June 06, 2020

अब न वह गांव है, न वे लोग हैं, न वह परिवेश है…

हरिवंश
जिस गांव में शिक्षा की भूख बढ़ी, वह भी खुद के कारण नहीं, अध्यापकों के कारण. वे पुराने किस्म के अध्यापक थे, धोती-कुर्ता वाले, हर साल इंक्रीमेंट और तनख्वाह बढ़ाने के लिए आंदोलन करने वाले नहीं, बल्कि अपने बच्चों को शिक्षित करने की प्रक्रिया में आत्मसुख पाने वाले (अपवाद हर दौर में होते हैं, तब भी थे, आज भी हैं). एक खास अध्यापक को मैं याद करूंगा वह मेरे हाई स्कूल के अध्यापक थे, घर पर ही रहते थे, परिवार के सदस्य की तरह.

न कभी डांटना, न कभी फटकारना, न छड़ी दिखाना, पढ़ाई के प्रति मोटिवेशन पैदा करना, नैतिक बोध कराना. एक घटना तो मामूली थी, पर उसने गहरा असर डाला. घर से थोड़ी दूर बड़ा दोचारा था (देशज अर्थ में पुरुषों को रहने-ठहरने का ड्राइंग रूम). फूस की बड़ी झोपड़ी, जिसमें 8-10 लोग सोते थे. जाड़े के दिनों में पुआल लगता था, 15-20 लोगों की सोने की जगह होती थी. जीवन बड़ा सादा-सरल था, प्रकृति पर निर्भर. बहुत बाद में ‘हेनरी डेविड थोरो’ को पढ़ा. कैसे वह सब नगर, भौतिक सुख सुविधाएं छोड़ कर एक तालाब के किनारे रहने चले गए थे, बिल्कुल प्रकृति के भरोसे. कम से कम जरूरतें. थोरो 19वीं सदी के चिंतक थे. उन्हें ट्रांससींडेंटलिस्ट कहा गया. अपने निबंध ‘सिविल असहयोग’ के लिए वे प्रख्यात थे. गांधी जी इस अमेरिकी विचारक से प्रभावित रहे. थोरो का निष्कर्ष था कि संसार में स्वविवेक ही अंतिम कानून है और ईश्वर ने मनुष्य को शक्ति दी है कि वह स्वविवेक का इस्तेमाल करे. थोरो का यही दर्शन गांधी जी के लिए सत्याग्रह का आधार बना. थोरो की प्रार्थना को गांधी जी ने ‘प्रार्थनाओं की प्रार्थना’ माना.
‘ हे प्रभो ! मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं अपने को अपनी करनी से कभी निराश न करूं. मेरे हस्त, मेरी दृढ़ता, श्रद्धा का कभी अनादर न करें. मेरा प्रेम मेरे मित्रों के प्रेम से घटिया न रहे. मेरी वाणी जितना कहे- जीवन उससे ज्यादा करता चले. तेरी मंगलमय सृष्टि का हर अमंगल पचा सकूं, इतनी शक्ति मुझ में बनी रहे . ‘
थोरो दार्शनिक थे. प्रकृतिवादी नैतिक सिद्धांतों के आग्रही. 1817 में वह कॉनकॉर्ड मैसाचुसेट्स अमेरिका में जन्मे. हार्वर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक किया. जीवन में अनेक प्रयोग किये. वह तालाब के किनारे रहे. कुछ दिन तपस्वी जीवन जिया. मांश, शराब, तंबाकू सब कुछ छोड़कर. प्रकृति के साथ तादात्मय बैठाते हुए. आस-पास के पौधे और जीवों का विस्तार में रिकॉर्ड रखे. वाल्डेन में अपने अनुभवों को लिखा. इस तरह से दुनिया को नयी राह दिखाने वाले इंसान रहे. कम से कम सुविधा के बीच प्रकृति से लय बैठाकर जियें, यह चाहत रही.
आज दुनिया में मिनिमलिस्ट (कम से कम सुख-सुविधा के बीच रहने की आदत बनाना) आंदोलन चल रहा है. बढ़ते उपभोग की अपनी चुनौतियां हैं, प्रकृति पर असर है, पर्यावरण संकट है, पीने का पानी दूषित हो रहा है. उपभोक्ता संस्कृति और इस टेक्नोलोजी से चलने वाली दुनिया से जो अवशिष्ट (कचरा) पैदा हो रहा है, उससे निपटना दुनिया के लिए नयी चुनौती है.

