June 06, 2020

मेरा ‘गांव’-मेरा ‘देस’

डाॅ.सुधा सिंह
कलकत्ता में रहनेवाले बिहार, उत्तरप्रदेश के प्रवासी मजदूर अपने गांव को ‘देस’ कहते हैं। मैंने अपने आरंभिक जीवन के 24 वर्ष इन मजदूरों के बीच बिताए हैं। उनके जीवन, रहन-सहन, सुख-दुख को करीब से देखा है। इनके बीच रहकर मैंने अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी की है, जीवन की पहली नौकरी की है। केशोराम कॉटन मिल के नाम से ख्यात बिड़ला के सूताकल मिल में भोंपू के इशारे पर अलग-अलग शिफ्टों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर जब होली, दीवाली या छठ पर अपने गांव जाते थे, तो यही कहते थे कि ‘देस जा रहे हैं’। गांव से लौटने पर अपने साथ कसार, भेली, चावल और चूड़े के भूजे से बने बड़े-बड़े लड्डू, चना, सत्तू, कचरी (चने के साग को सूखाकर बनाई गई टिकिया), लाई, तिलकूट, खाजा लेकर लौटते थे। हम बड़े चाव से खाते थे, बिल्कुल मजदूर बच्चों के साथ मिलजुल कर। हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती थी कि हमारे बाबा या पिता की सामाजिक स्थिति क्या है। लेकिन हमारा बालमन यह सोचता था कि अब तक क्या विदेश में रह रहे थे, जो देस जा रहे हैं? और हम भाई-बहन इसे इनके भोले या बेवकूफ होने का मतलब निकालकर मस्त हो जाते थे। गर्मी की छुट्टियों में हम भी दादीघर या नानीघर जाते थे, पर हम उसे ‘गांव’ जाना कहते थे।


यह ‘देस’ और ‘गांव’ का फर्क, केवल संबोधन का फर्क नहीं है बल्कि हम अपनी बुनियाद और जड़ों को किस तरह देखते हैं, उसका फर्क है। मजदूरों की चेतना के विकास से इसका गहरा संबंध है। हम शहर में जीते हुए मध्यवर्गीय लोगों के लिए ‘गांव’ एक रूमानी सत्ता की तरह प्रतीत होता है। वहां के जीवन, रहन-सहन और सुख-दुख से दूर का नाता होता है। हम वहां जाकर भी वहां के नहीं होते, उनसे घुलते-मिलते नहीं। एक किसान और मजदूर की चेतना से अपने को नहीं जोड़ पाते। शहर में रहना, शहरी सुख-सुविधा में रहना और ‘गांव’ और गंवई जीवन को ठोस रूप में पिछड़ा और भदेस समझना हमारी आदत होती है और वहां जाकर कुछ दिन के लिए शहरी फैशन से गांव वालों को चकाचैंध कर देना भर उद्देशय होता है। मध्यवर्ग का सपना कभी गांव लौटना नहीं होता। उसका सपना दिल्ली, बंगलौर जैसे शहरों में आजीविका प्राप्त करना होता है। आज पढ़े-लिखे युवाओं में अमेरिका जाकर नौकरी पाना और वहां बसना सपना होता जा रहा है। जबकि मजदूर का मन अपने गांव और गांव के जीवन के लिए, वहां लौटने के लिए आजीवन कसकता रहता है। वह शहर में मजदूरी करते हुए, गांव में जमीन खरीदता है, घर बनवाता है, पशु खरीदता है, वहां लौटकर आराम का जीवन बिताने के सपने देखता है।


