किसान आंदोलन: चर्चा पर चर्चा..बैठक दर बैठक..समाधान की उम्मीद नील बट्टा सन्नाटा

मंगरूआ

नयी दिल्ली: आज किसान आंदोलन का 35 वां दिन है। किसान सरकार से बातचीत करने विज्ञान भवन पहुंच गये है। दोनों पक्षों की तरफ से कहा जा रहा है बातचीत खुलेमन से होगी। लेकिन मांगों की फे​हरिश्त और अपने-अपने मांग पर जिस तरह का अड़ियल रवैया दोनों तरफ से उसे देख कर साफ है दोनों पक्ष बातचीत के लिए बैठेंगे। अपनी-अपनी कहेंगे। हाई टी आफर होगा। पहले की तरह ही सरकार के इस आफर को किसान इंकार करेंगे और उसके बाद बैठक खत्म। उसके बाद शुरू होगा आरोप प्रत्यारोप का दौर। अपना-अपना पक्ष रखने का सिलसिला। सरकार की भाषा उम्मीद भरी और किसानों को मनाने वाली होगी वहीं किसान संगठन अपने आंदोलन को और कड़ा करने की घोषणा करते हुए लौट जांएगे।


कहां फंसा हैं पेंच
सबसे बड़ा पेंच यही है कि सरकार कृषि कानून को ​​किसानों के हित में बता रही है और जब दिल्ली के सभी बोर्डर पर हजारों की संख्या में किसान जमे हुए रहे हैं उस दौरान भी केंद्रीय कृषि मंत्री और अन्य भाजपा के नेताओं मंत्रियों के साथ बहुत सारे ऐसे किसानों और किसान संगठनों से बातचीत करते रहे हैं और उनका समर्थन सरकार को मिलता रहा है कि ये कृषि बिल किसानों के हित में है। वहीं प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री और गृह मंत्री तक बार-बार ये दुहरा चुके हैं कृषि बिल किसानों के हक में है। यहां तक की वार्ता वाले दिन भी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कृषि कानूनों को लेकर कहा कि, कृषि संबंधी ये जो तीन कानून बने हैं ये किसानों के हितों को ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं। पिछले सरकारों की तुलना में हमने न्यूनतम समर्थन मूल्य काफी बढ़ाई हैं। इस तीनों कानूनों के माध्यम से हमने पूरी कोशिश की है कि किसानों की आमदनी दो-तीन गुना बढ़े। यदि इसमें संशोधन की जरूरत है तो सरकार तैयार है। कृषि बिल वापस नहीं होगी।


वहीं दूसरी ओर किसानों के पक्ष को देखें तो किसान यूनियनों का प्रतिनिधित्व करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा ने मंगलवार को केंद्र को लिखे पत्र में कहा कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने के तौर-तरीकों एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देने का मुद्दा वार्ता के एजेंडे का हिस्सा होना ही चाहिए।
यहां तक की वार्ता के लिए जाने वाले किसान नेताओं ने भी साफ कह दिया कि मुख्य मांग तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की है। यदि इस पर सरकार आगे बढ़ती है तो बातचीत होगी नहीं तो फिर वो अपना प्रदर्शन न सिर्फ जारी रखेंगे बल्कि किसान आंदोलन और तेज किया जाएगा। ऐसे माहौल में होने वाला बातचीत स्वाभाविक है बेनतीजा रहे और इसके सफल होने की उम्मीद शायद ही किसी को हो।


