July 14, 2020

मेरे व्यवहारिक जीवन की पाठशाला रहा है गांव

डॉ रश्मि सिंह (आईएएस)
मेरा गांव भवानीपुर औरंगाबाद जिले में देव प्रखंड में है। देव कई कारणों से प्रसिध्द है। उसमें ऐतिहासिक सूर्य मंदिर तो एक कारण है ही, मेरे बाबा और पिता का भी इस प्रसिध्दि में काफी योगदान रहा है। मैंने अपने बाबा कामता प्रसाद सिंह ‘काम’ को देखा भले नहीं है, लेकिन उनके विषय में सुना है। वे स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई लाहौर से हुई। वे बहुत मेधावी छात्र थे और जाने-माने साहित्यकार हुए। उनकी कहानियां स्कूली पाठ्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। गांव-गंवई के समाज के सफल चित्तेरे कामता प्रसाद सिंह की कहानी घर, गांव और देहात काफी लोकप्रिय रही है। यह कहानी उन्होंने लगभग 50 साल पहले लिखी थी। मेरे पिता शंकर दयाल सिंह राज्यसभा सदस्य रहे हैं। जब मैं छोटी थी, तो अचानक एक दिन देखा कि गांव में बाबा की भव्य मूर्ति लगाई गई। उनकी याद में पिता जी ने कामता सेवा केंद्र बनाया। पिता के इस विचार से मैं काफी प्रभावित हूं और इस सेवा केंद्र से मैं काफी जुड़ी हुई हूं। लोग सार्वजनिक स्थान को निजी बना लेते हैं, जबकि मेरे पिता ने निजी स्थान पर सेवा केंद्र बनाया। 29 अक्टूबर को बाबा कामता प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर एक आयोजन किया जाता। अपने गांव के साथ ही आसपास के गांव के लोग आते। चाय का दौर चलता। विचार गोष्ठी आयोजित की जाती। लोग खिचड़ी खाते और उन्हें तुलसी का पौधा दिया जाता।


इसी क्रम में मुझे पर्यावरण जागरूकता का पाठ भी सिखाया गया। पिता जी जब गांव जाते तो वहां फूलवारी लगाते। मैं लगभग 10 साल की रही होउंगी। एक दिन फूल तोड़ने के लिए हांथ बढ़ाया तो उन्होंने कहा,
‘‘ तन मन देकर हमने लगाया, यह सुंदर फुलवाड़ी,
फूल सूंघना पर न तोड़ना, मर्जी बिन हमारी।’’

29 अक्टूबर के अलावा भी पिताजी जब गांव जाते तो यह परिसर न सिर्फ जीवंत हो जाता बल्कि पूरा गांव काफी उत्साह में रहता। साहित्य जगत के कई बड़े बड़े लोग इस गांव में गए हैं। अज्ञेय जी भी गए थे। दादा जी के मृत्यु के समय जगजीवन बाबू भी यहां गए थे। तीन एकड़ के परिसर में गांधी की प्रतिमा लगी है। अज्ञेय की प्रतिमा भी। पिताजी का देहांत मात्र 58 साल की उम्र में हो गया। कामता सेवा केंद्र देव और भवानीपुर के बीच है। जीटी रोड से देव की ओर जाने वाली सड़क को बिहार सरकार ने शंकर दयाल सिंह पथ के रूप में विकसित किया है। छठ के समय वहां बहुत लोग आते हैं। भले ही परिवार का कोई व्यक्ति नहीं रहता लेकिन कामता सेवा केंद्र के जरिए सामाजिक गतिविधियां चलती रहती हैं।

यदि मैं अपने बचपन को याद करूं और ठहरकर आज को देखूं तो मेरे अंदर जो भी नैतिक, सामाजिक मूल्य हैं उसका विकास गांव से ही हुआ है। परिवार ने उसके निर्माण में काफी योगदान दिया है। आप थ्योरी में तो बहुत कुछ पढ़ते हैं, लेखों और किताब के जरिए आपका ज्ञान बढ़ता है लेकिन व्यवहारिक ज्ञान तो आपको जमीन पर उतरने पर ही मिलता है। इस लिहाज से गांव मेरे लिए व्यवहारिक जीवन की पाठशाला रही है। मेरे पिताजी पटना में रहते थे। लेकिन उनकी इच्छा होती थी कि बच्चे समय-समय पर गांव जाते रहें। इसलिये वे चाहे कितना भी व्यस्त हों जब भी गांव जाते तो हम बच्चों को ले जाते। हर महीने-दो महीने में प्रयास करते थे कि हम गांव जाते रहें। हालांकि उस समय यातायात की अच्छी व्यवस्था नहीं थी। पटना से गांव जाना आसान नहीं था, बावजूद इसके वे अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करते कि हम गांव जाएं, गांव के लोगों से घुले मिलें, वहां की मिट्टी में रचे बसें। उसके बाद हम दिल्ली चले आए। पिता राज्यसभा के सांसद हो गए। फिर भी गांव आना जाना लगा रहा। इस कारण गांव से एक भावनात्मक लगाव है।


