समझ रहा है कॉरपोरेट इंडिया…भविष्य गांव का ही है

संकल्प सिन्हा

तुलसी दास ने लिखा है

धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
अर्थात धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। लेकिन इस कोरोना रूपी महामारी के इस दौर में जब पूरा देश लॉक डाउन में था तो इन चारों की तो परीक्षा हो ही रही थी, साथ ही परीक्षा की घड़ी वृद्ध, रोगी,निर्धन और दिव्यांगों की भी थी। या यूं कहे कि ये सारे खुद परीक्षा दे रहे थे और परीक्षक की भूमिका में थे राजनेता और बड़े कॉरपोरेट।

लेकिन इन सब के बीच कुछ और लोग थे जो पूरी मुस्तैदी से डंटे हुए थे वो सीमा पर सेना, अस्पताल में डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ, सड़कों पर पुलिस और सबसे महत्वपूर्ण में था यानी हमारा अन्नदाता जो खेत में डंटा हुआ था ताकी हमें अन्न की कमी न हो। जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार लगभग थम सी गई थी। बाजार बंद थे,फैक्ट्रियों से धुंआ नहीं उठ रहा था, मजदूर अपनी जान बचाने के लिए सड़क के रास्ते गांव की ओर चल पड़े थे, ऐसे में वह किसान ही था जिसने भारी भरकम अर्थव्यवस्था के बोझ को अपने कांधे पर रख कभी मुस्तैदी से खड़ा दिखा तो कभी तलमलाता हुआ। लेकिन कदम अंगद की तरह मुस्तैदी से जमे हुए थे।

हो भी क्यों न सवा सौ करोड़ लोगों के इस देश में भूख की चिंता जिसके उपर हो उसके कदम भला कैसे डगमगायेंगे। यही कारण है कि इस कोरोना महामारी के इस दौर में भी हमारे कृषि उत्पादन में ऐतिहासिक रूप से वृद्धि हुई है जिसने न सिर्फ भारत को जीवित रखा, बल्कि विश्व बिरादरी के समक्ष हमारी साख को भी बनाये रखा कि सवा सौ करोड़ का यह देश परेशानी तो उठायेगा लेकिन हर हाल में इसे दो जून की रोटी मयस्सर होगी। सही अर्थों नीति निर्माताओं के नीति निर्धारण में अब तक उपेक्षित रहे गांवों ने भारत को जीवित रखा है। भारत एक कृषी प्रधान देश है। कहा भी जाता है कि देश की आत्मा गांव में बसती है, शहरों में नहीं। जब धुआं छोड़ने वाले शहरों को बंद कर दिया गया, तो गांवों ने देश को जीवित रखा। जिस तरह से इस आपदा की घड़ी में रिकॉर्ड कृषि उत्पादन हुआ वह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सही मायने में वेंटिलेटर के रूप में काम करेगा। शाषण व्यवस्था की तीसरी ईकाई यानी पंचायत प्रणाली के महत्व को समझना और इसमें समयानुकूल बदलाव करना आवश्यक है। हालाकि इस दौरान सामाजिक भेद मानदंड, संगरोध मानदंड, मास्क का निर्माण/उपयोग, इन सभी गांवो ने महत्ती भूमिका निभाई है जबकी दूसरी तरफ शहरों और शिक्षित लोगों ने ही हमें निराश किया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विदेश में प्रवास कर रहा संपन्न वर्ग ही था ​जो इस महामारी का वाहक बना न कि ग्रामीण। बावजूद इसके मुख्यधारा की मीडिया के लिए इनकी दुरावस्था और इस महामारी से लड़ने में वॉरियर्स की भूमिका निभा रहे आम लोगों की कहानी के बजाय चर्चा सेलिब्रिटी की कहानियों की होती है।