मैं ठीक-ठीक याद नहीं कर पा रही कि गांव की पहली स्मृति का संबंध मेरी उम्र के किस वर्ष से है। शायद चार-पांच साल की रही होऊंगी। पिता हर बार मई-जून में जब अवकाश मिलता था, हमें गांव ले जाते थे। हर साल लगभग दो-तीन महीने, कभी इससे ज्यादा भी, हम गांव में रहते थे। वापस लौटने पर बिना परीक्षा दिए अगली कक्षा में प्रमोट हो जाते थे। गांव जाने में मुझे जो चीज सबसे अधिक आकर्षित करती थी, वह थी रेलगाड़ी। अक्सर हमारा आरक्षण हावड़ा-दानापुर एक्सप्रेस से बख्तियारपुर जंक्शन तक होता था, कभी कभी हमलोग पटना होते हुए भी जाते थे। लेकिन हम भाई-बहनों के उत्साह का यहीं अंत नहीं था। बख्तियारपुर जंक्शन से हम जीप या कार से बिहारशरीफ आते थे। वहां दिन भर अपने नाते-रिशतेदारों के यहां रुककर, दिन ढ़लने और गर्मी का प्रकोप थोड़ा कम होने पर सबसे मजेदार सवारी ‘टमटम’ (घोड़ागाड़ी) की यात्रा शुरू होती थी। ‘टमटम’ गांव के ही एक कहार जाति के व्यक्ति का होता था जिन्हें हम चाचा कहते थे। पेड़ों की घनी छांव के बीच गुजरता ‘टमटम’ घोड़ों के घुंघरू और पैरों की लयबद्ध टाप से अनूठे संगीत का सृजन करता जो आज के किसी एफ.एम. चैनल के संगीत से मुकाबला कर सकता था। गांव तक पहुंचने के पूरे सफर का यह सबसे रोमानी हिस्सा होता था। रास्ते में पड़ने वाले गांवों से गुजरते हुए हम बहुत उत्सुकता से लिपे-पुते आंगन, बंधे हुए मवेशी, घरों के आसपास चरती हुई बकरियां, मुर्गे-मुर्गियां, तोते आदि को देखते और खुश होते। अगर गर्मी अधिक होती तो हमारा ‘टमटम’ घोड़े को आराम देने के लिए कुछ देर थमता। घोड़े का मुंह उसकी गर्दन से बंधे बोरे के अंदर होता, वह कुछ खाता और फिर ‘टमटम’ अपनी रुनझुन के साथ चल पड़ता गांव की ओर।
गांव की सीमा का अंतिम छोर जहां उस समय कुछ घर बने हुए थे, ‘चंदनिया पर’ कहलाता था। जब हमलोग गांव से विदा होते या हमारे आने की खबर मिलती तो हमारे स्वागत या विदा का अंतिम प्वॉइंट यही होता था। घरवाले, विशेषकर दादी जी, बुआ, बच्चे और गांव के अन्य लोग खेतों से निकलकर छोटे रास्ते से पहले ही वहां पहुंचे होते थे जबकि ‘टमटम’ को मुख्य रास्ते से पहु्रचने में समय लगता था। ‘चंदनियां पर’ से हम गांव के अंदर जानेवाली सड़क पर आ जाते। पहले ‘देवी स्थान’ पड़ता था। वहां हमारे खेत भी थे। पिता अपने खेत को बड़े प्यार से दिखाते। थोड़ा आगे बढ़कर हम गांव में दाखिल हो जाते। गांव में दाहिनी तरफ डीह और उससे सटा बड़ा-सा पोखर, उससे और दाहिने खलिहान थे।