भारत सरकार में रहते हुए मैंने महिला शक्ति केंद्र की संरचना की। राजस्थान के पाली जिले में 150 पंचायत को चुना गया। हमने यह दिखाया कि कैसे गांव की महिलाएं यदि ठान लें तो वंचित लोगों तक योजनाएं पहुंच सकती हैं। दिल्ली में जेंडर रिसोर्स सेंटर बनाया क्योंकि मुझे लगता है कि दिल्ली के स्लम की स्थिति गांवों से बेहतर नहीं है। यहां भी हमने महिलाओं के लिए काफी काम किया। राजस्थान के उस मॉडल को अब अन्य जिलों में भी ले जाने का प्रयास सरकार कर रही है।

बिहार में औरंगाबाद जिले के दो प्रखंडों को इसके लिए चुना गया है- देव और ओबरा प्रखंड। इस कार्यक्रम को राज्य सरकार द्वारा कार्यान्वित किया जाना था। लेकिन स्थानीय प्रशासन ग्राम समन्विका का चयन नहीं कर पाया। बाकी जिलों में तो हो गया लेकिन हमारे यहां स्थानीय स्तर पर यह काम नहीं हो पाया। राजस्थान के मॉडल पर ही हर जिले में महिला शक्ति केंद्र स्थापित किया जाना है। हम अपने मॉडल को स्थानीय स्तर पर किस शिद्दत से लागू कर पाते हैं, इसी में कार्यक्रम की सफलता अंर्तनिहित है। राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण योजना, बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओं सहित कई योजनाएं है जिससे महिलाओं को काफी फायदा होगा। हर बच्ची या बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले, उन्हें अपने भविष्य को गढ़ने का मौका मिले, इसी में विकास कार्यक्रमों की सार्थकता है।

जहां तक मेरे अपने गांव का प्रश्न है तो परिवार और गांव ने मुझे बहुत कुछ दिया है। एक अधिकारी के रूप में हम देश में अपना योगदान दे रहे हैं। लेकिन उस योगदान के एक हिस्से पर हक गांव का भी है। उसी को ध्यान में रखते हुए पिताजी द्वारा स्थापित कामता सेवा केंद्र के गतिविधियों को धीरे-धीरे विस्तार दिया है। एक अधिकारी के रूप में जब भवानीपुर जाती हूं तो वहां के महिलाओं से मिलती हूं, अन्य परिवारों में जाती हूं तो लोगों में एक विश्वास पैदा होता है। उन्हें लगता है कि यदि मैं बाहर के लोगों के लिए बेहतर काम कर सकती हूं तो गांव में तो कुछ विकास का कार्य हो ही सकता है। यदि मैं खुद नहीं कर पाती तो लोगों को भरोसा नहीं होता। इसलिए उनके भरोसे पर खरा उतरना भी हमारे लिए चुनौती है।

कामता सेवा केंद्र के लगभग तीन एकड़ के परिसर में जो भी कमरे बने हैं, उसमें कई तरह की गतिविधियां संचालित हो रही हैं। मैं जब भी गांव जाती हूं, संस्था के गतिविधियों को आगे बढ़ाने का प्रयास करती रहीं हूं। इस केंद्र में महिलाओं को व्यवसायिक व स्थानीय जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षण देने का काम होता है। हमने शुरूआत में इन महिलाओं को सहयोग दिया था। संस्था की गतिविघियां अब स्थायित्व की ओर बढ़ रही हैं। उनके उत्पादों के विक्रय के लिए महिला हाट हो, महिला उद्योग के रूप में बाजार मिले, उन्होंने जो काम सीखा है उसका व्यापक पैमाने पर उत्पादन हो तो उनकी गतिविधियों को काफी बल मिलेगा और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होंगी।

छठ के दिनों में या देव सूर्य-मंदिर पर पूजा अर्चना के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। उनसे जुड़े उत्पादों को तैयार किया जाता है और उनकी बिक्री होती है। अभी स्थानीय स्तर पर ही काम हो रहा है लेकिन यह काम और आगे बढ़े, इस दिशा में कोशिश की जा रही है। अब बड़ी संख्या में लड़कियां भी आती है। उनकी इच्छाओं को जाहिर करने का मंच मिल रहा है। पहले महिलाएं घूंघट में आती थी, घर के लोगों का रोकटोक भी था लेकिन धीरे-धीरे उनका भरोसा बढ़ा है। अब जो महिलाए या लड़कियां कामता परिसर में आती हैं उन्हें रोका नहीं जाता। इस तरह से देखें तो देव का लघु उद्योग अब पहले से ज्यादा सफल है।

 

यह तो नहीं कह सकती कि हमारा गांव गांधी के सपनों के अनुरूप आत्मनिर्भर गांव बन गया है। लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं कि हमने उस दिशा में कदम जरूर बढ़ाया है। साथ ही मैं यह भी स्वीकार करती हूं कि यदि मैं बिहार में पदस्थापित होती या गांव में रह रही होती तो काम और तेजी से बढ़ता। इसके साथ यह भी सच्चाई हैं कि आज गांधी के ग्राम स्वराज की बात तो होती है, लेकिन हर ग्राम वासी अपने गांव को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय शहरी सुविधाओं के पीछे भाग रहा है। शहरीकरण की होड़ में गांव का मूल चरित्र न खो जाए, हमें इसका ध्यान रखते हुए अपने-अपने हिस्से का प्रयास गांव के लिए करना होगा तभी हमारा गांव बदलेगा और गांधी का सपना साकार होगा।
(अडिश्नल कमिश्नर नार्थ दिल्ली एमसीडी)

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