मोदी के ‘मन की बात’:
विगत रविवार को प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कार्यक्रम में खुले मन से उन कहानियों को देश की जनता के सामने रखा जिसमें आम लोग विशेष रूप से ग्रामीण समाज कोरोना वॉरियर्स की तरह न सिर्फ लड़ता हुआ दिखा अपितु लोगों को राह भी दिखाया। उन्होंने कहा कि कोरोना के समय के दौरान, हमारे ग्रामीण क्षेत्र पूरे देश के लिए मार्गदर्शन के केंद्र के रूप में सामने आए। गांवों और ग्राम पंचायतों के स्थानीय निवासियों की ओर से प्रभावी प्रयासों के कई उदाहरण सामने आ रहे हैं।

इन पंचायतों की हुई चर्चा
प्रधानमंत्री ने कहा कि जम्मू में ग्राम त्रेवा नाम की एक ग्राम पंचायत है। वहां के सरपंच बलबीर कौर जी हैं। मुझे बताया गया है कि बलबीर कौर जी को उनकी पंचायत में 30 बेड का संगरोध केंद्र बनाया गया था। उन्होंने पंचायत की ओर जाने वाली सड़कों पर पानी की उपलब्धता की भी व्यवस्था की। उसने यह सुनिश्चित किया कि लोगों को हाथ धोने में किसी समस्या का सामना न करना पड़े। सिर्फ इतना ही नहीं बलबीर कौर जी, एक स्प्रे पंप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूरे पंचायत और उसके पड़ोस के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर सफाई करती हैं। इसी तरह, एक कश्मीरी महिला सरपंच है- गंटालबल के चौंतलियार की जैतुन बेगम जी। जैतुन बेगम जी ने फैसला किया कि उनकी पंचायत कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ेगी और इसके साथ ही आय के अवसर भी पैदा करेगी। उसने आसपास के क्षेत्रों में मुफ्त मास्क और मुफ्त राशन वितरित किया; उसी समय उसने फसल के बीज और सेब के पौधे वितरित किए ताकि लोगों को खेती और बागवानी में असुविधा का सामना न करना पड़े। दोस्तों, कश्मीर का एक और प्रेरक उदाहरण है। श्रीमन मोहम्मद इकबाल अनंतनाग के नगर अध्यक्ष हैं। उसे अपने क्षेत्र के स्वच्छता के लिए एक स्प्रेयर की आवश्यकता थी। उन्हें बताया गया कि मशीन को दूसरे शहर से लाना होगा, वह भी छह लाख रुपये की लागत से। इस पर, श्रीमान इकबाल जी ने, अपने प्रयासों के माध्यम से, एक स्प्रेयर मशीन को डिज़ाइन किया और बनाया, और वह भी पचास हजार रुपए की कीमत पर। ऐसे ही कई उदाहरण हैं। इस तरह के प्रेरक उदाहरण पूरे देश में, हर कोने से, हर रोज उभर रहे हैं।


प्रवासी बोझ नहीं तरक्की के देवदूत
देश के 137 करोड़ की आबादी एक विशाल बाजार के साथ-साथ संभावित विश्व निर्माता भी है। कॉरपोरेट इंडिया ने इस कोरोना काल में इस बात को बखूबी समझ लिया है। महिला समूह पीपीई किट तथा मास्क का निर्माण कर रहे हैं। ऐसे में सभी कॉर्पोरेट्स और सरकार के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है- अधिकांश प्रवासी जो वापस लौट आए हैं वे कुशल संसाधन हैं। उनका देश हित में बिना किसी विलबं के तुरंत उपयोग किया जा सकता है। इस डिजिटल युग में यह मायने नहीं रखता कि स्थान क्या है? प्रतिभा का उपयोग कहीं से भी किया जा सकता है? खासतौर पर गांवों से यानी उनके घरों से। वे वहां प्रवासी नहीं हैं, वहां के निवासी हैं। उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है। वहां उनके अपने है। उन्हें भरोसा है, वहां वे भूख से नहीं मरेंगे। कंपनियों को स्किल पूल लोकेशन बनाना चाहिए और लघुउद्योग शुरू करना चाहिए। उदाहरण के लिए झारखंड में ओरमांझी एक टेक्सटाइल हब हो सकता है। अधिकांश टेक्सटाइल कारखानों में काम से लौटे प्रवासियों इकट्ठा करें और काम शुरू करें। इसी तरह कॉरपोरेट्स पंचायत और स्थानीय सरकार से जुड़ सकते हैं और यह पहल शुरू कर सकते हैं। इसके जरिए स्थानीय स्तर पर रोजगार, ग्राम विकास जैसी कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हमारे गांव को केंद्र में लाएगा, और डिजिटल कनेक्टिविटी सभी अंतर को पाट देगी।