यह गांव दरअसल मेरी दादी का नैहर है। यह बिहारशरीफ से अस्थावां के रास्ते पर पड़ता है और ‘बेलछीशरीफ’ के नाम से जाना जाता है, वह ‘बेलछी’ नहीं जहां दुर्दान्त ‘बेलछी काण्ड’ हुआ था। मेरी दादी का ससुराल बिहारशरीफ में बिन्द के आगे ‘सूरतपुर’ गांव है। वहां बहुत पहले हमारे घर भारी डकैती हुई। जानमाल की क्षति हुई। परिवार में मेरे पिता अकेले पुत्र संतान थे। मेरी दादी इस घटना से बहुत डर गईं और अपने नैहर ‘बेलछीशरीफ’ चली आईं और वहीं घर बनाकर बस गईं, फिर अपने ससुराल ‘सूरतपुर’ कभी नहीं गईं। उनके बड़े भाई कलकत्ता में सरकारी हाई-स्कूल के शिक्षक थे। परिवार में सबसे पहले वे ही नौकरी के सिलसिले में बाहर गए थे। जैसाकि आम बिहारी परिवारों में होता है, एक शहर गया तो उसके सहारे परिवार के बहुत से लोग नौकरी और शिक्षा की तलाश में वहां पहुंच जाते हैं। तो मेरी दादी के बड़े भाई ने यानी हमारे बड़े बाबा ने अपने बहनोई श्री लोकनारायण सिंह यादव को कलकत्ता आने का आमंत्रण दिया। मेरे बाबा कलकत्ता गए और धीरे धीरे कलकत्ता में हमारे परिवार का एक छोटा गांव बस गया। बाबा के बाद पिता ने भी कलकत्ता विशवविद्यालय से स्नात्तकोत्तर हिन्दी की पढ़ाई पूरी कर कलकत्ता को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया। मेरा जन्म कलकत्ता में ही हुआ।
गांव का मोर्चा स्वभाव से दृढ़ और बेहद कर्मठ मेरी दादी ने संभाला। मेरी दादी श्रीमती अजनाशो देवी, सुंदर नाक-नक्श वाली, मझोले कद की, घुंघराले बालों वाली, सांवली स्त्री थीं। जबकि मेरे बाबा छह फीट से ऊपर, छरहरे, तीखे नाक-नक्श वाले, गोरे और बेहद सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी थे। मेरी दादी पर्दा नहीं करती थीं। चूंकि वे उस गांव की बेटी थीं, अतः अन्य खाते-पीते घरों की स्त्रियों की तुलना में घर के बाहर के सामाजिक क्रियाकलापों में उन्हें अधिक स्वाधीनता हासिल थी। लेकिन दादी को अपनी दोनों बहुओं से भी पर्दा करवाते मैंने नहीं देखा। लिहाजवश मां और चाची स्वयं ही सिर के आंचल को कुछ खींचकर ललाट तक ले आएं तो और बात थी। मैंने अपनी दादी को बाबा और पिता की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में निर्णायक फैसले लेते और उन पर अमल करते-करवाते देखा है।

मेरे पिता दो भाई और चार बहनों में तीसरे नंबर पर थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी, एम. ए. का नतीजा आने से पहले ही उनकी नौकरी लग गई। उनके पढ़ाए विद्यार्थी आज देश-विदेश में बड़े पदों पर काम कर रहे हैं। जीवन के बेहतर मूल्यों को अर्जित करना मेरे पिता के लिए सबसे मूल्यवान था। मेरे पिता और बाबा की कमाई की असली निवेशक मेरी दादी थीं। वे ही तय करती थीं कि इन पैसों से क्या होगा, यह घर बनाने या मरम्मत कराने पर खर्च होगा कि खेत खरीदे जाएंगे अथवा भाई या बहनों के परिवार पर खर्च किया जाएगा। मेरे चाचा ने कभी तरीके से कोई नौकरी नहीं की, निहायत आरामतलब और अकर्मण्य रहे। लेकिन उनके और उनकी पत्नी तथा बच्चों का रहन-सहन बिल्कुल मेरी मां और हम जैसा ही रहे, इसका पूरा ध्यान दादी रखती थीं और उनके बाद मेरे पिता ने बराबर यह ख्याल रखा। पढ़ी लिखी और सुविधाओं में पली मेरी माताजी के लिए भी वही साड़ी आती, जैसी मेरी चाची और चारों बुआओं को मिलती। बल्कि होता यह था कि मेरी मां चुंकि कमाने वाले आज्ञाकारी पुत्र की पढ़ी-लिखी पत्नी थीं, तो सबके द्वारा साड़ियां चुन लेने के बाद ही वे बचे हुए एक दो रंगों में से अपने लिए साड़ी ले पातीं। मेरी मां ने इस व्यवस्था के खिलाफ कभी असंतोष व्यक्त नहीं किया।

