घनश्याम
झारखंड का एक गांव है, ‘लालपुर’। यह गांव देवघर जिले के मधुपुर प्रखंड में है। दो तरफ नदियों से घिरा यह गांव मिश्रित आबादी का है। गांव में कुल 110 परिवार हैं। 4 टोलों में विभक्त यह गांव अपने स्वावलंबन की कथा खुद रच रहा है। 15 साल पहले यह गांव अपनी व्यथा की कहानी कहता हुआ सरकारों, जनप्रतिनिधियों और संस्थाओं के सामने अपनी फरियाद पहुंचाता रहा। लेकिन न तो सरकारों और न ही जन प्रतिनिधियों के कानों पर जूं रेंगी। विवश होकर लालपुर के ग्रामीणों ने अपनी व्यथा से मुक्ति की कहानी खुद गढ़नी शुरू कर दी। इस कहानी का सिलसिला ऐसा चला कि न सिर्फ इस गांव ने अपनी व्यथा से मुक्ति पाई बल्कि अन्य गांवों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया।
लालपुर की 50 वर्षीय ‘शीला देवी’ अपनी कहानी सुनाते हुए जार-जार रोने लगती है। वे कहती हैं कि 30-32 साल पहले जब वह ब्याह कर लालपुर आयी थी, तब घर और गांव की स्थिति इतनी खराब थी कि लोग मुश्किल से एक शाम खाना खा पाते थे। तब गेंहू और रोटी तो थी नहीं। सिर्फ चावल पर निर्भर रहना पड़ता था। किसी तरह से बच्चों को भात बना कर खिला पाती थी और परिवार के अन्य सदस्यों को खुद्दी चावल के टूटे हुए टुकड़े की लपसी खाकर गुजरा करना पड़ता था। अपने आंसू पोंछते हुए शीला देवी कहती हैं, ‘पिछले 10 वर्षो में इस गांव की तस्वीर और इस गांव के लोगों की तकदीर बदल गई। अब यहां के लोग न सिर्फ तीनों पहर भरपेट भोजन करते हैं बल्कि साल में कुछ अनाज बेचते भी हैं। अनाज में अब सिर्फ धान ही नहीं बल्कि गेंहू, मकई, अरहर, मूंग, घंघरा, कुर्थी तथा सब्जियों में आलू, प्याज, लहसुन फूलगोभी, बंधगोभी, बंैगन, टमाटर, सलजम, भिण्डी, लौकी सहित अन्य कई प्रकार की हरी सब्जियां उगते हैं। अर्थात सिर्फ पेट नहीं भरते बल्कि पौष्टिक आहार ग्रहण करते हैं।

यहां के बच्चे अब निरक्षर नहीं है और न बच्चियां अनपढ़। 15 वर्ष पहले यहां के 10 प्रतिशत बच्चे भी स्कूल नहीं जाते थे। बच्चियों की तो बात ही न पूछिए। अब शत-प्रतिशत बच्चे-बच्चियां आंगनबाड़ी और गांव के मिडिल स्कूल में जाते हैं, छीजन की तो बात ही न करें छीजन बन्द हो गया है। सभी बच्चों के चेहरे पर कांति टपकती है और वे स्वच्छ और स्वस्थ नजर आते हैं। न सिर्फ यहां के लड़के बल्कि यहां की लड़कियां भी अब खेल-कूद में भाग लेने लगी हैं। गीत, संगीत और नाटक में भी शामिल होने लगी हैं। यहां की बहुऐं अब घुंघट उठाकर संघर्ष और अपने हक अधिकार के गीत गाने लगी हैं।
यह कहते हुए शीला देवी मुस्कराने लगती है और उसकी चमकती हुई आंखों में लालपुर के भविष्य का सपना तैरता दिखता है। जब उनसे पूछा गया-यह सब हुआ कैसे? तब शीला देवी 12 वर्ष पीछे चली जाती है और कहती है ‘यह एक युग की बात है, हमारे गांव में 12 वर्ष को एक युग माना जाता है। 12 वर्ष पहले लालपुर के ग्रामीणों को लगा कि गांव की गरीबी और परिवार की बदहाली दूसरों के भरोसे दूर नहीं की जा सकती। नेता आश्वासन अवश्य देते है पर अमल नहीं करते। इसलिए गांव की गरीबी और बदहाली को अपने बल पर दूर करना पड़ेगा। अपने हाथ को जगन्नाथ बनाना पड़ेगा’। गांव में बैठक हुई करीब-करीब सभी स्त्री-पुरूष शामिल हुए और तय किया गया कि हम सबों को मिलजुल कर कुछ करना होगा।
हमारे पास पानी है, लेकिन बह कर चला जाता है। हमारे पास श्रम है, लेकिन वह पलायित हो जाता है। हमारे पास हुनर है, लेकिन वह महाजनों के यहां गिरवी है। हमारे पास बुध्दि है, लेकिन हम सब अंधविश्वास से बंधे है। इन सबों को हमें रोकना और तोड़ना होगा। शीला देवी अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि इसी बीच हमारे गांव के युवकों का संपर्क ‘जुड़ाव’ नाम की एक संस्था से हुआ जिसके अल्पसहयोग से गांव की तस्वीर बदली जा सकी।
गांव का श्रम, गांव की बुद्धी, गांव का संगठन तथा जुड़ाव संस्था की दूरदृष्टि, लोक-हितकारी चिंतन और थोड़ा आर्थिक सहयोग के सामूहिक प्रयास से पूरा गांव उठ खड़ा हुआ। सबों की एक बड़ी महत्वपूर्ण बैठक हुई 2005 में। सबों ने मिलकर संकल्प लिया कि लालपुर गांव की तस्वीर बदलनी है और यहां के लोगों का भविष्य सुधरना है। काफी गहरे विचार-विमर्श के बाद बैठक इस निष्कर्ष पर पहुंची कि यहां के बहते पानी को रोककर सिंचाई में लगाना है। खेतों में गोबर खाद डालकर जमीन को उपजाऊ बनाना है, पलायन कर रहे युवकों को खेती-किसानी के काम में लगाना है और गांव के सभी लोगों में परिष्कृत चेतना का विकास करना है ताकि सभी मिलकर अपने संसाधन और श्रम का समुचित इस्तेमाल कर सकंे।
इसी बीच खगिया देवी मुस्कराती हुई आती है, शीला की कहानी को अपनी जुबानी आगे बढ़ाती है। खगिया देवी कहती है कि ‘लालपुर अब हरापुर हो गया है। यहां की अधिकांश जमीन अब लहलहाती फसलों से झूमने लगी है और झूमने लगे है यहां के लोग-बाग भी। 2005 में इस छोटे से गांव से 76 लोग काम की तलाश में कलकत्ता, दिल्ली, सूरत पलायन करते थे। जबसे गांव में समुचित विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ी है तब से गांव के मात्रा 8-10 युवा ऐच्छिक पलायन करते हैं। यहां के अधिकांश युवा अब अपने खेतों में तीन-चार फसल उगाकर आनंदमयी आजीविका का स्वाधीनता पूर्वक उपभोग कर रहे हैं।

खगिया देवी कहती है कि ‘2007 में इस गांव में एक लिफ्ट इरिगेशन और चेकडैम का निर्माण ‘जुड़ाव’ के सहयोग से हुआ। इस लिफ्ट इरिगेशन का उद्घाटन जलपुरूष राजेंद्र सिंह ने 14 फरवरी 2007 को किया। जब राजेन्द्र सिंह आए थे तब यहां के सैकड़ों ग्रामीण इकठ्ठा हुए थे। उन्होंने सबों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘जल संग्रहण एवं पटवन की यह विधि गांव के लिए वरदान साबित होगी और यह विधि लालपुर के लिए सचमुच वरदान साबित हुई है।
इस विधि के कारण आज लगभग 125 एकड़ जमीन जो बंजर थी, अब उर्वर बन गयी है। तीन फसलें होने लगी हैं। यहां के लोग महाजनों से मुक्त हो गए हैं। अंधविश्वास से लड़ने के लिए ग्रामीणों ने कमर कस लिया है। गांव में परंपरागत बीज के भंडार का निर्माण हो चुका है। जिसमें फिलहाल धान के 20 प्रकार के स्थानीय बीज, 12 प्रकार के दलहन के बीज तथा कई प्रकार की सब्जियों के बीज संग्रहित हैं। पूरा गांव अक्षय उर्जा (सौर उर्जा) से प्रकाशमान है। हर वर्ष गांव में 14-15 फरवरी को किसान मेला लगता है। इसमें दर्जनों गांव के मजदूर-किसान आकर अपने उत्पादों का प्रदर्शनी लगाते हैं।

लालपुर के ग्रामीण अब जन-प्रतिनिधियों एवं सरकार के पास नहीं जाते, वरन जन-प्रतिनिधि एवं सरकारी नुमाइन्दे उन तक दौड़े आते हैं। लालपुर के लोगों ने अब किसी के पास गिड़गिड़ाना एवं आंचल फैलाना छोड़ दिया है। वे अपने श्रम, संगठन और सहभाग के बल पर गांव की तकदीर स्वयं लिख रहे हैं और गांव के भविष्य की रचना में रमें है। लेकिन अभी बहुत लंबी यात्रा तय करनी है ताकि लालपुर स्वशासी, स्वावलंबी और स्वाभिमानी गांव बन गांधी के सपनों को साकार करते हुए अन्य गांवों एवं जन-प्रतिधियों के लिए उदाहरण बन सके।
(सामाजिक कार्यकर्ता, मधुपुर, झारखंड।)