अब तक हो चुकी है 6 दौर की वार्ता
सबसे पहले किसान और सरकार के बीच अब तक हुई बातचीत में क्या निकला? सरकार से बातचीत का पहला दौर 14 अक्टूबर को शुरू हुआ था। इस बैठक में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की जगह कृषि सचिव आए। किसान संगठनों ने मीटिंग का बायकॉट कर दिया। वो कृषि मंत्री से ही बात करना चाहते थे। वहीं दूसरा दौर 13 नवंबर को हुआ और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान संगठनों के साथ बातचीत की। 7 घंटे तक चली यह बातचीत बेनतीजा ही रही।
इसके बाद 1 दिसंबर को तीसरे दौर की बातचीत हुई और तीन घंटे तक चली। सरकार ने एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव दिया, लेकिन किसान संगठन तीनों कानून रद्द करने की मांग पर ही अड़े रहे। फिर चौथे दिन की बातचीत दो दिनों बाद यानी 3 दिसंबर को हुई। सरकार और किसान संगठनों के बीच बातचीत साढ़े 7 घंटे तक बातचीत चली। सरकार ने वादा किया कि एमएसपी से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। किसानों का कहना था सरकार एमएसपी पर गारंटी देने के साथ-साथ तीनों कानून रद्द करे। इसके बाद दोनों पक्षों में 5 दिसंबर को वार्ता हुई। इस बैठक में सरकार एमएसपी पर गारंटी लिखित में देने को तैयार हुई, लेकिन किसानों ने साफ कहा कि कानून रद्द करने पर सरकार हां या न में जवाब दे। वहीं दोनों पक्षों में 6 ठे दौर की बातचीत 8 दिसंबर को हुई। यह बातचीत उस दिन की जब किसान संगठनों ने भारत बंद बुलाया था। उसी दिन देर शाम गृह मंत्री अमित शाह ने बैठक की। अगले दिन सरकार ने 22 पेज का प्रस्ताव किसान संगठनों को भेजा। इसे किसान संगठनों ने सिरे से खारिज कर दिया। किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि 22 में से 12 पेजों पर इसकी भूमिका, बैकग्राउंड, इसके फायदे और आंदोलन खत्म करने की अपील और धन्यवाद है। कानूनों में क्या-क्या संशोधन करेंगे, उसकी बजाय हर मुद्दे पर लिखा है कि ऐसा करने पर विचार कर सकते हैं। तीनों कानून रद्द करने के जवाब में हां या न में जवाब देने की जगह लिखा है कि किसानों के कोई और सुझाव होंगे, तो उन पर भी विचार किया जा सकता है।
लेकिन इस 22 पेज के दस्तावेज को देखें जो बातें सामने आती है उसमें एमएसपी की खरीदी जारी रखे जाने को लेकर सरकार इसे लिखित में देने को तैयार थी। वहीं किसान और कंपनी के बीच कॉन्ट्रैक्ट की रजिस्ट्री 30 दिन के भीतर होगी। कॉन्ट्रैक्ट कानून में साफ कर देंगे कि किसान की जमीन पर लोन या गिरवी नहीं रखने की बात कही गई। राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया कि राज्य सरकारें चाहें तो प्राइवेट मंडियों पर भी फीस लगा सकती हैं। इसके अलावा सरकारें चाहें तो मंडी व्यापारियों का रजिस्ट्रेशन जरूरी कर सकती हैं। सरकार ने साफ किया कि किसी भी कीमत पर किसान की जमीन कुर्की नहीं हो सकेगी। किसानों को सिविल कोर्ट जाने का विकल्प भी मिलेगा। इसके साथ ही सरकार ने कहा कि बिजली बिल अभी ड्राफ्ट है, इसे नहीं लाएंगे और पुरानी व्यवस्था ही लागू रहेगी।


साफ है ये वार्ता सिर्फ यह दिखाने के लिए हो रही है कि दोनों पक्ष बातचीत कर रहे हैं लेकिन समाधान के नाम पर उम्मीद नील बट्टा सन्नाटा ही रहेगा क्योंकि दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। अपनी-अपनी जिद है। किसान संगठन तीनों कानून रद्द करने की मांग पर अड़े हैं। किसान संगठनों का कहना है जब तक सरकार कानून रद्द नहीं करती, तब तक आंदोलन चलता रहेगा। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि कानून को न वापस लिया जा सकता है और न ही रद्द किया जा सकता है। किसानों के जो भी सुझाव होंगे, उस हिसाब से इसमें संशोधन कर सकते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *