बदला-बदला सा दिखता है मेरा गांव

आशुतोष कुमार सिंह
मां के बाद अगर कोई सबसे सुन्दर शब्द है तो वह है गांव। गांव की चर्चा होते ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है। आम, महुआ, जामुन, कटहल, बेर, पीपल एवं नीम के पेड़ों के संग की दोस्ती याद आने लगती है। आंगन में गौरइयों की चहकती आवाज हो अथवा फूदक-फूदक कर चलने की उनकी अदा, आंखों के सामने फिल्म की तरह ऊभरने लगते है।
याद है 2001 का वह दिन, जब पहली बार गांव-जवार से दूर पढ़ने के लिए लखनऊ जाना पड़ा था। घर के चौखट से बाहर निकले पैर भारी हो गए थे। गौशाला से बाछी टकटकी निगाह से देख रही थीं। मुहल्ले की भाभियां आशीर्वाद दे रही थी। बागीचे के पेड़ शुभकामनाएं दे रहे थे। काली मंदिर से आशीर्वाद लिया था। गांव के स्कूल का छूटना टीस पैदा कर रहा था। एक घंटे के सफर में जिला मुख्यालय जा पहुंचा था। वहां से बैरन रेलिया लखनऊ लेकर आ गई थी। तब से लेकर आज तक पढाई-कमाई का जो चक्कर लगा है, वह कमतर होने का नाम ही नहीं ले रहा है।

छुट्टियों में अथवा छुट्टी लेकर जब भी गांव गया हूं, गांव को बदला-बदला सा अनुभव किया हैं। गांव में बयार चल रही है, बदलाव की। यह बदलाव मुझे बिल्कुल ठीक नहीं लगा। गांव की आत्मा पर कुल्हाड़ी चलने जैसा महसूस होता रहा। गांव के युवा भटकाव के दौर से गुजर रहे हैं। बड़ों का आदर अब पहले जैसा नहीं रह गया है। यह स्थिति सिर्फ मेरे गांव की ही नहीं है बल्कि आस-पास के गांवों का भी हाल यही है। लड़कियों में ब्वाय फ्रेंड बनाने की होड़ लगी है तो दूसरी तरफ लड़कों में गर्ल फ्रेंड, क्रिकेट मैच, नए मोबाइल के मॉडलों की चर्चा ज्यादा मायने रख रही है।
बिहार के सीवान जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण में अवस्थित है रजनपुरा गांव। रजनपुरा ग्राम-पंचायत है। इस पंचायत में जलालपुर, उसरही, सेमरी एवं मुस्लिम टोला सम्मिलित है। 13 वार्ड में बंटे रजनपुरा ग्राम-पंचायत में 6 हजार से अधिक वोटर हैं। इस पंचायत की कुल आबादी 12 हजार के आस-पास है। बिहार की तकरीबन सभी जातियां इस पंचायत में हैं- डोम, हरिजन, दुसाघ, नोनिया, धोबी, नाई, गोंड, तेली, मल्लाह, यादव, कोयरी, लोहार, बनिया, राजपूत, कायस्थ एवं ब्राह्मण सहित तमाम जातियां इस पंचायत की शोभा बढ़ा रही हैं। हिन्दू एवं मुसलमान -दोनों धर्मों के उपासक इस पंचायत में है। मुस्लिम टोला एवं सेमरी मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, वहीं गांव के दक्षिण छोर पर भी कुछ मुस्लिम परिवार रहते हैं। इसी ओर दाहा नदी के किनारे डोम जाति के लोगों की बसावट है। इस समुदाय में पिछले चुनाव तक 7 वोटर थे। इनकी स्थिति पहले से खराब होती जा रही है। कारण है कि ये अपने मूल काम से भटक गए हैं। इनके लड़कों में वह हूनर नहीं आ पाया है जो इनके बाप-दादा में था। वैसे सरकार स्कील इंडिया अभियान के तहत लोगों को हुनर सीखाने का दावा तो कर रही है लेकिन जो हुनर पहले से ही भारतीयों में रहम है, उनको सहेजने का काम नहीं हो रहा है। मेरी समझ से डोम जाति देश-दुनिया की सबसे हुनरमंद जातियों में से एक है लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें आज भी अछूत समझा जाता है।

