकी संख्या का ही कोई सही अनुमान नहीं है।
अपेक्षित कार्रवाई-यह सब देख-समझ लेने के बाद अगर कुछ सुझाव देने की बारी आए तो यह काम सबसे मुश्किल लगेगा ही क्योंकि विकास की इस धारा का झंडा आज जितनी बुलंदी से फहरा रहा है, उतना पहले कभी नहीं फहराता था। इसमें इसे उलटने का सबसे पहले सुझाव तो तूफान में तिनके जैसा ही रहेगा। इसके बावजूद यही पहला सुझाव रखना होगा।
ग्रामीण श्रम पर बने राष्ट्रीय आयोग के सुझावों पर तत्काल अमल का सुझाव भी यह लेखक देगा। वे अपने आप में काफी बड़े और महत्वपूर्ण हैं। आम लोगों को इसका पता न हो, पर फैसला लेने वालों को इसका पता है और यह काम बिना देरी के हो जाना चाहिए।
तीसरा सुझाव तो प्रवासी मजदूरों संबंधी जानकारियों के पंजीकरण का है। अंतर-राज्य प्रवासी कानून के हिसाब से प्रदेश से बाहर जानेवालों का पंजीकरण कलक्टर के जिम्मे दे दिया गया है। हम व्यावहारिक अनुभव से जानते हैं और इस अध्ययन के दौरान भी देखने में आया कि कोई मजदूर या ठेकेदार कलक्टर के पास जाने से बचता है। जब यह विषय बना था तब बिहार में थोड़ा प्रयास हुआ, पर तब भी एक लाख से ज्यादा मजदूरों का पंजीकरण नहीं हुआ था। इसके बाद तो पंजीकरण का नफा-नुकसान न देखकर सबने इस कर्मकांड को तिलांजलि दे दी और कलक्टर के पास ऐसे कामों के लिए वक्त भी कहां होता है।

ऐसे में इस लेखक का सुझाव है कि जन्म-मरण के पंजीकरण की तरह ही गांव और मुहल्ले से मजदूरों के आने-जाने की सूचना दर्ज करने का काम ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों के जिम्मे करना चाहिए। अधिक से अधिक यह काम प्रखंड के स्तर पर हो सकता है-उससे ऊपर जाने का मतलब काम को ही खत्म कर देना है। सामान्यतः पंजीकरण से तत्काल नफा-नुकसान नहीं दिखेगा, पर जैसे ही एक बार पलायन करने वालों की कुल संख्या साफ होगी, उनका संगठन बने न बने, हर संभावित व्यवस्था उनको अपनी तरफ मोड़ने का प्रयास करेगी। यह काम सरकार, ट्रेड यूनियनों भर तक सीमित न रहकर चुनावी पार्टियों तक जाएगी और जब शासन के सारे सक्रिय अंगों को प्रवासियों के वोट की चिंता होगी तो उनकी अनदेखी का दौर समाप्त होगा।
चौथा सुझाव प्रवासी मजदूरों की सघन रिहाइश वाले इलाकों में प्रवासियों के अपने मूल प्रदेश की सरकार द्वारा सहायता केंद्र खोलने का है। ये केंद्र खुलें और इनका प्रचार हो, तो मजदूर अपनी किसी भी तरह की परेशानी लेकर उनके पास जा सकते हैं। हर शिकायत पर थाना-पुलिस या अदालत-वकील पहुंचे, यह संभव नहीं है, पर मरने-जीने-मजदूरी नहीं मिलने जैसे मामलों में उसकी थोड़ी भी सक्रियता काफी लाभकर हो सकती है। जब वशिष्ठ नारायण सिंह (जो जनता दल-यू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष रहें) बिहार में श्रम मंत्री थे, तो उन्होंने ऐसी पहल की थी। नतीजा निकलने से पहले वही हट गए थे। मौजूदा सरकार ने भी प्रवासियों के पंजीकरण और सहायता केंद्र बनाने की पहल तो की थी, लेकिन नतीजा पांच वर्षों में भी दिखाई नहीं दिया। ये काम न सिर्फ होने चाहिए, बल्कि दिखने भी चाहिए।
(वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया-प्राध्यापक, लेखक। दिल्ली।)

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