July 14, 2020

बदलाव के बावजूद गांव के गांव होने पर संदेह की नहीं है गुंजाईश

डॉ आरकेे नीरद
सावन का महीना उतार पर है। इस साल मॉनसून देर से आया है। बड़ी मिन्नत के बाद आए बादल बरसे, मगर इतना भी नहीं कि खेतों की प्यास पूरी-पूरी बुझ सके। खेतों की प्यास के न बुझने का सीधा मतलब है खेती पर संकट के बादल, किसानों की बेचैनी और गांव की किशोरियों-युवतियों के मन में पल रहे सपनों का मुरझा जाना। इस साल भी अच्छी फसल नहीं होगी तो उनके ब्याह-गौने के मनसूबे धरे-के-धरे रह जाएंगे। मैं पगडंडियों पर छपे पांव के निशान पहचानने की कोशिश कर रहा हूं, कदम-दर-कदम बढ़ते हुए। अपने ही गांव के लोगों के पांवों के निशान हैं सभी।

धत्त तेरी के! ऐसा भी कहीं होता है? पगडंडियों पर छपे पांव के निशान किसके हैं, भला यह भी कोई पहचान सकता है? अगर कोई पहचान सकता तो हम तभी नहीं पहचान लेते, जब हमारे पांव बेहद छोटे थे। इतने छोटे कि गांव का दूसरा टोला भी कोसों दूर लगता था और शहर तो सपनों का एक कोना होता था। मगर न तो तब मन हारा था, न अब बदला है। दशकों बाद भी गांव की पगडंडियां वैसी-की-वैसी ही हैं। उनके साथ मन का रिश्ता वही है। हमारे पैरों के जूते बदल गए, मगर पगडंडियों की सतह नहीं बदली। मैं एक बार फिर गांव में हूं, सालों बाद। उसी गांव में जो मेरे जेहन में किसी बड़े साम्राज्य की तरह उस दिन से बसा है, जिस दिन से आहिस्ता-आहिस्ता इस दुनिया को समझने की काबिलियत मिलती गयी, बढ़ती गयी। तब भी हम पगडंडियों के साथ ऐसा ही खेल खेलते थे। पगडंडियों पर छपे पांवों के निशान पहचानने की कोशिश करते थे, इस यकीन के साथ कि ऐसा करना बिल्कुल ही मुमकिन है। यह बात दीगर है कि यह न तो तब मुमकिन हुआ, न अब मुमकिन है। मगर मन के हिस्से जो अतीत को जीने का सुख है, उसका मिलना यहीं, इसी खेल में मुमकिन है, कहीं और नहीं।
दरअसल, मैं अपने गांव को कभी नहीं भूला। गांव भी मुझे कभी नहीं भुला सका। अगर वह मुझे भूला होता, तो हमारे साथ-साथ हर पल थोड़े ही चल रहा होता, मानस की परछाई की मानिंद?

प्रसंग चाहे ‘मैला आंचल‘ का हो या ‘राग दरबारी‘ का, उनमें मेरा अपना गांव ही प्रतिबिंबित होता रहा है। इन उपन्यासों में जाने कितनी बार मैं डूबा और हर बार इनके कथानक, किरदार, परिवेश, घटनाक्रम, भाषा-बोली, सोच और संघर्ष मुझे नए अंदाज में आकर्षित करते, नया आनंद, नया रस देते हैं। वैसे तो विशेषज्ञ मानते हैं कि सन साठ के दशक में नयी-नयी आजादी के मनोभाव के साथ हमारा ग्रामीण समाज कितनी तेजी से बदल रहा था, राजनीतिक महत्वकांक्षाएं कैसे सामाजिक तानेबाने को चुनौतियां दे रही थीं और कैसे गांव-समाज में एक नयी किस्म की संस्कृति पनप रही थी, इसे उस समय के समाजशास्त्रियों ने जितनी बारीकी और संजीदगी से नहीं समझा, उससे ज्यादा फणीश्वरनाथ रेणु ने ‘मैला आंचल‘ और श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी‘ में देश-समाज को समझा दिया। मगर मेरे लिए इन दोनों उपन्यासों के प्रति आकर्षण की वजह इनका यह बौद्धिक पक्ष नहीं, इनकी आंचलिकता के पोर-पोर में समाया मेरे खुद के ग्राम्य-जीवन की संवेदना और अनुभूतियां हैं। इन गांवों का एक-एक दृश्य मेरे अपने गांव के हैं-वही गलियां, वही टोले, वही खेत, वही नदियां।

गांव बदल रहे है, यह सच हैं। गांव को बदलने का हक है और उसके हक के लिए पूरी दुनिया लड़ रही है। इस लड़ाई में सब शामिल हैं। सरकार, राजनीतिक पार्टियां, कॉरपोरेट, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शक्तियां और मेरे गांव का मंगरू भी। सब के अपने-अपने हित हैं। सरकार को वादे पूरे करने हैं। राजनीतिक पार्टियों के असली वोटर गांवों में हैं। कॉरपोरेट का कंज्यूमर गांवों में बसता है और मंगरू जैसे लोग अपने हालात, जीने की बुनियादी शर्तों और शहरी आकर्षण को पाने के लिए मासूम जद्दोजहद कर रहे हैं। इसी कैनवास पर नक्सली कहा जाने वाला तबका भी अपने रक्त-संकल्प के धब्बे खींचता सबसे नासमझ प्राणी के रूप में दिखता है।
गांवों को तो महात्मा गांधी भी बदलना चाहते थे। उनका ग्राम्य दर्शन वैश्विक धरोहर है। गांधी ग्राम स्वराज चाहते थे। ऐसा गांव जो सहकार की पूंजी के साथ आत्मनिर्भर हो। पंचायत-सरकार उसी दिशा में क्रांतिकारी कदम है। इन सबके अच्छे-बुरे परिणाम और संकल्पों की अपनी परिणतियां है। इस पर हमसे पहले की पीढ़ियों ने खूब बहस की। हम भी इस बहस में हांफ रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए विमर्श कर मसाला छोड़ रहे हैं। मगर इन सब का रिश्ता दिमाग, दौलत, दलाली, दलदली और दगाबाजी से है।
गांव से जो दिल का रिश्ता है, उसमें तो बस इंसानियत, सहकार और संवेदना का अनंत आकाश है। उसमें तमतमाया सूरज भी है, शीतलता का आंचल फैलाती धुली-धुली चांदनी भी है, उमड़-घुमड़ कर बरसते बादल भी हैं, सतरंगे इंद्रधनुष और अमावस की काली चादर भी है। उसमें निःशब्द रात्रि में पानी पीती धान की बालियों की गुड़गुड़ाहट का मद्धम संगीत है, गेहूं की पकी बालियों के टकराने से उत्पन्न लहरियां हैं, ओस की छुअन में छिपी सिहरन है और कोहरे में पसरी अलहदा खुशबू है। जहां की मिट्टी के स्पर्श में धन्यता का बोध है। चूल्हों से उठते धुओं में एक खास किस्म की मादक गंध है। प्रकृति के आंचल का कौन-सा धागा ऐसा है जो जीवन के अर्थ की खूबसूरत कशीदाकारी में शामिल न हो!