गांव के इसी कोने पर सड़क के उस पार धोबी जाति के कुछ परिवार रहते हैं। रजनपुरा गांव के उत्तरी छोर पर नोनिया लोगों की बस्ती है। इनका जीवन-यापन मनरेगा से मिलने वाले कामों और खेतों की कटाई-बुवाई के काम से होता हैा इन्हीं कामों से इनके परिवार का पालन-पोषण होता है। रजनपुरा चट्टी (हाट) से सटे यादवों की बसावट है। पशुपालन इनका मुख्य पेशा रहा है। पर नई पीढ़ी में शहरों में जाकर बस जाने का चलन आया है। बहुत से घरों के बच्चे विदेश चले गए हैं, इसलिए पशुपालन पर निर्भरता कम होती जा रही है। गांव के काली मंदिर के नजदीक सड़क पार हरिजनों की बस्ती है, गांव के अंदर भी इनके कुछ घर हैं। अब इनके घर की औरतें किसी धार्मिक आयोजन को छोड़कर ष्षायद ही किसी के घर काम करने जाती हैं। रोपनी-बोवनी में भी ये नहीं जातीं। इनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है। गांव के जो नाई हैं उन्होंने अपना सैलून खोल लिया है।
कुल मिलाकर रजनपुरा ग्राम-पंचायत शांति-प्रिय एवं गंगा-जमुनी तहजीब को जीवंत कर रहा है। मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में यह गांव नहीं बंटा। यह जरूर है कि पिछले दो-तीन वर्षों में कुछ लफंगों के कारण दो-तीन बार हिन्दू-मुस्लिम आमने-सामने हो चुके हैं। लेकिन इस पंचायत का इतिहास लड़ाई-झगड़ा वाला रहा नहीं है। मुझे याद है ताजिया के समय हमारे घर पर भी ताजिया का जूलूस आता था और मेरी बड़ी माँ एवं मम्मी धूप-अगरबत्ती एवं कुछ सीधा चढ़ाया करती थी। हालांकि यह दृश्य अब देखने को नहीं मिलता है।

रजनपुरा गांव का मिडिल स्कूल अभी तक उत्क्रमित होकर हाई स्कूल नहीं बन पाया है। ग्रामीणों की सालों से यह मांग रही है कि रजनपुरा मध्य विद्यालय को उच्च विद्यालय में तब्दील किया जाए। सरकार भी कह रही है कि प्रत्येक पंचायत में एक उच्च विद्यालय होगा। लेकिन सरकार की योजना इस गांव के लोगों तक कब पहुंचेगी, इसका पता किसी को नहीं। स्वच्छ भारत के तहत सभी घरों में शौचालय निर्माण की बात भी बेमानी ही साबित हो रही है। गांव के 60 फीसद घरों में शौचालय नहीं है। महिलाओं को अभी भी होत भिंसार अथवा सूरज के ढ़लने का इंतजार करना पड़ता है।
गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है जरूर, पर पिछले साल तक गांव के लोगों को मालूम नहीं था कि इस गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। जब हमने हस्तक्षेप किया तो स्वस्थ भारत अभियान के तहत एक एएनएम की बहाली हो सकी है। जलालपुर में 30 बेड वाला एक अस्पताल भी बन रहा है। साथ ही गांव में पावर ग्रीड हाउस गया है। अब गांव में 18 घंटे बिजली रहने लगी है। बिजली आने के बाद लोगों के घरों में फ्रीज, कुलर एवं वाशिंग-मशीन दिखने लगे हैं। घरों की दीवारों पर एलइडी टीवी भी लग गए हैं। गांव का विकास हो या नहीं हो,लेकिन दिल्ली में किसकी सरकार, कैसा काम कर रही है? एलजी एवं केजरीवाल में किस बात पर ठनी है, पाकिस्तान का प्रधानमंत्री कौन होगा? ऐसी तमाम जानकारियां इन तक पहुंच रही है। इन्हें यह नहीं मालूम है कि इनके लिए क्या जरूरी है, क्या नहीं। लेकिन नेशनल चैनल देखकर खुद को नेशनलिस्ट जरूर मान रहे हैं।

गांव के शिव मंदिर से गुजरकर भैरो घाट होते हुए हुसेना-बंगरा को जोड़ने वाली सड़क का तकरीबन 1 किमी का हिस्सा आज भी नहीं बन पाया है। गांव वाले बताते है कि ठेकेदार भाग गया। उससे किसी ने गुंडा-टैक्स मांगा था। अभी बारिश के दिनों में निकुंभ टोली के लोगों को अपना रास्ता बदलना पडता है। इस बावत गांव वालों ने कई बार कहा कि कुछ कराइए। लेकिन गांव वाले एक आवेदन लिखकर बीडीओ के पास नहीं दे सकते। जेई से बात करने वाला कोई नहीं है। मेरे कहने पर अखबार वालों ने इस मसले को एक-दो बार प्रकाशित भी किया लेकिन कुछ हुआ नहीं। शायद अखबार का असर भी अब खत्म होता जा रहा है।
तमाम बदलावों के बाद भी गांव की पगडंडिया वही हैं। बाग-बगीचे वही हैं। लेकिन द्वार पर आम एवं नीम के पेड़ अब नहीं रहे। उनके साथ बचपन की कई कहानियां भी दफन हो चुकी हैं। गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवहन की व्यवस्था पहले से बेहतर तो हुई हैं लेकिन जितनी होनी चाहिए, उतनी नहीं। वोट मांगने वाले वोट लेने के बाद नजर नहीं आते है। अतः गांव वालों से अनुरोध है कि किसी का इंतजार न करें। खुद जागें और अपने अधिकार की लड़ाई खुद लड़ें।
(स्वस्थ भारत डॉट इन के संपादक।)

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