August 15, 2020

गांव अगर खो गए, नहीं बचेगा देश और नहीं बचेगी संस्कृति

डॉ.राजश्री देवी
गांव शब्द में ही एक अद्भुत आकर्षण है। गांव बोलते ही मन में हरे-भरे खेत, गाय-बैलों के चरने के लिए विशाल मैदान, पानी भरती औरतों का खिल-खिलाकर हंसना, शाम के समय नामघर (कीर्तनघर ) से आती शंख, घंटा, डबा की सम्मिलित मांगलिक ध्वनि, युवक-युवतियों का मिलकर मैदान में बरगद के नीचे बिहु नाचना, सूरज ढलते गाय-बैलों को हांककर घर लाता किसान, मेखला-चादर पहनकर सर को गमछा अथवा चादर की आंचल से ढककर घर-आंगन में अगरबत्ती लेकर घोषा-पद गातीं बहुएं, लोगों का मिलना-जुलना, बिना किसी काम के भी पड़ोस के घर में तामुल (कच्ची सुपारी) चबा-चबाकर बात करती बुजुर्ग महिलाएँ, सुख-दुःख में सहभागी गली-मुहल्ले के लोग, किसी के घर में कोई अनुष्ठान हो तो बिना बुलाए मदद के लिए पहुंचने वाले युवा और भी बहुत कुछ। दरअसल हर आदमी अपने मन में, अपने दिल में एक गांव लेकर, गांव बसाकर घूमता है.
किसी देश की आत्मा को देखना हो तो गांव गए बिना यह संभव ही नहीं है। उस देश की असली संस्कृति गांव वाले ही बचाकर रखते हैं। अपने देश में तो हर आदमी की जड़ किसी-न-किसी गांव से ही जुड़ी हुई है। शहर तो वैश्विक होता है। शहर रफ्तार का नाम है। वहां सब कुछ होते हुए भी एक दूसरे के लिए समय और अपनेपन की कमी है। किंतु गांवों में संसाधनों की कमी तो है पर ऐसा बहुत कुछ है जो शहरों में नहीं है। गांवों में इंसान है, इंसानियत है, मूल्य है, परंपराएं हैं, लोक-गीत हैं, लोक-संगीत हैं, लोक-कहानियां हैं और हैं उसमें बसे ग्रामीणों के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, पीड़ा की गाथाएं।


वैश्वीकरण और बाजारीकरण ने मानव-मन की कोमल भावनाओं को मार डाला है। सब अपनी ही दुनिया में जीते हैं। उपभोक्तावादी मानसिकता ने सबको उपभोक्ता बना दिया है। सब यांत्रिक हो गए हैं। मानवीय व्यवहार और आचरण पर भौतिकवाद हावी हो गया है। यह हवा केवल शहर ही नहीं गांव के लोगों को भी लगी है। इस कारण पारंपरिक गांव की छवि धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है। जिस पुराने गांव को लोगों ने अपने दिल में सहेजकर रखा है, वह मिलना अब कठिन हो गया है। सच कहा जाए तो तथाकथित आधुनिकता के चौंकाचौंध में लोग खो गए हैं। उन्होंने अपनी जड़ों को भूला दिया है।

गांवों के सीधे, सरल लोगों के सादगी से भरे समाज को राजनीति ने काफी बदला। जब से पंचायत चुनाव भी दूसरे चुनावों की तरह होने लगे तब से यह परिवर्तन अधिक तेज हुआ। किंतु गांव के समाज की यह विशिष्टता है कि विपत्ति के समय पुराने कटु अनुभवों को भूलाकर वे एक हो जाते हैं। होली, दिवाली आदि उत्सव सबको एक कर देते हैं। सभी गांवों की यही सच्चाई है, मेरे गांव की भी। मेरे गांव की एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि प्रति वर्ष तीन दिवसीय भागवत पाठ का आयोजन होता है और जिसमें तथाकथित दलित, जनजातीय सभी लोग सहभागिता करते हैं। सभी लोग भागवत पाठ करते, खाना पकाते और बांटते हैं।