पर तब के मेरे गांव, परिवेश कठिन चुनौतियों से घिरे थे, फिर भी प्रकृति से न्यूनतम साधनों को लेकर इंसान जीता था. पुरुषों के रहने-सोने के लिए जो बैइठका या दोचारा बनता, वह भी खर-पतवार और सरकंडा से. रात को आठ बजते-बजते लगता आधी रात हो गयी. शाम में ही लगभग भोजन का रिवाज था.घर से अपने उस अध्यापक ‘सुरेश गिरी’ का शाम का खाना लाया. घर और दोचारे के बीच घुप्प अंधेरा, सांप, बिच्छू के डर होते थे. टर्च घर में होता था, पर एकाध. मिल—बांट कर काम करने की परंपरा थी. जाड़े के दिन थे, गिरी जी कि तबीयत नसाज थी. खाने के बाद पानी लाया, लोटे में. उन्होंने पूछाः पानी छनवा लिये हो ? हमने कहा, हां. कुएं से पीने का पानी आता था. मैंने गलत बोला था. जाड़े में दोबारा दोचारा से घर जाने, अंधेरे से बचने और ठिठुरन से बचने के कारण. शायद ! तब तक एक लालटेन मिल गया था, पढ़ने के लिए. लालटेन की रोशनी में उन्होंने पानी को निहारा, देखा उसमें मेढक का छोटा बच्चा है. गलत बोलने पर छड़ी से पिटाई की भी परंपरा थी, पर गिरी जी ने कुछ नहीं कहा. उन्होंने बस दिखाया पानी और कहा कि तुमने कहा कि छनवा लिए हो, देखो. इसके बाद और कोई टिप्पणी नहीं, सिर्फ यही कहाः दूसरा पानी ला दो.
मेरे मन मस्तिष्क पर इस घटना का गहरा असर हुआ. आमतौर से जीवन में ऐसी स्थिति न आए, इसकी शिक्षा ऐसे ही अध्यापकों से मिली. पढ़ने की आदत विकसित हुई. क्योंकि ऐसे अध्यापकों ने बताया कि शिक्षा का मर्म क्या है? पढ़ने की भूख या ललक पैदा करना, ऐसे लोगों ने किया. गिरी जी ने एक आदत डलवाई शाम सात-आठ बजे गांव में खाकर सो जाने की परंपरा थी, पढ़कर अच्छे नंबर पाने की मनोवैज्ञानिक लालसा उन्होंने पैदा की, फिर कहा, शाम को खाकर सो जाना, रात में दो-ढाई बजे उठकर सुबह तक पढ़ो. लगभग दो साल, उन्होंने इस कार्यक्रम को अपनाने को कहा. मैट्रिक परीक्षा के पहले, याद है यह प्रक्रिया शुरू हुई, तो कितनी दिक्कतें आई, कुर्सी पर बैठकर नींद आती. धीरे-धीरे आदत पड़ी, उठकर पांच-सात मिनट बाहर चांदनी रात होने पर टहलता. आज लगभग पांच दशक हो गए, प्रकृति की जिस निस्तब्धता, मुखर मौन का तब एहसास हुआ, वह अब नहीं मिलता. चांद का जो सौंदर्य देखा, वह फिर कहां मिला ? कृष्णपक्ष के अंधियारे में आसमान में जो तारों का सौंदर्य देखता, सामने के बगीचे के पेड़ दिखाई देते, दरवाजे के आगे का विशाल पेड़ झलकता, तब पंत की कविता कि पंक्तियां, जो बाद में पढ़ी, का एहसास होताः
स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार
चकित रहता शिशु सा नादान ,
विश्व के पलकों पर सुकुमार
विचरते हैं जब स्वप्न अजान,
न जाने नक्षत्रों से कौन
निमंत्रण देता मुझको मौन !

पूस और माघ के भयावह जाड़े में जो खेखर, सियार वगैरह की आवाज गूंजती, अब वो आवाज सुनने को नहीं मिलती. प्राकृतिक घास पर जो ओस की बूंदे होतीं, वह रजत कड़ याद आते हैं. खुले आसमान के नीचे गांव में सोने की परंपरा थी, उसका जो आनंद मिलता, प्रकृति के छत के साये में रहने का, वह अब दुर्लभ है.न मेरे गांव में उसके दूर-दूर तक चिह्न रह गये और न इस पीढ़ी ने यह देखा या जीया है. प्रकृति से एक रूप होने की भूख गांव ने ही मन में पैदा की.