मेरे गांव की लगभग आधी आबादी मुसलमानों की थी और हिंदू जातियों में प्रमुखता यादवों की थी। उसके बाद कहार, तेली, चमार और दुसाधों के कुछ घर थे। नब्बे के दशक में दबंग यादवों के खिलाफ दलित जातियों का प्रतिरोध भी हुआ। लेकिन फिर गांव के ताने बाने में सब पहले की तरह व्यवस्थित हो गया। सब जातियों और धर्म के लोग मिल जुलकर रहते थे। मैंने सन बानबे में बाबरी-विध्वंस के बाद कलकत्ता के मटियाबुर्ज इलाके में जहां हम रहते थे, दंगे की धमक देखी है। लेकिन गांव में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कभी कोई दंगा या तनाव की स्थिति नहीं आई। खेती-किसानी का काम सब आपसी सहयोग से करते थे। मुसलमानों के खेत हिंदुओं के पास बटाई थे। थ्रेसर, पटौनी का सामान आदि, बिजली आने पर पंप चलाकर खेतों में पानी देना, सब में ग्रामीण सहकारिता का नियम चलता था। गांव में अस्सी के दशक में ही ग्रामीण बैंक भी खुल गया था। एक पोस्ट ऑफिस और एक मिडिल स्कूल था जिसमें लड़के-लड़कियों के लिए आठवीं तक पढाई की व्यवस्था थी।
मेरा नानीघर जहानाबाद जिले के बैरागीबाग गांव में है। जब छुट्टियों में गांव जाते तो नानी से मिलने भी जाते। वह मूलतः यादव बहुल गाव था और किसी अन्य जाति या धर्म के लोग वहां नहीं बसे थे। वहां के लोग काफी समृद्ध थे और फसल अच्छी होती थी। खेत, बगीचे, हरियाली से भरे होते थे। शिक्षा की सुविधाएं भी वहां ज्यादा थी क्योंकि वह गांव शहर जहानाबाद से सटा हुआ था। मेरी मां, मौसियों को स्कूल की पढ़ाई के बाद आगे पढ़ाने के लिए मेरे नानाजी ने बाकायदा रिक्शा खरीद कर एक व्यक्ति लगा दिया था, जो इन लोगों को शहर पढ़ने ले जाने और लाने के अलावा दिन भर उस रिक्शे से अपना रोजगार करता था। शहर से सटा गांव होने और शहर में लड़कियों की शिक्षा का बंदोबस्त होने के कारण उसका लाभ मेरी माताजी, मौसियों आदि को मिला। मेरी मझली मामी ने भी विवाह के बाद ससुराल से पढ़ाई की।


मेरे दादीघर में सभी जातियां रहती हैं और उनमें आपस में मेल-मिलाप भी बहुत है। मेरे घर के सामने एक कृषक यादव परिवार रहता था, बांईं तरफ कहार परिवार और दाहिनी तरफ की गली में एक मुसलमान परिवार। कहार परिवार की सबसे बड़ी स्त्री मेरे घर पानी भरने और गोइठा ठोंकने आती थीं। सांवली सी, चौड़े गठन वाली हँसमुख और मेहनती स्वभाव वाली स्त्री थी। उसके सांवले शरीर पर गोदना सुंदर कंन्ट्रास्ट पैदा करता था। गोदना, उस समय का चलन था। मेरी दादी के भी हाथों पर सुंदर कलात्मक गोदना गुदा हुआ था जो मुझे बड़ा आकर्षक लगता था। लेकिन इस गोदना के अलावा मैंने अपनी दादी को कभी गहने पहने नहीं देखा। जबकि उनके पास उनके ससुराल में हुई डकैती के बाद, बनवाए गए गहने थे। दोनों बहुओं और बेटियों के गहने भी उन्हीं के पास रहते थे। उनके गहने रखने का तरीका बड़ा मजेदार था। भीतर के घरों की दीवार में बीच बीच में एक-एक ईंट नहीं होती थी, वहाँ एक बड़ी खाली जगह होती थी। मैंने अपनी दादी को चोर और डाकुओं के भय से उन हटी हुई ईंटों की खाली जगहों में गहनों को रखते और फिर उसे छोटी ईंट के टुकड़ों और मिट्टी से लीपकर बंद करते देखा है। कह सकते हैं कि उनके निकट गहनों का संपत्ति मूल्य था, सौंदर्य मूल्य नहीं था।