गांव में उद्योग की अपार संभावना
कोरोना के दौरान जो भी श्रमिक शहर से गांव लौटे उनका डाटा बेस तैयार कर उनके कौशल के हिसाब से काम देने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें केंद्र हो राज्य दोनों का अहम रोल है। सरकारों को कॉरपोरेट को टेबल पर बातचीत के लिए बुलाना चाहिए और यह सुनिश्चित होना चाहिए कि जो गांव लौटे हैं, उन्हें गांव में ही काम मिले। आप जब गंभीरता से देखेंगे तो इसके कई उदाहरण भी आसपास मिल सकते हैं। गांव ने दुग्ध उत्पादन और प्रोसेसिंग में क्रांति लाई। दुग्ध सहकारी समितियां चाहे अमूल हो, सुधा हो, मेधा हो या अन्य इसके बेहतर उदाहरण हैं। इसी तरह सब्जी विशेष रूप से पैकेज्ड वेजीटेबल और फल, दस्तकारी, हस्तनिर्मित सामान, चमड़े के जूते, बैग,पर्स,बेल्ट इन सब कामों को शहरों की बजाय आसानी से गांव में किया जा सकता है। सहकारी समूह के जरिए इसे सफलता पूर्वक चलाया भी जा सकता है। इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव लाकर कौशल को बाजार के अनुरूप तैयार कर गांव को संवारा जा सकता है। लेथ मशीन हो या आईटी सब गांव में संचालित किये जा सकते हैं। गांवों में आसानी से कॉल सेंटर संचालित किया जा सकता है। हमारे पास न्यूनतम प्रशिक्षण और लागत के अंश के साथ समर्पित संसाधन होंगे, तो हम ये काम आसानी से कर सकते हैं। आपने देखा होगा कि डिजिटल एरा में कैसे हमारे युवक और यु​वतियांह अब स्मार्टफोन का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं। ऐसा भी नहीं है उन्हें ​इसके लिए किसी ने प्रशिक्षण दिया हो। आज वे सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए देश दुनिया जसे जुड़े हुए हैं बस जरूरत है शहर को गांव की तरफ कदम बढ़ाने का। वैसे भी भारत में शहरों के इतिहास को गौर से देखें तो जो आज महानगर है वो कभी गांव थे। गांव कस्बे में बदला,कस्बा, कस्बा शहर में शहर नगर में और नगर महानगर हो गये। अब चक्र को उल्टा घुमाने का समय आ गया है। शहरों और महानगरों के उद्योगों को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए गांव का रूख करना होगा और हमारे गांव आत्मनिर्भरता व विकास की दिशा में कदम बढ़ायेंगे। यदि गांव में कॉरपोरेट जाते हैं तो इसका एक विशेष फायदा यह है कि कार्यसंस्कृती बदलेगी। गंव में सहयोग ज्यादा, जबकी शहरों में प्रतिस्पद्र्धा है। तुलना करेंगे तो गांव आउटपुट हमेशा ज्यादा रहेगा क्योंकि 1+1 = 2 नहीं ​की 1/1 = 1

(आईबीएम इंडिया में उच्च अधिकारी, देश—विदेश में पढ़ाई, गांव की मिट्टी से विशेष जुड़ाव व गांव की तरक्की के प्रति समर्पित)

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