गांव तक पहुंचना अब पहले से आसान हो गया है। गांव में शहरी सुविधाओं और समझदारी घनी हुई हैं। लोगों की पसंदगी बदली है। बोलचाल के ढंग, जीवन के रंग बदले हैं। खानपान में नया स्वाद तलाशा जा रहा है। आयातित स्वाद-बोध का आयतन बढ़ा है। अब सांझ और रात के बीच थोड़ा फासला पैदा हुआ है। गोधूली के बाद भी देर तक गांव की जिंदगी में हलचल बाकी रहती है और सैंकड़ों आंखें देर रात टीवी-इंटरनेट के साथ जाग रही होती हैं। गांव में बिजली के खंभे तथा उन पर खिंचे तार और उनमें दौड़ती बिजली ने, गन्ने और मकई के खेतों के बीच आकाश को चूमने पर आमादा मोबाईल-टावर की बदौलत बहुत कुछ बदला है। गांव की लड़कियां अब शहरी अंदाज में हंसती हैं। बच्चे हर नयी चीज को देख कर पहले की तरह नहीं चौंककते। चौकों के स्वाभाव-चरित्र भी बदल गए हैं। यानी बहुत कुछ बदला है, मगर इससे आप गांव के गांव होने पर संदेह नहीं कर सकते। शहर के साम्राज्यवादी विस्तार की हदों को गांव के सिरहाने या पायताने तक पसर जाने के कारण गांव को गांव मानने से इनकार नहीं कर सकते क्योंकि गांव के बहुत-से ऐसे रंग, रूप, गंध, स्वाद, स्पर्श और ध्वनियां ऐसी हैं, जिसे हम बदल नहीं सके। कम-से-कम मेरे हिस्से का सच तो यही है।
बिहार के मुंगेर जिले के उस गांव से मेरा ज्यादा रिश्ता नहीं रहा, जहां मेरे पुरखों ने दुनिया को देखा-जीया, बल्कि यूं कहिए कि उस गांव से तो मेरा नाम मात्र का रिश्ता रहा। हां, गौरव इस बात का जरूर रहा कि महान चित्रकार नंदलाल बोस का जन्म और उनकी आरंभिक शिक्षा उसी अंचल में हुई, यानी हवेली खड़गपुर। इसी अंचल का गांव है बढ़ौना, मेरे पुरखों का गांव। मेरा असल रिश्ता तो बिहार के जमुई जिले के उस गांव से है, जो मेरा ननिहाल है- कुमारडीह। हर मौसम को मैंने इस गांव में जीया है, उसके सुख को भोगा है। त्योहारी उत्साह और उल्लास को मैंने इसी गांव में जाना-जीया। किउल नदी की दो धाराओं से तीन तरफ से घिरा गांव। एक दिशा की नदी पार की तो जमुई जा पहुंचे, दूसरी दिशा की नदी पार की तो गिद्धौर जा पहुंचे। वही गिद्धौर, जहां की दुर्गापूजा की तुलना आज भी कलकत्ते की कालीपूजा से की जाती है। जॉर्ज पंचम व ब्रिटिश महारानी मैरी के 1911 में भारत आगमन पर उनका स्वागत इस गिद्धौर ने भी किया था जिसकी गवाही यहां का किला अब भी दे रहा है। गांव की तीसरी दिशा की नदी के उस पर कुछ कोस पर वर्तमान लछुआड़ (आज भी जैनियों का प्रमुख तीर्थस्थल) है, जहां खुदाई में महावीर की अनेक प्राचीन मूर्तियां मिलीं जो जमुई के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यह इलाका बौद्ध धर्म के अनुयायी पालवंशीय राजाओं के साम्राज्य का हिस्सा था। यानी बौद्ध और जैन, दोनों धर्मों के विस्तार से जुड़ा है यह इलाका।
बाद के सालों में संताल परगना के गांवों ने मुझे आवाज दी और पहाड़िया आदिम जनजाति एवं संताल जनजाति की संस्कृति, परंपरा व उनके जीवन को जानने-समझने के लिए यहां के गांवों से एक मजबूत रिश्ता बन गया। बाद के सालों में लुप्त होती जनजातीय चित्रकला शैली ‘जादोपटिया‘ पर अध्ययन, शोध और संरक्षण के अभियान ने मेरे जीवन में गांवों से रिश्ते का तीसरा अध्याय जोड़ दिया। दरअसल, इन गांवों में मुझे वही जीवनधारा मिली, जो बचपन में अपने ननिहाल के गांव में मिली थी। लिहाजा ये मेरे अपने गांव जैसे हो गए और कुल मिलाकर एक गंवई जीवन का मेरे मानस पर वह प्रभाव है जिससे इतर मेरी कोई मानसिक पूंजी नहीं है।