आम तौर पर गांव में नई बहुएं और बेटियां तो गहने पहनती थीं, कानों की बाली, झुमके, सिकड़ी (गले की जंजीर), नकबेसर, पायल, पहुंचा और लरछा आदि। विशेष उत्सवों पर शादी-ब्याह, डोमकच, करमा, गणेश पूजा, दुर्गापूजा आदि पर वे करधनी, बाजूबंद, मांगपट्टी, झुमका, बाला जैसे गहने पहनती थीं। लेकिन सामान्य दिनों में कनबाली, नकबेसर, सिकड़ी, हाथ में कांच की चूड़ियां ही पहना करती थीं। एक मुसलमान मनिहारिन चूड़ी पहनाने आती थी। हमारे गांव में सोने या धातु की चूड़ियां पहनना विवाहित स्त्री के लिए अशुभ माना जाता है।
महिलाओं के रिक्रिएशन का एक बड़ा माध्यम वह फेरीवाला था जो अपने कंधे से लटके एक डंडे पर महिलाओं के आकर्षण और जरूरत की सारी चीजें लादे रहता था। उसके डंडे से कई पोटलियां और अलग अलग वस्तुओं की लड़ियां झालर की तरह झूलतीं। उसके पास चोटी, कंघी, बिंदी, काजल से लेकर महिलाओं के अंतःवस्त्र जिसे वे प्रायः ‘बौंडिस’ कहतीं, भी होते थे। जो महिलाएं खाते पीते घरों से ताल्लुक रखती थीं और जिनकी दुनिया घर के आंगन-ओसारे तक ही सीमित थी, वे सब बड़े चाव से इस फेरीवाले का इंतजार करती थीं जो महीना-पंद्रह दिन में एक बार आता था। उसके पास गमकौआ तेल और अफगान स्नो भी होता था जिसकी विशिष्ट गंध होती थी। मेरी चाची के पास इन चीजों का जखीरा होता था, वे स्टॉक करना जानती थीं। जब हम गांव जाते तो बड़ी उदारतापूर्वक वे इन चीजों से हम बच्चों को भी सजने-संवरने का मौका देतीं। इस लालच में हम उनके पीछे लगे रहते।

दादीघर जाने का एक बड़ा आकर्षण मेरी चार बुआएं थीं जिनमें दो मेरे पिता से बड़ी और अपने अपने ससुराल में रमी हुई थीं, लेकिन संझली और छोटी दीदी (हमारी तरफ बुआ को ‘दीदी’ बोलते हैं) साल में आधे समय ससुराल और आधे समय नैहर में रहती थीं। गर्मी की लंबी छुट्टियां इन चचेरे-फुफेरे भाई-बहनों के साथ बीतती थी। मेरा पिता के ममेरे भाइयों का परिवार भी जिनमें से अधिकतर कलकत्ते में ही रहता था, इन गर्मियों की छुट्टियों में गांव आता था। गांव जाने पर मां घर की बड़ी बहू के नाते घर के कामकाज में उलझी रहती थीं। मां से मिलने, उनसे कपड़े और अन्य चीजें साधिकार मांगने वाली, रिशते में सास-ननद, देवरानी लगने वाली औरतें घर में आतीं। उनका जमावड़ा लगता, गर्मी की दुपहरिया गुंजार रहती। मैं मां से अलग अपनी दादी और बुआओं के पीछे लगी रहती। वही मां जब अपने नैहर जातीं तो उनका अलग रूप देखने को मिलता। अलग अलग घरों में निमंत्रित होतीं, वहां उनका नाम ‘मून’ होता। अपनी भतीजियों की वे लाडली ‘फुआजी’ होतीं। उनका संतोषी, संयमित, सौम्य और अक्रोधी स्वभाव बहुत असर डालता। मैं वहां मां के साथ लगी रहती क्योंकि मां के साथ मुझे गांव के अलग-अलग घरों में जाने, आम के बड़े बगीचे में, देवीथान और जहानाबाद घूमने का मौका मिलता। मां वहां हम भाई-बहनों से बेपरवाह रहतीं, हम खुद नहाते-धोते। किसी भी कुएं या चापाकल पर कोई मामा या नाना नहाते रहे, हमें भी नहला देते, हमारी चोटी-कंघी कोई और करता और हम इतराते फिरते। हमें मेहमान का दर्जा और दुलार मिलता। अपने मामा-मामी के बच्चों से हम अपने को विशिष्ट मानते। मझले मामाजी से भी मुझे डर नहीं लगता था जो बच्चों के बीच अपने गुस्सैल स्वभाव और पिटाई करने के लिए मशहूर थे।

(प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय…क्रमश: जारी)

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