बहुत बाद में काका कालेलकर का एक प्रसंग पढ़ा.
वह मध्यप्रदेश के झाबुआ के एक भील बच्चे को दिल्ली लाए, उसके पढ़ने से लेकर सब चीजों का बंदोबस्त किया.गांव की अपेक्षा अधिक भौतिक सुविधाएं मिली.  कुछ महीने बाद उन्होंने पाया कि रात में, उसके सुबकने की आवाज आ रही थी. छत पर खुले आसमान में कई लोग सोये थे, कालेलकर साहब भी थे, वो बच्चा भी था. आवाज दी पूछाः क्यों सुबक रहे हो ? पहले, तो वह लड़का बोला नहीं, बहुत कुरेदने पर, उनके सवालों का जवाब दिया. काका साहब ने पूछाः क्या तुम्हें खाने की दिक्कत है, कोई और असुविधा है, कोई चीज चाहिए, क्या परेशानी है? गांव या घर पर कोई घटना हो गयी है या शहर में तुम्हारे साथ कोई अप्रिय प्रसंग हुआ है ?
बच्चे ने कहाः कुछ भी नहीं, यहां तो बहुत सुविधाएं हैं. हमने बिजली पहली बार देखी, खाना बहुत अच्छा मिलता है, लोग बहुत अच्छे हैं, कपड़ा अच्छा पहनता हूं, पहली बार शहर में रहता हूं, बहुत सी चीजें जीवन में पहली बार यहां आ कर देखी, बहुत सुख से हूं, पर मुझे अपना गांव चाहिए. रातों के सुनसान आसमान में जंगल के बीच वो चमकते तारे, आसमान का वह अक्षत सौंदर्य, गाय के बछड़े का वह फूदकना, गायों का रंभाना, गांव का वह सामूहिक गीत-नृत्य सब कुछ बहुत याद आते हैं, मैं यहां रह नहीं सकता, कृपया मुझे गांव, मेरे परिवेश में वापस कर दें.
यह पढ़ा प्रसंग जब-जब स्मृति में उभरता है, मुझे अपने गांव में गुजारे दिन, खासतौर से देर रात में उठकर देखा गया वो आसमान, प्रकृति का वह रूप या उन अंधेरिया (अंधकार) रातों या टहटह अंजोरिया (चांदनी) में देखे, वे पौधे-पेड़, मवेशियों के दृश्य, दूर तक मीलों-मीलों पसरे खेत-खलिहान, दरवाजे का एक मात्र कुंआ वगैरह याद आते हैं. यह मालूम है कि अब न वह गांव है, न वे लोग हैं, न वह परिवेश है. गांव में ही गीता के उपदेश में पंडित जी ने कहा थाः असल चीज काल यानी समय है.यह निरंतर प्रवाहमान है, गतिमान है, चरैवेति—चरैवेति.


इस बदले हुए परिवेश को समझने के लिए मेरे गांव में आए बदलाव (शायद देश के सभी गांव में आए बदलावों) के लिए लगभग चार दशक पहले पढ़े गए चार उपन्यास याद आते हैं- राही मासूम राजा का ‘आधा गांव’, शिव प्रसाद सिंह का ‘अलग-अलग वैतरणी’, फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ और श्रीलाल शुक्ल का ‘रागदरबारी’. आजाद भारत में गावं बदले, कैसे मूल्य परिवर्तित हुए, इसका समाजशास्त्रीय अध्ययन तो बहुत है, पर हिंदी के इन उपन्यासकारों की ये चार क्लासिक रचनाएं 60-70 के दशकों में गांव के समाज मे आए बदलाव का श्रेष्ठ अध्ययन है.इस अध्ययन की पृष्ठभूमि में ही अपने उस गांव को बार-बार समझने की कोशिश करता हूं. पांच दशकों के काल के प्रवाह में बार-बार मुड़कर लौटता हूं. निजी घर में कोई स्वजन लगभग बचा नहीं, फिर भी प्रायः साल में कई बार जाता हूं. अपने गांव, उस धरती पर. घर में आज भी मामूली सुविधाएं ही हैं, रहने की दिक्कत. बिजली संकट वगैरह. फिर भी मन नहीं मानता, बार-बार आना जाना है. शायद, अतीत को जीने, अपनी जड़ समझने, ऊर्जा पाने, उस धरती को प्रणाम करने, पर हर बार कैलाश गौतम की यह कविता का भाव लेकर ही लौटता हूं.

गाँव गया था, गाँव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आँगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था, गाँव से भागा.
नए धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गाँव गया था, गाँव से भागा.
नए नए हथियार देखकर
लहू-लहू त्योहार देखकर
झूठ की जै जैकार देखकर
सच पर पड़ती मार देखकर
भगतिन का शृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था, गाँव से भागा.
(राज्यसभा के उपसभा​पति हरिवंश जी के गांव सिता​बदियारा के कहानी की अंतिम यानी पांचवी कड़ी।)

कहानी की बाकी क​ड़ी पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं।

http://panchayatkhabar.com/sitabdiara-story-harivansh-jee-part4/

http://panchayatkhabar.com/harivansh-ji-sitabdiara-story-part-3/

http://panchayatkhabar.com/harivansh-ji-sitabdiara-part-2/

http://panchayatkhabar.com/sitabdiara-jayprakash-narayan-village/

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