गांवों तक पक्की सड़कें बन गयी हैं। आवागमन की सुविधाएं विकसित हो चुकी हैं, मगर पुरानी पगडंडियां अब भी मौजूद हैं और मेरे लिए आकर्षण वहीं हैं। खेती का पैटर्न ज्यादा नहीं बदला है, भले खेती को लेकर सोचने के तरीके बदल गए हैं। पैदावार को लेकर जद्दोजहद का वही सिलसिला अब भी कायम है। खेती के संसाधन बढ़े हैं, मगर बुनियादी तौर पर किसान-किसानी का रिश्ता वैसा ही है। हां, अब गांव में आटे की चक्की नहीं रही। धान के पुराने मिल बंद हो गए हैं। ढ़ेंकी कुछ घरों में हैं, मगर उनमें धान कूटने वाली औरतें नहीं रहीं। जब पहली बार गांव में आटे की चक्की खुली थी, तो गांवभर को ऐसा लगा था कि आधुनिकता ने बड़े जोर से हमारे गांव में पांव रखा है। धान की मिल लगी थी तो उसके धुएं और आवाज से गांव के तमाम टोलों ने खास किस्म का अहंकार महसूस किया था। जमीन पर बैठी औरतों ने दोनों पांवों को सीधा पसार कर कहा था, ‘ढ़ेकी को आराम मिला‘, मगर वही आटा-चक्की और धान-मिल अब गांव के नक्शे से गायब हैं। बावजूद इसके कि मेरे गांव के किसान अब भी वैसे ही गेहूं उपजाते हैं, धान उपजाते हैं। उनकी उपज अब उनके ही घरों में तरह-तरह के ‘ब्रांड नेम‘ के साथ आते हैं। किसानी जीवन में उपज और उपभोग के इस नए रिश्ते के बीच कई तबके पैदा हो गए हैं जो किसानों के पसीने पर पूंजी, तकनीक और बुद्धि की बदौलत बहुत भारी पड़ रहे हैं, किसानों से इसकी भारी कीमत वसूल रहे हैं।
सुना, तीन साल पहले पास के एक गांव के किसानों से एग्रो-मार्केटिंग यानी अनाज का कारोबार करने वाली किसी बड़ी कंपनी ने करार कर लिया। जमीन किसान की, किसानी यानी खेती कंपनी कराएगी। फसल, उसकी किस्में और खेती के तौर-तरीके कंपनी तय करेगी। उपज भी कंपनी की होगी। किसान को अपने से खेती करने पर मिलने वाली संभावित उपज के एवज में एक मुश्त रकम दे दी जाएगी यानी खेत कंपनी के हाथों उठ गए। यही हाल मौसमी फसलों, मसालों और सब्जियों का है। हमारे गांव के किसानों में इसे लेकर बहस जारी है। कोई खेती के इस तरीके के पक्ष में दलीलें गढ़ रहा है, तो कोई इसके खिलाफ संवेदना के स्तर पर तर्क दे रहा है।

इस दलील और तर्क के बड़े कैनवास में सभी मौजूद हैं-किसान, खेतिहर मजदूर, बनिया, व्यापारी, गाड़ीवान-चालक, पंडित, मौलवी, राजनीतिक जीव और बौद्धिक प्राणी सभी। बस गायब है, तो सरकार जिसने पूरे इलाके में एक भी कोल्ड स्टोरेज नहीं खोला, अनाजों-फलों-सब्जियों का एक भी प्रोसेसिंग प्लांट नहीं लगाया, समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद की हकीकत में इंतजाम नहीं किया। तो किसान क्या करेगा? शुक्र है हमारे गांव के किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की क्योंकि मुश्किल हालात में भी जीने की सीख उन्हें पुरखों से मिली है। इसबार जब से गांव आया हूं, एक बात गौर कर रहा हूं-गांव में औरतों, बूढ़ों और बच्चों के मुकाबले मर्द कम हो गए हैं। इस बात पर कोई गौर नहीं करता। बस इलेक्शन के वक्त ख्याल आता है जब मर्दों के मुकाबले ज्यादा वोट महिलाएं डाल आती हैं। मर्द तो शहरों में बसे-फंसे हैं, गांव वाली जिंदगी को खुदकुशी से महफूज रखने लिए।


बहरहाल, पगडंडियों पर अब भी पांव वैसे ही धरे जाते हैं। भले कोसों दूर तक नहीं, मगर खेतों, तालाबों, बाग-बगीचों, खाली खेतों में चरतीं बकरियों, पास के गांव-टोलों और रिश्तेदारों के घरों की दहलीज तक लोगों को पहुंचाने से पगडंडियों ने कब मना किया? वह तो अब भी गांव के लोगों का साथ वैसे ही रिश्ते निभा रही है, पूरे सहकार के साथ, अधिकार और सत्कार के साथ। मैं एक बार फिर उलझ जाता हूं पगडंडियों पर उभरे पावों के निशानों को पहचानने की कोशिश में, यह जानते हुए कि उन्हें कभी पहचान नहीं सकूंगा। ठीक वैसे ही, जैसे मैं अपने मन की उन कमजोरी से मुक्त नहीं हो सका जो मुझे बार-बार खींच लाती है गांव। गोया कि मेरे अंदर एक पूरा-का-पूरा गांव बसा है जिसे ताजी हवा तो बस बाहर के इन गांवों से ही मिलती है।
वरिष्ठ पत्रकार, जनजातीय संस्कृति के विशेषज्ञ, करीब ढ़ाई दशकों से प्रभात खबर,रांची।

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