आज घर, बंगला, गाड़ी, खान-पान आदि में अमीरी-गरीबी का अंतर स्पष्ट दिखायी देता है। पहले वे उपलब्ध नहीं थे, तो अंतर भी बहुत कम था। अमीर-गरीब दोनों ही बांस के घर में रहते थे, दोनों ही धोती-कुर्ता पहनते थे, दोनों ही साग-पत्ता ही खाते थे। दोनों को ही कच्चे रास्ते से ही चलना पड़ता था, लाइलाज बीमारी हो जाए तो दोनों को ही मरना पड़ता था। किंतु आज साधनों की उपलब्धता के कारण, बाजार में भौतिक साधनों के भरमार के कारण दोनों के अंतर सभी जगह स्पष्ट दिख जाते हैं। कुछ पैसे इकट्ठे कर स्वयं को तथाकथित उच्च श्रेणी में शामिल करने की प्रतियोगिता से लोगों में चारित्रिक और नैतिक पतन भी आया है.
पूर्वोत्तर क्षेत्र शेष भारत से काफी मायनों में अलग है। खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, उत्सव-त्योहार, मान्यताएं आदि संस्कृति के सभी तत्वों में इस भूभाग की अपनी विशिष्टता है। यहां जनजाति अधिक है। वे समतल में कम और पहाड़ों में अधिक रहते हैं। असम चारों ओर से पर्वतीय राज्यों से घिरा हुआ है ही, असम के अंदर भी कई पर्वतीय जिले हैं। समतल में रहने वाली जनजातियां भी हैं। ऐसे में असम में रहनेवाले लोगों पर, उनकी संस्कृति के सभी तत्वों पर जनजातीय संस्कृति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
गांव के लोग साधारणतः प्रकृति से अधिक जुड़े हुए होते हैं। प्रकृति से इसी सामीप्य के कारण खेत और खेती के काम से जुडा पर्व बिहु असम के जातीय उत्सव के रूप में प्रचलित है। पर जैसे-जैसे शहर बढ़ने लगे, लोग शहर की ओर उन्मुख होने लगे। लोग अधिक साधनसंपन्न तो हुए, पर प्रकृति से धीरे-धीरे दूर होते चले गए।

आज असम के किसी शहर में रहने वाला बच्चा यह नहीं जानता कि बिहु में गाय-बैलों को पोखर या नदी में कैसे नहलाया जाता है, कौन-सी वनौषधि खिलायी जाती है, नयी रस्सी से बांधा जाता है, ऊरद दाल और हल्दी की उबटन लगायी जाती है, खेत और गौशाला में दीए जलाए जाते हैं। हस्तकला में निपुण असम का ग्रामीण समाज पहले अपने आप में एक संपूर्ण इकाई की तरह था। वह शहर से आने वाली चीजों का मोहताज नहीं था। कताई-बुनाई, बांस-काठ के काम आदि में पारंगत असम के ग्रामीणों में अपना जो तंत्र था, वह अब लगभग खत्म हो गया है। आर्थिक, सामाजिक, संवेदनात्मक रूप से परिपूर्ण इन गांवों को पुनः समृद्ध बनाकर हमें बचाना ही होगा। देश की आत्मास्वरूप गांव अगर खो गए तो देश और इसकी संस्कृति भी नहीं बचेगी।

मेरा गांव…
मेरा गांव असम के मोरीगांव जिले में मुख्यालय से 11 किलोमीटर पूर्व है। निर्मल ग्राम पुरस्कार से सम्मानित इस गांव को चराइबाही कहते हैं। लगभग ,22 हजार की आबादी वाला यह अंचल बरभगीया, ब्राह्मण गांव, कांहिबारी, कासोधरा, मायेंगीया, बड़िगांव, मेधीगांव, बेलगुरी, खाइगरीया, निज चराइबाही, आहोमगांव, माजगांव, लुंगामुख, मोरागुरी आदि अलग-अलग टोलों में विभाजित है। यहां अधिकतर नाथ-योगियों का वास हैं। इसके अलावा कैवर्त, कोच, सुतिया, अहोम, हीरा, ब्राह्मण आदि समुदायों के साथ-साथ तिवा, कारबी आदि जनजातीय लोग भी रहते हैं।


