बाबूलाल
देवघर का श्रावणी मेला विश्व प्रसिद्ध है, पर झारखंड राज्य के इस जिला के अंर्तगत मधुपुर अनुमंडल के करौ प्रखंड स्थित मॉडल पंचायत रानीडीह के आदिवासी बहुल गांव चोरबरिया उर्फ भवानीपुर आजादी के सात दशक बाद भी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। यहां विकास की किरण दूर-दूर तक नहीं पहुंची हैं। चोरबरिया गांव के भौगोलिक क्षेत्रफल पर नजर डालें तो 199 स्क्वायर फीट में फैले रानीडीह पंचायत का चोरबरिया गांव दो टोलों में बंटा है। आदिवासी टोला और दलित टोला। गांव की कुल जनसंख्या 363 है जिसमें पुरूषों की संख्या 165 है और महिलाओं की जनसंख्या 178 है एवं बच्चों की संख्या 56 है। पूरे गांव में लगभग 60 परिवार हैं जिसमें अधिकांश लोग भूमिहीन है। इसकी वजह से सारे लोग जीविकोपार्जन के लिए मजदूरी पर निर्भर हैं। गांव में 48 लाल कार्ड और 05 अन्त्योदय कार्ड धारी हैं। पूरे गांव में साक्षरों की संख्या बहुत कम है। गांव में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय,एक आंगनबाड़ी दो समुदाय भवन है, जिनकी मरम्मत हुई है और मनरेगा योजना से तीन कुआं निर्माणाधीन है।

खेतीबाड़ी के लायक जमीन नहीं रहने के कारण यहां के लोग दिहाड़ी मजदूरी करने के लिए बाध्य हैं। मनरेगा के तहत एक-दो कार्य संचालित हुआ है, लेकिन मनरेगा योजनाओं में विसंगति रहने की वजह से ग्रामीण मजदूर इस योजना के तहत काम नहीं करते हैं। सामान्य मजदूरी से मनरेगा की मजदूरी कम होना इसका पहला कारण है। दूसरा कारण अनियमित भुगतान है। तीसरा कारण आवंटन एवं अनियमितता का घोर अभाव है। नियमित काम नहीं रहने से अन्य जगह रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है। खाद्य सुरक्षा के तहत राशन भी समय पर नहीं मिलने के वजह से खाद्य संकट उत्पन्न हो जाता है।
गौरतलब है कि सरकार सबको आवास देने की घोषणाएं करती हैं। लेकिन अधिकतर लोगों के लिए समुचित आवास अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। अधिकांश ग्रामीण झोपड़ियों में रहने के लिए मजबूर हैं। हालांकि आठ लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास निर्माण की स्वीकृति मिली है, किंतु प्राक्कलन की राशि में घोर अनियमितता और राशि के आवंटन में विलंब होने के कारण लाभुक कार्य को आरंभ कर अगले आवंटन का बांट जोह रहे हैं। कुछ लोगों ने अपनी जमा पूंजी निर्माण कार्य में झोंक दिया ताकि उनका घर सही तरीके से बन सके। कई ग्रामीण कहते हैं कि प्राक्कलन में सामाग्री की कीमत दस वर्ष पूर्व के मूल्य के आधार पर है। वर्तमान में लोग सीमेंट करीब प्रति बोरा 400 रूपए खरीद रहे हैं जबकि योजना में पौने तीन सौ के करीब दिखाया गया है। यह प्रतीत होता है कि गरीबों के लिए सामग्री-खरीद का मूल्य निर्धारण भी गरीबों की तरह किया गया है। वहीं दूसरी ओर अन्य परियोजनाओं की प्राक्कलन राशि वास्तविक राशि से दुगुना कर बनाया जाता है।

गरीबी व अशिक्षा की वजह से युवा मजदूर नशा सेवन का शिकार है जो इसके जीवन स्तर को उठाने की बजाए गिराने का काम कर रहा है। इस सच्चाई से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता है, लेकिन व्यवस्थागत उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा भी एक कारण है। लोगों का कहना है कि जन प्रतिनिधि वोट के दिन तो नजर आते हैं बाकी दिन नदारद।
इस गांव में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय है जिसमें करीब 60 विद्यार्थियों का नाम दर्ज है। यह विद्यालय तीन पारा शिक्षक द्वारा संचालित है। गांव में एक आंगनबाड़ी केंद्र है, जिसमें शिशुओं की देखभाल, उसकी उचित खान-पान के लिए बातचीत, बैठक आयोजित किए जाते हैं। यहां गर्भवती महिलाएं विशेष रूप से वैसी महिलाएं जो सात माह की गर्भवती है, वैसी महिलाओं की गोदभराई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। महिलाओं के टीकाकरण के लिए समय≤ पर प्रशिक्षित एएनएम द्वारा टीकारकरण, सूई और दवाईयां दी जाती हैं। 06 माह से अधिक उम्र के शिशुओं को अन्न खिलाया जाता है और मां को बच्चों के पौष्टिक खुराक के बारे में बताया जाता है।
विद्यालय एवं आंगनबाड़ी परिसर में साफ-सफाई रखी जाती है। गांव के लोग शिक्षा और सफाई के प्रति पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक हो रहे हैं। जन प्रयास से गांव को स्वच्छ रखने की चेष्टा कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि शिक्षा के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी है। गांव की घुड़की कुमारी और दुलारी हांसदा स्नातक डिग्री प्राप्त कर अपने कैरियर के लिए संघर्षरत हैं। घुड़की कुमारी पिछले रोजगार मेला में चयनित होकर अहमदाबाद में प्रशिक्षित हो रही हैं। वहीं दुलारी हांसदा जामताड़ा कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं।
यहां दो महिला स्वयं सहायता समूह छह माह से संचालित है। पहला गुलाब स्वयं सहायता समूह है और दूसरा चमेली समूह है। दस-दस का समूह है जिसमें प्रतिमाह के 10 रूपए जमा की जा रही है। इसका संचालन मालती देवीे के प्रयास से संभव हो पाया है। कहा जा सकता है कि व्यवस्था की उदासीनता और उपेक्षा के बावजूद गांव के लोग अपने अथक प्रयास के जरिए उपर उठने और अपने जीवन स्तर को उंचा उठाने का प्रयास कर रहे हैं।
कहा जाता है कि भारत गांवों का देश है और भारत की आत्मा गांव में बसती है। देश में करीब 07 लाख गांव हैं। सही है कि जब तक इन गांवों का विकास नहीं होगा, तब तक देश का समुचित विकास संभव नहीं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसीलिए बारबार कहा कि जब तक गांव का समुचित विकास नहीं होगा, तब तक देश के विकास का सपना अधूरा ही माना जायेगा। परन्तु वास्तविकता को इन पंक्तियों में बेहतर ढंग से कहा गया है –
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़-सी देखो अमीरी और गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज चाँदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।
(सामाजिक कार्यकर्ता, मधुपुर, झारखंड।)