गांव के बीचों-बीच चंद्रपुर नामक चौराहा पूरे इलाके का हृदयस्थल है। बाजार, स्कूल, कॉलेज, पंचायत, डाकघर, हॉस्पिटल, बैंक, स्टेडियम, मंदिर, विभिन्न सामाजिक अनुष्ठान के लिए पक्का मंच आदि यहीं पर है। अब रास्ता भी पक्का होने के कारण यातायात व्यवस्था भी अच्छी है। सन 1919 में ही यहां स्कूल स्थापित हुआ था। इसलिए गांव कोई अनपढ़ या निरक्षर षायद ही हो। अब गांव में कई डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, अध्यापक आदि के अलावा सेना में काम करने वाले बहुत सारे लोग हैं। बाकी लोग कृषि और व्यापार से जुड़े हैं। कुल मिलाकर इसे एक उन्नत गांव कहा जा सकता है।
गांव की आबादी पहले बहुत कम थी। जंगल, खाई, दलदल जैसी जगहें थीं। पर अब जनसंख्या की वृद्धि से गांव में खाली जगह ही नहीं बची। लोगों के खेत गांव के बाहर है। यहां लोग कब से रहते आ रहे हैं, इसका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं मिलता, पर किंवदंती है कि नौंवी शताब्दी में मायंग के शगुनपुरी नामक पहाड़ से तांत्रिक बौद्धों का एक समूह पूर्व की ओर आकर कुछ दिन यही रहा। उनलोगों द्वारा स्थापित कई थान (मंदिर जैसा धार्मिक स्थल) और पत्थरों का अवशेष आज भी हैं। उनमें से एक बामुन गोंसाई थान आज भी है। लोग वहां नियमित पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा यहां कई मठ-मंदिर, राजा के जमाने का पोखर, पुरानी पोथी आदि थीं जो संरक्षण के अभाव में लुप्तप्राय है।
चराइबाही नामक यह इलाका टीले की तरह है। इसके काफी ऊंचा होने के कारण प्रलयंकारी बाढ़ आने पर भी हम बचे रहते हैं। इसीके कारण पहले इसका नाम शायद चरावास रखा गया था। चरा मतलब ऊंचा और वास मतलब निवास। किंवदंती के अनुसार इस ऊंचे भूखंड पर प्रबल बाढ़ के समय विभिन्न जगहों से पशु-पक्षी और इंसान आकर बसने लगे और स्थाई रूप में यहीं रह गए। .संभवतः पक्षियों के आधिक्य के चलते और समय के साथ थोड़े-बहुत परिवर्तन के कारण इसका चराइबाही नाम पड़ा। असमिया भाषा में चराइ का अर्थ चिड़िया है। जिन टोलों में यह इलाका बंटा हुआ है, उनके नाम के पीछे भी कथाएं प्रचलित हैं। बाढ़ के कारण कामरूप के बरभाग से आकर बसनेवाले लोगों की जगह को बरभगीया (जहां मैं रहती हूं ), तंत्र-मंत्र के इलाके के रूप में प्रसिद्ध मायोंग से आकर बसनेवाले लोगों की जगह हो मायेंगीया, रहा के खाइगढ़ से आकर बसनेवाले लोगों की जगह को खाइगरीया आदि।


यहां के निवासी नाथ-योगी लोग तो योग-परंपरा का पालन करते ही हैं, पर साथ साथ मध्यकाल के महान संत श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रचारित वैष्णव संस्कृति का भी पालन करते हैं। बाकी लोग भी इस परंपरा में शामिल हैं। जनजातीय लोग भी इसके अनुयायी हैं, साथ ही अपनी जनजातीय संस्कृति के आधार पर प्रकृति पूजन से संबंधित कुछ अनुष्ठान भी करते हैं। स्थिति यह है कि शैव, शाक्त, जनजातीय पारंपरिक प्रकृति पूजन, जो जिस धारा का हो, सभी वैष्णव संस्कृति से प्रभावित हैं और लोक-परंपरा के रूप में यह पूरे समाज में व्याप्त है।

पहले ऐतिहासिक बूढ़ा गोसाईं थान ही एकमात्र पूजा स्थल था। यहां पहला मंदिर शंकर मंदिर की स्थापना सन 1915 में आनुष्ठानिक रूप में हुई। पूरे अंचल में छोटे-बड़े लगभग 40 नामघर हैं। हर शाम सभी नामघरों से शंख, घंटा, डबा की मांगलिक ध्वनि से पूरा गांव मुखरित हो उठता है। यहां के साहित्य, संस्कृति की चर्चा भी आवष्यक है। सन 1951 में एक केन्द्रीय ग्रंथागार की स्थापना की गयी थी जिसका सन 1986 में सरकारीकरण हुआ। इसके अलावा अलग-अलग टोलों में बने अलग-अलग और छोटे-छोटे ग्रंथागारों ने शुरू से ही पठन-पाठन के प्रति लोगों की रुची बढ़ाने का काम किया।

हमने भी बचपन में इससे किताबें लाकर खूब पढ़ा। गांव से कोई बड़ा नाम तो नहीं पर स्थानीय स्तर पर अनेक कवि, निबंधकार भी निकले।


मध्य असम के मोरिगांव जिला की स्थिति दिलचस्प है। इस इलाके में (नगांव जिले के कुछ अंश के साथ पश्चिम में कपिली नदी तक) एक जमाने में तिवा जनजाति समुदाय का राज था। नेली, गोभा, खला, कुमोई, बघरा आदि सात राज्य थे। राज परिवार अभी भी है। उनके शासन के अंतर्गत आने वाले स्थानों में आयोजित होने वाला मेला, उत्सव आज भी होता है। इसी परंपरा के अंतर्गत यहां प्रति वर्ष चैत्र संक्रांति अर्थात बोहाग बिहु के बाद वाले दूसरे रविवार के दिन मेले का आयोजन होता है। मेला मुख्य राजा के मातहत छोटे-छोटे राजाओं से लगान वसूलने का एक आडंबरपूर्ण अनुष्ठान था। इसलिए आज भी यहां बसे तिवा जनजाति के लोगों का यह मुख्य त्योहार है। आज इसमें सभी जाति के लोग सहयोग करते हैं। इस मेले में ढाल और तलवार लेकर युद्ध के अभ्यास करने जैसा एक नृत्य किया जाता है, जिसे ढालबारू नृत्य कहा जाता है। पूर्व में शासन व्यवस्था से संबंधित इस मेले के बाद दूसरे रविवार को फिर एक मेले का आयोजन होता है, जिसे वर्णमेला कहा जाता है। इस मेले के साथ हमारे बचपन की बहुत सारी यादें जुड़ी हुई है। पहले दादाजी और उनके देहांत के बाद मां और परिवार की बाकी औरतों के साथ देखने जाते थे। जलेबी खरीदना सबसे महत्वपूर्ण होता था। साल के उसी एक दिन में मीठापान खाने की अनुमति मिलना भी कोई छोटी बात नहीं थी।

यहां का एक और पुराना महत्वपूर्ण उत्सव है कमिटी भाउना। वैष्णव संस्कृति के अंतर्गत मध्यकाल के महान संत श्रीमंत शंकरदेव ने रामायण, महाभारत की पौराणिक कहानियों को नाटक के रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा की शुरुआत की थी। प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर आयोजित 162 वर्ष पुराना यह अनुष्ठान इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। रास पूर्णिमा के दिन एक ही रात में पास-पास में ही स्थित नाथ मंदिर, शंकर मंदिर और तेतेलीतल नामक तीन स्थानों पर आठ जाति-जनजातियों के लोग मिलकर लगभग 27-28 भाउनाएं करते हैं। लाखों लोग इसे देखने के लिए इकट्ठा होते हैं। पुरुष और महिला दोनों ही इसमें अभिनय करते हैं। मेरे घर से भी पहले दादाजी, फिर पिताजी और अब भाई इसमें भाग लेते आ रहे हैं।

शिक्षा, स्वस्थ्य, सड़क, संचार माध्यम, बैंक जैसी सेवाएं असम के लगभग अधिकांष गांवों में पहुंच चुकी हैं। जनसंख्या का घनत्व कम होने के कारण पहले से ही लोगों के पास अपनी जमीन रही है। चाहे कितना भी गरीब क्यों न हो कम-से-कम अपना घर (चाहे बांस का ही हो) और खेत सबके पास था। इसके अलावा साहूकारी अथवा जमींदारी प्रथा भी यहां पहले से ही नहीं रही। नदी, झरने की अधिकता और उर्वर जमीन व जंगल के कारण मांस, मछली, अन्न-पानी आदि की प्रचूरता रही। किंतु बाढ़ से हर वर्ष करोड़ों के जान-माल की क्षति होती है। इसका समाधान नहीं हो पा रहा है। अपना घर-द्वार, खेत गंवाकर गरीब ग्रामीण दिन-व-दिन गरीब होता चला जा रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर से संबंधित विकास योजनाएं धरी की धरी रह जाती है। असम की पूरी व्यवस्था और जनसंरचना को प्रभावित करने वाला एक कारक बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या भी है। इसने प्रदेश को सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि सभी दृष्टियों से बदला है। अपराधों की संख्या बढ़ी है। गांव और उसका चरित्र पहले जैसा नहीं रह गया है।
(शिक्षिका, मोरिगांव,असम )

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *